Saturday, April 14, 2012

आंटी मां


नरेन्द्र फोन पर बात समाप्त करके एक गहन सोच में डूब गया। खिडकी का परदा हटा कर देखा, हलकी बर्फबारी हो रही थी। लंदन में इस साल देर से बर्फबारी शुरू हुई, जब हुई तो पिछले चार दिनों से लगातार हो रही थी। खिडकी पर परदा करके ईजी चेयर पर बैठ कर सोचने लगा। नरेन्द्र ईजी चेयर को हलके हलके झूला रहा था। सोच और उलझन लगातार बढती जा रही थी।
रविवार का दिन था। भारतीय महिला चाहे विदेश में सेटल हो, रविवार का दिन बाल धोने के लिए रिजर्व है। नीना नहा कर बाथरूम से तौलिए से बालों को झटकाती हुई निकली और खिडकी का परदा हटाया आज भी बर्फबारी हो रही है, पता नही मौसम कब साफ होगा।कह कर नीना सोफे पर बैठ गई। गंभीर मुद्रा में नरेन्द्र को देख कर पूछा क्या सोच रहे हो।
इंडिया चलेगी?”
इंडिया जाना है, इस बात में अति गंभीर होने की क्या बात है। कोई खास गंभीर बात है?” नीना ने नरेन्द्र के पास आकर उसका हाथ थामा।
कुछ समझ नही आ रहा है, लेकिन दिल कह रहा है जाने को। नीना यह बिजनस ट्रिप नही होगा, कुछ खास, कुछ निजी, अभी मैं तुमको समझा नही सकता, कि मैं क्यों जा रहा हूं, और तुमको क्यों साथ जाने को कह रहा हूं। बस जाना सोच लिया है। क्यो? मत पूछना।
नीना टुकर टुकर नरेन्द्र को ताकती रही। उसके मन में क्या उथल पुथल चल रहा है, समझने का असफल प्रयास करती रही। नीना को परेशान देख कर नरेन्द्र ने उसका हाथ चूम कर कहा नीना, डरने की कोई बात नही है। न तो कोई बिजनस की टेंशन है और न ही कोई परिवारिक। लेकिन यह तय है, कि हो सकता है कुछ जीवन में परिवर्तन आ जाए। हां अभी मैं खुद यकीन से कुछ कह नही सकता।
नीना को नरेन्द्र की दार्शनिक बातें समझ में नही आ रही थी। बिजनस और परिवार में हमेशा संतुलन बना कर चलने वाला नरेन्द्र कभी कभी दार्शनिक बाते भी  करते थे, लेकिन उनकी सोच एक दम शुद्ध, निर्मल और साफ रहती थी, लेकिन आज उनके विचारों में दुविधा नजर आ रही है। विवाह के तीस वर्ष पश्चात इंडिया जाने पर आज पहली बार नरेन्द्र को एक दुविधा में देख रही थी। तीस वर्ष पहले नरेन्द्र के साथ अग्नि के समक्ष सात पवित्र फेरे लेकर लंदन आई थी, मात्र बीस वर्ष की उम्र में मां, बाप, भाई, बहिन को सात समुन्द्र पार छोड कर नरेन्द्र में समा गई। इंडिया कभी कभी पांच, सात साल बात जाना होता। नरेन्द्र एक सफल बिजनेसमेन, लंदन के साथ भारत में भी कई ऑफिस है। नरेन्द्र का तो इंडिया आना जाना रहता था, लेकिन नीना अपनी गृहस्थी में रमी कभी कभार भारत जाती। अब दोनो शादीशुदा बच्चे, एक पुत्र और एक पुत्री अपनी गृहस्थी और बिजनेस में बिजी थे।
नरेन्द्र पचपन और नीना पचास की उम्र में एक नई जिन्दगी में प्रवेश करने जा रहे हैं, यह नीना तो सोच नही सक रही थी, लेकिन नरेन्द्र कुछ कुछ इसकी आहट सुन रहा था।
शाम तक नरेन्द्र की उधेडबुन खत्म हुई। नीना, इस बार इंडिया हम लम्बे समय के लिए जाएगे। हो सकता है, एक या फिर दो महीने।
दो महीने सुन कर  नीना आश्चर्यचकित हो गई।
हैरान हो रही हो, नीना, क्योंकि आज तक मैं दो महीने लगातार इंडिया नही रहा। हमेशा बचता हूं, लम्बे समय तक इंडिया में रहने के लिए। मैंने तुम्हे कभी नही बताया। यह राज सिर्फ मेरे बचपन का मित्र राजेश और ननीहाल वाले जानते हैं। पिताजी भी नही रहे। कभी कभी वो कहते थे, इंडिया जाते हो, ऊंटी वाली आंटी से मिल लिया करो। मैं ऊंटी नही गया। पिताजी की मृत्यु के बाद किसी ने उस आंटी से मिलने के लिए नही कहा। मामा मामी जानते थे, कि मैं क्यों नहीं मिलना चाहता हूं। इसलिए उनहोनें कभी नही कहा। खैर छोडो, इंडिया जाकर इस बार सबसे मिलना है, सब के गिले शिकवे दूर करने की कोशिश करूंगा।
नीना उंटी वाली आंटी के बारे में कुछ खास नही जानती थी। बस उतना, जितना नरेन्द्र ने कभी कभी थोडा सा बताया।
नीना, ससुराल जाऊंगा, कुछ खातिर होगी भी या नही।" नरेन्द्र ने हंसते हुए चुटकी ली।
हुजूर सिर आंखों पर बिठाएगे, जनाब बरसों बाद जवाई बाबू का पदापर्ण होगा।
मजाक के मूड में हो।
शुरूआत तो जनाब आपने की थी।
हलकी फुलकी नौंक झौंक के बाद नीना का इंडिया फोन मिलाने का सिलसिला शुरू हुआ, कि वो नरेन्द्र के साथ आ रही है। अगले दिन सबके लिए गिफ्ट खरीदे गए। दो दिन नरेन्द्र ने दिए। दो दिन बाद इंडिया जाना है।
इंडिया में कोम्बटूर एयरपोर्ट में राजेश ने उनको रिसीव किया। कार में बैठ कर उंटी की ओर रवाना हुए। सडक के किनारे टेक्सटाईल्स मिलों के बीच निकल कर आधे घंटे पश्चात अन्नूर के जयललिता रेस्टारेंट रुक कर इडली सांभर और छोले कटलट खाए।
रियली टेस्टी, भाई साहब, दक्षिण भारत में दक्षिण और उत्तर भारत का बेहतरीन स्वादिष्ट खाना बहुत समय बाद खाया है।नीना ने राजेश का शुक्रिया अदा किया।
रेस्टारेंट के पास फल की दुकान से नरेन्द्र ने संतरे और अंगूर खरीदे। पहाडी रास्ता है, गोल धुमावदार रास्ते में कभी कभी दिल उकताई ले लेता है, संतरे, अंगूर रामबाण साबित होते है।नरेन्द्र ने नीना को कहा।
राजेश ने छोटे केलों उठाते हुए नरेन्द्र को कहा इन केलों के साईज पर मत जाऔ, स्वाद चख कर बताऔ, कि कितना दम है, छोटे से केले में।
केला मुंह में रख कर नीना बोली वाकई इतना छोटा पिद्दी सा केला आज तक नही देखा। स्वाद बेमिसाल। एक मिठास और बेहतरीन खुशबु के साथ, चख कर देखो, नरेन्द्र।
वाकई, बेमिसाल स्वाद। राजेश लाल केले भी खरीद लो। बचपन में लाल केले मेरी पहली पसंद थे।
फल खरीदने के बाद कार केले, नारियल, सुपारी के खलियानों के बीच गुजरती कार मेट्टुपलायम पहुंची। मेट्टुपलायम से उंटी की ट्रेन चलती है।। राजेश ट्रेन में चले, एक रोमांस है, छुक छुक ट्रेन, जब प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच गुजरती है।
ट्रेन का समय नही है, उंटी से कन्नूर का सफर करेंगे, कल।      
मेट्टुपलायम से उंटी का पहाडी रास्ता शूरू हुआ। घुमावदार रास्ता, एक तरफ पहाड, बीच में कहीं कहीं झरने और दूसरी तरफ पेडों पर बंदरों के झुंड अठखेलियां करते हुए, कहीं कहीं सडक के बीच में वार्तालाप करते हुए, गाडी आता देख किनारे पर बैठ जाते। नीना मंत्रमुग्ध प्रकृतिक सौन्दर्य निहारती रही। नरेन्द्र भी पूरे रास्ते कार के बाहर प्रकृतिक सौन्दर्य देखता रहा।
राजेश, आज मैं करीब तीस वर्ष बाद उंटी जा रहा हूं, पुरानी यादे ताजा हो गई है। ट्रेन का सफर प्रफुल्लित करता था। नीना तुम पहले उंटी आई हो।
नही, आज पहली बार आ रही हूं।
कार कन्नूर पार करते हुए उंटी जा रही थी। भाभीजी नीचे आपको घाटी में रेल नजर आ रही है, इसी जगह मशहूर फिल्मी गीत छैय्या छैय्या की शूटिंग उंटी ट्रेन में हुई थी।
बिल्कुल टॉय जैसी ट्रेन लग रही है।
टॉय ट्रेन ही कहते हैं।
बातों बातों में उंटी आ गया। कमर्शियल रोड से कुछ दूरी पर हेवलॉक रोड में 123 नंबर बंगला मारबोरोह हाउस पर कार रूकी। केयरटेकर शशीकुमार ने स्वागत किया।
आंटी कहां हैं।
शशीकुमार ने आखरी कमरे की ओर ईशारा किया। कमरे की ठीक बीच एक लकडी का बडा सा पलंग, जो एक से बडा और दो से छोटा था। रजाई ओढ कर एक वृद्धा लेटी थी। नरेन्द्र चुपचाप वृद्धा के पैरो के पास बैठ गया। नीना नरेन्द्र के समीप खडी हो गई। कुछ देर की शांती के बाद राजेश वृद्धा के समीप जाकर बोला आंटी, देखो, नरेन्द्र आया है।
तुरन्त वृद्धा ने आंखे खोली। वृद्द आंखों में गजब की चमक आ गई। बहुत ही धीमे स्वर में कह पाई बेटा...। इधर आ।
नरेन्द्र वृद्धा के पैर छूकर उसके मुख के पास आ गया। नीना के ओर ईशारा करके कहा मां, तुम्हारी बहू।
मां शब्द सुन कर नीना आश्चर्यचकित हो गई। एकाएक धबराहट में वृद्धा के पैर छुए। वृद्धा ने नीना को आर्शीवाद दिया और नरेन्द्र के समीप बैठने को कहा। नीना पास आ गई। वृद्धा ने नीना का हाथ अपने हाथों में लिया। हाथों को चूमा। वृद्धा की आंखों में आंसू थे। वृद्धा की उम्र नब्बे वर्ष के आसपास थी. छुरियों से भरपूर खूबसूरत गोरा चेहरा। कुछ असपष्ट से शब्दो में कुछ कह रही थी, लेकिन समझ में नही आया। आंखें मूंद कर नीना के हाथ को चूमती रही। प्यार से विभोर सब कुछ न्यौछावर करने को आतुर थी वृद्धा। नम आंखों को बंद करके आर्शीवाद देती रही। नरेन्द्र शशीकुनार से आंटी की तबीयत के बारे में पूछता रहा। आंटी पिछले सात आठ महानों से बीमार चल रही थी. बिस्तर तक सीमित थी। डाक्टर घर में आकर देख जाता था। डाक्टर अस्पताल में दाखिल कराने को कहता है, वहां अच्छे से तीमारदारी हो सकती है। नरेन्द्र ने डाक्टर को बुला कर आंटी को अस्पताल में दाखिल करवाया। रात को नरेन्द्र थक कर सो गया, लेकिन नीना की आंखों में नींद गायब थी।

सुबह लॉन में हल्की गुनगुनी धूप छा रही थी। नरेन्द्र और नीना कुर्सियां डाल कर चाय की चुस्कियां ले रहे थे।
आपने कभी मां के बारे में बताया नही। अपने दिल में दफन करके रखी थी।
बचपन में ही दफन कर दी थी। पर कुछ रिश्ते ऐसे होते है, कि वो जिन्दा भी रहते है और दफन भी। मां का रिश्ता भी कुछ ऐसा था। नीना मै मां को ऊंटी वाली आंटी कहता था। बहुत कम बताया, तुम्हे, मैंने तुमहे कभी नही बताया कि आंटी मेरी मां है, वास्तविक नाम देविका रानी है। अपने समय की मशहूर फिल्म अभिनेत्री।
अभिनेत्री शब्द सुन कर नीना चौंक गई।
हां, फिल्म अभिनेत्री आभा, पचास के दशक की मशहूर अभिनेत्री। ब्लेक एँड वहाइट जमाने की अभिनेत्री। तुम्हे फिन्मों का शौंक है। आभा की भी फिन्में देखी होगी।
"हां, कुछ देखी हैं, कभी सोचा नही, कि वो तुम्हारी मां है।
तभी शशीकुमार ने संदेश दिया कि होस्पीटल से फोन आया है। आपको बुलाया है।
चलो नीना, अस्पताल चलते हैं। अस्पताल में डाक्टरो से मुलाकात की। सब डाक्टरों और नर्सों से मां का पूरा ख्याल रखने को कहा। हर संभव उपचार की हिदायात थी और एडवांस पेमेंन्ट जमा की। नीना मां को देख रही थी। मां आज भी सुन्दर है। नब्बे वर्ष की उम्र में पतला, दुबला, झुरियों वाला शरीर अपनी बीती सुन्दरता का ब्खान कर रहा था। आज मां को देख कर कोई भी यौवन में सुन्दरता सोच सकता है। बहुत ही सुन्दर रही होगी मां। नीना मां की पुरानी फिल्मों की याद ताजा करके सौन्दर्य का विष्लेणन कर रही थी।
अस्पताल से बाहर आकर नरेन्द्र नीना को रोज गार्डन ले गया। नीना यह रोज गार्डन भारत का सबसे बडा रोज गार्डन है। गुलाब के फूलों से लदा बगीचा हर फूल को निहारने का आमंत्रण दे रहा है। गुलाब के फूलों की खुशबू आत्मविभोर कर रही है। हर वैरेयटी का फूल आकर्षित कर रहा है। मां की सुन्दरता और व्यक्तित्व गुलाब की खुशबू की तरह खींचती थी। गुलाब की हर समानता मां में थी। गुलाब में कांटा जरूर होता है। कांटा फिल्म अभिनेत्री होना।
सीडीयां उतरते रोज गार्डन और ऊंटी शहर की सौन्दर्य निहारते हुए बातें करते रहै। नीना नरेन्द्र की दार्शनिक बातों को अब कुछ कुछ समझ रही थी। मां के बारे में नरेन्द्र नीना को थोडा थोडा बता रहा था। रोज गार्डन के बाद दोनों बोटेनिकल गार्डन पहुंचे। जहां रोज गार्डन सीडीयां नीचे उतरता जाता था, वहीं बोटेनिकल गार्डन ऊंचाई पर जा रहा थआ, नीचे देख कर बाग की खूबसूरती अनोखी लग रही थी।
नीना रोज गार्डन, बोटेनिकल गार्डन की गहराई, ऊंचाई की छटा, सौन्दर्य अलग है, वैसे मां का सौन्दर्य भी देखने वाला था। बचपन की यादें मस्तिषक के किसी कोने से निकल आती हैं। दफन करने के बाद भी जिन्दा रहते हैं। कभी दिल में, कभी मन में। यादें फिर से दस्तक देती हैं। मां के साथ मेरी भी खूबसूरती की तारीफें की जाती थी। मेरी तरफ देखो, नीना, मां की खूबसूरती मेरे में नजर क्या आ रही है?”
बोटेनिकल गार्डन की खूबसूरती निहारने के बाद पति के मुख को निहारने लगी। पति तो सुन्दर थे। विवाह के समय भी की खूब छेडा गया था, पत्नी से अधिक सुन्दर पति है। सुन्दर, खूबसूरत पति पर नीना को शुरू से नाज था। कभी तुलना नही की, लेकिन मां और नरेन्द्र की शक्ल और सौन्दर्य में समानता है।

रात को ठंड अधिक थी। बोनफायर के पास बैठ कर नरेन्द्र ने पुराना पिटारा खोला। मां अपने फिल्मी नाम आभा के नाम से जानी जाती थी। मेरे पिता एक सफल उद्योगपति। पार्टियों में मिलते रहे, प्यार हुआ, फिर पवित्र विवाह के बंधन में बंध गए। विवाह के पश्चात मां ने फिल्मों में काम करना छोड दिया। मेरे जन्म के बाद मां में फिल्मों में काम करने की इच्छा व्यक्त की। पापा और परिवार मां के फिल्मों में फिर से काम करने के खिलाफ थे। पापा चाहते थे, कि मां उसके साथ बिजीनेस में हाथ बटाए, लेकिन गलैमर की चकाचौंध और फिल्म इंडस्ट्री से ऑफर ने मां को फिल्मों की तरफ दुबारा मोड दिया। मैं मात्र तीन साल का था, कि मां और पापा का तलाक हो गया। पापा ने दूसरी शादी कर ली, लेकिन दस साल बाद कैंसर की बीमारी से दूसरी मां का देहान्त हो गया। मेरा बचपन ननीहाल में बीता। कभी कभी मां से मिलना होता, मैं मां से दूर दूर रहता, क्योंकि मैंने मां को पापा से झगडते देखा। मां की कमी खलती थी। समाचारपत्रों या फिल्मी मैगजीनों से मां के बारे में गौसिप ही सुनने को मिलते थे। इसी कारण किसी को मां के बारे में नही बताता था। मैंने मां को मृत्य घोषित कर दिया था, सभी को कहता था, कि मां का देहान्त मेरे बचपन में ही हो गया और मेरी परवरिश ननिहाल में हुई। पांचवी कक्षा तक मुम्बई में पढा, फिर उंटी के स्कूल में होस्टल से पढाई की। पापा बिजीनेस में डूबे रहते, लेकिन हर साल गर्मियों की छुट्टी में पापा मुझे लंदन ले जाते। मेरा बचपन उंटी के इसी बंगले में हुआ था। पापा ने मां को शादी में यह बंगला गिफ्ट किया था। यह बंगला पहले एक अंग्रेज वॉटमेन का था। वॉटमेन का पापा से बिजीनेस संबंध थे। देश आजादी के कुछ साल बाद जब वॉटमेन वापिस इंगलैड चले गए तब पापा ने यह बंगला खरीदा था और शादी में मां को गिफ्ट किया था, लेकिन जब दुबारा मां फिल्मों में चली गई, तब इस बंगले को छोड दिया था, लेकिन बंगला मां के नाम था। स्कूल की पढाई के बाद पापा मुझे लंदन ले गए। कॉलेज इंगलैड में और फिर पापा के साथ बिजीनेस में आ गया। उधर मां ने भी दूसरी शादी कर ली। लगभग बीस साल पहले दूसरे पति का देहान्त हो गया और तब से मां इसी बंगले में रह रही है। पापा चाहते थे, कि मेरी शादी किसी अच्छे रईस परिवार में हो, लेकिन फिल्मी बैकग्राउंड की मां को देख कर मैं किसी साधारण परिवार की लडकी से विवाह चाहता था, ताकि उसकी महत्वकांक्षा से विवाहिक जीवन पर कोई आंच न आए, इसी कारण एक मध्यमवर्गीय परिवार की युवती नीना को अपना जीनवसाथी बनाया, जिस का मुझे गर्व है, कि मेरा निर्णय गलत नही रहा। हांलाकि पापा ने पहले इसका विरोध किया था, लेकिन मेरी बात और बचपन का अनुभव सुन कर स्वीकृति दे दी। मां के फिल्मी बैकग्राउंड ने मां को काफी समय तक सुर्खियों में रखा। दूसरे पति के देहान्त के बाद मां ने पाप से संपर्क बनाया। मुझे कुछ कुछ ऐसा लगता है, कि पापा मां से इंडिया मिलने भी गए और मां लंदन आई। दोनों काफी समय तक एक साथ रहे। मैं इस गहराई में कभी नही गया। पापा ने एक बार मुझसे कहा, कि मां से एक बार मिल ले, मैंरे इन्कार करने के पश्चात फिर जिक्र नही किया। पापा की मृत्यु के पश्चात राजेश ने मां के बारे में बात की, लेकिन मैंने मना कर दिया। मां ने राजेश से संपर्क बनाये रखा। कभी कभी राजेश मां के बारे में बताता, मैं सिर्फ सुनता रहता। समय बीतता गया, मां के बारे में मेरी राय बदली नही।

ऊंटी आए तीन दिन हो गए थे। मां के मेडिकल टेस्ट हो चुके थे। मां के चेहरे पर रौनक थी। उम्र की वजह से डाक्टरों ने कोई उम्मीद नही दिलाई, लेकिन नरेन्द्र को संतुष्टि थी, मां से मिल कर और मां को चैन था, पुत्र से मिल कर।

शशीकुमार ने समाचार पत्र नरेन्द्र को दिए। मुख्य पृष्ठ पर मां की फोटो के साथ लेख छपा था। बीते जमाने की मशहूर अभिनेत्री आभा का पुत्र मिलन। नरेन्द्र मुसकुरा दिया। नीना के आगे अखबार सरका दिया। नीना पढने लगी। मां की पुरानी फोटो के साथ अस्पताल के बेड पर लेटी मां की फोटो। मीडिया नरेन्द्र के बारे में कुछ जानती नही, जो अस्पताल के सुत्रो से पता चला, छाप दिया कि लंदन से पुत्र ईलाज करवाने आया। बरसों बाद मां बेटे का मिलन हुआ है।

ऊंटी के आसपास प्राकृतिक सौन्दर्य बहुत है। ऊंटी से पाइकारा लेक जाते हुए नीना सोचती रही। विवाह से पहले घर, स्कूल और कॉलिज तक नीना का जीवन सीमित रहा। इंडिया घूमी नही, विवाह के बाद घर, बच्चों तक सीमित नीना ने अधिक भ्रमण नही किया। यूरोप, अमेरिका भ्रमण किया, पर इंडिया की बात कुछ और है. इंटरनेट के जमाने में इंडिया यूरोप से आगे लग रहा है।

नीना पाइकारा लेक की सुन्दरता प्राकृतिक है। दोनों छोर को देखो, कभी नही मिलते। लोग आनन्द लेते है, भ्रमण करके चले जाते हैं। वैसे मां और पिता सुन्दर, अपने अपने फील्ड में अव्वल, मां अभिनेत्री, पिता उद्योगपति, मिलन हुआ, लेकिन दो अलग छोर की तरह सदा मिलकर रह नही सके। दूर से दो छोर मिलते नजर आते है। नजदीक जाते है, मिलते छोर और अधिक दूर होते जाते हैं। सामने देखो, दो छोर नही मिल रहे है। तमिलनाडु की सीमा समाप्त हो कर केरल की सीमा आरम्भ हो रही है। कुछ ऐसा ही मां, पिता के साथ हुआ। मिले, बिछडे, सुना फिर मिलते रहे, पर एक नही हुए। एक सीमा समाप्त होती है, दूसरी आरम्भ हो जाती है।

अगली सुबह नरेन्द्र देर से उठे। लेकिन मीडिया ने उठने से पहले दस्तक दी। मीडिया से दूर रहने वाले नीना, नरेन्द्र ने दो टूक बात की, वे सिर्फ बेटे का फर्ज निभा रहे है। मां के बारे में कुछ नही छुपा, सब जानते है, मैं मां से दूर रहा, लेकिन भारत से दूर रह कर भी वह कभी भारतीय सभ्यता, संस्कृति नही भूला है। जैसे ही मां की तबीयत के बारे में मालूम हुआ, फौरन इंडिया आ गया।

एक सप्ताह बाद बूडी मां की आंखों की चमक कई गुणा बढ गई थी।

नीना, मां की तबीयत अब ठीक है। हो सकता है, कि दीपक बुझने से पहले की ज्योती हो, फिर भी दिल को तसल्ली है, मैं मां से मिला, मां ने मुझसे, तुमसे मिल कर अंतिम खुशी हासिल कर ली है। कुछ दिन भारत भ्रमण पर चलते है। ससुराल पहुंच कर खातिर करवाने की प्रबल इच्छा है।

पहला पडाव कन्याकुमारी डाला। विवेकानंद मैमोरियल से तीन सागरों के मिलन के अदभुत नजारे में खो गए. नीना, तीन सागरों का पानी अलग रंग का है, तीनों का संगम स्पष्ट दिखता है, फिर अपना रंग खो देते है, एक रंग में आ जाते है।
क्या अब भी मां से घृणा करते हो।
नही, नीना, अगर करता, तो मां से मिलने नही आता। मेरी घृणा, नफरत, मां के प्रति नजरिया, तीन सागरों के पानी की तरह आपस में मिल गया है, एक नए रंग में। वह रंग है, प्यार, श्रद्धा का। मानव जीवन विभिन्न अवस्थाऔ से गुजरता है। बचपन में जो देखा, उस की छाप पढी। एक छोटे बच्चे के दिल में मां बाप के झगडे और मां की दूरी ने जो नफरत दी। सच तो यह है, कि यह छाप कुछ दिन पहले ही हटी है। बच्चे के कोमल दिल पर छाप पक्की होती है। शायद विवेकानंद मैमोरियल की खासियत है, कि मैं नये रंगों में रंग गया हूं। जब मां ने दिल से बुलाया, तब घृणा, नफरत समाप्त हो गई है। आज एक छोटे बच्चे की तरह हूं, मां की बात मान लेता हूं। जो हुआ, तीनों सागर के एक दूसरे में मिलते पानी में बहा कर सिर्फ एक रंग में रंगा गया हूं, वह रंग है, सिर्फ प्रेम का।

कन्याकुमारी के बाद मायके, ससुराल में कुछ दिन ठहर कर भारत भ्रमण के बाद ऊंटी वापिस पहुंचे। राजेश से मां की तबीयत की खबर मिलती रही। मां से मिलने अस्पताल पहुंचे। बहू, बेटे को समीप देख बूडी आंखों की चमक कई गुणा बढ गई। डाक्टरों ने अस्पताल से छुट्टी दे दी। नरेन्द्र , नीना मां के पास ही रूक गए। नरेन्द्र ने सदा के लिए भारत में बसने का निर्णय लिया। नरेन्द्र को आभास था, कि उम्र के इस पढाव में तबीयत में सुधार ठीक वैसे है, जैसे दीया की लौ बुझने से पहले तेजी से जलती है। अस्पताल से लौट कर मां से बंगला नरेन्द्र के नाम कर दिया। बहू नीना के गुण गाती नही थकती थी। नीना ने तीमारदारी में कोई कसर नही छोडी।

एक माह पश्चात मां ने देह छोड दिया।          

Saturday, March 24, 2012

साध्वी


शहर की प्रसिद्ध वेश्या चंपाबाई ने मरते समय बारह साल की कन्या ललिता बाई, शानदार हवेली और दो करोड़ रुपये छोडे थे। चंपाबाई शाही वेश्या थी और बादशाह के संयोग से ललिता बाई का जन्म हुआ, इसलिए वेश्या होते हुए भी समाज में ऊंचा स्थान था। बादशाह के दरबार में आना जाना था। कोई आंख उठा कर चंपाबाई की तरफ नही देख सकता था। शाही वेश्या होने के कारण और बादशाह की खास मेहरबानी के कारण चंपाबाई ने धन, संपति और समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त किया। चंपाबाई की मृत्यु पर ललिता बाई हांलाकि मात्र बारह वर्ष की थी, बादशाह ने उसे मां चंपाबाई का स्थान अर्थात शाही वेश्या का स्थान दिया। ललिता बाई मां चंपाबाई से सुन्दरता में चार कदम आगे थी। बादशाह की कृपा से पढाई और नृत्य, संगीत में महारत मात्र बारह वर्ष की छोटी उम्र में कर ली।

उस दिन शाम का समय था। अब ललिता बाई सोलह वर्ष की हो गई थी। ललिता बाई हवेली की दूसरी मंजिल पर अपने कमरे में गद्दी लगा कर बैठी थी। सुन्दर गोरा रंग। सभी तरह की कलाओं में माहिर थी। मां की तरह उसने भी इस छोटी उम्र में काफी नाम अ©र शोहरत हासिल कर ली थी, आखिर शाही वेश्या का दर्जा जो हासिल था। कमरे में सभी तरह के बाजे रखे थे। अलमारियों में सुकवियों के कविता ग्रन्थ और साहित्य रखा था। कमरे में वह एकदम अकेली थी। सितार उठा कर नाजुक कलाईयों से मधुर संगीत छेडा। गीत गुनगुनाने लगी। काफी देर तक अपने संगीत में डूबी ललिता बाई अपनी सुधबुध खो बैठी। सहसा उसकी नजर सामने दरवाजे पर टिक गई। एक ब्रह्मचारी नवयुवक को दरवाजे पर देख कर हैरान हो गई। कुछ देर तक वह उस नवयुवक को ऊपर से नीचे तक देखती रही। लंबा कद गोरा रंग, चौडी छाती, कोई भी लड़की उस युवक को देख कर गश खाकर संभल नही सकती थी। जैसे ललिता बाई किसी को भी मंत्र मुग्ध कर सकती थी, ठीक उसी तरह वह युवक भी अपने रुप से जादू कर सकता था। दोनों में बस एक फर्क था। जहां ललिता बाई एक ऊंची शाही वेश्या थी, वह नवयुवक ब्रह्मचारी एक फकीर था। उसे देख कर पहले ललिता बाई मंत्र मुग्ध ह¨ गई, लेकिन फिर संभल कर बोली - नीचे मेरा सिपाही नही मिला था।
ब्रह्मचारी - सिपाही तो कोई नजर नही आया। 
ललिता बाई - यहां क्यों आए हो।
ब्रह्मचारी - नीचे एक आदमी से पूछा कि किसी सत्संगप्रिय सज्जन का मकान बताऔ। रात गुजारनी है। फकीर हूं। इस शहर में अजनबी हूं। तो उस ने इस मकान को इशारे से बताया कि ऊपर चले जाऔ र मैं यहां चला आया।
ललिता बाई - वह मुंह से कुछ बोला था।
ब्रह्मचारी - नही।
ललिता बाई - अच्छा तो यह बात है, फिर क्या हुआ।
ब्रह्मचारी - होना क्या है, बस मैं आपके सामने आ गया।
ललिता बाई - और वो सिपाही।
ब्रह्मचारी - कैसा सिपाही। दरवाजे पर कोई नही था। मैं तो किसी सेठजी का मकान समझ कर यहां चला आया। शायद मेरे से गलती हो गई है। आपको तकलीफ हुई। आप मुझे क्षमा करे। मैं प्रस्थान करता हूं। अब ब्रह्मचारी समझ चुका था कि उसके साथ मजाक हुआ है। यह किसी सूफीआना तबीयत वाले सेठ का मकान नही, बल्कि किसी वेश्या की हवेली है।
ललिता बाई - आप अजनबी हैं और सज्जन ब्रह्मचारी। आपसे किसी ने मजाक किया है, लेकिन आप सच्चे मन से रात बिताने आए हैं। आप को आश्रय जरूर मिलेगा। बस इतना सा काम मेरी खातिर करें कि जो भी दरवाजे पर खडा हो, उसे बुला लाए।

ब्रह्मचारी नीचे जाकर एक चौदह साल के लडके को ले आया। उस लड़के का नाम महमूद था। ललिता बाई के सामने वह हाथ जोड कर खडा हो गया। ललिता बाई तपाक से बोली – महमूद, जब ये ब्रह्मचारी ऊपर आ रहे थे तो आप कहां थे।
महमूद - पेशाब कर रहा था।
ललिता बाई - तुमने इनहे ऊपर आते देखा।
महमूद - हां हजूर।
ललिता बाई - रोका क्यों नही।
महमूद - पेशाब करते समय बोलते नही है हजूर। इसलिए नहीं रोका। मैंने सोचा, ऊपर जा रहा है, नीचे भी आएगा।
ललिता बाई - मेरे से मसखरी करता है, कोई और नही मिला तेरे को मसखरी के लिए। एक भोले बाबा के साथ मजाक करता है। अब इसकी सजा भी भुगत। पूरी जिन्दगी पेशाब करता रह, तेरी आज से छुट्टी।
महमूद - हुजूर रहम करें बंदे पर। एक छोटी सी खता पर इतनी कठोर सजा मत दें। मैं माफी मांगता हूं।
ललिता बाई - तू माफी के लायक नही हैं। एक सज्जन, भद्र पुरूष के साथ गंदा मजाक। तमाम उम्र माफी नही दी जाऐगी। दफा हो जा यहां से। मेरी नजर से दूर हो जा। बादशाह से कह कर शहर से बाहर निकलवा दूंगी। कुध्र हो कर ललिता बाई ने कहा।
महमूद - मेरी खता की इतनी सजा न दो। मैं कहां जाऊंगा। आपके दर से निकाला गया तो ¨ई आश्रय भी नही देगा। आपके और बादशाह के हुक्म में कोई अंतर नही है।
ललिता बाई का गुस्सा शान्त नही हो रहा था। उसने चिल्ला कर कहा - मेरी आंखों के आगे से गायब हो जा। 
ब्रह्मचारी ललिता बाई और महमूद का वार्तालाप शान्त भाव से सुन रहा था। जब ललिता बाई गुस्से में चिल्लाई तब हाथ जोड कर उसने ललिता बाई से विनती की।
ब्रह्मचारी - जब आपने मुझे रात भर आश्रय देने का वायदा किया है तो एक वायदा और किजिए। इसकी छुट्टी मत किजिए। मैं समझ चुका हूं कि इसने मेरे साथ मजाक किया है। एक सेठ की जगह एक वेश्या के घर भेज दिया। इसके मसखरेपन को माफ किजिए और मुझे प्रस्थान की अनुमति दीजिए। जाने से पहले आप एक वायदा किजिए कि आप इस छोटे से लडके को माफ करेंगीं। इसकी छुट्टी मत किजिए।
ब्रह्मचारी की विनम्रता पर ललिता बाई ने महमूद क¨ माफ कर दिया।
ललिता बाई - महमूद जा माफ किया। लेकिन इस बात को हमेशा याद रखना, कि एैसा मजाक भविष्य में कभी दुबारा न हो।
जाते जाते महमूद ने ब्रह्मचारी के चरण स्पर्श कर माफी मांगी। महमूद के जाने के बाद ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा। यह दुष्ट महमूद तो चला गया, लेकिन मैं आपको इतनी रात में कहीं भटकने नही दूंगी। आप यहीं रूकिए। आप के रहने का प्रबंध मैं करवाती हूं।
ब्रह्मचारी - मैं एक फकीर हूं। एक वेश्या के घर नही रूक सकता। मैं अनजाने में गलती से आपके यहां आ गया।  मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूंगा। फकीर हूं। रात कहीं भी खुले में किसी पेड के नीचे काट लूंगा।
ललिता बाई – नही, आप जिस उद्देश से आए हैं, वे तो पूरी होंगी। आप रात्रि विश्राम, भोजन और सत्संग के लिए एक सेठ का मकान ढूंढ रहे है। आपको यहां तीनों चीजें मिलेगीं। आप सत्संगी ब्रह्मचारी बाबा हैं। मुझमें एक लडकी, वेश्या की बजाए सत्संगी सेठ का रुप देखिए। रुप, देह मत देखिए, आत्मा को देखिए। यही तो आपका ज्ञान है। शरीर तो नश्वर है। एक वेश्या नही, बल्कि एक साधारण स्त्री आपसे कुछ शिक्षा चाहती है। आपका फकीराना साथ चाहती हूं। आपसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा जीवन धन्य हो सकता है। हांलाकि मैं शाही वेश्या हूं। समाज में ऊंचा स्थान है। लेकिन मैं जानती हूं कि यह सब बादशाह के डर के कारण है। वरना लोग मुझे इतना ऊंचा स्थान कभी न दें। मेरे नम्र निवेदन को ठुकराईयें मत। अपने ज्ञान के अथाह सागर की चन्द बूंदे मुझे देकर कृतग करें।

ललिता बाई की फकीराना बातों को सुन कर ब्रह्मचारी वहां रह गया। बादशाह की कृपा से ललिता बाई ने ऊंची शिक्षा प्राप्त की थी। ललिता बाई ने पहले ब्रह्मचारी को भोजन करवाया और फिर सूफियाना बातों में मशगूल हो गई। पूरी रात बीत गई। ललिता बाई ब्रह्मचारी के ज्ञान के अथाह सागर में डूब गई। सुबह ब्रह्मचारी प्रस्थान करने लगा तो ललिता बाई ने ब्रह्मचारी को जाने से रोका।
ब्रह्मचारी - मैं अब यहां रूक नही सकता। जिस उद्धेश से यहां आया था, वह पूरा हो गया। रात आपके साथ सत्संग में गुजर गई। भोजन भी मिला। मैं आगे प्रस्थान करूंगा।
ललिता बाई - आपके यहां रात में रूकने के तीन उद्धेश थे। रात्रि विश्राम, भोजन और सत्संग। आपके सिर्फ दो उद्धेश पूरे हुए, भोजन और सत्संग के। तीसरा उद्देश तो अधूरा रह गया, रात्रि विश्राम तो मैंने आपको करने ही नही दिया। आपके ज्ञान के अथाह सागर में इतना डूब गई कि आपको विश्राम नहीं करने दिया। आज आप विश्राम किजिए, कल चले जाना।

ब्रह्मचारी ललिता बाई के आग्रह पर विश्राम करने रूक गया। बिस्तर में लेटते थके ब्रह्मचारी को नींद आ गई, लेकिन ललिता बाई की नींद गायब हो चुकी थी।
वह उसके व्यक्तित्तव पर दिल लुटा चुकी थी। जिस ललिता बाई का बादशाह समेत हर नागरिक दिवाना था, वह एक फकीर ब्रह्मचारी पर मुग्ध हो कर होश गंवा चुकी थी। ब्रह्मचारी नींद में था और ललिता बाई खुली आंखों से ब्रह्मचारी के साथ जीवन बिताने के सपने देखने लगी। ब्रह्मचारी का साथ पा कर ललिता बाई की जिन्दगी सिर्फ एक रात्र में बदल गई। फकीराना बातें कर उसने ब्रह्मचारी क¨ एक हफ्ते तक रोक लिया। हवेली की सबसे ऊपर की मंजिल पर रहने का इंतजाम कर दिया। पूरा हफ्ता ललिता बाई ने अपने वेश्या के पेशे को त्याग दिया और उस नवयुवक ब्रह्मचारी के साथ सुफीयाना और फकीराना अंदाज में रही।
ललिता बाई और ब्रह्मचारी के साथ की बातें शहर में हर जुबान पर होने लगी। बात बादशाह के दरबार में पहुंची। बादशाह ने ललिता बाई को दरबार में आने का हुक्म दिया, जिसे ललिता बाई ने ठुकरा दिया। बादशाह ने नाराज होकर सेना के सिपाही ललिता बाई को बंदी बनाने भेजे। बंदी बना कर ललिता बाई को दरबार में पेश किया गया।
ललिता बाई - बादशाह को सलाम। मैं आपनी शाही वेश्या की पदवी वापिस करती हूं। आप किसी और को इस पदवी से नवाजे।
बादशाह - इस गुस्ताखी की वजह।
ललिता बाई - ब्रह्मचारी के ससंर्ग में आने पर मेरी जिन्दगी का नजरिया बदल गया है। मैं भौतिक सुख त्याग कर फकीराना जिन्दगी बिताना चाहती हूं।
बादशाह - तुम्हे मौत की सजा दी जा सकती है।
ललिता बाई - कोई डर नही।

ललिता बाई के निडर तेवर देख कर बादशाह ने दरबारियों से सलाह कर यह सोचा कि जबरदस्ती ललिता बाई क¨ बंदी बना कर उसके शरीर से खेला जा सकता है, लेकिन उसका दिल नही जीता जा सकता है। एक बेजान शरीर से खेलने का कोई फायदा नही। बादशाह ने ललिता बाई को आजाद कर दिया। हवेली लौटने पर ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा - अब मैं हर बंधन से मुक्त हूं। जैसा आप कहेंगें। वैसा ही होगा। आप के साथ फकीराना करूंगी। 
ब्रह्मचारी - यहां रह कर फकीरी नही होगी।
ललिता बाई - आप जहां कहेंगें, वहीं आपके साथ रह कर आपका साथ निभाऊंगीं।
ब्रह्मचारी - मैं एक जगह टिकता नही। शहर शहर गांव गांव जा कर ज्ञान बांटता हूं।
ललिता बाई - मैं भी साथ चलूंगी।
ब्रह्मचारी - तुम्हारी सम्पति का क्या होगा।
ललिता बाई - दान दे दूंगी और हीरे का मुकुट माधव जी को चढाऊंगी फिर तुम्हारे साथ फकीरी करूंगी।
ब्रह्मचारी - सोच लो।
ललिता बाई - अब दुबारा सोचने का समय नही है। मेरा दृढ निश्चय है।

ब्रह्मचारी रूक गया। ललिता बाई ने ब्रह्मचारी को दिए वचन के अनुसार अपनी सारी संपति बेच दी या फिर दान कर दी। पूरे शहर में यह खबर आग की तरह फैल गई कि शाही वेश्या ललिता बाई ने इतनी छोटी उम्र में सब कुछ एक नवयुवक ब्रह्मचारी के लिए त्याग दिया। माधवजी का मंदिर शहर का सबसे प्रतिष्ठित मंदिर था। मुकुट चढाने की पुरानी परमपरा थी। बृहस्पतिवार का दिन, ललिता बाई बाजे गाजे और विशाल जन समूह के साथ माधव जी के मंदिर पचास लाख के हीरे का मुकुट चढाने पहुंची। पूरा नगर सिर्फ माधवजी के मंदिर को उमड पडा। बादशाह भी पूरे दरबार समेत मंदिर में उपस्थित थे। बादशाह के सिपाही भीड को नियन्त्रित कर रही थी। मंदिर के पुजारियों ने एक वेश्या के पैसो से बना मुकुट नही स्वीकार किया। चारो तरफ सन्नाटा छा गया। ब्रह्मचारी ने तब आगे आ कर कहा - माधव जी के मंदिर में नृत्य की परंपरा है। ललिता बाई नाचने के बाद अपने हाथों में मुकुट उठाएगी, अगर माधवजी मस्तक झुका देंगें तो मुकुट पहना देंगें वरना बिना मुकुट पहिनाए वापिस चलें जाऐगें।

इस प्रस्ताव पर सहमति हो गई। ललिता बाई दो घंटे तक नृत्य करती रही। उसे न तो खुद का होश था और न ही अपने वस्त्रो का। जैसे ही नृत्य के बाद ललिता बाई ने मुकुट उठाया, माधवजी का मस्तक झुक गया। सभी पुजारी चुप। सबने ललिता बाई का जयजय घोष किया। एक वेश्या ने माधवजी के मुकुट पहनाया।
मुकुट पहनाने के बाद ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा - अब चलिए, फकीराना जिन्दगी की शुरूआत करते हैं।
ब्रह्मचारी - हम दोनों जवान है। एक साथ फकीरी नहीं कर सकेंगें। कही बहक गए तो।
ललिता बाई – फिर।
ब्रह्मचारी - तुम इस शहर में रह का फकीराना करो, मैं दूसरे शहर जाता हूं।
ललिता बाई - मुझे स्वीकार है।

यह सुन कर बादशाह ने शहर की सीमा पर ललिता बाई की फकीराना जिन्दगी के लिए जमीन दे दी और रहने के लिए एक छोटी कुटिया का निर्माण करवा दिया। इसके बाद ललिता बाई उस कुटिया में फकीराना जिन्दगी बिताने लगी। ब्रह्मचारी दूसरे शहर चला गया। जाने से पहले ब्रह्मचारी ने ललिता बाई को नया नाम साध्वी मां ममता दिया। साध्वी सुफीआना अंदाज में कीर्तन करती और धर्म प्रचार करती। दूर राज्यों में भी उसकी प्रसिद्धी फैल चुकी थी। सैकडों लोग रोज उसकी कुटिया में साध्वी मां ममता के दर्शनार्थ आते। ब्रह्मचारी हर साल कुटिया आता। साध्वी ब्रह्मचारी से शिक्षा प्राप्त करके आगे बांटती। गर साल कुटिया के स्थापना दिवस पर ब्रह्मचारी मौजूद रहते। साध्वी की बात का सम्मान बादशाह भी करते। साध्वी के अनुयाई बढते गए। 

कुछ वर्ष बाद बादशाह की मृत्यु हो गई। बडा लडका नया बादशाह मनोनीत हुआ। साध्वी का यौवन अभी भी बरकरार था। सादे लिबास में अब भी किसी को मनमोहित कर सकती थी। उसकी कुटिया का विस्तार हो गया था। नया बादशाह एक दिन शिकार के बाद जब लौट रहा था तब उसकी नजर साध्वी पर पडी। देखते ही वह साध्वी पर मुग्ध हो गया। उसे शाही हरम में रखने के लिए फरमान जारी कर दिया। साध्वी ने दो टूक जवाब दिया कि शाही वेश्या की पदवी वर्षो पहले छोड दी है और फकीराना जिन्दगी व्यतीत कर रही है। बादशाह ने काफी दबाव डाला, लेकिन साध्वी टस से मस नही हुई। बादशाह ने सिपाही भेजे। खबर सुनते ही नगरवासी कुटिया पर एकत्रित हो गये। सिपाहियों से जमकर मुकाबला किया। निहत्थे नगरवासी अधिक देर तक बादशाह के सिपाहियों का मुकाबला न कर सके। कई नगरवासी शहीद हो गए। साध्वी निहत्थे नगरवासियों के बलिदान पर दुखी होकर समाधी में जाने का फैसला कर लिया। उसने सिपाहियों को खबर पहुंचावाई कि वे निहत्थे नगरवासियों का कत्लेआम रोक दे। कल सुबह बादशाह मेरी कुटिया में आ सकते हैं। फैसला सुन कर बादशाह खुश हो गया। कत्लेआम रोक दिया गया। नगरवासियों ने कुटिया को अभी भी घेरा हुआ था। सिपाही पीछे हट चुके थे। वे सिर्फ हालात पर नजर रखे हुए थे। प्रमुख नगरवासियों ने साध्वी से उसके फैसले पर दुबारा विचार का आग्रह किया।

ललिता बाई - मैं निहत्थे नगरवासियों का दुख नही देख सकती। मैं एक फकीर हूं। मैं आप सबको वचन देती हूं कि बादशाह मेरे जिस्म को हाथ नही लगा सकेगा।

नगरवासी आशंकित थे। कुटिया के चारों तरफ घेरा डाल कर पूरी रात चैकसी करते रहे। कुटिया के अंदर साध्वी ध्यान में डूब गई। ब्रह्मचारी मुझे माफ कर देना, अब इस जन्म में तुमसे मिलन नही हो सकेगा। मैं नगरवासियों की बली नही देख सकती हूं। मैं समाधी में जाकर अपने प्राण त्याग रही हूं। आपके बताए रास्ते पर चली और ज्ञान बांटा, लेकिन अत्याचारी बादशाह के आगे बेबस हूं। मैं नगरवासियों की रक्षा चाहती हूं। उनके, अपने अनुयाईऔं की जान बचाने के लिए प्राण छोड रही हूं।

प्रभात के समय साध्वी ने प्राण त्याग दिए। सूरज की पहली किरण के साथ साध्वी मां ममता के प्राण त्यागने का समाचार आग की तरह फैल गया। निहत्थे नगरवासियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सेना के सिपाहिऔं पर धावा बोल दिया। उन के हथियार छीन कर बादशाह के महल की ओर कूच किया। शहर में बगावत हो गई। बादशाह की हवस के कारण साध्वी के प्राण त्यागने पर सेना के कुछ सिपाहिऔं ने विद्रोह कर दिया और नगरवासियों में हथियार बांट दिए। बादशाह के महल में जमकर युद्ध हुआ। अंत में जीत नगरवासियों की हुई। बादशाह को कत्ल कर दिया गया।

साध्वी मां ममता की कुटिया में उसकी समाधी बनाई गई। हर बृहस्पतिवार क¨ समाधी पर मेला लगने लगा। छोटा सा लडका महमूद, जिसने ब्रह्मचारी से मसखरी की थी, समाधी की देखभाल करने लगा।

आज फिर कुटिया का स्थापना दिवस है। हर साल की तरह ब्रह्मचारी फिर शहर में आया। साध्वी की तलाश की तो मालूम हुआ, कि साध्वी ने शरीर त्याग दिया है। कुटिया में उसकी समाधी बन गई थी। हर बृहस्पतिवार क¨ समाधी पर मेला लगता था। ब्रह्मचारी समाधी पर गया और नमस्तक हो गया। एक वेश्या का चरित्रोद्धार दुनिया के लिए एक अनोखी मसाल थी। ब्रह्मचारी ने कुछ दिन शहर में रूकने का विचार किया। समाधी से बाहर आकर रात्री विश्राम के लिए उसने एक सज्जन से किसी उपयुक्त स्थान का पता पूछा। वह सज्जन महमूद था। ब्रह्मचारी क¨ देखते ही पहचान गया और मुस्कुराते हुए बोला - पहचाना नही ब्रह्मचारी, आपसे बारह साल पहले एक मसखरी की थी।
ब्रह्मचारी – महमूद, बडे हो गये हो। दाढी, मूंछ रखते हो इसलिए पहचान नही सका।
महमूद - ठीक है, मैंने उस रात आपसे मसखरी की थी, लेकिन सच यह भी है, उस मसखरी के बाद एक शाही वेश्या साध्वी बन गई।
ब्रह्मचारी - आज फिर कौन सी मसखरी करने का इरादा है।
महमूद की आंखों मे आंसू छलक आए - सोचा नही था, एक मसखरी साध्वी का जीवन बदल देगी। उसे अपने प्राण त्यागने पडेगे।
ब्रह्मचारी - चाहता तो मैं यह हूं कि तुम फिर से कोई मसखरी करो, शायद फिर कोई ललिता बाई साध्वी जन्म ले।