Monday, July 02, 2018

विवाह उपरांत पढ़ाई



अनुप्रिया पढ़ने में होशियार थी। हर वर्ष स्कूल में प्रथम स्थान पर रहती थी। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन कॉलेज में भी कम नही हुई। उसकी इच्छा दिल्ली के सबसे अच्छे और प्रतिष्ठित  कॉलेज में पढ़ने की थी लेकिन परिवार ने घर से दूर पढ़ने की अनुमति नही दी। न चाह कर भी उसे सोनीपत के स्थानीय कॉलेज में पढ़ना पढ़ा। पढ़ाई के प्रति लगन कम नही हुई। मन पसंद कॉलेज में दाखिला मिलने के बावजूद परिवार ने उसका दाखिला नही करवाया कि लड़की है, हर रोज दो-ढाई घंटे कॉलेज पहुँचने में लग जाएंगे। हर रोज चार से पांच घंटे तो आने जाने में लग जाएंगे। घर के पास कॉलेज में उसका दाखिला करवाया।

कॉलेज में जहाँ छात्र मौज मस्ती में रहते थे वहां अनुप्रिया सदा पुस्तकों संग रहती थी। क्लास या फिर लाइब्रेरी में ही अनुप्रिया रहती थी। प्रथम वर्ष की परीक्षा के कुछ दिन पहले जहाँ छात्रों ने पुस्तकों को हाथ लगाया वहां अनुप्रिया ने एक मीठी मुस्कान के संग पुस्तकों को विराम दिया। परीक्षा के पश्चात लगभग डेढ़ महीना परीक्षाफल आने तक अनुप्रिया ने घर के काम सीखे और साथ में द्वितीय वर्ष की पुस्तकें पढ़नी शुरू कर दी।

आखिर परीक्षाफल आ ही गया। अनुप्रिया ने किसी को निराश नही किया। वह कॉलेज में ही नही बल्कि पूरे विश्विद्यालय में प्रथम रही। अनुप्रिया का हौसला बढ़ता गया। द्वितीय और तृतीय वर्ष में भी अनुप्रिया प्रथम रही। अनुप्रिया आगे और पढ़ना चाहती थी लेकिन उसका परिवार उसके हाथ पीले करने के सपने देख रहा था। बीए के बाद उसको आगे नही पढ़ने दिया। परिवार की निगाह में लड़की का विवाह जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। यह तो अनुप्रिया की पढ़ने की धुन ने उसके परिवार को बीए तक रोक लिया वर्ना उसके परिवार में चाचा, ताऊ की लड़कियों की शादी स्कूल की पढ़ाई के फौरन बाद ही हो गई। उसके परिवार को चिंता होने लगी कि यदि अनुप्रिया पढ़ती रही तब कहीं दूसरे धर्म या जाति में स्वयं विवाह न कर बैठे। इसलिए उसके परिवार ने उसकी एक नही सुनी औऱ बीए के रिजल्ट आते ही उसका विवाह कर दिया।

विवाह होते उसने सोचा कि अब आगे पढ़ने का उसका सपना अधूरा ही रह गया और गृहस्थ जीवन मे पति-बच्चों तक ही उसकी जिंदगी सिमट जाएगी।

विवाह के पश्चात कुछ दिन अनुप्रिया पानीपत रही और उसके बाद पति आनंद के संग दिल्ली रहने आ गई। पति आनंद दिल्ली में कार्यरत था। सोनीपत के अपने संयुक्त परिवार और बड़े मकान के बाद पानीपत ससुराल में संयुक्त परिवार और बड़े मकान में कुछ दिन रहने के पश्चात दिल्ली में एक छोटे से फ्लैट में रहना अनुप्रिया को अजीब लगा। डीडीए का एक छोटा सा एलआईजी फ्लैट जो शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाता है। दरवाजा खोलते ही छोटी सी बैठक, उसके पीछे छोटा सा बैडरूम जहां डबल बेड के अतिरिक्त सिर्फ कपड़े रखने की अलमारी ही थी। एक छोटी सी रसोई और छोटा सा बाथरूम।

पानीपत से दिल्ली आते-आते रात के आठ बजे गए थे। रात का खाना आनंद पानीपत से पैक करवा के ले आया था कि देर रात पहुंचने और थकान के कारण खाना कौन बनाएगा। ढाबे या होटल के खाने से घर का खाना अच्छा है इसलिए रात का खाना घर से ले आये थे। थकान के कारण खाना खाने के पश्चात आनंद औऱ अनुप्रिया ने थोड़ी देर बातें की और फिर एक दूसरे की बाहों में सिमट गए।
आनंद अभी दो दिन और छुट्टी पर था। अगली सुबह आनंद फ्लैट के समीप बाजार से फल-सब्जी ले आया और अनुप्रिया की गृहस्थी आरम्भ हो गई।
"अनु रसोई कला में तो तुम माहिर हो। सब्जी और दाल एकदम बढ़िया औऱ स्वादिष्ट हैं।"
"लगता है कुछ अधिक तारीफ कर रहे हो।"
"नही अनु एकदम दिल से अच्छे खाने की तारीफ निकली है। झूठ नही कह रहा हूँ।" आनंद ने अनुप्रिया को बाहों में जकड़ लिया।"
"यह कोई समय है कोई बाहों में लेने का? अनु ने आनंद की बाहों से निकल कर कहा।
"प्रेम के लिए एकांत का हर पल उपयुक्त होता है।" कह कर आनंद ने अनु को फिर से बाहों में जकड़ लिया।

दिल्ली में पहला दिन तो प्रेमालाप में बीत गया। अगली सुबह आनंद अभी नींद में था लेकिन अनुप्रिया उठ कर घर के कामों में व्यस्त हो गई। उसने अपने सूटकेस खोले और कपड़ो को अलमारी में समेटने के लिए जैसे आलमारी खोली वह स्तब्ध हो गई। आधी अलमारी में आनंद के कपड़े और समान था और आधी अलमारी में पुस्तकें थी। वह एक-एक करके पुस्तकें देखने लगी। आईएएस परीक्षा की तैयारी की पुस्तकों के साथ अर्थशास्त्र, इतिहास, वाणिज्य, हिंदी, अंग्रेजी और कानून की पुस्तकों के साथ रामायण, गीता, आध्यात्मिक और उपन्यास से आधी अलमारी भरी हुई थी। अनुप्रिया पुस्तकों में उलझी हुई थी। आनंद की नींद खुली और उसने अनुप्रिया को बाहों में लिया। पुस्तकों के ढेर संग अनु आनंद के ऊपर लुढक गई। पुस्तकों के बीच दोनों खिलखिला के हंस पड़े।
"ये सब पुस्तकें आपकी हैं?" अनुप्रिया ने उत्सुकता से पूछा।
"हां मेरी ही हैं।" आनंद ने मुस्कुरा कर पूछा।
"मुझे तो किसी ने बताया ही नही कि आप इतने पढ़ते थे।"
"मिस पढ़ाकू पढ़ते तो हम भी थे लेकिन विश्विद्यालय में प्रथम नही आए। लेकिन अनुप्रिया जब तुम पूरे विश्विद्यालय में प्रथम आई तब आगे पढ़ाई क्यों नही की?"
"क्योंकि आपकी श्रीमती जो बनना था।"
"मजाक छोड़ो, सच में बताओ, पढ़ाई क्यों छोड़ी?"
"घर वालों को पसंद नही था। हमारे परिवार क्या पूरे गांव में पढ़ने की परंपरा ही नही है। मैं परिवार के विरुद्ध नही जा सकी।"
"आगे पढ़ना चाहती हो?"
"मेरे चाहने से क्या होगा?"
"आगे पढाई होगी और क्या।"
"क्या यह संभव है?" अनुप्रिया की आंखों में आश्चर्य के भाव थे।
"अनु इस वर्ष तो विश्विद्यालय में दाखिला नही हो सकेगा। समय निकल चुका है। अगले वर्ष अपने मनपसंद विषय मे दाखिले की कोशिश करना।"
"क्या आप मुझे आगे पढ़ने दोगे?"
"बिल्कुल पढ़ने दूंगा।"
"सच्ची में?"
"बिल्कुल सच्ची मुच्ची।"
आगे पढ़ने की अनुमति मिलते ही अनुप्रिया खुशी से झूम गई और आनंद से लिपट गई।
"अच्छा आपने अपने बारे में कुछ बताया ही नही कि कितना पढ़े हैं और कहाँ काम करते हैं?"
"कमाल है तुम्हारे घर वालों ने कुछ बताया ही नही क्या"?"
"सच्ची में कुछ नही बताया। बस इतना बताया था कि लड़का अच्छा कमाता है और देखने में सुंदर है।"
"जब मैं तुम्हे देखने आया था तब पूछ लेती?"
"क्या पूछती?" अकेले में मिलने ही नही दिया था। पूरे घर वालों के सामने क्या बात करती?"
"यह बात तो है, तुम्हारे घर वाले पुराने खयाल के हैं। मुझे भी तुम्हारे साथ बात नही करने दी।"
"तो फिर पसंद क्यों किया?"
"देखने में ठीक ठाक थी और विश्विद्यालय में प्रथम रही तभी तुम्हारे संग विवाह की हामी भर दी।"
"और तुमने?"
"घर वालों ने पहले ही कह दिया था कि लड़के के बारे में सभी जानकारी जुटा ली है। शरीफ लड़का है, अच्छा कमाता है, शराब सिगरेट नही पिता। देखने में तुम्हारे से अधिक सुंदर है। लड़का हाँ बोले तो झट से हाँ बोल देना।"
"अच्छा सुबह की चाय स्वयं बनानी होगी या श्रीमती जी थोड़ा कष्ठ करेंगी?"
"थोड़ा क्या पूरा कष्ठ करेगी। चाय, नास्ता, लंच और डिनर श्रीमती की जिम्मेवारी है।"
चाय पीते हुए अनुप्रिया आनंद से उसकी पुस्तकों के बारे में पूछा।
"बी.कॉम के बाद कानून की पढ़ाई की। एलएलबी के साथ प्रतियोगिताओं की भी तैयारी की लेकिन असफल रहा। बी.कॉम और एलएलबी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की लेकिन सभी एंट्रेंस परीक्षाओं में असफल रहा। एलएलबी के बाद एलएलएम में भी प्रथम श्रेणी में पास हुआ। परिवार पर कब तक बोझ बन कर रहता। एलएलएम के बाद लॉ फर्म में नौकरी कर ली। सोचता हूँ थोड़ी रकम बचा लूं फिर वकालत की प्रैक्टिस ही शुरू कर दूं।"
"हमें तो मालूम ही नही था कि हमारे सैयां वकील साहब हैं।"
"अभी तो मेरे पास तलाक के केस हैं। किसी सहेली या रिस्तेदार का तलाक करवाना हो तो कम फीस में मुकदमा कर दूंगा।"
अनुप्रिया खिलखिला दी। दो दिन बाद आनंद ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। अनुप्रिया ने छोटे से फ्लैट को दो दिन में चकाचक चमका दिया और अलमारी में अपने और आनंद के कपड़े व्यवस्थित करके बैठक में पुस्तकों के लिए बाजार से एक शोकेस खरीद लिया।
"पत्नी गृहणी हो तब विवाह के बाद घर स्वर्ग बन जाता है। अकेला रहता था कभी घर को व्यवस्थित करने की जरूरत नही समझी। सुबह ऑफिस जाना और रात को आना। रविवार को पूरे सप्ताह के कपड़े धोना, साफ सफाई। यहां तो दो दिन में ही घर की नई शक्ल निकल आई है।" आनंद ने अनुप्रिया की तारीफ की।
"देखो यह तो गृहणी का कर्तव्य है। इसमें तारीफ की कोई आवश्कयता नही है। मुझे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है।"
"बताओ किस मुद्दे पर सलाह लेनी है। वकील हूँ सलाह की फीस लगेगी।"
"कौन सी और कितनी फीस लोगे?"
"पति-पत्नी का प्रेम ही फीस है।" आनंद ने अनुप्रिया को बाहों में कैद करते हुए कहा।
"देखो आप तो ऑफिस सुबह नौ बजे चले जाते हो और रात आठ बजे वापस आते हो। घर का काम दो घंटे में सिमट जाता है और विश्विद्यालय का अगला सत्र में अभी आठ महीने हैं। मुझे क्या करना चाहिए? आप की क्या राय है?"
"अनु मैं तो आईंएएस और जुडिशरी दोनों में असफल रहा। हो सकता है कि मेरी किस्मत में शायद वकालत लिखी है। तुम पढ़ने में होशियार हो। स्वयं पढ़ाई करके तुम विश्विद्यालय में प्रथम रही। यदि चाहो तो घर बैठ कर आईंएएस की तैयारी कर सकती हो। मुझे यकीन है कि तुम बिना कोचिंग के सफलता प्राप्त कर सकती हो। पुस्तकें और आ जाएंगी।"
सप्ताह के छ दिन आनंद जब ऑफिस होता तब अनुप्रिया पुस्तकों में उलझ जाती। हालांकि आनंद प्रतियोगिताओं में असफल रहा लेकिन उसका अनुभव अनुप्रिया के बहुत काम आया। आनंद अनुप्रिया का अध्यापक, कोच और गुरु बन कर मार्ग दर्शन करने लगा। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ रविवार की छुट्टी वाले दिन तक सीमित हो गया। रविवार को दोनों दिल्ली घूमते और बाहर खाना खाते। छ महीने तक अनुप्रिया ने दिल्ली के सभी पर्यटक स्थल देख लिए औऱ पढ़ाई में भी बहुत आगे निकल गई।

अनुप्रिया का अपने मायके भी संपर्क बहुत कम हो गया। उसके माता-पिता को चिंता सताने लगी कि जब से दिल्ली गई है मायके आना ही नही हुआ। दीवाली पर भी नही आई। फोन पर भी कुछ सेकंड ही बात करती। स्थिति का जायका लेने के लिए पूरा परिवार ने अनुप्रिया के घर बिना बताए छापा मारा। घर पर अनुप्रिया पुस्तकों में उलझी हुई थी। जिस परिवार ने उसे आगे पढ़ने नही दिया, उसे उसके पति ने आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि उनको इस बात की कतई उम्मीद नही थी। आनंद का परिवार पानीपत रहता था और आनंद अकेला ही दिल्ली में रहता था। अनुप्रिया ने दो टूक अपने परिवार को कह दिया कि उसका मकसद कुछ बनना है जिसमें आनंद का भरपूर सहयोग है। वह अब अपने मायके कुछ बन कर ही आएगी।
"तू यह क्या कह रही है? लड़कियां मायके से संबंध कैसे तोड़ सकती हैं। लड़के परिवार से अगल होते है लेकिन लड़कियां तो अपने मायके से जुड़ी रहती हैं।" उसके परिवार ने उसे समझाया।
"मैं आपसे दूर कहाँ हो रही हूँ। मैं तो सिर्फ कुछ बनने के लिए एकांत में पढ़ना चाहती हूं। आपने जंवाई खुद जांच परख कर चुना है और उसी जंवाई ने पहले ही दिन मेरी प्रतिभा को जांच लिया है।"
अनुप्रिया का परिवार वापस चला गया और अनुप्रिया पढ़ने में व्यस्त हो गई। उसके जीवन में सिर्फ पढ़ाई समाई हुई थी। मायका और ससुराल दोनों छूट गए। छोटे से फ्लैट में पुस्तकों में डूबी रहती। अडोस-पड़ोस से भी कोई मतलब नही। अड़ोसी-पड़ोसी और रिश्तेदारों ने अनुप्रिया को पागल घोषित कर दिया। एक नवविवाहित युवती सिर्फ पढ़ने में अपना सर खपा रही है। उसके साथ आनंद को भी जोरू का गुलाम घोषित कर दिया कि वह भी अनुप्रिया को संरक्षण दे रहा है। अच्छी नौकरी और तनख्वा है, क्या जरूरत है नवविवाहिता से पढ़ाई करवाने की। सारे रिश्ते तोड़ दिए। किसी से मेल मिलाप नही है।

आनंद और अनुप्रिया दुनिया की नजर में पागल और मानसिक रोगी थे और उनकी नजर में दुनिया पागल थी।
एक दिन अनुप्रिया की तबियत थोड़ी खराब हुई। डॉक्टर के पास चेकअप के लिए गए तो खुशखबरी मिल गई। अनुप्रिया गर्भवती थी।
"आनंद अब पढ़ाई में रुकावट आ जाएगी।" अनुप्रिया ने चिंता जाहिर की।
"किस बात की रुकावट?" आनंद ने बेपरवाह हो कर पूछा।
"मेरा मतलब कि थोड़ा आराम करना होगा और बहुत परहेज रखना पड़ता है।"
"तू चिंता क्यों करती है। घर का काम होता ही कितना है। हम दो जने हैं। अगर तुझे तकलीफ होगी तब हाथ बटाने के लिए मैं हूँ। यदि किसी सहायक की जरूरत हुई तो नौकर रख लेंगे। पढ़ाई तो बिस्तर पर बैठ या लेट कर ही होनी है। आराम और ज्ञान एक साथ।"
आनंद की बात सुनकर अनुप्रिया सोचने लगी तब आनंद ने प्यार और मजाक के मिश्रण में कहा। "पढ़ाई की तरफ ध्यान दे। बच्चा गर्भ में ही पढ़ाई के गुण सीख लेगा। अभिमन्यु की तरह सीख कर दुनिया में प्रदापर्ण करेगा।"
"तुम यह कैसे कह सकते हो?"
"खैर इस विषय को छोड़ कर तुम आराम और पढ़ाई करो।"
दिन बीतते गए। अनुप्रिया की परीक्षा का समय आ गया। गर्भ के आठवें महीने परीक्षा शुरू हो गई। डॉक्टर ने परीक्षा छोड़ने की सलाह दी लेकिन आनंद ने अनुप्रिया को परीक्षा में बैठने की सलाह दी। आनंद अनुप्रिया की हर परीक्षा में साये की तरह साथ रहा। अनुप्रिया के परीक्षा केंद्र के बाहर आनंद बेताबी से इंतजार करता रहता। परीक्षा केंद्र पर हर निगाह अनुप्रिया पर टिकती कि इस हालात में उसे परीक्षा देने की क्या जरूरत है। उसे जोखिम नही लेना चाहिए। आनंद की सोच थी कि जब अनुप्रिया की पूरी तैयारी है और वह स्वयं पर भरोसा कर रही है तब एक वर्ष का और इंतजार नही करना चाहिए। यदि परीक्षा में असफल रहती है तब देखा जाएगा। उसे भरोसा था कि जो वह नही कर सका उस मुकाम को अनुप्रिया अवश्य हासिल करेगी। वह अनुप्रिया की लगन, जोश और जज्बे को मंद नही करना चाहता था। उसे डर था कि कहीं एक बार जोश ठंडा हो गया वह दुबारा नही आएगा। उसके साथ स्वयं भी ऐसा हुआ था। बार बार असफल होने पर उसका उत्साह ठंडा हो गया था। वह अनुप्रिया के पढ़ाई के उत्साह को किसी भी हालात में कम नही देखना चाहता था।

आज अनुप्रिया का अंतिम पेपर था औऱ सुबह उठते ही उसको अपनी तबियत ठीक नही लग रही थी। अब कभी भी प्रसव का समय आ सकता है। आनंद ने प्रेम से उसका उत्साह बढ़ाया और परीक्षा भवन ले गया। अनुप्रिया ने ईश्वर की स्तुति करके पेपर देना शुरू किया। उसकी लगन ही थी कि वह पेपर संपन्न कर सकी। परीक्षा केंद्र से सीधे डॉक्टर के पास जाना पड़ा।
"कहो पेपर कैसे हुए?" डॉक्टर ने चेकअप करते हुए पूछा।
"बस दे दिए।"
"अगली बार दे देती?"
"आनंद ने पेपर दिलवा दिए।"
"और तुमने दे दिए?"
"हाँ।"
"ऐसा पति नसीबों से मिलता है अनुप्रिया। कभी लड़ना नही।"
डॉक्टर की बात सुनकर अनुप्रिया सिर्फ मुस्कुरा दी।
"इस खुशी में अब अस्पताल में भर्ती हो जायो। मैं तुम्हे घर नही भेजूंगी। बस दो चार दिन की बात है। कोई जोखिम नही।" डॉक्टर ने आनंद को बुलाया औऱ स्थिति से अवगत कराया।

आनंद ने अपने और अनुप्रिया के परिवार को सूचित किया लेकिन नाराजगी के चलते अस्पताल कोई नही आया। आनंद सारा दिन अस्पताल ही रहता और अस्पताल से ही लैपटॉप पर ऑफिस का काम करता रहता। ऑफिस से आनंद को पूरा सहयोग मिला और घर से काम करने की अनुमति दे दी।
चार दिन बाद अनुप्रिया ने एक सुंदर से गोलू मोलू बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म की खबर सुनकर भी दोनों के परिवार नाराज ही रहे। उनकी सोच जब दोनों स्वयं ही सक्षम है तब बच्चा पालने हम क्यों जाएं? अब तक खुद ही अपनी सरकार हैं तब खुद जैसा रहना चाहे तब रहें। हमे क्यों बुला रहे हैं?

आनंद और अनुप्रिया दोनों अकेले बच्चे के संग घर आ गए। दोनों का चित्त अशांत था। सोचने लगे कि क्या कसूर है उनका? सिर्फ इतना कि अपने इरादों का पाने का सपना देखा था। क्या पढ़ना गुनाह है? बच्चे ने अपनी मुस्कान से दोनों को खुद अकेले जीवन की राह पर चलने की प्रेरणा दी। आनंद ने अनुप्रिया और बच्चे के लिए सहायिका रख ली और ऑफीस जाना शुरू कर दिए।

अनुप्रिया ने अब पुस्तकों को आराम दे दिया और बच्चे की परवरिश में व्यस्त हो गई।

कुछ समय पश्चात

आज सुबह से अनुप्रिया का चित्त अशांत था। आज रिजल्ट आने को जो है। आनंद ने ऑफिस में और अनुप्रिया ने घर से रिजल्ट देखा। अनुप्रिया उत्तीर्ण हुई। दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नही था। आनंद ऑफिस से तुरंत घर आया औऱ खुशी से अनुप्रिया को बाहों में भरते हुए कहा।
"अनु आज मुझे तुमसे से भी अधिक खुशी है।"
"मालूम है आनंद।"
"तुमने पहले मेरा सपना पूरा किया है। जो मैं नही कर सका उसे मेरे जीवन साथी ने किया।"
"इसका श्रेय सिर्फ तुम्हे जाता है। मैं तो मास्टर्स डिग्री के लिए पढ़ना चाहती थी। तुमने मेरा मार्गदर्शन किया।"
"मुझे असफलता का अनुभव था। तुमने सफलता पर निशाना साधा।"
"तुम्हे मुझ पर इतना यकीन कैसे हुआ?"
"तुम्हारी आँखों मे पढ़ाई की चाहत और निष्ठा देख कर तुम्हे प्रेरित किया।"
"तानाशाही तो तुमने की।"
"कौन सी?"
"गर्भ के नौवें महीने पेपर दिलवाए। याद है कितनी मुश्किल से अंतिम पेपर दिया था।"
"यह तानाशाही नही प्रेम था पगली तभी सारे पेपरों में तुम्हारे साथ रहा। अनहोनी की शंका रहती थी लेकिन तुम्हे बताया नही।"
"तुम्हारी आँखों को मै हर रोज पढ़ती थी।"
"अब ट्रेनिंग पर जाना है अनु तुमने।"
"बच्चे की परवरिश?"
"मैं हूँ न।"
"बहुत मुश्किल है बच्चे को छोड़ कर ट्रेनिंग पर जाना।"
"कोई बात नही सब ठीक होगा। तुम चिंता न करो। मेरिट लिस्ट में तुम्हारा स्थान बारवां है। तुम बेफिक्र ट्रेनिंग पर जाओ।"

भारी मन से अनुप्रिया दूध पीते बच्चे को छोड़ ट्रेनिंग पर गई। आनंद पिता और माता दोनों की भूमिका निभाने लगा। ऑफिस में उसकी व्यथा देख उसके साथियों ने सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। बात आनंद और अनुप्रिया दोनों के परिवार तक पहुंची। दोनों परिवारों का अहम अनुप्रिया की सफलता पर टूटा। अनुप्रिया की माँ बच्चे की देखभाल के लिए आनंद संग रहने लगी। दोनों परिवारों को आनंद और अनुप्रिया का पढ़ाई की धुन में उनसे कुछ समय के लिए कटने का महत्व समझ आने लगा।

अनुप्रिया की ट्रेनिंग के दौरान अनुप्रिया ने माता-पिता ने ट्रेनिंग सेंटर के समीप कमरा किराये पर लेकर रहने लगे ताकि अनुप्रिया बच्चे से दूर न रहे।
आनंद और अनुप्रिया की तपस्या रंग लाई। ट्रेनिंग के पश्चात अनुप्रिया को आईएएस अधिकारी बनने पर देहरादून में पहली पोस्टिंग मिली।
आज दोनों परिवारों ने अनुप्रिया की सफलता पर जश्न मनाने के लिए पार्टी का आयोजन किया। आनंद और अनुप्रिया ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे की आँखों मे देखा।
"अनु तुम्हारा सपना पूरा हुआ।"
"आनंद रास्ता तुमने दिखाया था।"
"चली तुम थी।"
"हाथ हमेशा तुमने पकड़ कर रखा था।"
"अब तो तुम्हारा ओहदा मेरे से ऊपर हो गया है श्रीमती जी।"
"श्रीमान जी पत्नी का ओहदा हमेशा पति से ऊपर ही रहता है। आदाब तो करना ही होगा।"
"आदाब श्रीमती जी।"
"ऐसे नही सिर्फ प्रेम का आदाब।"
दोनों प्रेम में मग्न हो गए।

पांच कन्याएं


बीए अंतिम वर्ष में अधिकांश छात्र पढ़ाई में व्यस्त थे। आगे कैरियर औऱ पढ़ाई की योजनाओं को अंतिम रूप दे रहे थे। टिया जनवरी के माह में निश्चिन्त हो गई। अब उसका ध्येय सिर्फ बीए की डिग्री लेना ही था चाहे अंक कितने ही आएं। आगे उसने पढ़ाई करनी नही।
"रिया एक बात बताऊं।" टिया ने रिया के कान में फुसफुसाते हुए कहा।
"कौन सी बात है?" बेफिक्र होकर किताब बंद करते रिया ने टिया की और देखते हुए पूछा।
"यहां नही बाहर चल कर बताती हूं।" टिया ने रिया को उठने को कहा।
टिया और रिया लाइब्रेरी से बाहर आकर कॉलेज के गार्डन में एक पेड़ के नीचे बैठते हैं। सर्दियों की गुनगुनी धूप अच्छी लग रही थी।
"बता टिया ऐसी कौन सी खास बात है जिसे बताने के लिए तूने लाइब्रेरी में नोट्स भी नही बनाने दिए।"
"रिया मेरी शादी हो रही है। कल रिश्ता पक्का हो गया है।" चहकते हुए टिया ने कहा।
रिया ने टिया को देखा। एक गजब की मुस्कान उसके चेहरे पर थी और आत्मविश्वास के संग उसका बदन दमक रहा था।
"इतनी जल्दी भी क्या है शादी की। आगे पढ़ना नही है क्या?" रिया ने टिया से पूछा।
"देख घर बैठे अपने आप रिश्ता आया है। अभी पिछले रविवार को पापा के व्यापारी के बेटे की शादी थी। हमारा पूरा परिवार शादी में सम्मलित था। वहीं लड़के ने मुझे देखा औऱ मैंने लड़के को। बस कल बात पक्की हो गई।"
"लड़का क्या करता है?"
"अपना कारोबार है। पापा को अच्छी तरह जानते हैं। तभी तो मुझे शादी में ले गए थे।" टिया ने मटकते हुए आंखों में शरारत लाते हुए जवाब दिया।
"टिया बस दो चार मिनट लडके को देख कर तुमने लड़का पसंद भी कर लिया। मतलब लड़का कैसा है, उसकी पसंद क्या है, उसकी आदतें क्या हैं?" रिया ने हैरानी से पूछा।
"रिया मुझे देख। मध्यम कद, सांवला रंग औऱ साधरण फिगर्स के साथ थोड़ी मोटी भी हूं। कॉलेज में मुझसे कोई लड़का दोस्ती भी नही करता है। मैं लड़कों के पीछे क्यों भागूं जब घर बैठे रिश्ता आ गया तब ना नकुर करने का कोई फायदा नही है। अब शादियां तो ऐसे ही होती है। मैं अपने परिवार में देखती हूं जहां घर वाले सुझाते हैं शादी कर ही लेते हैं।"
"और प्यार का क्या? बिना प्यार शादी?"
"प्यार शादी के बाद।"
"मेरा मतलब प्यार का समय ही कब मिलेगा? मुश्किल से एक दो महीना। फिर बच्चे और गृहस्थी के चक्कर।"
"रिया जिंदगी इसी को कहते हैं। फिल्मी प्यार नसीब से इक्का दुक्का को ही मिलता है। अपनी शक्ल सूरत भी आईने में देखनी चाहिए। साधारण लड़कियां हैं, अप्सरा तो हैं नही जो हमारे पीछे लड़के घूमेंगे।"

टिया की बात पर रिया विश्लेषण करने लगी। टिया कह तो सही रही है फिर भी अपने को कम क्यों आंकें। टिया धनी परिवार की लड़की थी। व्यापारिक घराने से रिश्ता आया और उसने स्वीकार कर लिया। आराम से जिंदगी कटेगी। घर में काम करने के लिए नौकर और आराम की हर सुख सुविधा के लिए रुपयों का अंबार। हर हसरत पूरी होगी। जीवन में किसी भी चाह को पूरा करने के लिए मन को नही मारना पड़ेगा। फरवरी में टिया का विवाह धूमधाम से सम्पन्न हुआ। रिया टिया के परिवार की रईसी देखती रह गई। एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली रिया को टिया का निर्णय उचित लगा। अब दोनों की दुनिया में जमीन आसमान का अंतर है। जहां टिया की हर ख्वाइश पूरी होती है वहां उसे छोटी छोटी बातों पर अपनी चाहतों को दबाना पड़ता है।

विवाह के बाद टिया ने कॉलेज आना छोड़ दिया। बस परीक्षा देने आई। तीसरी श्रेणी में उत्तीर्ण होकर टिया ऐसे चहक रही थी जैसे उसने हिमालय पर्वत की चढ़ाई पूरी कर ली।

टिया के विवाह करने का कारण रिया को समझ आ गया। रिया के परिवार ने रिया को आगे पढ़ने और अपने पैरों पर खड़े होने की प्रेणना दी। रिया की शादी की इतनी जल्दी उसके परिवार को नही थी। रिया के पिता के रिटायरमेंट में अभी चार वर्ष शेष थे इसलिए वे तब तक रिया का विवाह खर्च उठाने की हैसियत में नही थे। भविष्य निधि की जमा रकम से रिया के विवाह खर्च की उसके पिता की सोच थी। पेंशन और ग्रतुईटी अपने बुढ़ापे का सहारा बनाने की योजना पिता ने बनाई। रिया अपने परिवार की आर्थिक मजबूरी अच्छी तरह समझती थी।
मास्टर्स डिग्री के दौरान रिया की मित्रता श्रुति से हुई। श्रुति आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। लंबा कद, गोरा चिट्टा रंग, पतली कमर, तीखे नैन और आदर्श फिगर। कॉलेज का हर लड़का उसका दीवाना था। श्रुति का ध्यान पढ़ाई में कम लगता था। वह सारा दिन सैर सपाटे में लड़कों संग निकालती थी। रिया के संग मित्रता नोट्स के बहाने हुई। श्रुति के संग रहने के कारण रिया के भी बहुत मित्र बन गए। रिया को यह अहसास था कि उसके साथ मित्रता श्रुति के नजदीक आने के लिए हो रही है।

एक दिन श्रुति रिया को अपने साथ शॉपिंग पर ले गई।
"श्रुति आज कोई खास बात है क्या जो मुझे शॉपिंग के लिए साथ लिया, वर्ना तुम हमेशा लड़कों संग घूमती हो?
रिया के इस प्रश्न पर श्रुति खिलखिला कर हँस दी। "अरे पगली आज उनके साथ शॉपिंग नही करनी है। अगले महीने मेरी मौसी की लड़की की शादी है। शादी में पहनने के लिए कुछ कपड़े खरीदने है। सबसे जरूरी लहँगा खरीदना है। उनको क्या अक्ल कि लहँगा क्या होता है और कौन सा खरीदना है। सब बेवकूफ है उनको मेरा जिस्म नजर आता है और कुछ नही।"
"फिर उनके साथ क्यों रहती हो?"
"कॉलेज आओ, पढ़ाई करो। बड़ी नीरस जिंदगी है इसमें कुछ नयापन और रोमांच और रोमांस होना चाहिए। इसलिए लड़कों संग मौज मस्ती में रहती हूं।"
"कुछ ऊंच-नीच हो जाये तब क्या होगा?"
"आज के आधुनिक युग मे सुरक्षा के साधन हर जगह आसानी से उपलब्ध हैं। डरना किस बात से रिया पगली।"
"तेरे घर वालों को मालूम है क्या?"
"मौज मस्ती घर वालों के सामने नही की जाती है। उनको इतना पता जरूर है कि मेरे बॉय फ्रेंड हैं।"
"फिर भी कुछ नही कहते तुझको?"
"उनकी समस्या मैंने हल कर दी है।"
"कौन सी?"
"शादी की। अपनी पसंद के लड़के से शादी करूँगी। प्रेम विवाह में खर्च भी कम आएगा। तू तो जानती है शादी का खर्च। माँ-बाप गंजे हो जाते हैं।"
"शादी तो एक से करनी है फिर इतने सारे क्यों पाल रखे हैं?"
"सिर्फ मौज मस्ती के लिए। मैंने किसी को नही पाल रखा है। वो मुझे पाल रहे हैं। मेरा सारा खर्च वोही करते है। जिस विलासता में मैं रहती हूँ उस का खर्च नौकरी पेशा मेरे माँ-बाप नही कर सकते। हम चार भाई बहन हैं।"
श्रुति ने जब मंहगा लहँगा खरीदा तब रिया ने उसे टोका कि सस्ता लहँगा भी अच्छा लग रहा है तब हँस कर श्रुति ने रिया के गाल पर हल्की सी चपत लगा दी। "कौन से मेरे बाप का खर्च हो रहा है। सब मेरे मजनूओं की जेब से निकलेगा।"

श्रुति के जीने के ढंग से रिया हैरान हो गई। वह इस तरह का जीवन सोच ही नही सकती। उसने अपने परिवार में समस्त जीवन अपने जीवन साथी को समर्पित होते देखा है। उसके संस्कार इतना उन्मुक्त उड़ कर जीना नही सिखाते हैं।
श्रुति ने अपने मित्रों को अपनी मौसी की लड़की की शादी में आमंत्रित किया। रिया ने शराब के नशे में श्रुति को अपने मित्रों और रिश्तेदारों संग खूब मौज मस्ती करते देखा। असहज रिया अधिक देर तक विवाह समारोह में नही रुकी और बहाना बना कर शीघ्र घर लौट गई। उस दिन के बाद रिया श्रुति से दूरी रखने लगी। श्रुति और रिया की मित्रता अब सिर्फ नोट्स तक सीमित हो गई।

मास्टर्स डिग्री लेने के पश्चात रिया और श्रुति के रास्ते अगल हो गए। रिया नौकरी करने लगी। कंपनी की नववर्ष की पार्टी में रिया अपने सहकर्मियों संग एक पांच सितारा होटल में डिनर करने के पश्चात होटल से बाहर आ रही थी वहां उसका आमना-सामना श्रुति से हो गया। श्रुति एक अधेड़ उम्र के गंजे गोल मटोल व्यक्ति की बाहों में झूलती हुई अचानक से उसके सामने टकरा गई तब खुद ही रिया के मुख से निकल पड़ा "श्रुति हाए।"
"रिय़ा व्हाट आ प्लीजेंट सरप्राइज? आज कितने दिन बाद मिल रहे है। छोड़ो इन बात को। रिया मीट माई हस्बैंड।"
हस्बैंड शब्द सुनते ही रिया भौचक्की हो गई। श्रुति दो मिनट के लिए रिया को एकांत के एक कोने में ले गई।
"ऐसे क्या देख रही है। तबियत तो ठीक है न?" श्रुति ने रिया को झंझोरते हुए पूछा।
"श्रुति क्या तुमने शादी कर ली। वो तुम्हारा हस्बैंड?"
"अरे यार तू अभी भी बदली नही है। वैसे पुराने घिसे पिटे खयाल। कॉलेज से आज तक वैसे ही है।"
"मेरा मतलब कॉलेज में तू खूबसूरत हैंडसम हीरो टाइप लड़को के संग रहती थी। क्या सोच कर अपने से बड़ी उम्र के अंकल टाइप अधेड़ से शादी कर ली। कोई भी मेल नही है तुम दोनों में। तुम अभी भी कॉलेज के समय वाली हसीना हो औऱ तुम्हारा पति?" मुझे कुछ समझ नही आ रहा है।"
"कभी फुरसत में बताऊंगी। मेरा नंबर ले। अच्छा अभी चलती हूँ।"
श्रुति होटल में प्रवेश करती है और रिया घर की और रवाना होती है।

अगले दो दिन रिया श्रुति के बारे में सोचती रही कि क्या सोच कर उसने अधेड़ से विवाह किया लेकिन उसने श्रुति को फोन नही किया।
शनिवार के दिन रिया के ऑफिस में आधे दिन की छुट्टी होती है। ऑफिस के बाद रिया अपने सहकर्मियों के साथ फ़िल्म देखने गई। रिया को श्रुति दिख गई जो आज एक नवयुवक की बाहों में झूल रही थी। श्रुति को देख कर रिया परेशान हो गई। विवाह अधेड़ से किया और प्रेम युवा से कर रही है। उसकी नजर में यह अपराध है। उसकी आंखें सिनेमा के पर्दे पर थी लेकिन मन मे श्रुति के बारे में अनेकों प्रश्न थे। अगले दिन उसने श्रुति से फोन पर बात कर उससे मिलने की इच्छा जाहिर की। शाम के समय मॉल में श्रुति और रिया मिले। कॉफ़ी शॉप में एक कोने की टेबल पर एकांत में रिया ने श्रुति से कई सवाल किए। श्रुति ने रिया को बताया कि उसका पति तलाकशुदा बहुत अमीर है। सारा दिन और रात व्यापार को और आगे बढ़ाने के लिए देश विदेश घूमता है। उसको अपने बिज़नेस सर्किल में खूबसूरत जवान सेक्सी बीवी दिखानी थी जिस कारण उसने मेरे से विवाह किया और मुझे एक रईस पति की तलाश थी जिसके पैसों पर मैं हर सुख सुविधा भोग सकूं। मेरा परिवार इस विवाह के खिलाफ था। हमारी उम्र में बीस वर्ष का अंतर है। हम दीवाली मेले पर मिले थे जहां मुझे खूबसूरत युवती का इनाम मिला था। मुख्य अतिथि मेरे पति थे। उस दिन के बाद हम नजदीक आ गए। उससे मेरी आर्थिक जरूरते पूरी होती हैं और तुम्हे मालूम ही है कि कॉलेज के समय से ही मेरे आशिकों की लंबी कतार थी, उनसे मेरे तन की जरूरतें पूरी होती हैं।

रिया को श्रुति से सभी प्रश्नों का जवाब मिल गया लेकिन खिन्न मन से उसने श्रुति से कभी न मिलने का वादा करके रुक्सत ली।

टिया और श्रुति के विवाह के कारण जुदा थे। एक अमीर परिवार की मोटी और साधारण टिया ने परिवार की पसंद से विवाह कर लिया। उसका कोई बॉय फ्रेंड नही था। श्रुति के आगे पीछे बॉय फ्रेंड्स की लंबी लाइन थी फिर उसने सबको छोड़ अमीर अधेड़ तलाकशुदा से विवाह किया। विवाह करने के सबके कारण अगल हैं।

ऑफिस में रिया की घनिष्ठ मित्र सोनम ने एक दिन उसे ऑफिस के बाद अपने घर चलने को कहा।
"रात को देर हो जाएगी। तुझे मालूम है कि नौ बजे तक मैं घर पहुंच जाती हूँ।"
"अधिक देर नही होगी। मैं तुझे तेरे घर छुड़वा दूंगी। मेरा भाई कार में छोड़ कर आएगा।"
"आखिर क्या कुछ खास है?"
"हाँ यार लडके वाले मेरे घर आ रहे हैं। मैंने और लड़के ने एक दूसरे को देखना है। घर वालों ने बात पक्की कर ली है।"
"हैरानी की बात है कि परिवार राजी और लड़का-लड़की अनजान?"
"क्या करूँ पिछले चार वर्षों से कई रिश्ते आये परंतु कुंडली न मिलने के चक्कर मे बात ही नही बनी। इस बार कुंडली मिल गई है। मैंने तो बस इतना देखना है कि लड़का आड़ा टेड़ा न हो।"
"कोई पसंद नही सिर्फ कुंडली?" रिया फिर परेशान होकर सोचने लगी कि शादी करने की भी क्या अजीब कारण हैं। रिया सोनम के साथ गई। लड़का साधारण कद का थोड़ा मोटा था। दोनों ने दो मिनट में एक दूसरे को पसंद कर लिया।
सोनम के लिए रिया लकी साबित हुई कि उसके साथ होने के कारण चुटकियों में रिश्ता पक्का हो गया। सोनम के परिवार ने खूबसूरत भेंट देकर रिया को उसके घर छोड़ा।
"सोनम तेरी अपनी कोई पसंद नही। कुंडली के आधार पर विवाह मंजूर कर लिया।"
"क्या करूँ घर से भाग कर शादी करने की हिम्मत नही हुई। परिवार की इज्जत और समाज की बेड़ियां अपनी पसंद को बांध लेती हैं। मजबूरी में जो मिले उसके साथ जीवन गुजरता है।"

विवाह के कारणों में हर व्यक्ति की सोच जुदा है। प्रकृत्या मुख्य कारण अवश्य है फिर भी पारिवारिक, आर्थिक, शारीरक और सामाजिक कारणों से विवाह करने की वजह जुदा होती है।

एक दिन शाम को रिया ऑफिस से लौटी तब घर में उदासी औऱ मातम छाया हुआ था। दस मिनट पहले उसकी मौसेरी बहन के पति (जीजा) के एक्सीडेंट की खबर आई। सड़क दुर्घटना में उसके जीजा को गंभीर चोटें आई और अस्पताल में नाजुक हालत है। उसके माता-पिता अस्पताल की ओर दौड़े।

रिया की मौसेरी बहन बहुत खुशमिजाज और बहुत ही खूबसूरत थी। एक वर्ष पहले उसने प्रेम विवाह किया था औऱ सात महीने का गर्भ था। रिया की बहन और जीजा बहुत ही खूबसूरत और खुशमिजाज थे। कॉलेज में दोनों प्रेम बंधन में बंधे औऱ सात वर्ष के प्रेम के बाद दोनों का परिवार की सहमति से विवाह संपन्न हुआ।

तीन दिन तक घर मे माहौल बहुत ही उदासी का रहा। ऑफिस से छुट्टी लेकर रिया अपनी बहन के पास रही। बाकी सारा परिवार अस्पताल में छावनी बना कर रह रहा था। तीन दिन बाद अनहोनी हो ही गई। रिया के जीजा का निधन हो गया। पति की असमय मौत से रिया की बहन पर वज्रपात गिरा औऱ सात महीने के गर्भ को सह न सकी। समय से पूर्व एक सुंदर बेटी का जन्म हुआ। समय से पहले जन्म के कारण बेटी का वजन कम था जिस कारण उसे अस्पताल की नर्सरी में रखा गया।

रिया की बहन तो चार दिन बाद अस्पताल से घर आ गई लेकिन गुमसुम उदास रहती। पति के गुजर जाने के बाद औऱ बेटी के उससे दूर अस्पताल में रहने के कारण वह अपनी सुधबुध खो बैठी। दीवारों से बातें करती रहती। रिया की कोई ननद नही थी। उसकी सास बुजुर्ग थी इस कारण बहन का साथ देने रिया अपनी बहन के संग रहने लगी।
समय ही घाव देता है औऱ वही भरता है। बेटी के अस्पताल से घर आने पर बहन की दिनचर्या बदली औऱ छोटे बच्चे के साथ व्यस्त हो गई।

रिया की मौसेरी बहन के दो देवर थे। एक देवर उससे एक वर्ष छोटा था औऱ दूसरा तीन वर्ष छोटा था। बड़े बेटे के बरसी होने के बाद बहन के ससुराल ने उसके देवर से विवाह प्रस्ताव रखा।
"हमारे बेटे और बहू ने सात वर्ष के प्रेम के पश्चात सात जन्म एक साथ बिताने के लिए पवित्र अग्नि के सात फेरे लिए थे। हम चाहते हैं कि बहू हमारे दूसरे बेटे के संग विवाह कर ले। समाज भी जवान बेटे की मृत्यु के पश्चात कुंवारे देवर के संग विवाह की मान्यता देता है। यदि आपके परिवार को कोई ऐतराज हो तो हमे अवगत कराएं।"
रिया के मौसा ने यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात बेटी का जीवन संवर कर दुबारा पटरी पर आ जाएगा। पूरी जिंदगी विधवा का जीवन काटना बहुत मुश्किल है। छोटे बच्चे के साथ दुबारा विवाह असंभव होता है। रिया की बहन ने भी विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

"दीदी तुम जीजा से कितना प्रेम करती थी। एक दूसरे के लिए तुम बने थे। क्या तुम अपने देवर को पति के रूप में स्वीकार कर सकोगी?"
रिया के इस प्रश्न पर उसकी दीदी ने गर्दन झुका कर अपनी स्वीकृति दी। "रिया कुछ बातें हमारे बस में नही होती हैं। मैंने सात वर्ष तक प्रेम किया। शुरू में हमारा परिवार हमारी शादी के खिलाफ था फिर उन्हें झुकना पड़ा। जीवन और मौत ऊपर वाले के हाथ में है। यह फिल्मी डायलॉग जरूर है लेकिन जीवन का कटु सत्य भी है। कल क्या होगा किसी को नही मालूम। हँसता खेलता मानव पल भर बाद रोने को मजबूर हो जाता है। यही मेरे साथ हुआ है। कोई सोच भी नही सकता था कि ऐसा होगा। एक छोटे बच्चे के साथ विधवा का पूरा जीवन बिताना बहुत कठिन है।"
"तुम्हारी और जीजा की जोड़ी अतुलनीय थी। एक समान खूबसूरत। देवर का रंग भी सांवले से काला औऱ मोटा भी है। कहाँ जीजा जी और कहाँ देवर। कोई भी मेल नही है दीदी।"
"रिया मजबूरी में मेल नही देखा जाता है। जो मिल जाये वही किस्मत का लिखा मान संतोष करना पड़ता है। परिवार की सहमति में मेरी इच्छा समझ ले।"
एक महीने बाद विवाह का शुभ मुहूर्त निकला। विवाह की तैयारियां आरम्भ हो गई। विवाह की तैयारियों के बीच सबसे छोटा देवर रोहन रिया के नजदीक आने लगा। अक्सर एक साथ शॉपिंग में जाते और राय, विचार विमर्श के बीच रिया और रोहन एक दूसरे के नजदीक आ गए इसका अहसास रिया को नही हुआ लेकिन रोहन रिया के बारे में अधिक रुचि लेने लगा। रोहन की कोशिश रिया के नजदीक रहने की होती। रिया की मौसेरी बहन रोहन की बढ़ती नजदीकियों की भाँप गई। हालांकि रिया नजदीकियों को अधिक तवज्जो नही दे रही थी लेकिन उसकी बहन ने अपने सास-ससुर से इस बारें में बात की और उन्होंने इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति प्रदान दी और रिया के माता-पिता को विवाह प्रस्ताव भेजा। रिया के परिवार को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नही हुई। उन्होंने रिया की पसंद पर बात छोड़ दी।

"रिया तुम्हे रोहन कैसा लगता है?" बहन ने एक रात बिस्तर पर नन्ही को सुलाते समय पूछा।
रिया इस प्रश्न पर चौंक गई। "दीदी यह कैसा प्रश्न है?"
"सीधा सादा प्रश्न है। तुम्हारी उम्र विवाह योग्य है, रोहन तुम्हे पसंद कर रहा है इसलिए तुमसे तुम्हारी राय जाननी है। रोहन अच्छा लड़का है। इस रिश्ते पर हम सब की सहमति है। अंतिम निर्णय तुम्हारा है।"
"कमाल है दीदी सब कुछ तय करके मेरी राय पूछी जा रही है। जिसने शादी करनी है उसकी पसंद और मर्जी की कोई कीमत नही है।"
"तुम्हारी मर्जी के खिलाफ कुछ नही होगा। यहां तुम कहोगी तुम्हारा विवाह वहीं होगा। मैंने प्रेम विवाह किया तुम पर जबरदस्ती नही होगी। अब दूसरा विवाह मेरी मजबूरी है उसके कारण जुदा हैं।"
"दीदी तुम बताओ अपनी विवाह की वजह?"
"मैं और तुम्हारे जीजा कॉलेज में एक साथ पढ़े। ग्रेजुएशन और मास्टर्स एक साथ किये। पढ़ाई और नोट्स बनाते समय एक दूसरे के खयालात समझने लगे। एक दूसरे की रुचियां समझी और जानी। हमारी सोच एक होती गई। हम एक दूसरे के जज्बात समझने लगे। जब हम एक दूसरे के सुख-देख बाटने लगे तब हमने विवाह करने का निर्णय लिया। विवाह तन के साथ मन का भी मिलन है। जब तक मन न मिलें विवाह बेमेल होता है।"
"दीदी मैं आपकी बातों से सहमत हूँ कि जब तक मन का मिलन नही हो विवाह का नही सोचना चाहिये।"
"इसके लिए तुम रोहन से मिल सकती है अपने दिल की बात उससे बांट सकती हो औऱ उसके मन को परख सकती हो।"
"दीदी इसमें समय लगेगा।"
"रिया तुम भरपूर समय लो। जल्दी में कोई निर्णय के लिए मैं तुम पर दबाव नही डालूंगी। चाहे एक वर्ष लग जाये। यदि तुम्हारी कोई अगल पसंद है तब मुझसे बिना किसी संकोच के कहो।"
"दीदी अभी तक तो मैं किसी के प्रेम में नही हूँ। विवाह के सबके अगल कारण देखे इसलिए सही कारण ढूंढने की तलाश में हूँ।"
"मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे संग हैं।"

रिया रोहन को समझने के लिए उसके नजदीक रहने लगी। विवाह की रस्मों और फेरों के बीच पंडित जी विस्तार से साथ फेरों का अर्थ बात रहे थे। रिया ध्यानपूर्वक पंडित जी के द्वारा बताए सात फेरों का अर्थ समझ रही थी।
"बहुत ध्यान से पंडित जी के प्रवचन सुन रही हो। इतना ध्यान तो दुल्हन और दूल्हा भी नही दे रहे हैं।" रोहन ने रिया को छेड़ते हुए कहा।
"मेरे से बात करनी है तो पंडित जी को ध्यानपूर्वक सुनो। आज तुम्हारी परीक्षा है। यदि परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए तब बात करूँगी नही तो मेरा तुम्हारा रास्ता अलग-अलग।"
इतना सुनते रोहन के होश उड़ गए और सावधान मुद्रा में पंडित जी की व्याख्या सुनने लगा। रिया पर लट्टू रोहन रिया को किसी भी हालत में नाराज नही करना चाहता था।

पंडित जी हर फेरे के पश्चात फेरे का मतलब समझा रहे थे।
पहला फेरे का अर्थ है कि सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, धार्मिक आदि जैसे सभी प्रमुख निर्णयों के लिए एक दूसरे से परामर्श करना।
दूसरे फेरे का अर्थ है कि अच्छे दोस्त बन कर, एक गहरी समझ विकसित करके, एक दूसरे के और परिवार के लिए प्रति दायित्व का निर्वाह करें।
तीसरे फेरे का अर्थ है कि एक दूसरे का, एक दूसरे के माता पिता और परिवार का सम्मान करें।
चौथे फेरे का अर्थ है कि एक दूसरे के प्रति वफादार रहें।
पांचवे फेरे का अर्थ है कि परिवार और सामाजिक परंपराओं से मार्गदर्शित हो।
छठे फेरे का अर्थ है कि उनके परिवारों के बीच सामंजस्य बनाए रखें।
सातवें फेरे का अर्थ है कि संकट और बीमारी के समय के दौरान मजबूत और शांत रहें।
फेरे समाप्त होने पर रिया ने रोहन से पूछा। "पाठ याद हुआ?°
"जी मेम, पूरा कंठस्थ है। जब चाहे परीक्षा लीजिये।" रोहन ने सर झुका कर आदर्श विद्यार्थी की भांति कहा।
"पहले साप्ताहिक, फिर मासिक, फिर अर्धवार्षिक के बाद वार्षिक परीक्षा के अंक मिल कर औसत निकाला जाएगा। कम से कम अस्सी प्रतिशत आने जरूरी हैं वरना फेल।" रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।
"बडी कठिन परीक्षा है मेम, कुछ राहत मिलेगी?"
"नकल भी नही चलेगी। मन में और दिल दिमाग में कंठस्थ कर लीजिए।"
शादी के अगले दिन रिया अपने घर लौट गई। रोहन और रिया अक्सर छुट्टी वाले दिन मिलने लगे। लोंग ड्राइव, सिनेमा और मॉल घूमते हुए रिया रोहन के दिल को टटोलती। दोनों एक दूसरे को समझने लगे और सोच एक होने लगी। एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करने लगे। हर पारिवारिक विषय पर चर्चा करने लगे। छ महीने में वे एक दूसरे पर समर्पित हो गए और रिया ने विवाह के लिए हाँ कह दी।

विवाह के मंडप पर रिया ने रोहन को छेड़ते हुए कहा। "सात फेरों का मतलब याद कर लेना। अगर भूल गए हो तो परीक्षा से पहले अंतिम मौका है।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?"
"ध्यानपूर्वक सुन कर रट लो।"
सुहागरात पर रोहन ने रिया के गाल पर हल्का चुंबन अंकित किया। "बिना परीक्षा के पास कर दिया मेम आपने।"
"श्रीमान जी हर रोज आँखों-आँखों मे बातों-बातों में परीक्षा लेती थी।"
"फिर कितने नंबर दे रही हो?"
"वफादार रहोगे?"
"शत प्रतिशत।"
"अच्छे मित्र बन कर परिवार के दायित्व निभाओगे?"
"शत प्रतिशत।"
"सुख और दुख में एक सामान व्यवहार करोगे और शांत रह कर मजबूत साथ दोगे?"
"शत प्रतिशत।"
"श्रीमान जी अंक भी आपको मिलते हैं शत प्रतिशत।"
रिया ने अपना होंठ आगे किये और दो तन एक हो गए।





अकेली


तेज बरसात की बौछारें पड़ने पर दोपहर के दो बजे घनघोर अंधेरा छा गया। स्कूल से वापिस आते समय अचानक बरसात ने अलका को बस स्टॉप पर रुकने को मजबूर कर दिया। स्कूल से घर आना जाना अलका पैदल ही करती थी। पंद्रह मिनट का पैदल रास्ता था। अब कौन बस का इंतजार करे फिर ऊपर से तुर्रा यह कि बस पीछे से आती है, बैठने को सीट मिलनी नही, खडे-खडे सफर तय करना है फिर बस में भीड, धक्का-मुक्का से अच्छा है कि ग्यारह नंबर की बस ज़िंदाबाद। सेहत के लिए पैदल चलना अच्छा है। इसी कारण अलका स्कूल से घर का रास्ता पैदल नापती थी। बरसात से बचने के लिए बस स्टॉप नाकाम रहा। रुकने का कोई लाभ नही हुआ। अलका तेज बारिश की तिरछी बौछारों में भीग गई। गीले कपडे तन से लिपट कर चिपक गए। बरसात कुछ कम हुई और अलका घर की ओर चल पड़ी।

"अलका तू तो पूरी भीग गए। स्कूल में रुक जाती।" मां ने बिस्तर से उठ कर अलका से कहा।
"स्कूल से निकली तब बारिश नही थी मां।"
"अच्छा तू कपड़े बदल, मैं चाय बनाती हूं।"
अलका ने कपड़े बदले और मां ने तब तक चाय बना ली। चाय की चुस्कियों के साथ अलका खिड़की के बाहर कभी कम और बीच-बीच में तेज होती बारिश देख रही थी। मां ने एक लड़के की फोटो उसको पकड़ाई।
"यह क्या है मां?" तुनक कर अलका ने कहा।
"लड़का अच्छा है अपना व्यवसाय है। मौसा जी ने रिश्ता सुझाया है। एक बार मिल ले।" मां के स्वर में दीन विनती थी।
"मां मैंने कितनी बार कहा है, नही करनी शादी। फिर भी तुम्हारा शादी पुराण खत्म ही नही होता है।"
"संसारिक नियम हैं उनमें हमें रहना होता है फिर विवाह पवित्र बंधन होता है जो हमें परिवार और समाज से जोड़ता है और बहुत तन मन की बातें होती हैं जिस कारण विवाह आवश्यक है।"
"तुम्हारे पास कौन रहेगा?" अलका ने मां की ठोडी पकड़ कर पूछा।
"मेरा क्या है, किसी के पास भी रह लूंगी अब उम्र भी कितनी बाकी है। तू मेरी फिक्र मत कर। अपना भविष्य देख।"
"मां मैं तेरी चिंता भी करती हूं और अपना भविष्य भी देखती हूं। हम तीन भाई बहन हैं। पिता जी दस वर्ष पहले ही दुनिया कूच कर गए। बड़ी बहन दूसरे शहर रहती है। अपनी गृहस्थी छोड़ तुम्हारी सेवा नही कर सकती है। यही हाल भाई का है। उसकी नौकरी भी दूसरे शहर है। तुम यह मकान छोड़ती नही और वो नौकरी छोड़ नही सकता। मेरी नौकरी घर के समीप है इसलिए मैं शादी नही कर रही हूं कि तेरी सेवा करनी है। भगवान ने कुछ सोच कर मेरी नौकरी घर के पास दी है। भविष्य में चिंता किस बात की। घर में निक्कमी पड़ी होती तब चिंता करती कि तुम्हारे बाद मुझे कौन खिलायेगा।"
"तू बात समझ। अब पच्चीस की हो गई है। यौवन भरपूर है। यही उम्र गृहस्थ होने की है। बड़ी उम्र में विवाह भी नही होते। बेमेल रिश्ते आते हैं। कर ले शादी। मेरी पसंद छोड़ तू अपनी मर्जी बता। कोई देख रखा है? बिना झिझक बता। तेरी पसंद सर्वोपरि।"
"मैंने कोई लड़का नही देख रखा है। मैंने सिर्फ तुम्हे देखना है मां सिर्फ तुम्हे।"

बाहर बरसात भी रुक गई थी। अलका बाजार जाने के बहाने शादी पुराण समाप्त करके घर से बाहर निकली। बाजार में अनिल मिल गया।
"हलो अलका साडी तुम पर निखर रही है। कुछ बात करते हैं। कहां बैठोगी? कॉफ़ी शॉप ठीक रहेगा।" अनिल ने अलका को अपनी राय बताई।
अलका ने कोई जवाब नही दिया। वह चुपचाप अनिल के साथ कॉफ़ी शॉप चल पड़ी। कॉफ़ी पीते हुए अनिल ने अलका से वोही सवाल पूछा जो उसकी मां ने पूछा था।
"अनिल तुम भी मां की तरह शादी पुराण ले कर बैठ गए। कोई और बात करो।" अलका ने कॉफी शॉप की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा।
"अलका अब हमारी उम्र विवाह योग्य है। हमें इस ओर सोच कर शीघ्र निर्णय ले लेना चाहिए।"
खिड़की से बाहर झांकते हुए अलका ने जवाब दिया। "अनिल मुझे मां की चिंता है। विवाह के बाद वह अकेली रह जायेगी। बुढ़ापे में मैं मां को अकेला नही छोड़ सकती।"
"तुम खिड़की से बाहर झांकना बंद करो और ध्यान से सुनो और सोचो। मां हमारे पास रहे। तुम इसकी चिंता क्यों करती हो?"
"अनिल कहना आसान है लेकिन करना मुश्किल है। तुम संयुक्त परिवार में रहते हो। मां को हर कोई स्वीकार नही कर सकेगा। किसी ने कुछ कह दिया तब मां के दिल को ठेस लग सकती है। मैं सभी कारणों पर विचार कर रही हूं।"
"तुम अधिक मत सोचो। हम मां के पास रह लेंगे।"
"घर जवाई बनोगे? तुम्हारा परिवार क्या इसकी इजाजत देगा?"
अलका के इस प्रश्न पर अनिल के पास कोई उत्तर नही था। वह भी अलका की तरह कॉफी शॉप की खिड़की से बाहर देखने लगा।
कुछ देर बाद दोनों अपने घर वापिस चले गए।

अनिल और अलका दोनों कॉलेज में एक साथ पढते थे और प्रेम के बंधन में भी बंध चुके थे। अलका स्कूल में अध्यापिका बन गई और अनिल अपने पैतृक व्यवसाय से जुड़ गया। जैसे अलका की मां अलका पर विवाह का दबाव बना रही थी ठीक वैसे अनिल पर भी विवाह का पूरा दबाव उसका परिवार बना रहा था।
अलका की रात करवटें बदलते बीती। कभी मां की बात पर विचार करती और कभी अनिल की बात पर विचार करती। एक जीवन साथी अवश्य होना चाहिए। विवाह की प्रथा से गृहस्थ जीवन के सभी मनोरथ सम्पन्न होते हैं। अभी तन की भी जरूरत है, फिर मन की जरूरत होगी। पति-पत्नी चाहे पूरी उम्र लड़ते रहे फिर भी एक दूसरे के प्रति समर्पित होते हैं। दोनों एक दूजे की जरूरतों का ख्याल रखते हैं। अंतिम सांस तक एक दूसरे की चाहत होती है। भावी पीढ़ी बच्चों का लालन पालन और उन्हें अच्छे संस्कार दे कर मार्गदर्शन करना। कितना सुंदर और मधुर होता है गृहस्थ जीवन। उसके पिता दस वर्ष पहले दुनिया से कूच कर गए। कूच होने से पहले रहने को मकान का बंदोबस्त कर गए। बड़ी बहन का विवाह कर गए और बड़े भाई को भी अपने पैरों पर खड़ा होते देख गए। पेंशन से अलका की पढ़ाई हुई और आज स्वयं अपने पैरों पर खड़ी है। माता-पिता का जैसे फर्ज होता है बच्चों की परवरिश का, वैसा बच्चों का फर्ज होता है बुढ़ापे में माता-पिता की लाठी बन कर उनको सहारा देना। भाई को कंपनी विदेश भेज रही है। एक बार विदेश चला गया फिर मां अकेली रह जाएगी। कुछ तन के सुख के पीछे मां को अकेला नही छोड़ सकती।

आने वाले एक सप्ताह तक अलका सोचती रही कि क्या करे? अनिल पर उसके परिवार का दबाव था।
"अलका तुमने क्या सोचा?"
"मैं मां को बेसहारा नही छोड़ सकती।"
"मां पूरी तरह से स्वस्थ्य है। हम एक ही शहर में हैं, आते जाते रहेंगे। मां की ओर तुम्हारी चिंता कुछ अधिक है। जरूरत के समय हम तुरंत हाजिर हो सकते हैं।"
"मां अकेली उदास दीवारों को देख बीमार पड़ सकती है। जीवन की सांझ में अकेला जीवन नही कटता है। इसलिए मां को अकेला नही छोड़ सकती हूं।"
"मैं क्या समझूं" हताश अनिल ने अलका की आंखों में झांकते हुए पूछा।
"कुछ समय रुक जाओ।"
"कितना?"
"कुछ कह नही सकती। भाई को कंपनी विदेश भेज रही है। हो सकता है वह वहीं बस जाए।"
"फिर चिंता क्यों करती हो। मां भाई के संग विदेश में भी रह सकती है।"
"मेरा आकलन है मां विदेश नही रह सकेगी।"
"तुम सोच बहुत रही हो। हालात को अपने आप पर छोड़ना चाहिए। यह होगा, वह नही होगा, इन पर चिंता बेकार की है।"
"पिता जी के देहान्त के पश्चात मैं और मां एक दूसरे के बहुत समीप रही हैं। हम मां बेटी के साथ सहेलियां भी हैं।"
"फिर तुम्हारी सहेली क्या कहती है?"
"वह तो विवाह करने को कहती है।"
"फिर तुम परेशान क्यों हो?"
"सहेली अकेली हो जाएगी। वह मेरे बारे में सोचती है और मैं उसके बारे में। मैं खुदगर्ज नही हो सकती। अगर मेरा कोई और भाई या बहन होती तब मैं बेफिक्र होकर विवाह के लिए तुरंत हामी करती। जब तक मैं मां के भविष्य पर निश्चिन्त नही होती मैं विवाह नही कर सकती। अनिल तुम थोड़ा ठहर जाओ।"

आखिर अनिल भी कितना रुकता। उसने विवाह कर लिया और अलका मां के और करीब आ गई। मां का विवाह पुराण कभी समाप्त नही होता। अलका सिर्फ मुस्कुरा देती। उम्र बढ़ती गई और अलका के द्वारा रिश्ते ठुकराने पर रिश्ते आने बंद हो गए। अनिल से जुदा हुए पांच वर्ष हो गए और अलका ने किसी दूसरे की ओर मुड़ कर नही देखा।

अलका तीस की हो गई। तन और मन दोनों को उसने वश में कर लिया। विवाह के बारे में अब सोचना ही बंद कर दिया। निष्ठा के संग काम मे डूबी अलका मात्र तीस वर्ष में स्कूल की उप प्रधानाचार्य बन गई। स्कूल और घर में मां संग समय बीतता चला गया।

बूढ़ी मां की खाव्हिश अलका के बच्चों के संग खेलने की पूरी नही हो सकी और एक दिन दुनिया को अलविदा कह दिया। अलका अकेली रह गई। सहेली मां उसको अकेला छोड़ गई। स्कूल से वापस आने पर मां संग समय बीतता था। अब सूना घर काटने को दौड़ने लगा। समय काटने के लिए वह स्वयं घर के सभी काम करने लगी। लोग उपहास उड़ाने लगे, इतने पैसे साथ बांध कर ले जाएगी क्या? स्कूल की उप प्रधनाचार्य है, मोटी तंखाव्ह मिलती है। इतने रुपयों का क्या करेगी?

खैर अलका ने दुनिया की बातों को अनसुना करना बहुत पहले से आरंभ कर दिया था। कर्म ही उसकी पूजा थी।
अलका का सौंदर्य अब भी बरकरार था। आज पैतीस की उम्र में भी कॉलेज की बीस वर्ष की बालाओं को सौंदर्य में पछाड़ देती थी। ग्यारवीं और बारवीं में पढ़ने वाली लड़कियां अलका को सौंदर्य में अपना आदर्श मानती थी।
रिश्तेदारों ने तो रिश्ते भेजने बंद कर दिए थे लेकिन स्कूल की दूसरी अध्यापिकाओं ने अलका को रिश्ते सुझाने आरम्भ कर दिए। अलका ने आजीवन कुंवारी रहने का प्रण ले लिया। एक उम्र के पश्चात तन की भूख स्वयं शांत हो जाती है। अलका ने उसे पच्चीस की उम्र में ही विदा कर दिया। अनिल से बिछड़ने के बाद उसने इस तरफ सोचा ही नही।

स्कूल में नए सत्र के दाखिले की प्रक्रिया आरम्भ हो गई। नर्सरी से लेकर बड़ी कक्षाओं के रिक्त स्थान के दाखिले की प्रक्रिया अलका स्वयं देख रही थी। अलका का स्कूल प्रतिष्ठित श्रेणियों में पहले पांच पायदान पर था। अभिभवकों की पहली पसंद में अलका का स्कूल होता था। अघ्यापक कोटा में दाखिले के लिए स्कूल के स्टाफ और अध्यपिकाओं को संपर्क किया जाने लगा।

एक दिन शाम के समय अलका घर पर वाशिंग मशीन में कपड़े धो रही थी। कॉल बेल बजी। दरवाजा खोला, सामने अनिल को देख कर स्तब्ध रह गई। मुख से कोई शब्द नही निकला। दरवाजे पर बुत बनी खड़ी रही। अनिल भी कुछ नही बोला। अनिल से मिलने की उसे कभी उम्मीद नही रही थी।
हाथ में धोने वाले कपड़े लिए ही दरवाजा खोला था। कुछ पल तक दोनों एक दूसरे को चौखट पर खड़े खड़े ताकते रहे। फिर हड़बड़ाहट के साथ अलका ने हकलाते हुए कहा।
"अनिल आओ अंदर आओ।"
अनिल चुपचाप अंदर आकर सोफे पर बैठा लेकिन बोला कुछ नही।
"वो कपड़े वाशिंग मशीन में डाल रही थी।" हाथ में लिए कपड़े वाशिंग मशीन में डाल कर सोफे पर बैठ कर अनिल से कहा। "अब कपड़े अपने आप धुल जाएंगे।"
"अलका तुम पहले से अधिक खूबसूरत हो गई हो। लगता है उम्र की गाड़ी उल्टे गियर में चल रही है।" अनिल के इतना कहने पर अलका खिलखिला के हंस दी। "जैसे पहले थी वैसे ही हूं। कहां की खूबसूरत। छोड़ो इन बातों को लेकिन तुम बुढ़ापे की ओर जल्दी अग्रसर हो रहे हो। बाल भी सफेद हो गए, आधे उड़ भी गए और तोंद भी निकल आई है। पूरे लाला लग रहे हो।"
"तुमने ठीक कहा कि मै लाला हो गया हूं लेकिन तुम पहले से अधिक हसीन हो गई हो।"
"इरादा क्या है जनाब का, तारीफों के पुल बांध रहे हो?" अलका ने चुटकी ली। "अच्छा छोड़ो इन बातों को, यह बताओ क्या पिओगे? चाय या कॉफी?°
"तकल्लुफ मत करो अलका।"
"तकल्लुफ नही मेहमान नवाजी है। अतिथि का आदर सत्कार भारतीय परंपरा है। तुम्हे कॉफ़ी पसंद है, मैं पांच मिनट में कॉफ़ी बना कर लाती हूं। तब तक तुम टीवी देखो।"
अलका टीवी खोल कर रिमोट अनिल को थमा कर रसोई में चली गई। अनिल ने टीवी चैनल नही बदला। धार्मिक चैनल टीवी पर आ रहा था, उसे ही देखने लगा। अलका कॉफी के साथ बिस्कुट ट्रे में लेकर आई।
"यह क्या अनिल, धार्मिक चैनल देख रहे हो। पहले तो फिल्मों का बहुत शौंक था। अब क्या हुआ?
"तोंदू हो गया हूं शायद इसलिए शौंक भी बदल गए।" मुस्कुराते हुए अनिल ने जवाब दिया।
"कॉफ़ी में चीनी कितनी डालूं?"
"वही दो चम्मच। मधुमेह से अभी बचा हुआ हूं।"
दोनों कॉफ़ी पीते हुए बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हैं।
"अलका बच्चे नजर नही आ रहे हैं। बाहर खेलने गए हैं?"
"कौन से बच्चे?" अनिल का इशारा अलका समझ गई थी फिर भी अनजान बनते हुए कॉफ़ी का घूंट पीते हुए अनिल से पूछा।
"तुम्हारे बच्चे?"
"अनिल मैंने शादी नही की।"
"क्या? पर क्यों नही की?"
"जवाब तुम्हे मालूम है फिर क्यों पूछते हो।"
"ऑन्टी के कारण। ऑन्टी नजर नही आ रही हैं। क्या भाई के पास रहने गई हैं।"
"मां को गुजरे पांच वर्ष बीत गए।"
"मुझे नही मालूम था।"
"हां अनिल आज दस वर्ष बाद हम मिल रहे हैं। इस बीच कोई वार्तालाप भी नही हुआ।"
"तुमने मां के कारण शादी नही की थी। मां के जाने के बाद तो शादी कर सकती थी।"
"अनिल बस इच्छा ही नही रही अब शादी की। उस समय तन की इच्छा को दबा लिया था। धीरे-धीरे मन ने भी ख्याल छोड़ दिया था। अब तो स्कूल ही मेरी ज़िंदगी है। अब तुम बताओ कुछ अपने बारे में?"
"दो बच्चे हैं। एक सात वर्ष की लड़की है और तीन वर्ष का लड़का है। अभी दो महीने पहले ही मकान बदला है। स्कूल के पीछे कोठी नंबर दस खरीदी है। लड़की का स्कूल बहुत दूर पड़ता है। घर के पास दोनों का एक स्कूल में दाखिला हो जाये बस यही सोच कर यहां आया हूं।"
"उस मकान का क्या किया?"
"वो बड़े भाई के हिस्से में आया है। व्यापार भी अब अलग हो गया है।"
"अनिल लड़की को दूसरी कक्षा के लिए परीक्षा देनी होगी। उसकी योग्यता के आधार पर दाखिला होगा। लड़के का दाखिला नर्सरी में होगा, वह मेरे हाथ मे नही है। दाखिला लाटरी पद्यति के अनुसार होता है। वह तुम्हारी किस्मत पर आधरित है। लेकिन तुम्हारी किस्मत तेज है। उम्मीद पर दुनिया कायम है।"
कुछ सोच कर अनिल ने अलका से कहा। "तुम बदली नही। दस वर्ष पहले भी नही कहा था और आज भी नही। बड़ी उम्मीद से पहले भी आया था और आज भी। तुमने मायूस किया दोनो बार।"
"नही अनिल ऐसा नही है जो तुम कह रहे हो। पहले मैंने तुम्हें थोड़ा रुकने को कहा था, तुम रुके नही और आज भी रुकने को कह रही हूं। तुरंत निर्णय कभी नही लेना चाहिए। हालात को समझो। नर्सरी के दाखिले में हम मनमर्जी नही कर सकते हैं। सरकार के दिशानिर्देश का हमें पालन करना पड़ता है।"
अनिल निररुतर वापिस चला गया।

अनिल की लड़की ने दूसरी कक्षा के  दाखिले की परीक्षा में विदुषियों वाले जवाब दिए और तुरंत इंटरव्यू में उत्तीर्ण हो गई। लड़के का दाखिला अलका ने स्टाफ कोटा में करवा दिया। बच्चों के दाखिले के पश्चात अनिल पत्नी संग अलका का धन्यवाद करने रविवार के दिन अलका के घर पहुंचे। आज फिर अलका वाशिंग मशीन में कपड़े धो रही थी।
"अलका मैं जब भी तुमसे मिला तुम्हे कपड़े धोते पाया।"
"अनिल स्कूल में दाखिले की प्रक्रिया में व्यस्तता बहुत थी। अब फुरसत मिली है। एक रविवार की छुट्टी पर घर के सारे काम निबटाने होते हैं। बैठो मैं कॉफ़ी बना कर लाती हूं।"
अनिल की पत्नी अलका के घर का मुआयना कर रही थी। "इतने बड़े मकान में अकेली रहती है। कमाल है अनिल।" पत्नी ने हैरानी से पूछा।
"ऊपर की मंजिल किराये पर दी है। नीचे खुद रहती है।"
"बहुत खबर रखी हुई है।"
"बच्चों के दाखिले के लिए बहुत पापड़ बेले हैं। खुद यहां पहले भी सिफारिश के लिए आया था।"
अनिल ने अपनी पत्नी को अपना अतीत अलका के बारे में कुछ नही बताया था। वह शक्की मिजाज पत्नी से उलझना नही चाहता था। अलका ने कॉफ़ी के साथ पकोड़े भी बनाए। पकोड़े खाते हुए अनिल की पत्नी ने स्वादिष्ठ पकोड़ों की जम कर तारीफ की।
"अलका जी आप इतना सब काम कैसे कर लेती हैं। स्कूल का काम फिर घर के सारे काम और सबसे अच्छी बात स्वादिष्ठ खाना।"
"रसोई का सारा श्रेय अपनी मां को देती हूं, जिन्होंने मुझे रसोई के गुण सिखाये।"
बातों के बीच अलका सोचने लगी कि अनिल भी तोंदू हो गया है और उसकी पत्नी भी गोल मटोल फुटबॉल की तरह है। क्या शादी से समय से ऐसी थी या अब हो गई है। थोड़ा मुस्कुरा कर अपनी सोच को विराम दिया कि सेठ और सेठानियां अक्सर मोटे गोल मटोल ही होते हैं।

अलका के बरकरार यौवन को देख अनिल फिर से अलका पर मुग्ध हो गया। अनिल कभी घर, कभी स्कूल और कभी बाजार में अलका से मिलने के बहाने ढूंढता रहता। दो-तीन महीने अलका ने कुछ नही कहा। एक दिन बाजार में अनिल अलका से मिला।
"अलका थोड़ी देर कॉफ़ी हाउस बैठते है।"
अलका अनिल के साथ हो ली। कॉफ़ी पीते हुए अनिल ने अलका का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा।
"तुम्हे याद है इसी कॉफ़ी हाउस में अक्सर मिलते थे। वो प्यार के दिन कितने हसीन और मधुर थे।"
अलका ने हाथ छुड़ाते हुए उत्तर दिया "अनिल उस बात को दस वर्ष बीत गए। तुम विवाहित हो। तुम्हारे दो बच्चे हैं। तुम अपनी गृहस्थी के बारे में सोचो। मैंने विवाह का सोचना बंद कर दिया है। आजीवन कुंवारी ही रहना है। लोग मिलते हैं और बिछुड़ते हैं। दुनिया गोल है इसलिए कई बार मिलना और बिछुड़ना होता रहता है। विवाह करना होता तो मैं मां के निधन के बाद कर चुकी होती। अब इन नजदीकियों को बढ़ाने का कोई अर्थ नही है।"
इतना कह कर अलका सीट से उठी और बिना मुड़े कॉफ़ी हाउस से बाहर आ गई। कॉफ़ी भी आधी पी थी। अलका को रोकने की हिम्मत अनिल में नही आई।

इस प्रसंग के पश्चात अलका काम मे अधिक डूब गई। चालीस की उम्र में स्कूल की प्रधानाचार्य बन गई। सर्वश्रेष्ठ अध्यापक और प्रिंसिपल के बहुत पुरस्कार अलका को मिले। अलका और उसका स्कूल उन्नति के नए शिखर चूमते हुए नए शिखरों को तलाशते रहे। ख्याति को देखते हुए अलका की बड़ी बहन ने अपने दोनों लड़कियों को अलका के पास पढ़ने और रहने के लिए भेज दिया। अलका का अकेलापन दूर हो गया।

समय बीतता गया। अलका के मार्गदर्शन में उसकी दोनों भांजियां उच्च शिक्षा के बाद नौकरी करने लगी। बड़ी बहन भी बच्चों के बहाने अक्सर रहने आ जाती। अलका का बड़ी बहन और उसकी लड़कियों से बहुत गाड़ा लगाव हो गया। अलका ने अपना पैतृक मकान अपनी भांजियों को देने की इच्छा अपनी बड़ी बहन को जताई। बड़ी बहन खुश हो गई। किरायेदार के प्रथम तल खाली करने के बाद अलका ने उसको किराये पर नही दिया। उसकी भांजियाँ प्रथम तल पर रहने लगी और अलका भूतल पर रहने लगी। बड़ी बहन अक्सर उसका साथ देने अलका के संग रहने लगी। मकान की कीमत अब बहुत अधिक हो गई थी।
उम्र बढ़ती गई। अलका पचपन की हो गई। रिटायरमेंट में अभी पांच वर्ष बाकी थे। बढ़ती उम्र में शरीर ढीला पढ़ने लगा और निरंतर अधिक काम के बोझ से अलका बीमार हो गई। टाइफाइड बिगड़ गया। सारे काम स्वयं करने वाली अलका बिस्तर पर पड़ गई। चार दिन अस्पताल में भी रहना पड़ा। अस्पताल के कमरे में कैद अकेली अलका सोचने लगी कि मां की उसने तीमारदारी की थी। मां को कभी अकेला नही छोड़ा। आज जब टाइफाइड की जकड़ में उसका जिस्म निचुड़ कर कमजोर हो गया है उसकी बहन सिर्फ शाम के समय दस-पंद्रह मिनट ही मिलने आती। भांजियां दो कदम आगे ही निकली। अलका चार दिन अस्पताल में रही लेकिन वे दोनों एक दिन भी अलका से मिलने नही आई। इतनी बेरुखी की उम्मीद अलका को नही थी।

अस्पताल से घर आने पर दोनों भांजियां रात को ऑफिस से लौटने पर मिली "हाए मासी कैसे हो?"
"ठीक हूं बेटा।"
"बहुत कमजोर हो गए हो मासी।"
"दो चार दिन की बात है ठीक हो जाउंगी।" अलका ने हल्की मुस्कान होंठों पर लाकर कहा।
"गेट वेल सून मासी। बहुत काम है। कॉर्पोरेट मीटिंग है सुबह दस बजे। प्रेजेंटेशन भी तैयार करनी है।" कह कर दोनों चली गई।

बहन और भांजियों को अपनी जायदाद देने जा रही थी, यह सोच कर अलका की आंखें नम हो गई। जमाना बदल गया है या वह कुछ जमाने से जुदा सोचती है। अलका ने एक महीना घर रह कर स्वास्थ्य लाभ किया और साथ में सोच विचार कर अपना निर्णय भी बदल लिया।

पुराने होते शरीर पर अब अधिक बोझ डालना उचित नही है। बहन और भांजियों का व्यवहार भी देख लिया। जो उसने मां के लिए सहेली बन कर किया उसको आज वैसा कोई साथी या सहेली नही मिला। अपने भी जायदाद पर नजर गड़ाए बैठे हैं। आदमी जो चाहता है वैसा हमेशा नही होता। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है कोई नही जानता?

अलका की दोनों भांजियों ने दूसरे शहर में नई नौकरी कर ली और अलका का घर छोड़ दिया। अलका की बहन की चाहत थी कि उसकी दोनों लड़कियां उसी शहर में नौकरी करके अलका के घर रह कर अपना हक और जायदाद पर कब्जा रखें। मां और बेटियों की सोच जुदा थी। कैरियर की खातिर दोनों ने शहर बदला। उनकी सोच विदेश में बसे मामा के पास जाने की थी। दूसरे अनजान शहर में दोनों जवान बेटियां कैसे और किसके साथ रहेगी। उनकी सुरक्षा की खातिर अलका की बड़ी बहन अलका का साथ छोड़ बेटियों के संग रहने लगी।

अकेली अलका ने अपना बैंक बैलेंस और जमा पूंजी देखी। अकेली जान का कितना खर्चा होता है?" बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट समेत एक करोड़ रुपये निकले जो उसके भविष्य के लिए काफी थे। रिटायरमेंट पर पेंशन भी बनेगी। भविष्य निधि और ग्रतुईटी की मोटी रकम मिलेगी। उसने समय-समय पर शेयर मार्केट में रकम लगाई थी। सारे शेयर बेच कर एक करोड़ एकत्रित हो गए, जिसे अलका ने बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट करके गरीब बच्चों की शिक्षा हेतु मदद करने के लिए एक ट्रस्ट बनाया। अपनी मां के नाम पर "देवी एजुकेशन ट्रस्ट" रखा। फिक्स्ड डिपाजिट के ब्याज से अलका गरीब बच्चों की फीस भरती थी और पुस्तकें, यूनिफार्म का खर्चा भी सहन करती थी। मेधावी छात्रों की उच्च शिक्षा में आर्थिक मदद करने लगी।
गर्मियों और सर्दियों की स्कूल छुट्टियों में अलका जिन बच्चों की शिक्षा में आर्थिक मदद करती थी उन्हें भारत भ्रमण के लिए ले जाती। उत्तर भारत के भ्रमण के दौरान अलका वैष्णो देवी की यात्रा पर थी। कटरा में हेलिपैड पर अपने नंबर की प्रतीक्षा में अलका बीस बच्चों के समूह के बीच बतिया रही थी।

अनिल अपने परिवार संग हेलिपैड पर आया। अनिल की लड़की और लड़का दोनों अलका के स्कूल के छात्र रहे थे। वे अलका को देख बातें करने लगे। अनिल की लड़की के हाथों में शादी का चूड़ा देख कर अलका ने नवविवाहित दंपति को आशीर्वाद दिया।
"कब की शादी? मुझे भूल गए न।"
"नही मैम आपको कभी नही भूल सकते। आपका सरल तरीके से पढ़ाना कभी नही भूल सकते। आप कठिन विषयों को भी सरलता से पढाती थी। आप का पढ़ाया आज तक याद है मैम।"
"अपने दूल्हे से मिलवाओ।"
अनिल की लड़की ने जोर से आवाज दी। "पापा देखो इधर मैम से मिलो पापा।"
अनिल अपनी पत्नी, लड़के और जंवाई संग अलका से मिलते हैं। अनिल और अलका का अतीत आज भी अनिल का परिवार नही जानता था इसलिए अनिल ने कोई विशेष बात नही की।
"लड़की की शादी पिछले सप्ताह सम्पन्न हुई। माता रानी का आशीर्वाद लेने यात्रा पर आए हैं।"
थोड़ी देर में हेलीकॉप्टर से चंद मिनटों में सांझी छत पर उतर कर भवन की ओर चले। अनिल और अलका धीरे-धीरे चलते हुए सबके पीछे हो गए। अलका के बच्चों का समूह मस्ती में माता रानी के जयकारे के साथ आगे बढ़ गया।
"अलका धीरे चल रही हो।"
"अनिल अब सतावन की हो गई हूं। जिस्म ढल गया है। दो वर्ष पहले बीमार हुई थी उसके बाद जीवन की रफ्तार कम हो गई है। तुम बहुत मोटे हो गए और तुम्हारी पत्नी स्लिम-ट्रिम।"
"बच्चों के दाखिले के समय उसने तुम्हे अपना आदर्श बनाया और तब से स्लिम-ट्रिम और चुस्त है। मैं और मोटा हो गया।"
"लाला जो ठहरे।" अलका के इतने कहते ही अनिल हंसने लगा। "अच्छा तुम बताओ ये बच्चे कौन हैं?"
अलका ने अपने अकेलेपन, बड़ी बहन और भांजियों के व्यवहार और अपनी संपत्ति को एजुकेशन ट्रस्ट को अर्पित देने की बात कही।
"अलका तुम बहुत अच्छा काम कर रही हो। बुरा नही मानो तो एक बात कहूं?" अनिल ने झिझकते हुए पूछा।
"निजी जिंदगी को छोड़ कुछ भी कह सकते हो अनिल।"
"गरीब बच्चों की शिक्षा के तुम्हारे मुहिम मैं तुम्हारा साथ देना चाहता हूं। मेरे पास अनगनित दौलत है। उसका थोड़ा अंश मैं तुम्हारे ट्रस्ट में दान देना चाहता हूं।"
"ठीक है अनिल इस नेक काम के लिए मैं तुम्हे नही रोकूंगी। माता रानी का आशीर्वाद सब पर बना रहे।"

वैष्णो देवी के दर्शन के पश्चात अनिल ने अलका के एजुकेशन ट्रस्ट में एक करोड़ रुपये की धनराशी दान दी और ट्रस्ट के काम में सहयोग के लिए अपने ऑफिस से दो जनों की नियुक्ति कर दी।

साठ वर्ष की उम्र में अलका रिटायर हो गई। अब अपना पूरा समय एजुकेशन ट्रस्ट में देने लगी। अनिल का पूरा सहयोग मिलने लगा। अलका के सामाजिक कार्यों और गरीब बच्चों की शिक्षा में आर्थिक मदद के काम से पूरे प्रदेश में ख्याति हो गई।
अलका और अनिल अब अक्सर कॉफ़ी हाउस में बैठते। अब अपने जीवन की किसी भी बात की चर्चा नही करते। ट्रस्ट की गतिविधियों पर बारीक चर्चा करते हुए कॉफ़ी पीते। चर्चा के बीच मे कुछ पल रुकते, एक दूसरे की आंखों में आंखे डाल देखते, कुछ मुस्कुराते और फिर ट्रस्ट की चर्चा करते।

अलका ने जीवन अकेला जिया। हर मोड़ पर साथी मिलते रहे। उसने विवाह नही किया, अपने बच्चे नही थे लेकिन अनेक बच्चे उसके परिवार का अभिन्न हिस्सा थे।

उम्र बढ़ती गई। अलका अस्वस्थ्य रहने लगी। उसके भाई और बहन के परिवार ने कभी उसका साथ नही दिया। अनिल का परिवार और अनेक बच्चों के परिवार उसकी तीमारदारी में जुटे रहे। अलका अस्वस्थ्य शरीर के साथ भी काम मे जुटी रहती।

एक दिन काम करते हुए ऑफिस से ही अलका परलोक की ओर चल पड़ी। रोते हुए बच्चे और उनका परिवार आज स्वयं को अनाथ महसूस कर रहे थे।

Wednesday, June 20, 2018

दस वर्ष बाद


लगभग एक वर्ष बाद बद्री अपने गांव पहुंचा। पेशे से बड़ाई बद्री की पत्नी रामकली गांव में रह रही थी। बद्री के विवाह को दो वर्ष हो चुके थे। विवाह के पश्चात एक वर्ष बद्री और रामकली शहर में रहे। फिर बच्चे के जन्म के समय बद्री रामकली के संग गांव आ गया। फसल काटने का समय था। बद्री ने अपने खेत पर काम किया। अच्छी फसल की अच्छी रकम मिल गई जो परिवार में बट गई। बद्री के हिस्से में भी अच्छी रकम हाथ आ गई। अच्छी रकम हाथ में आने पर बद्री गांव में ही रुक गया। मकान की टूटी छत को पक्का करवा लिया और कुछ दिन के लिए गांव रुक गया

एक दिन गांव के समीप लकड़ी के लट्ठे ले जाता एक ट्रक खराब हो गया। बद्री ने कुछ रुपये देकर ट्रक ड्राइवर से कुछ लकड़ी के लट्ठे लगभग मुफ्त के भाव ले लिए। लगभग मुफ्त में लकड़ी मिलने पर बद्री ने घर के नए दरवाजे, खिड़की, अलमारी, मेज, कुर्सियां और पलंग बना लिए। उसके हुनर को देख गांव के मुखिया ने ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत काम दिलवा दिया। मुखिया ने अपना काम मुफ्त में करवाया और ग्रामीण रोजगार योजना में काम मे अपना हिस्सा भी रखता था। बद्री को गांव में भी रोजगार मिल गया। शहर जाना छोड़ आसपास के गांव और कस्बों में काम पकड़ना आरंभ कर दिया। गांव का मुखिया नेताओं से जुड़ा था जिसकी बदौलत बद्री को काम की कोई कमी नही हुई। शहर में कमरे का किराया औऱ मंहगाई से बच गया। गांव में लगभग न के बराबर खर्च में रहने पर बद्री ने काफी रकम जुटा ली और चार कारीगर भी अपने अधीन रख लिए।

काम के चलते बद्री गांव में टिक गया। रामकली शहर जाने के लिए बद्री पर दबाव डालती। शहर की चकाचौंध उसे आकर्षित करती। बिना किसी टोकाटाकी के किसी के संग हँस बोल लेना उसे अच्छा लगता था। बद्री काम पर निकलता तब रामकली आजाद पंछी की तरह इधर उधर डोलती फिरती। दिल्ली महानगर में सब आजादी मिली हुई थी जो उसे गांव में नही थी। अपने को बेड़ियों में जकड़ा महसूस करती। बद्री तो काम के सिलसिले में गांव, कस्बों में आता जाता था लेकिन रामकली बच्चे और चूहले तक सिमट गई थी। उसकी ख्वाहिश शहर में रहने की थी। बद्री संग विवाह से पहले रामकली गांव में ही रहती थी और गांव की सीमाएं समझती थी लेकिन विवाह के पश्चात जब उसने आजादी देखी तब गांव में वह दुबारा रहना नही चाह रही थी लेकिन बद्री को जब घर में ही रोजगार मिलने लगा तब वह शहर जाने को राजी नही था। गांव में अपना खुद का घर जिसका कोई किराया नही देना। खाना-पीना शहर के मुकाबले सस्ता। बद्री ने रामकली को दो टूक जवाब दे दिया कि जब तक गांव में रोजगार है वह शहर नही जाएगा।

एक दिन रामकली घर में अकेली थी। बद्री काम के सिलसिले में दूसरे कस्बे में था और बद्री के माता पिता बद्री की बहन से मिलने दूसरे गांव चले गए। रामकली ने अपने बच्चे संग शहर की बस पकड़ ली। बद्री दो दिन बाद घर लौटा। घर पर कोई नही था। पड़ोस में पूछा तो पता चला कि परिवार के लोग उसकी बहन के घर गए हैं। बद्री ने सोचा कि रामकली भी वहीं होगी। अगली सुबह जब बद्री के माता-पिता वापस आए तब रामकली की खोज हुई कि वह कहां है? रामकली बद्री के मां-बाप संग नही गई थी। बद्री ने सभी परिचितों से फोन पर रामकली के बारे में पूछा लेकिन असफल रहा। किसी को रामकली के बारे में कुछ नही मालूम था। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई। बिना बीवी और बच्चे के बद्री लगभग पागल सा हो गया। बदहवास बद्री काम पर भी नही गया। गुमसुम रामकली और बच्चे की तलाश में घूमता रहता।
समय सब गमों का हल है। धीरे-धीरे बद्री काम पर जाने लगा। जहां उसका काम चल रहा था सबने उसे समझाया कि काम न छोड़े, काम के साथ रामकली और बच्चे की तलाश जारी रखे। बद्री काम में जुट गया लेकिन रामकली नही मिली।

लगभग छ महीने बाद एक दिन थाने से बुलाया आया कि नहर की सफाई के दौरान एक महिला और बच्चे की लाश मिली है। क्योंकि रामकली और बच्चे की गुमशुदा रिपोर्ट दर्ज थी उनकी शिनाख्त के लिए बद्री को बुलाया गया। लाश बहुत बुरी हालात में थी। महिला के बदन पर गहने रामकली जैसे थे जिनके आधार पर बद्री और उसके परिवार ने शिनाख्त कर दी और अंतिम संस्कार भी कर दिया।

बद्री का अशांत मन अब शांत हो गया कि रामकली नहर में नहाने के लिए उतरी होगी और बच्चे समेत नहर के तेज पानी के बहाव में बह गई होगी।

गबरू जवान बद्री का अपना मकान और अच्छी आमदनी देख विवाह के रिश्ते आने लगे। तन की भी बहुत ख्वाहिशें होती है जिनको नजरअंदाज भी नही किया जा सकता। बद्री ने दूसरा विवाह कर लिया। सुखी वैवाहिक जीवन से बद्री रामकली और पहले बच्चे को भूल गया। नए जीवन की खुशियां घर आंगन में दौड़ने लगी। तीन वर्ष में दो बच्चे आंगन में मस्ती करने वाले हो गए। बद्री का काम और आमदनी भी पहले से अधिक हो गई। खुशियों ने अतीत भुला दिया।

दस वर्ष बीत गए। बद्री के माता-पिता परलोक सिधार गए। बद्री अब ठेकेदार बन गया जिसके अधीन पच्चीस कारीगर काम करने लगे। उसने अपनी कंपनी बना ली औऱ काम दो दूनी चार और चार दूनी आठ की रफ्तार से बढ़ता गया। दो मंजिल का पक्का मकान बन गया। घर में सब सुख सुविधाएं थी। चारों ओर खुशियों की बरसात हो रही थी।

रविवार की सुबह नाश्ता करके बद्री घर के दरवाजे पर खड़ा गली में खेलते बच्चों को देख रहा था। स्कूल की छुट्टी के कारण गली में बच्चों का जमावड़ा लगा हुआ था। बद्री के बच्चे भी खेल रहे थे। तभी दो औरतों ने शोर मचा दिया। "भूत-भूत" और बच्चों को घर के भीतर जाने को कहा। भूत शब्द सुन कर बद्री भी हैरान और परेशान हो गया। उसने रात के समय भूतों के किस्से सुने थे। दिन के दस बजे भूत कहां से आ गया।

भूत-भूत सुन कर बच्चे अपने घरों की ओर लपके और फटाफट घरों के दरवाजे बंद होने लगे। बद्री ने अपने बच्चों को भी अंदर किया लेकिन खुद घर के दरवाजे पर खड़ा रहा। तभी गली के अंदर एक महिला ने प्रवेश किया जिसे देख कर गली की दो औरतों ने भूत कहना शुरू कर दिया। "रामकली का भूत आ गया। रामकली का भूत आ गया।"
छोटे बच्चों ने रामकली को कभी नही देखा था लेकिन गांव की औरतें रामकली को पहचानती थी। उन्हें याद था किस तरह एक दिन रामकली गायब हो गई थी फिर उसकी और उसके बच्चे की लाश नहर में मिली थी। आज वर्षो बाद रामकली को देख वोही औरतें भूत-भूत कह कर चिल्लाने लगी। यह तो रामकली का भूत है। जिन औरतों के सामने बद्री ने रामकली का दाह संस्कार किया वह कैसे वापस आ गई। उनकी नजर में वह औरत रामकली का भूत ही है।

देखते-देखते गली सुनसान हो गई। रामकली बद्री के सामने खड़ी हो गई। वह बद्री के घर को देख रही थी। एक दम आलीशान घर देख कर रामकली ने कहा।
"घर तो बहुत बड़ा और आलीशान बना लिया है। अंदर आने नही दोगे क्या?"
बद्री ने रामकली को देखा। वह लगभग वैसे ही थी जैसे घर से गई थी। घर के दरवाजे के ठीक बीच खड़ा हो कर बद्री ने रामकली के घर के अंदर जाने का रास्ता रोक रखा था।
"तुम कौन हो और क्या करने आई हो?" बद्री ने तीखी आवाज में पूछा।
"नाराज हो?"
"मैं कौन होता हूँ नाराज होने वाला।"
"फिर अंदर तो आने दो। सब बताती हूँ।"
"किसी अंजान को घर के अंदर क्यों आने दूं।"
"मैं रामकली हूँ।"
"रामकली तो दस वर्ष पहले ही मर गई थी। अपने हाथों से उसका दाह संस्कार किया है। तुम जरूर कोई भूत या चुड़ैल हो। मैं तुम्हे घर के अंदर नही आने दूंगा।"
"तुम मेरी बात मानो। मैं रामकली ही हूँ। मैं कोई भूत या चुड़ैल नही हूँ। अगर मैं भूत या चुड़ैल होती तब मुझे कोई नही रोक सकता था। बिना रोक टोक कहीं भी आ जा सकती। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ।"
"कौन पत्नी, कहाँ की पत्नी। मेरी पत्नी बबिता है जो मेरे पीछे खड़ी तुम्हे देख रही है। मेरे दो बच्चे सहमे माँ संग चिपके हुए हैं। वे डरे हुए हैं, मालूम नही भूत क्या कर दे। देखो भूत के डर से दिन में पूरी गली सुनसान हो गई है। खेलते बच्चे डर के कारण अपने घरों में दुबक गए हैं। मैं तुम्हे घर के अंदर नही आने दूंगा। मेरी पहली पत्नी रामकली मर चुकी है और पूरा गांव इसका गवाह है। सबके सामने अंतिम संस्कार किया है।"
बद्री ने दरवाजा बंद कर दिया लेकिन रामकली घर के दरवाजे पर बैठ गई। घर के अंदर बबिता रामकली के बारे में पूछने लगी।
"भाग्यवान इस औरत को देख कर मैं स्वयं परेशान हूँ। इसकी शक्ल, रंग-रूप सब रामकली से मिलता है। रामकली का अंतिम संस्कार स्वयं मैंने अपने हाथों से किया है। यह रामकली नही हो सकती है। रामकली का भूत जरूर हो सकती है। चुड़ैलों के किस्से बहुत सुने हैं। चुड़ैल किसी का भी रूप धारण करके कुछ भी अनर्थ कर सकती हैं। यह मेरे से क्या चाहती है, अब मैं क्या जानूँ? मैंने अब सब ईश्वर पर छोड़ दिया है। अब वही सब काज ठीक करेगा।" बद्री ने बेबस होकर बबिता से कहा।
बबिता भी आशंकित और डरी, सहमी बद्री को देखती रही। कुछ साहस के साथ बोली "सुनो जी मुझे लगता है कि किसी की साजिश है। कोई हमारे से बदला लेना चाहता है। हमारी धन-संपत्ति और खुशी का कोई दुश्मन है उसी ने जादू टोना करके यह चुड़ैल भेजी है।"
"भाग्यवान कुछ भी संभव है। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है। ऐसा कौन हमारा दुश्मन हो सकता है?"
"मुझे क्या मालूम?" बद्री की तरह बबिता के दिमाग ने भी काम करना बंद कर दिया था।

बद्री और बबिता को सहमा देख दोनों बच्चे भी माँ-बाप से चिपके बैठे थे। थोड़ी देर तक पूरी खामोशी रही फिर रामकली दरवाजा पीटने लगी। अब बद्री ने बबिता से कहा "यह ऐसे नही मानेगी और चुपचाप जाएगी भी नही। तू मुस्तैदी से लट्ठ लेकर चौकनी खड़ी हो जा। मैं दरवाजा हल्का सा खोलूंगा। तू उस पर लट्ठ से वार करियो। मैं उसे आरी से चीर दूंगा।"

बद्री की बात सुन कर बबिता एक मजबूत लट्ठ लेकर मुस्तैदी से दरवाजे की आड़ में खड़ी हो गई। बद्री ने आरी अपने हाथ मे पकड़ी और धीमे से दबे पांव दरवाजे की कुंडी खोली। रामकली दरवाजा पीट रही थी। दरवाजे की कुंडी खुलते ही वेग के साथ रामकली घर के अंदर आ गई। मुस्तैद बबिता ने रामकली पर लट्ठ से दो वार किए। पहला वार रामकली की कमर पर पड़ा और वह लड़खड़ाते गिर पड़ी। लट्ठ का दूसरा वार रामकली के पैरों पर पड़ा। दो वार के बाद रामकली की आंखों से सामने तारे नाचने लगे। वह उठ भी नही सकी। अब बद्री ने मजबूती से आरी संभाली और उसकी गर्दन पर प्रहार करने ही वाला था कि रामकली ने बचने की गुहार लगाई।

"मुझे मत मारो।" उसने दोनों हाथ जोड़ कर माफी की गुहार की। बद्री की निगाह उसके हाथों पर गुदे निशान पर पड़ी जिस पर बद्री राम लिखा था। बद्री वहीं रुक गया और उसने आरी एक ओर फैंक दी। विवाह के तुरंत बाद बद्री और रामकली एक मेला देखने गए थे जहां रामकली ने अपने हाथ पर बद्री और अपना नाम मिला कर बद्री राम गुदवाया था। यह देख बद्री के हाथ रुक गए और आरी हाथ से छूट गई। बद्री ने उसे हाथ पकड़ कर उठाया और चारपाई पर बिठाया और समीप रखे मटके से एक गिलास पानी दिया। रामकली तीन गिलास पानी पी गई।

कुछ देर की शांति के बाद रामकली ने कहना शुरू किया। "बद्री मैं ही तुम्हारी रामकली हूँ।"
"यह कैसे हो सकता है? सारे गांव के सामने तुम्हे अग्नि में सौंपा था तभी सब तुम्हे भूत कह रहे हैं।"
"बद्री वो मैं नही थी। वह रामभरोसे की बीवी चमेली थी।"
"वो कैसे हो सकता है? उस के साथ हमारा बच्चा भी था?"
"वो बच्चा भी चमेली का था।"
"फिर हमारा बच्चा?"
"वो अब नही है। थोड़े दिन बाद डेंगू की बीमारी में चल बसा था।"
"मेरी कुछ समझ में नही आ रहा है। तू क्या कह रही है और क्या कहना चाहती है?"
"बस समझ लो सब किस्मत के खेल है। अब सोचती हूँ कि मैं कठपुतली ही निकली। कब कहाँ नाच गई, पता ही नही चला।" रामकली बोल कर चुप हो गई।
अब बबिता और बच्चे भी बद्री के पास बैठ गए। कुछ पल की चुप्पी के पश्चात रामकली ने कहना शुरू किया।
"मुझे शहर रहने का भूत सवार था। मैं उस दिन दिल्ली की बस पर बैठ गई। मैं अपने कमरे गई, उस कमरे को मकान मालिक ने किसी और को किराए पर दे दिया था।"
"मैंने तो वह खाली कर दिया था। सारा सामान उठा कर मैं यहां गांव ले आया था।"
"मैंने सोचा कि वह कमरा खाली होगा लेकिन वहां साथ वाले कमरे में तुम्हारा कारीगर रामभरोसे रहता था। उसकी पत्नी गांव गई हुई थी। उसने मुझे रुकने के लिए कहा। मैं वहां रुक गई। कुछ दिन तक मैं शहर घूमी फिर रामभरोसे की बीवी गांव से वापस आ गई। मुझे देख कर वह भड़क गई। उसे रामभरोसे पर शक हो गया कि रामभरोसे और मेरा कोई चक्कर है तभी मैं तेरे बिना रामभरोसे के संग रह रही हूं।"
"बद्री ने रामकली का हाथ पकड़ लिया। "मैं तुझे ढूंढने शहर भी गया था लेकिन रामभरोसे वहां नही मिला था और किसी को उसके बारे में नही पता था।"
रामकली ने बताया। "रामभरोसे मुझे छोड़ने के बहाने गांव की ओर चलने लगा। रामभरोसे की बीवी और बच्चा भी साथ हो लिए। उसकी बीवी को पक्का शक था कि रामभरोसे मेरे संग भाग जाएगा। हम रात की बस में बैठे। रास्ते में नहर के पास किसी जगह बस रुकी। हम खाना खाने ढाबे पर बैठे। रामभरोसे की नीयत खराब हो चुकी थी। उसकी बीवी ठीक सोच रही थी। खाने में उसने कोई नशे की दवा मिला दी। मैं, रामभरोसे की बीवी, हमारा बच्चा और उसका बच्चा बेहोश हो गए। मुझे दो दिन बाद होश आया। मैं रामभरोसे के संग किसी अनजान जगह थी। उसने सभी को अपनी पत्नी बताया और हमारे बच्चे को अपना बच्चा। मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसकी बीवी बच्चे को लेकर नाराज हो कर अपने मायके चली गई है। बेहोशी की हालात में उसने मेरे जिस्म से छेड़छाड़ की। मैंने हथियार डाल दिये। उसने शायद मुझे सम्मोहित कर लिया था। वह जैसे कहता गया, मैं वैसे करती गई। हम पति-पत्नी की तरह रहने लगे।"
"मुझे भूल गई थी?"
"शायद यही हुआ था। साल बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं क्या कर रही हूं लेकिन तब तक मुझे गलती का प्रायश्चित करने का कोई साधन नही सूझा कि किस मुंह से तुम्हारे पास आऊं। मैं रामभरोसे संग रहने लगी। फिर एक साल महामारी फैली। सबको डेंगू और चिकनगुनिया होने लगा। बहुत लोग मर गए जिसमें हमारा बच्चा भी चला गया। हम लोग फिर शहर आ गए लेकिन अब की बार हम दूसरे स्थान पर रहने लगे। हमारे बच्चे के चले जाने पर उसे अपराध बोध हुआ और उसने एक दिन असलियत बताई।"
"क्या बताया?"
"जब रात को ढाबे पर हमारे खाने के बाद हम सब बेहोश हो गए थे तब उसने मेरे गहने अपनी बीवी को पहना दिये और नहर में धक्का दे दिया। फिर अपने बच्चे को भी धक्का दे दिया। बेहोशी में दोनों डूब गए। मेरे गहनों के कारण तुमने रामभरोसे की बीवी बच्चे को मुझे और अपना बच्चा समझ तुमने अंतिम संस्कार कर दिया। इसलिए तुम और गांव की हर औरत मुझे रामकली का भूत समझ रहा है।"
"रामभरोसे को छोड़ यहां क्यों आई हो?" बद्री ने रामकली से पूछा।
"पिछले महीने रामभरोसे भी मर गया है। उसे शराब की लत थी। सस्ती शराब पीता था। पिछले महीने जहरीली शराब पीने से बहुत लोग मर गए जिसमें रामभरोसे भी था।"
"अब क्या करने आई हो?"
"प्रायश्चित।"
"मेरी अपनी गृहस्थी है। बबिता और बच्चों संग मजे में जीवन बीत रहा है। मैं उसमें कोई तूफान नही लाना चाहता हूं।"
"मैं नौकरानी बन कर एक कोने में पड़ी रहूंगी। किसी को कुछ नही कहूंगी।"
"रामकली यह हो नही सकता है। चाहे मैंने तुझे समझ रामभरोसे की बीवी और बच्चे का अंतिम संस्कार किया हो लेकिन अब हालात अगल हैं। यदि तू तभी वापस आ जाती तब मैं तुझे अपना लेता लेकिन अब न हमारा बच्चा रहा और मैने बबीता संग सुखी गृहस्थी बसा ली है और तुम भी रामभरोसे संग गृहस्थन बन कर रही। तुम रामभरोसे के मरने के बाद मेरे पास आई हो। अब मेरी जिंदगी में तुम्हारा कोई स्थान नही है। हमारी राह और जिंदगी जुदा है। बिना किसी कारण तुम मुझे छोड़ किसी और के संग राजी खुशी रही। अब तुम मेरे संग नही रह सकती हो।"
"मैं कहां जाऊं?"
"मैं भी क्या बताऊँ। हाँ मैं तुम्हारी आर्थिक मदद कर सकता हूँ जिससे तुम अपना गुजर बसर कर सकती हो। बाकी थोड़ा बहुत काम कर लेना। मजदूरी, घर का काम। मुखिया से कह दूंगा कि रोजगार योजना में मजदूरी दिलवा देगा।"

रामकली बद्री, बबिता और बच्चों को देखती रही। बद्री ने कुछ रुपये रामकली को दिए और मंदिर के बरामदे में उसके रहने का प्रबंध कर दिया। मुखिया ने उसे मजदूरी दिलवा दी।


Saturday, June 16, 2018

ईदी

छुट्टी के दिन वो ईदी ले गए
उड़न खटोले से हम कोलकता पहुंच गए
कुछ अवकाश से फुरसत के पल मिल गए
कुछ पर्यटन के स्थल देखे गए
अकेले घूमते थक से गए
एक पार्क के कोने में बैठ गए
खेलते बच्चों की मुस्कान देखते गए
जेब से निकाल बच्चों को ईदी देते गए

Saturday, June 09, 2018

वृंदावन का कृष्ण कन्हैया



वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सब की आंखों का तारा
मन ही मन क्यों जले राधिका, मोहन तो है सबका प्यारा

सुध बुध भूली खड़ी गोपियां जाने कैसा जादू डाला
वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सब की आंखों का तारा
मन ही मन क्यों जले राधिका, मोहन तो है सबका प्यारा

रंग सलोना ऐसा जैसे छाई हो घटा सावन की
मेरे में तो होई दीवानी मनमोहन मन भावन की
तेरे कारण देख सांवरे छोड़ दिया मैंने जग सारा
वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सब की आंखों का तारा
मन ही मन क्यों जले राधिका, मोहन तो है सबका प्यारा

विवाह उपरांत पढ़ाई

अनुप्रिया पढ़ने में होशियार थी। हर वर्ष स्कूल में प्रथम स्थान पर रहती थी। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन कॉलेज में भी कम नही हुई। उसकी इच्छा दिल्ल...