Friday, September 21, 2018

किस्मत

सुबह से रुक-रुक होती बरसात ने दोपहर के समय उग्र रूप धारण कर लिया। लक्ष्मीनारायण की फ्लाइट कैंसल हो गई और एक दिन अधिक भोपाल में मजबूरन रहना पड़ा। ऑफिस के टूर पर आए लक्ष्मीनारायण का काम समाप्त हो गया। फ्लाइट कैंसल होने पर वे होटल के कमरे में कैद हो गए। दो दिन तूफानी बारिश की मौसम विभाग चेतावनी दे रहा था। खाली समय व्यतीत करना सबसे कठिन काम होता है। होटल के कमरे की खिड़की से बाहर होती तेज तूफानी बरसात को देखते हुए लक्ष्मीनारायण के मष्तिष्क के किसी कोने से विचार बाहर आया।

"लक्ष्मीनारायण अपने समधियों से मिल आओ। इसी शहर में तो रहते हैं।"
"क्या करूंगा वहाँ जाकर जहां कोई इज्जत सम्मान नही। उनके दामाद का बाप हूँ लेकिन न कभी फोन पर बात हुई है और न कभी उनके घर गया हूँ। जाऊं तो तब जब कभी बुलाया हो। आज पुत्र के विवाह को दस वर्ष हो गए हैं लेकिन विवाह के बाद कभी भी समधियों के घर नही गया हूँ। यहां होटल में ही ठीक हूँ।"
"तुम तो किसी से नाराज नही रहते हो फिर समधियों से क्या नाराजगी?"
"मैं कौन होता हूँ किसी से नाराज होने वाला। किस्मत के खेल हैं। दस साल से उनकी लड़की हमारी बहू है। तेज तर्रार लड़की है बेटे और मेरे बीच संवाद बंद हो गए हैं। चुप रहता हूँ कि गलती से मुख से कुछ निकल गया तो तीसरा विश्वयुद्ध आरम्भ होने में एक सेकंड की देर नही होगी।"
"फिर बेटे का विवाह उनके साथ क्यों किया? अपने पसंद के समधी ढूंढ लेते जो तुम्हे अपने घर टिकाते और जाते समय उपहार भी देते।"
"किस्मत का लिखा कोई मेट नही सकता है। शादी से पहले किसको मालूम होता है। जब आदमी संपर्क में आता है तभी असलियत मालूम होती है। मोहल्ले में पुत्रवधु की बुआ रहती थी उसके साथ घनिष्ठता थी उसने विवाह के लिए अपने भाई की लड़की सुझाई। पुत्र को लड़की पसंद आ गई और हमने हाँ कर दी। जहाँ बच्चे की खुशी वहाँ हमारी खुशी। बस यही सोच कर रिश्ता पक्का किया।"
"फिर बात कहां बिगड़ी?"
"हम उसकी बुआ की चिकनी चुपड़ी बातों में आ गए कि शादी भोपाल में कीजिए। सारा खर्च उनके भाई करेंगें। पंचतारा होटल में सब इंतजाम होगा। हमारा इरादा दिल्ली में विवाह का था। उन्होंने कहा कि भोपाल में विवाह का खर्च दिल्ली से आधा होगा और अच्छा भी होगा इसलिए भोपाल में विवाह करने पर दबाव डाला। विवाह में फिजूल खर्च मुझे भी पसंद नही है अतः मैं भोपाल में विवाह के लिए राजी हो गया। जब बारात के खर्च उठाने की बात की तब पुत्रवधु और उसके पिता बिगड़ गए कि हम क्यों खर्च उठाएं। तुम अपना खर्च उठाओ हमने तो अपना खर्च कम करने के लिए भोपाल बुलाया था। पुत्रवधु की बुआ से बात की तब वह मूक बधिर बन गई। उनको पूर्ण विश्वास था कि अपनी इज्जत की खातिर हम बारात वापस ले कर नही जाएंगे और उनकी तेज तर्रार लड़की मेरे पुत्र को काबू में कर लेगी और बुड्ढे अपने आप चुप हो जाएंगे। हुआ भी यही। बच्चे खुश तब चुपचाप विवाह का खर्च अपने सिर लेकर एक किनारे हो गए।"
"कभी मिलना हुआ समधियों से?"
"मैंने गुस्सा पी लिया और स्वयं उनसे कभी बात नही की न उनका कभी फोन आया। मुझे ऐसा लगता है कि उन्होंने अपनी तेज तर्रार लड़की जो उनका भी कहना नही मानती थी औऱ अपने ऊपर भार समझते थे, हमारे सिर पर डाल कर अपनी इतिश्री समझी, वर्ना कभी कहीं सुना है कि विवाह के बाद लड़की मायके जाना भी छोड़ दे।"
"तुम्हारे बुआ के साथ कैसे संबंध हैं?"
"उसी दिन टूट गए। झूठ का पुलिंदा जिंदा कब तक रह सकता है। हमने कहा कि बात विवाह खर्च की नही है बल्कि झूठ बोल कर भोपाल में विवाह करवाने पर दबाव डालने की है। जब उसे अपने घर की बात मालूम थी तब हमसे झूठ नही बोलना चाहिए था।"
"तुम किसको दोषी मानते हो?"
"सब किस्मत में लिखा था। किस्मत का लिखा कोई बदल नही सकता है। समय आने पर बुद्धि वैसे ही कार्य करने लगती है और किस्मत का लिखा सम्पूर्ण होता है।"
"बहुत बातें हो गई। बरसात थम गई है। कल की टिकट आरक्षित करवाओ और दिल्ली चलो।"
"तुम्हारा टाइम पास हो गया।"
"तुम्हारा भी तो कर दिया वर्ना उदास और निराश ही रहते।"

लक्ष्मीनारायण मुस्कुरा दिए और खाने के लिए रेस्टॉरेंट के अंदर दाखिल हुए। एक कोने की टेबल पर बैठ कर खाने का आर्डर किया तभी उनके समधी परिवार सहित रेस्टॉरेंट में आये। एक नजर लक्ष्मीनारायण से मिली औऱ दूसरे कोने की टेबल पर बैठ गए। लक्ष्मीनारायण मुस्कुराते हुए डिनर करने लगे।

किसके लिए

पांच सौ गज की भव्य तिमंजला कोठी जिसके आगे शानदार लॉन है और पीछे शानदार बरामदा में आज उसके चौसठ वर्ष के मालिक अनिल राय अकेले लॉन में एक कुर्सी पर बैठे है। सामने सफेद रंग की गोल मेज है। मौसम गुलाबी नवंबर का और शाम के साढ़े छ बजे। हल्की गुलाबी ठंड में अनिल राय ने शाल ओढ़ रखी है। इतनी बडी कोठी में आज अकेले हैं। पत्नी और बच्चे बाहर पार्टी में गए हैं और घर में सिर्फ अनिल राय और एक नौकर दर्शन हैं।

कुछ दिन से अनिल राय अस्वस्थ्य चल रहे थे जिस कारण वे ऑफिस भी नही जा रहे थे। तीन दिन अस्पताल में भी रहे। अब तीन दिन से घर पर आराम कर रहे हैं। बड़ा करोबार है जिसे बच्चे देख रहे हैं। व्यापार की चिंता नही है। आज अचानक से एकांत घर में अनिल राय विचलित हो गए। पिछले चालीस वर्षो से अनिल राय कारोबार में व्यस्त रहे। कभी खालीपन का अहसास तो छोड़ो खाली समय से वास्ता ही नही पड़ा। परिवार और कारोबार में डूबे रहते अनिल राय आज लॉन में बैठे शाम को रात में परिवर्तित होते देख रहे थे। आसमान काला स्याह हो गया था। अर्धचंद्र उनकी आंखों के सामने आ गया। कहीं कुछ तारे टिमटिमा रहे थे। कहीं से कुछ बादल आए औऱ कुछ पल के लिए चांद को ढक दिया। कुछ देर बाद बादल आगे चल दिये और चांद फिर खिलखिला दिया। प्रकृति के इस दृश्य को देख कर अनिल राय मुस्कुरा दिए। वर्षो बाद आज खुले में बैठने का अवसर मिला वर्ना वर्षो तक ऑफिस के बंद कमरों में ही सारा दिन बीतता। अनिल राय को अपना बचपन औऱ कॉलेज के दिन याद आ गए, कैसे वह खुले में विचरण किया करते थे। काम में उलझे अनिल राय प्रकृति में विचरण छोड़ कर बंद कमरों में सिमट गए। आज चाहे नरम तबियत के चलते मजबूरी में ही खुले वातावरण में बैठना पड़ा लेकिन बहुत अच्छा लगा। रात आठ बजे बजे अनिल राय थोड़ी थकान महसूस करने लगे। लॉन से उठ कर कमरे में आ गए। थोड़ा खाना खाया, दवाई ली और बिस्तर पर आंख मूंद कर लेट गए। थोड़ी देर में अनिल राय नींद के आगोश में थे।

पत्नी औऱ बच्चे जब देर रात आए तब अनिल राय सो रहे थे। सुबह जल्दी उठ कर फिर से लॉन में बैठ गए। पत्नी और बच्चे देर से उठे। तब तक अनिल राय स्नान करने बाद नाश्ता करके ऑफिस के लिए रवाना हो गए। थोड़ी देर ऑफिस में काम देख कर औऱ वरिष्ठ मैनेजरों से मिल कर वापिस घर आ गए।
पत्नी "क्या बात है, जल्दी घर आ गए?"
"अब बच्चे कारोबार संभाल रहे हैं। ऑफिस में रुक कर भी क्या करूँ।"
"मतलब क्या है कहने का। जो पहले करते थे, वही करो औऱ क्या। मैं जो करती रही हूँ, वही कर रही हूँ।"
"तुम तो किट्टी पार्टी में सारा समय बिताती हो। मैं अब आराम करना चाहता हूँ।"
"मतलब मुझे बोर करोगे।"
"नही तुम्हे पूरी आजादी है। जैसे रहना है तुम रह सकती हो।"
"ठीक है। मैं जा रही हूँ पार्टी में। तुम आराम करो।" कह कर पत्नी ने ड्राइवर को आवाज दी और कार में बैठ कर पार्टी में सम्मलित होने चल दी।

अनिल राय घर में अकेले परिस्थिति का अवलोकन करने लगे कि घर में या तो नौकर हैं या वे। इतनी बड़ी कोठी अनिल राय को कभी भी काटने नही दौड़ी जो आज वे महसूस कर रहे थे। पहले सारा दिन काम में व्यस्त रहते थे और घर सिर्फ एक तरह से सोने आते थे। अब सारा दिन घर की दीवारों को देखने लगे। दो चार दिन यही सिलसिला चलता रहा। थोड़ी नरम तबियत के कारण आराम करते या सो जाते। पंद्रह दिन बाद अनिल राय भले चंगे हो गए लेकिन उन्होंने ऑफिस जाना आरंभ नही किया। एक दिन छोड़ कर ऑफिस जाते और लंच समय तक वापिस घर आ जाते। एक दिन दोपहर के समय पत्नी किट्टी पार्टी में नही गई तब अनिल राय ने पूछा।
"चलो कहीं घूम कर आते हैं।"
"कहाँ चलना है?"
"बस कुछ पुराने दिन याद करते हैं। वहीं चलते हैं यहां शादी के बाद चलते थे।"
"तुम सठिया गए हो। तब हमारी हैसियत ऐसी नही थी कि पंच तारा होटल में किट्टी पार्टी करते। तब पार्क में बैठ कर समय व्यतीत करते लेकिन अब हम नही जा सकते।"
"हमने किसी का क्या करना है। हमने अपनी खुशी और इच्छा देखनी है।"
"अब मेरे से ये काम नही होंगे।" पत्नी ने साफ मना कर दिया।
कुछ दिन तक अनिल राय अपने बच्चों की दिनचर्या औऱ व्यवहार पर गौर करने लगा। सब अपने में मस्त और व्यस्त मिले। ऑफिस, क्लब और होटल में व्यस्त थे। कभी-कभी उससे तबियत का पूछते और दो-तीन मिनट मुश्किल से साथ बैठना होता। रात का खाना भी एक साथ नही खाना होता। पोते-पोतियां भी अपनी पढ़ाई और अपने दोस्तों में व्यस्त रहते। अनिल राय ने इतना कभी नही सोचा था कि बुढ़ापे में तबियत नरम होने पर परिवार का कोई सदस्य उसके समीप नही होगा। देखभाल के लिए नौकर अवश्य हैं।
एक दिन दोपहर के समय अनिल राय सोचते-सोचते दो भाग में विभक्त हो गया। एक अनिल औऱ दूसरा मिस्टर अनिल राय। चलिए दूसरे भाग को हम सिर्फ राय के नाम से संबोधित करते हैं।
"हैलो अनिल आजकल बहुत सोच विचार करते हो। इस उम्र में दिमाग पर अधिक बोझ मत डालो।"
"राय कहना आसान है लेकिन करना मुश्किल है।"
"कुछ भी मुश्किल नही होता है अनिल।"
"होता है राय, मुश्किल होता है।"
"सब संकल्प करना होता है फिर क्या मुश्किल अनिल।"
"ऐसे मुझे कुछ समझ नही आएगा। कुछ विस्तार से कहो।"
"चलो मैं उदाहरण दे कर अपनी बात सपष्ट करता हूँ।"
"हाँ यह ठीक रहेगा।"
"जब तुम स्कूल, कॉलेज में पढ़ते थे तब क्या इतने अमीर थे जितने आज हो?"
"नही तब साधारण मध्यम वर्गीय परिवार था।"
"क्या करते थे तब?
"स्कूल में पढ़ाई कम और खेल कूद मस्ती अधिक होती थी। कॉलेज में भी यही सिलसिला रहा। खूब घूमना। कॉलेज के टूर संग पर्वत, मैदान, समुंदर और रेगिस्तान सब देखे। भारत देश का लगभग हर कोने में घूमना हुआ।"
"तब घूमने से पहले कुछ सोचते थे?"
"बस पिताजी से कुछ जेब खर्च मिल जाये। वो मिलता औऱ मैं घूमने के लिए उड़न छू हो जाता था।"
"अब तुम्हारे पास अनगिनित पैसे हैं। खुद के मालिक हो। किसी से जेब खर्च नही मांगनी। तब तो तुम खुद दूसरों को जेब खर्च देते हो फिर किस लिए सोचते हो। निकल पड़ो भारत भ्रमण पर। कुछ पल पुराने सोचो औऱ आज दिल खोल कर जिओ।"
"पत्नी साथ नही दे रही है। उसको स्टेटस सता रहा है।"
"छोड़ो उसको। एक बार खुद अकेले निकलो। अगली बार खुद वो तुम्हारे साथ आएगी।"
"विवाह के बाद तीन साल तक हम खूब घूमे। उसके बाद व्यापार बढ़ने लगा और उसमें डूब गया।"
"कोई बात नही जब जागो तभी सवेरा है। उठो और कहीं घूम कर आओ।"
"ठीक है। कोशिश करता हूँ।"
"कोशिश नही। अवश्य कहो।"
अनिल मुस्कुरा दिया।
"अनिल अब तुम मुस्कुरा दिए तब चलता हूँ। मुझे लगने लगा है कि तुम अवश्य अपने पुराने जवानी के दिनों को फिर जिओगे। अब मैं चलता हूँ।"
मिस्टर राय ने रुक्सत ली और अनिल सो गए।

अगले दिन सुबह अनिल राय ने पत्नी से साथ चलने को कहा लेकिन उसने अनिल राय को बुड्ढा घोषित कर दिया कि बुढ़ापे में अनिल राय की बुद्धि सठिया गई है। सुनकर अनिल राय सोचने लगा कि उसने इतना बड़ा व्यापार और साम्राज्य किसके लिए खड़ा किया है। जब कोई उसके साथ नही तब आराम से बेफिक्र होकर अपनी बाकी जिंदगी बिताएगा। यही सोच कर उसने एक सूटकेस में अपनी दवाइयां और कपड़े रखे और दो दिन बाद सुबह छ बजे की अजमेर शताब्दी से जयपुर रवाना हो लिए। सुबह चार बजे अनिल राय उठे। स्नान करने के बाद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए। ड्राइवर ने उन्हें स्टेशन पर छोड़ा और अनिल राय गाड़ी में बैठ गए।
"आपका स्वागत है अनिल।"
"अरे राय तुम।"
"हाँ तुम्हे अकेले एक नए सफर पर जाते देख अति प्रसन्नता है।"
"अब राय की राय तो माननी पड़ेगी।" अनिल मुस्कुरा दिए। रेल चल पड़ी औऱ पानी की बोतल, समाचारपत्र और नींबू पानी अनिल को मिला।
"अनिल नींबू पानी पीना। तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा है।"
"मेरा पीछा नही छोड़ोगे।"
"मैं तो तुम हूँ। पीछा करने का कोई मतलब ही नही। तुम्हारे अंदर समाया हुआ हूँ। तुम जहां, मैं वहां।"
"फिर अब तक कहाँ थे?"
"निश्चित समय का इंतजार कर रहा था।"
अनिल समाचारपत्र पढ़ने लगे। जो सफल उद्यमी अनिल राय सिर्फ हवाई यात्रा और वो भी बिज़नेस क्लास में या फिर मर्सीडीज, ऑडी जैसी कारों में सफर करते थे और पंचतारा होटल, रिसॉर्ट्स में रहते थे, आज जयपुर पहुंच कर एक साधारण होटल में रुके। कुछ देर आराम किया। शाम को जयपुर के बाजार घूमने निकल पड़े। तीन दिन जयपुर के पर्यटक स्थल देखने के पश्चात अनिल राय अजमेर, पुष्करराज, उदयपुर, नाथद्वारा, जैसलमेर और जोधपुर घूमते हुए माउंट आबू पहुंचे।

दिल्ली से निकले पंद्रह दिन हो गए। अनिल राय का रक्तचाप भी सामान्य रहने लगा। डॉक्टर से फोन पर बात की तब डॉक्टर ने उन्हें किसी पहाड़ पर बाकी जीवन जीने की सलाह दे दी।
"अनिल राय अब तुम व्यापार की चिंताओं से मुक्त पहाड़ों की वादियों का लुत्फ उठाओ। आधी बीमारी तो खुश रहने से ठीक हो जाएगी। बाकी आधी बीमारी को दवाइयां नियंत्रण में रखेंगी। अब इस उम्र में कुछ न कुछ तो छोटी मोटी बीमारी लगी रहेगी।"
अनिल राय अपनी यात्रा का विवरण और फ़ोटो फेसबुक पर डाली तो पत्नी ने अनिल राय को फोन किया।
"कहाँ कहाँ इतनी अच्छी जगहों पर घूम रहे हो? मुझे नही लेकर जा सकते थे।" पत्नी ने नाराजगी जाहिर की।
"अरे मुझे बुड्ढा बोल रही थी और मना कर दिया था।"
"तुम पत्नियों की भाषा आज तक नही समझे। अनाड़ी रहोगे सारी उम्र।"
"चल अगली बार साथ चलेंगे। अब तो मैं वापिस आ रहा हूँ।"
अनिल राय दो दिन बाद घर वापिसी के लिए रेल की टिकट आरक्षित करवाई। कभी ऑटो में, कभी रोडवेज की बस में, कभी टैक्सी में, कभी रिक्शा में और कभी रेल में सफर करते हुए अनिल राय ने लगभग एक महीना सफर किया। मशहूर पर्यटक स्थलों के साथ दूर दराज के क्षेत्र देखे।
"अनिल अब तुम खुश तो हो?"
"राय मुझे आज पहली बार अहसास हुआ कि मैं अपने लिए जी रहा हूँ पता नही मैं किसके लिए काम कर रहा था और क्यों?"
"अनिल काम तो पहले भी अपने लिए कर रहे थे लेकिन फर्क इतना था कि अपने से दूर हो गए थे और अब खुद स्वयं में समा गए हो।"
"राय तुम ठीक कह रहे हो। अपने में समाने पर पत्नी भी लाइन पर आ गई है। कह रही है कि अगली बार साथ लेकर चलना।"
"अच्छा अनिल मैं चलता हूँ। अब कभी-कभी मिलना होगा।"
"लेकिन क्यों?"
"अब तुम स्वयं से मिल लिए औऱ मैं भी तुम औऱ तुम भी मैं हूँ। जब फिर स्वयं से जुदा होंगे तब मिलने आऊंगा।"
"बाए राय।"
"बाए अनिल।"
अनिल और राय एक हो गए। अनिल राय।

Monday, September 10, 2018

मोची

सुबह से हो रही बरसात अब थम चुकी थी। सुबह ऑफिस आते समय कपड़े गीले हो गए थे अब सूख गए थे। जूतों में पानी भर गया था और कीचड़ में दो तीन बार पैर पड़ने के कारण बदरंग हो गए थे। गीले जूते ऑफिस में ब्लोअर के आगे रख कर सुखा लिये लेकिन बदरंग जूते अटपटे लगने लगे। लंच समय ऑफिस के नीचे आया। सामने वाले ऑफिस की बिल्डिंग के कोने में एक मोची का ठिया है। थोड़ी-थोड़ी धूप निकलने लगी तो सोचा कि जूतों की शक्ल अच्छी करवा ली जाए। मोची के ठीये पर बहुत भीड़ थी। महिलाओं की अच्छी खासी भीड़ थी जिनकी चप्पल, सैंडल टूट गई थी और उनको जुड़वाने के लिए महिलाएं बतिया रही थी। भीड़ को देख कर वापस होने ही वाला था कि आवाज आई। "बाबूजी रुको, जल्दी कर दूंगा।" देखा कि मोची के समीप एक वृद्ध आदमी बैठ कर चप्पलें ठीक करने लगा। वह बूढ़ा मोची का पिता था। अब दो मोची होने पर काम फटाफट होने लगा। एक सैंडल ठीक करने के पश्चात उसने मुझे आवाज दी। "बाबू आइए अब आपके जूते ठीक कर देता हूँ।"
पिता मोची मेरे जूते पालिश करने लगा। "बाबू इतने खराब जूते तो कभी नही होते थे तुम्हारे।"
इतना सुन कर एक दम झटका लगा औऱ पिता मोची को ध्यान से देखने लगा।
"नत्थू तुम।"
"हाँ बाबू मैं नत्थू।"
"नत्थू तुम दिल्ली से मुम्बई कब आये।"
"दस साल हो गए हैं। यह मेरा बेटा है। मुम्बई आया और मुझे भी बुला लिया। अब उम्र हो गई है, अकेला रहने से अच्छा है कि बच्चों के संग रहा जाए।"
"हाँ यह तो ठीक है।"
"बाबू तुम भी मुम्बई आ गए।"
"नही मैं तो दिल्ली में ही हूँ। अभी मुम्बई ट्रांसफर हुआ है। फिर दिल्ली चले जाएंगे।"
"बाबू अभी उसी मकान में रहते हो।"
"नही। मकान बदल लिया है।"
"जूता तो एकदम बेकार हो गया है। कभी भी इसका तला निकल सकता है। अभी ठीक कर देता हूँ। नया ले लो।"
"इतनी बरसात में नया भी बराबर हो जाएगा। इसलिए पुराना पहन कर ऑफिस आया हूँ।"
"इसी सोच ने सबको लाइन लगा कर यहां खड़ा किया हुआ है। बरसात में पुराने जूते, चप्पल पहन कर निकलते हो और वो जवाब दे जाते हैं।"

मैं मुस्कुरा दिया और बचपन की बातें याद आ गई। घर की गली के नुक्कड़ पर नत्थू मोची का ठिया था। घर का हर सदस्य नत्थू मोची से हर रविवार जूते पालिश करवाता था। नत्थू खुद सुबह घर आकर जूते, चप्पल और सैंडल ले जाता था और थोड़ी देर बाद पालिश और मरम्मत करके वापस दे जाता था। घर के हर सदस्य का नाम नत्थू को मालूम था। अपने ठीये की दीवार पर नत्थू मोची लिखवा रखा था। जब भी वो मिट जाता तब हमसे ही ड्राइंग के रंग और ब्रश ले जाता औऱ खुद दीवार पर रंग बिरंगा नत्थू मोची लिखता। मुझे बहुत गुस्सा आता था क्योंकि ब्रश दीवार पर चला कर खराब कर देता था और रंग भी वापस नही करता था। बच्चे से बड़े हो गए। शादी हो गई फिर मेरे साथ पत्नी और बच्चों के जूते, चप्पल, सैंडल भी नत्थू मोची ने ठीक किए। फिर एक दिन नत्थू मोची अपने ठीये से चला गया और उसकी जगह कोई औऱ मोची बैठने लगा। पूछने पर पता चला कि उसने ठिया बेच दिया है। इस बात को आज लगभग पंद्रह साल हो गए। घर पर जब भी जूते, चप्पल, सैंडल खराब होते तब नत्थू मोची का जिक्र आ ही जाता था कि मोची जबरदस्त था। टूटे फूटे जूतों को एकदम नया बना देता था। ऐसा मोची फिर नही मिला।
आज पंद्रह वर्ष बाद एक झटके में नत्थू मोची ने मुझे पहचान लिया हालांकि मैंने उसे तब पहचाना जब उसने मुझे बाबू कहा। बाबू मेरा घर का नाम है और नाम भी नही भूला।
"बाबू अब देखो जूता।"
"अरे नत्थू तुमने तो एकदम नया कर दिया। चलो नए जूते के पैसे बचे।" मैने मुस्कुराते हुए कहा। "लेकिन तुमको यहां कभी देखा नही।"
"अब बुड्ढा हो गया हूँ। तबियत भी ठीक नही रहती है। कभी-कभी आता हूँ जब तबियत ठीक होती है।"
घर पहुंच कर पत्नी ने चमकते हुए जूते देखे तो पूछ ही लिया। "बरसातों में नए जूते क्यों लिए?"
"जूता भी पुराना है और मोची भी पुराना मिल गया जिसने जूता नया कर दिया।"
पत्नी के मुख से स्वयं ही उसका नाम निकल पड़ा। "कौन नत्थू।"
"हाँ, ऑफिस के सामने उसके लड़के का ठिया है। कभी-कभी आता है।"
पत्नी मुस्कुरा दी और अगले दिन एक बैग में अपनी तीन जोड़ी सैंडल ठीक करने के लिए रख कर मुझे पकड़ा दी।

Friday, September 07, 2018

दो बुड्ढे अलग अलग

रामशंकर साठ वर्ष के हो गए और सेवानिवृत्त हो गए। सोमवार सुबह आराम से उठे और बालकनी में चाय की चुस्कियों के साथ समाचारपत्र पढ़ने लगे। रामशंकर के पिता बंसीलाल लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलते बालकनी में आकर पूछते हैं।
"क्या बात है, ऑफिस की छुट्टी है क्या?"
"पिताजी आपको याद नही कि शुक्रवार को मैं रिटायर हो गया। अब ऑफिस वालों ने अलविदा कह दिया।"
"उम्र हो गई है मेरी अब। कभी-कभी बातें भूल जाता हूँ। जब साठ के तुम हो गए हो तो मेरी उम्र का अंदाजा लगा ही लो। कम से कम पिचासी या छियासी तो अवश्य होगी।"
"कुछ काम करोगे या फिर आराम करोगे। क्या सोचा है?" कह कर बंसीलाल रामशंकर के समीप पड़ी खाली कुर्सी पर बैठ गए।
"कुछ ढंग का काम मिलेगा तो जरूर करूंगा। खाली बैठने से अच्छा कुछ काम करना है।"
"हाँ यह तो अच्छा सोचा तुमने।"
"कल से पिताजी सुबह सैर करने हर रोज चलेंगे। अभी तक तो सिर्फ छुट्टी वाले दिन ही चलते थे।"
"जैसा तुम ठीक समझो।"

अगले दिन सुबह रामशंकर अपने पिता के संग कार में बैठ कर डिस्ट्रिक्ट पार्क सैर करने गए।
"कार उठाने की क्या आवश्यकता थी। घर के पीछे वाले पार्क में घूम आते।" कार में बैठते बंसीलाल ने रामशंकर को कहा।
"पिताजी आज देर से सैर करने निकले हैं। धूप भी निकल आयी है। धूप में सैर का आनंद नही आता। डिस्ट्रिक्ट पार्क में पेड़ों की झुरमुट के बीच पखडंडी है, वहीं सैर करेंगे। धूप भी नही लगेगी।"

डिस्ट्रिक्ट पार्क की कार पार्किंग में कार लगा कर रामशंकर ने पिता बंसीलाल का हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे पिता-पुत्र सैर करने लगे। बंसीलाल के एक हाथ में सहारे के लिए लाठी थी और दूसरे हाथ को पुत्र रामशंकर ने सहारा दिया हुआ था।
"रामशंकर आज तुम्हारे संग सैर करके भारतीय सामाजिक मूल्य याद आ गए।"
"कौन से पिताजी।"
"जब तुम छोटे थे तब मैं पार्क में तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलता था और जब आज मैं बूढ़ा हो गया हूँ तो तुम मेरा हाथ पकड़ कर चल रहे हो।"
"पिताजी इसको फर्ज कहते है जो भारतीय परंपरा और संस्कार का एक अभिन्न हिस्सा है। एक पिता जवानी में संघर्ष करके अपने बच्चों को पैरों पर खड़ा करके उनका विवाह करता है ताकि वोह अपने परिवार की छत्रछाया बने। जब पिता शरीर और रुपयों से थोड़ा कमजोर पड़ता है तब बच्चे उसी तरह से माता-पिता की सेवा करते हैं जैसा उन्होंने उनका बचपन में किया था। बच्चे अपने माता-पिता से संस्कार सीखते हैं।"
"हमने अपना कर्तव्य निभाया और अब तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो। हम दोनों का जीवन सार्थक है।" मुस्कुराते हुए बंसीलाल ने कहा।
"थोड़ा थक गया हूँ। बेंच पर बैठ कर विश्राम करते हैं। बातों में कुछ लंबी सैर हो गई है।" बंसीलाल के इतना कहते ही रामशंकर ने इधर उधर नजर दौड़ाई। पेड़ों के झुरमुट समाप्त होते गुलाब वाटिका में बेंच थे औऱ वहीं पिता-पुत्र कुछ विश्राम करने बैठ गए।
एक शोर से बंसीलाल और रामशंकर का ध्यान बटा।
"बेवकूफ, कुत्ते, सुअर अंधा हो कर चलता है। अबे गिर जाता तो?"
"खामखा चिल्ला रहा है। गिरा तो नही न। जरा सा कंकड़ पहिये के नीचे आ गया तो शोर ऐसे मचा रहा है जैसे मर गया हो।"
"अबे तू तो चाहता ही है कि मैं अभी मर जाऊं और सारी संपत्ति हड़प लूं। एक धेला नही दूंगा। कान खोल कर सुन ले।"
"छाती पर बांध कर ऊपर ले जइयो। एक धेला नही चाहिए मुझे। आग लगा दे अभी सारी संपत्ति को। ज्यादा टू टँ की तो अभी छोड़ कर घर चला जाऊंगा। धमकी किसको दे रहा है।"
यह तीखी बातचीत एक वृद्ध औऱ उसके पुत्र के बीच हो रही थी। दोनों के बीच कटी जली बातचीत को सुन बंसीलाल और रामशंकर सन्न रह गए। वृद्ध व्हील चेयर पर थे और उनका लड़का पार्क की सैर करवा रहा था। व्हील चेयर के पहिये के नीचे छोटा पत्थर आ गया था जिससे व्हील चेयर अटक गई और थोड़ा झटका लगा। झटका लगने से वृद्ध अपने लड़के पर बिगड़ गए।

पार्क में सैर कर रहे काफी व्यक्ति आसपास एकत्र हो गए। ऐसे मौके पर तमाशा देख कर बाद में मिर्च मसाला लगा कर बातचीत का विषय मिल जाता है। अब सैर करने वाले विभिन्न समूहों में बंट कर आपस में चर्चा करने लगे।
पहला व्यक्ति "अब देखो पहले बूढ़े को। लड़के की तारीफ कर रहा है। दोनों ऐसे बात कर रहे हैं जैसे दोस्त हों।"
"दूसरा व्यक्ति "दूसरे को देखो। ऐसा लग रहा है जैसे छत्तीस का आंकड़ा है।"
तीसरा व्यक्ति "सब संस्कारों का खेल है। जैसा बोओगे वैसे मिलेगा।"
चौथा व्यक्ति "बिल्कुल ठीक कह रहे हो भाईसाहब। पहले बुड्ढे ने अपने बच्चे पर भरोसा किया है। वह उसकी सेवा कर रहा है और दूसरे बुड्ढे शक्की है। हमेशा शक करता है कि जायदाद एक बार बच्चों के नाम लिख दी तो उसको कोई पूछेगा नही। तभी दोनों कुत्ते बिल्ली की तरह लड़ रहे हैं।"
पांचवा व्यक्ति "जायदाद अपने पास रखे लेकिन बच्चों से लड़े तो नही। कहीं लड़के का दिमाग फिर गया तो सेवा बंद कर देगा। व्हील चेयर पर तो पहले से है। पानी पिलाने को कोई नही मिलेगा।"
छटा व्यक्ति "ठीक कह रहे हो भाईसाहब। जब जिस्म नरम हो जाये तब बच्चों के साथ नरमी से पेश आना चाहिए।"
सातवां व्यक्ति "बुड्ढे में हिम्मत तो है। व्हील चेयर से उठ नही सकता है। अकड़ पूरी है।"

लोगों की बात सुनकर बंसीलाल छड़ी के सहारे से उठे।
"राम चल घर चलें। लोगों को मसाला मिल गया है। हम अपने समय को सकारात्मक तरीके से व्यतीत करें। यही जीवन का उद्देश्य है।"
"सही पिताजी लड़ाई में क्या रखा है। भरोसा रखो और प्रेम से जीवन बिताओ।"
वो बुड्ढा अपने पुत्र से झगड़ रहा था। लोगों की भीड़ जमा थी। बंसीलाल और रामशंकर मुस्कुराते हुए घर लौट गए।

Monday, August 27, 2018

विवाह

सुबह से घर में कोहराम मचा हुआ था। जोर-जोर की आवाजों ने पड़ोसियों के भी कान खड़े कर दिए। वे भी संत लाल के मकान की ओर कान गड़ाए बैठ गए। कुछ अपने मकानों से बाहर निकल आये और संत लाल के दरवाजे के पास खड़े हो कर उनके घर हो रहे महा युद्ध का मजा लेने की भरपूर कोशिश कर रहे थे। 

रविवार का छुट्टी का दिन था। किसी को ऑफिस, दुकान जाने की कोई जल्दी नही थी। मुफ्त में हो रहे मनोरंजन का लुत्फ उठाने में हर कोई पीछे नही रहना चाहता था।

सुबह के सात बजे थे। मोहल्ले में कइयों की नींद संत लाल के घर हो रहे झगड़े की आवाजों से खुली थी।
कुछ दिनों से संत लाल और उसकी पत्नी शांति अपनी बेटी श्रुति को अपनी पसंद के लड़के से विवाह के लिए मजबूर कर रहे थे लेकिन श्रुति ने दो टूक मना कर दिया कि उसने प्रेम विवाह करना है। लड़का उसके संग ऑफिस में काम करता है। 

श्रुति के माता-पिता को लड़का सिर्फ इसलिए पसंद नही था कि वह दूसरे राज्य और जाति का था।
आज सुबह उठते ही श्रुति से फिर राय पूछी और उसने साफ मना कर दिया।
"मैं या तो समीर से विवाह करूंगी या पूरी उम्र कुंवारी रहूंगी। मुझे किसी और से विवाह नही करना।"
"तू ऑफिस काम करने जाती है या फिर नैन मटक्का करने। कहती है कि प्रेम विवाह करूंगी।" कह कर शांति ने श्रुति को कस कर पकड़ कर झंझोर दिया। श्रुति गिरते हुए बची। उसने भी माँ को कस कर पकड़ कर झंझोर दिया। माँ से उसकी गिरफत से बचने के लिए यत्न किया औऱ धक्का-मुक्की में दोनों गिर पड़े। संत लाल ने शोर मचा दिया। "शर्म नही आती तुझे। माँ पर हाथ चलाती है।"
"मैंने कौन सा हाथ चलाया है। माँ ने मुझे पकड़ा था, मैं तो सिर्फ बचने का यत्न कर रही थी।" जवान श्रुति ने बूढ़ी माँ की गिरफत से बाहर आ कर कहा।
"झूठ बोलती है और बहस भी साथ में करती है।" कह कर संत लाल ने बेटी श्रुति को दो थप्पड़ रसीद कर दिए।

बाप के हाथों पिटाई से श्रुति भौचक्की हो गई। उसे कुछ नही सूझ रहा था। कुछ पल थर-थर कांपती रही और फिर तुरंत घर से बाहर निकल गई। घर के बाहर पड़ोसी झगड़े का आनंद उठा रहे थे। बिखरे बालों और अस्त-व्यस्त कपड़ो में श्रुति को देख कर झेंपते हुए तितर बितर हो गए। तेज कदमों में चलते उसके कदम समीप के पार्क में रुके। वह बुरी तरह से हांफ रही थी। एक खाली बेंच पर वह बैठ गई। आंखों को बंद करके शून्य में खो गई। 
कुछ देर बाद वह अपने होश में आई औऱ सोचने लगी कि अब क्या किया जाए। अब उसे अपने माता-पिता से कोई उम्मीद नही रही कि वे उसकी पसंद के लड़के से उसका विवाह करेंगे। उसने भी ठान लिया कि विवाह वह अपनी पसंद समीर से करेगी या फिर कुंवारी रहेगी।

तभी उसके दादा जी कृष्ण लाल लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए उसके समीप बेंच पर बैठ गए। श्रुति अपने विचारों में खोई हुई थी और दादा जी के आगमन का उसे पता नही चला। दादा जी उसे देखते रहे। श्रुति मन ही मन विचार किये जा रही थी और हल्के-हल्के होठों से बुदबुदाई जा रही थी। उसके बुदबुदाए शब्द दादा जी को समझ नही आ रहे थे। लगभग आधे घंटे बाद भी श्रुति सामान्य नही हुई तब दादा जी ने उसके कंधों पर हाथ रखा। कंधों पर हाथ के स्पर्श से श्रुति चौंक गई। दादा जी को देख कर श्रुति लड़खड़ाती जुबान से बोली। "दादा जी आप।"
"चलो घर चलो।"
"नही मैं घर नही जाऊंगी।"
"हर समस्या का हल होता है। शांत रहो और घर चलो।"
दादा जी ने श्रुति का हाथ पकड़ा औऱ खड़े हो गए। श्रुति दादा जी के साथ धीरे-धीरे कदमों से घर की ओर चल दी। दोनों कुछ नही बोले। चुपचाप घर पहुंचे। तब तक तमाशबीन पड़ोसी अपने काम धंधों में लग चुके थे।
जैसे ही दादा जी और श्रुति ने घर मे कदम रखा। संत लाल और शांति ने एक स्वर में तीखे वचन बोलने शुरू किए। "आ गई गली मोहल्ले में तमाशा दिखा कर।"

दादा जी ने श्रुति को चुप रहने का इशारा किया जिसे देख श्रुति दनदनाती हुई अपने कमरे में घुस कर दरवाजा बंद कर दिया और अंदर से कुंडी लगा दी।
कृष्ण लाल को श्रुति के संग देख कर संत लाल ने पिता से तीखे स्वर में पूछा "कहाँ से पकड़ कर लाये हो करमजली को?"
कृष्ण लाल ने बहस करके झगड़े को बढ़ाना उचित नही समझा और धीरे-धीरे अपने कमरे में जाते हुए बोलते गए। "जवान लड़की है। ऑफिस में काम भी करती है। बांध कर मत रखो। अनर्थ मत करो। जहाँ कहती है विवाह उसका कर दो।"
शांति इस बात पर चिढ़ गई। "सुनो गैर बिरादरी में शादी नही होगी।"
"बिल्कुल पिता जी। मतलब ही नही पैदा होता। शादी हमारी मर्जी से होगी।"
बेटे और बहू की बात सुनकर कृष्ण लाल ने कहा। "एक बार मिल लो लड़के से। फिर फैसला करना।"
कृष्ण लाल की बात सुन कर शांति ने चिढ़ कर संत लाल को कहा। "छोड़ो इनको, लगता है उम्र के साथ अक्ल भी कहीं घास चरने गई है।"
कृष्ण लाल कुछ नही बोले और चुपचाप एक गिलास पानी पीने के बाद बिस्तर पर लेट गए।

संत लाल और शांति ने श्रुति का कमरा बाहर से बंद कर दिया। "अब यह दरवाजा हमारी मर्जी के लड़के पर मोहर लगने पर ही खुलेगा।"
इतना सुन कर कृष्ण लाल ने हल्के से कहा। "अत्याचार मत करो, बगावत हो सकती है।"
शांति चिढ़ गई और संत लाल से बोली। "बूढे को समझा दो बीच में टांग न अड़ाए। इतना अच्छा रिश्ता घर बैठे हर रोज नही आता है।"
कृष्ण लाल ने चुप्पी को बेहतर समझा।

श्रुति के लिए रिश्ता शांति के मायके से आया था इस कारण संत लाल और शांति फौरन तैयार हो गए। कृष्ण लाल को भी कोई आपत्ति नही थी लेकिन श्रुति अपने सहपाठी से विवाह करना चाहती थी। दो वर्ष से प्रेम बंधन में थे। श्रुति और समीर के परिवार मध्यवर्गीय थे। प्रेम के कारण श्रुति ने विरोध किया और आज उसके माता-पिता ने उसके साथ मार पीट भी की और उसके कमरे का दरवाजा भी बाहर से बंद कर दिया।

बंद कमरे में श्रुति ने ठान किया कि अब वह इस घर मे नही रहेगी। वह समीर के संग भाग जाएगी। यदि समीर ने उसका संग नही दिया तब भी यह इस घर मे नही रहेगी। किराये पर कमरा ले कर रहने लगेगी और तमाम उम्र कुंवारी रहेगी। पढ़ी लिखी है। अच्छी नौकरी करती है। अपना गुजारा कर लेगी।

दोपहर के समय संत लाल और शांति अपने भाई से मिलकर श्रुति के विवाह के संबंध में बातचीत करने गए। दादा कृष्ण लाल ने श्रुति के कमरे का दरवाजा खोला और अपने कमरे में बैठ कर श्रीकृष्ण रुक्मणि विवाह प्रसंग पुस्तक से ऊंची आवाज में पढ़ने लगे। श्रुति कमरे से बाहर आ कर दादा जी के समीप बैठ कर श्रीकृष्ण रुक्मणि विवाह प्रसंग सुनने लगी। 

रुक्मणि के भाई ने विवाह जब पक्का किया तब रुक्मणि ने श्रीकृष्ण को विवाह का संदेश भेजा। श्रीकृष्ण ने उसे स्वीकार करके सब योद्धाओं के सामने रुक्मणि को अपने रथ पर बिठा लिया और युद्ध मे सब योद्धाओं को पराजित करके रुक्मणि संग विवाह किया।
"मुझे क्या करना चाहिए दादा जी?"
"जो रुक्मणि ने किया था।"
"क्या?" दादा जी का उत्तर सुन कर श्रुति अचंभित हो गई।
"पहले समीर से उसकी राय पूछो। क्या वह तुमसे इन हालत में विवाह करना चाहता है। यदि हाँ। क्या वह तुम्हे अपने माता-पिता के घर ले जाएगा या अलग तुम दोनों रहोगे?"
"समझ गई दादा जी। अब रुक्मणि संदेश भेजेगी।"
"सहमति मिलने पर ही अगला कदम उठाना जैसा श्रीकृष्ण औऱ रुक्मणि ने किया था। वहां श्रीकृष्ण ने योद्धाओं से युद्ध किया था यहां तुम्हे पुलिस का सामना करना पड़ सकता है।"

कुछ दिन घर में शांति रही। श्रुति और समीर ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन कर दिया ताकि पुलिस का झंझट न हो। विवाह के पश्चात अपना अलग घर बसाने के लिए किराये पर फ्लैट भी ले लिया। श्रुति और समीर ने दादा जी की बुद्धिमता का लोहा मान लिया कि श्रीकृष्ण और रुक्मणि विवाह प्रसंग के द्वारा दोनों को सलाह दे दी।
कोर्ट मैरिज के दिन श्रुति अच्छे कपड़े पहन कर घर के दरवाजे पर खड़ी हो गई। आमतौर पर श्रुति घर के दरवाजे पर खड़ी अपनी स्कूटी से ऑफिस जाती थी। एक मिनट मुश्किल से लगता था अपने कमरे से निकल कर स्कूटी स्टार्ट करने में लेकिन उस दिन श्रुति दस मिनट तक खड़ी रही। शांति को शक हुआ।
"खड़ी क्या देख रही है। ऑफिस नही जाना क्या?"
"जाऊंगी।"
इतने में समीर की बाइक श्रुति के सामने रुकी और हवा की रफ्तार से श्रुति बाइक पर बैठ गई। देखते-देखते समीर ने बाइक की रफ्तार बढ़ाई और पलक झपकते बाइक गली से मुख्य सड़क पर पहुंच गई और आंखों से ओझल हो गई।
श्रुति के बाइक पर बैठते शांति ने शोर मचा दिया। जब तक संत लाल घर के द्वार तक आते तब तक श्रुति काफी आगे निकल चुकी थी। संत लाल और शांति दोनों एक साथ निष्कर्ष पर पहुंचे कि कही श्रुति समीर के संग फुर तो नही हो गई। दोनों दादा जी के पास पहुंचे।
"आप को कुछ खबर है क्या?"
दादा कृष्ण लाल अपनी धुन में बोलने लगे। "श्रीकृष्ण रुक्मणि का संदेश पाते फौरन रुक्मणि के पास पहुंच गए।"
इतना सुनते ही शांति चिल्ला उठी "सुनो जी मुझे तो लगता है श्रुति घर से भाग गई है। जरूर इस बुड्ढे ने सलाह दी होगी। अब क्या करें?" 
संत लाल ने बदहवासी में कहा "अब करना क्या है। यह सोच। मुंह पर कालिख पोत गई। पहले अपने भाई को बुला। सलाह करनी है कि क्या किया जाए?"
तुरंत फोन मिलाए गए और संत लाल के शुभ चिंतक दो घंटे में एकत्रित हो गए। श्रुति का फोन बंद मिला। पहले पुलिस के पास जाने की हिचकिचाहट थी लेकिन अंत में पुलिस के पास जाना पड़ा। पुलिस स्टेशन जा कर सभी भौचक्के रह गए। श्रुति समीर और अपने दो सहपाठियों संग पुलिस स्टेशन बैठी अपने कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट दिखा रही थी कि यदि उसके घर से कोई शिकायत करने आए तब उनको मैरिज सर्टिफिकेट की कॉपी दिखा देना कि उसने विवाह अपनी मर्जी से किया है। 

संत लाल और शांति ने थोड़ा शोर मचाया लेकिन उनकी आपत्ति किसी काम नही आई। थोड़े हंगामे के पश्चात सभी वापिस हो लिए। पुलिस ने भी समझाया कि बालिग, पढ़ी लिखी, कामकाजी लड़की को स्वतंत्र निर्णय लेने दीजिए। जबरदस्ती करने का जमाना नही है। कानूनी शादी को स्वीकार करना पड़ेगा।
"नाक कटवा दी सबके सामने।" शांति के भाई ने हाथ पैर पटकते हुए कहा और नाराजगी में संत लाल औऱ शांति को थाने में छोड़ कर चला गया। सभी रिश्तेदार भी धीरे-धीरे खिसक लिए। पुलिस ने भी संत लाल औऱ शांति को श्रुति के संग समीर को अपनाने की सलाह दी।
"पढ़ालिखा खूबसूरत कमाऊ लड़का है। स्वीकार करके आशीर्वाद दीजिए। जात बिरादरी में क्या रखा है।"
संत लाल और शांति के पास कोई और चारा नही था। वे गुमसुम थाने में बैठे रहे।
"भाई साहब अब आप आशीर्वाद दीजिए। घर जाइये और हमे भी मिठाई खिलाइए।" फिर श्रुति और समीर की ओर देखकर थानेदार ने कहा। "अरे नीचे झुक कर पैर पकड़ कर आशीर्वाद लो और हमें भी फ्री करो। बहुत सारे दूसरे काम भी करने हैं। जवान हो फटाफट करो, जैसे शादी की है, वैसे आशीर्वाद लो।"
श्रुति और समीर ने झुक कर संत लाल और शांति के पैर छुए। संत लाल की आंखों में आंसू आ गए और श्रुति और समीर के सर पर आशीर्वाद का हाथ रख कर शांति को भी आशीर्वाद देने को कहा।
"घर चलो। दादा जी का भी आशीर्वाद ले लो।"
 
 

Thursday, August 16, 2018

पीढ़ी का अंतर


समय के मुताबिक ख्याल भी बदल जाते हैं। हमारी जरूरते बदलती है और सोच भी परिवर्तित हो जाती है। हालात और समय के मुताबिक समझौते करने पड़ते हैं। जब स्वयं हम खुद बदल जाते हैं तब अपने करीबी का बदलना भी स्वाभाविक है। किसको क्या कहें? कुछ नही कह सकते हैं बस सोच कर समयानुसार स्वयं ही बदल जाते हैं। और कुछ चारा भी नही होता है। छोटे बच्चों को अपने अनुसार ढालते हैं लेकिन समय का चक्र हमारी और हमारे बच्चों की सोच बदल देते हैं। आखिर यह कह कर संतोष कर लेते हैं कि पीढ़ी की सोच का अंतर है।
मनोहर लाल आज 60 वर्ष के हो गए और आज ऑफिस में उनका अंतिम दिन है। आज 40 वर्ष की नौकरी के पश्चात मनोहर लाल रिटायर हो रहे हैं। ऑफिस में विदाई पार्टी है। मनोहर लाल कुछ उदास से थे लेकिन उन्होंने उदास भाव चेहरे पर नही आने दिए। दोपहर बाद पत्नी मीना ऑफिस आ गई। मनोहर लाल के पुत्र विदेश में नौकरी कर रहे थे, वहीं अपनी सहपाठी से विवाह कर लिया। उसे विदेश गए 10 वर्ष हो गए। मुश्किल से थोड़े दिन के लिए दो बार आए। पुत्री बैंगलोर में कार्यरत है। मनोहर लाल और मीना अकेले ही रह रहे हैं।
ऑफिस में भावभीनी विदाई हुई और कंपनी की कार में उनके सहपाठी उनको घर छोड़ने आए।
बीस वर्ष की उम्र में मनोहर लाल की नौकरी लगी। नौकरी के साथ-साथ आगे पढ़ाई जारी रखी और तरक्की करते हुए आज साठ वर्ष की उम्र में जनरल मैनेजर के पद से रिटायर हुए। वैसे तो अपना मकान है, रिटायरमेंट पर भविष्य निधि और ग्रतुईटी फंड की बड़ी रकम मिली है जिससे बुढापा आराम से कट जाएगा लेकिन मनोहर लाल को पूरी रात नींद नही आई। परिवार को जोड़ कर रखने की ख्वाहिश मनोहर लाल की अधूरी रह गई। पुत्र को बड़े चाव से विदेश पढ़ने भेजा। पढ़ाई में होनहार पुत्र को विदेश में ही नौकरी मिल गई। वह वहीं बस गया। अपने सहपाठी से प्रेम विवाह कर लिया। विदेशी युवती के साथ विवाह विदेश में ही हो गया जिसमें मनोहर लाल सम्मलित ही नही हो सके। विवाह के बाद सिर्फ एक बार पुत्र औऱ विदेशी बहू दिल्ली मिलने आए और कुछ दिन रहने के बाद वापिस विदेश चले गए। अलग संस्कृति, अलग भाषा, अलग संस्कार और सोच के कारण मनोहर लाल पुत्र से मिलने विदेश नही गए। बड़े अरमान थे मनोहर लाल के कि पुत्र, पुत्रवधु और पोते-पोतियों के संग एक छत के नीचे रहेंगे लेकिन मनुष्य जो सोचता है वह प्रभु की सोच से अलग होता है। उसने क्या रच रखा है हमें क्या मालूम? सोचते-सोचते पूरी रात करवटों में कट गई। सुबह पांच बजे मनोहर लाल की आंख लगी।
पत्नी मीना भी बेफिक्री से सोती रही कि पति ने ऑफिस तो जाना नही है, आराम से उठेंगे। सात बजे मीना उठी।
"उठो आज ऑफिस नही जाना इसका यह मतलब नही कि सारा दिन बिस्तर तोड़ना है।" मीना ने झंझोर कर मनोहर लाल को हिलाया। "अच्छा मैं नहा कर आती हूँ।" कह कर मीना गुसलखाने चली गई।
मीना नहा कर आई तब तक मनोहर लाल सो रहे थे।
"क्या बात है तबियत ठीक है न?"
आंखें मलते हुए मनोहर लाल उठे और चश्मा पहनते हुए कहा। "बस जल्दी उठने का मकसद समाप्त हो गया मीना। ऑफिस जाने के लिए जल्दी उठना और जाना। अब क्या जल्दी उठना।"
"एक ही दिन में इतने मायूस क्यों हो गए। रिटायरमेंट के बाद एक नई जिंदगी का सफर आरम्भ होता है।"
"मीना बिना बच्चों के घर रैन बसेरा लगता है। सारी रात यही सोच कर करवटे बदलता रहा।"
"आप ऐसा क्यों सोचते हो। बच्चे पूरी उम्र माँ-बाप के साथ रहें, यह जरूरी नही। बच्चे जीविका के लिए परदेश भी जाते हैं। यह तो प्रकृति का नियम है। इसमें उदास होने की कोई आवश्कयता नही है।"
"मीना तुम्हारी बात से मैं सहमत हूँ फिर भी जिन हालात में बच्चे अगल रह रहे हैं उनको दिल मानने को तैयार नही।"
"हम बच्चों के साथ भी रह सकते हैं।"
"उनकी जिंदगी हमसे बहुत जुदा हो गई है। अजनबी बन कर नही रहना चाहता हूं। पिता-पुत्र के रिश्ता अजनबियों जैसा हो जाएगा, कभी सोचा भी नही और चाहा भी नही।"
"दिल छोटा क्यों करते हो? किस चीज की कमी है?"
"रुपयों की कमी नही है लेकिन रिश्तों की कमी है। अकेलापन काटने को दौड़ता है मीना। बर्दास्त से बाहर है मीना।"
"कभी लगा नही कि अंदर ही अंदर इतना घुट रहे हो?"
"बस ऑफिस की व्यस्तता के कारण खाली समय नही मिलता था। दिमाग के बंद खानों में बातें कैद थी जो आज घुमड़-घुमड़ कर दिमाग के बंद खाने से बाहर निकल रही हैं।"
"आप यही सोचते रहोगे तब जीवन कैसे कटेगा? जैसे बच्चे रहना चाहते हैं उनपर छोड़िए। ईश्वर की यही इच्छा है। हम क्या कर सकते हैं।"
"ईश्वर के हाथों की कठपुतलियां हैं। आज इस बात पर पक्का यकीन हो गया है। जैसा वो चाहेगा वैसे झूमना पड़ेगा।"
"बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं उनको अपना जीवन जीने दो। कुछ मलाल न करो। हमने अपनी तरफ से उनकी परवरिश की और अच्छे संस्कार देने की पूरी कोशिश की है। बच्चों को अपने भविष्य के लिए घर और माता-पिता से दूर रहना पड़ता है। प्रकृति का नियम है।"
मनोहर लाल चुप हो गए और स्नान के गुसलखाने चले गए।
मनोहर लाल को पुत्र की तरफ से चिंता नही थी। चलो वह विदेश में बस गया। विदेशी युवती से विवाह किया। नौकरी के पश्चात विवाह हो गया। अभी वह विदेश में है लेकिन एक आस दिल में है शायद कभी भारत वापिस आ जाए। मनोहर लाल की असली चिंता पुत्री को लेकर है। पुत्री मान्या तीस की हो चली है। उच्च शिक्षा के पश्चात उच्च कंपनी में कार्यरत है। अच्छी आय है फिर भी विवाह नही कर रही है। कई रिश्ते ठुकरा दिए। आखिर क्या पसंद है उसे? शायद उसे स्वयं भी नही मालूम है। मान्या उलझन में है कि किस किस्म का लड़का उसे चाहिए। मनोहर लाल अक्सर मीना से कहते हैं कि आजकल अधिक पढ़ने और अधिक आय की नौकरी के कारण लड़कियों के सर आसमान पर रहने लगे हैं। उनकी नानुकुर लड़कों से अधिक हो गई है। पहले लड़कों के नखरे सुना करते थे अब लड़कियों के नखरे लड़कों से अधिक हो गए हैं। उनकी आकांक्षाएं लड़कों से कई गुणा अधिक हो गई है कि कोई लड़का उन्हें जचता ही नही। यही हाल मान्या का है। मान्या पहले दिल्ली में ही थी अब दो वर्ष से बंगलुरू में रह रही है। पहले कुछ समय मीना मान्या के संग रही लेकिन मां की उपस्थिति बेटी की आजादी में खलल डालती थी और जबरदस्ती मां को वापस भेज दिया। लड़कियों की इतनी आजादी मनोहर लाल और मीना को कभी पसंद नही थी लेकिन बच्चों के आगे सबको झुकना पड़ता है। इसी कारण मनोहर लाल का पुत्री मान्या के साथ संवाद लगभग बंद ही हो गया। कभी-कभी मीना की मान्या से बातचीत हो जाती थी।
मां को वापिस भेजने के पीछे मुख्य कारण मान्या का अपने साथी के साथ लिवइन में रहने का था। मनोहर लाल लिवइन के विरुद्ध थे। वे मान्या का विवाह उस सहपाठी से करने को तैयार थे। मनोहर लाल और मीना ने पुत्री मान्या को कह दिया था कि वे जाती-धर्म कुछ नही देखेंगे बस जिस लड़के को मान्या चुनेगी वे उसे बिना किसी संकोच के अपना दामाद स्वीकार करेंगे लेकिन मान्या लिवइन में रह कर उस लड़के को परखना चाहती थी। इस कारण पिछले एक वर्ष से मनोहर लाल ने मान्या से संबंध लगभग तोड़ लिया था परंतु दिल और मन से बच्चों को कैसे निकाल दें। मीना कभी कभार फोन पर मान्या से बातचीत करती रहती थी।
सेवा निवृत्त होने के पश्चात मनोहर लाल सुबह और शाम के समय समीप के पार्क टहलने जाते। घर के लिए राशन, फल और सब्जी स्वयं खरीदते और यथा संभव सारे घरेलू कार्य करके अपना समय व्यतीत करते। समाचारपत्र को पूरा तसल्ली से पढ़ते फिर भी बहुत से समय खाली जाता जिसमें वे सोच विचार करते रहते। सोचते हुए फिर उनका मन मान्या को सोच कर विचलित हो जाता।
"कुछ दिन मनीष के पास हो आते हैं। सारी दुनिया के बच्चे विदेश रहते हैं। क्या हम नही जा सकते अपने पुत्र के पास?" एक दिन गुमसुम विचारों में व्यस्त मनोहर लाल को मीना ने कहा।
"मनीष विदेश में है। वहां की आबोहवा, संस्कृति हमारे से अगल है। मन नही लगेगा। यहीं दिल्ली में ठीक बैठे हैं।" मनोहर लाल ने बेमन से उत्तर दिया।
"तुम बीमार न पड़ जाओ कहीं मुझे यह चिंता सताती है। सारा दिन बच्चों के बारे में सोचते रहते हो और कर कुछ सकते नही फिर उनके पीछे परेशान क्यों होना है। जब वे बेफिक्र है तब हम भी बेफिक्री से अपना शेष जीवन जियें।" मीना ने मनोहर लाल को कहा और वे मुस्कुरा दिए।
मीना समझ गई कि मनोहर लाल मनीष से बात नही करेंगे इसलिए शनिवार की शाम मीना ने मनीष को फोन किया। अमेरिका में सुबह का समय था और मीना को मालूम था कि मनीष घर पर होगा और बात हो जाएगी। अक्सर मनीष सुबह के समय फोन करता था।
"हेलो।" मनीष की आवाज सुन मीना खिल उठी।
"बेटा कैसे हो। बहू और बच्चा कैसे हैं।"
"सब ठीक हैं माँ। पापा कैसे हैं?"
"हम भी ठीक हैं। पापा अब रिटायर हो गए हैं।"
"कब रिटायर हुए?"
"एक महीना हो गया है।"
"मुझे बताया ही नही। चलो अब तो आपके पास समय ही समय है। मेरे पास आ जाओ।"
"मेरा तो बहुत मन है लेकिन पापा नही आना चाहते है।"
"फोन पापा को दो। मैं बात करता हूँ।"
मनीष और मनोहर लाल एक लंबे अर्से के बाद बात कर रहे हैं। मनीष पापा से अमेरिका आने को कहता है लेकिन मनोहर लाल अधिक सर्दी और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण अमेरिका न जाने के बहाने तलाशने लगते हैं। अंत में मनीष कुछ दिन के लिए आने को कहता है और आने-जाने की टिकट भेजने की बात कहता है।
अपने वायदे के अनुसार दो महीने बाद मनीष आने जाने की टिकट और वीजा मनोहर लाल और मीना के लिए भेजता है। टिकट आने पर मनोहर लाल को मीना संग अपने पुत्र मनीष के पास अमेरिका जाना ही पड़ा। मनीष का घर एयरपोर्ट से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर था। मनीष माता-पिता को लेने एयरपोर्ट आया। छुट्टी का दिन था। चौड़े हाईवे पर कार एक सौ बीस एक सौ चालीस किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ रही थी। डेढ़ घंटे में मनीष का घर आ गया। एयरपोर्ट से घर के सफर में मीना ही मनीष से बातें करती रही। मनोहर लाल चुपचाप हूँ हाँ करते हुए कार की खिड़की से बाहर का नजारा ही देखते रहे।
घर पर पुत्रवधु मोनिका और तीन वर्षीय पौत्र भव्य से पहली बार मुलाकात हुई। अभी तक मनोहर लाल और मीना ने सिर्फ फोटो में देखा था। मोनिका ने जीन्स और टॉप पहन रखा था और भव्य ने निकर और टॉप। मोनिका का कद पांच फुट गयारह इंच का था और मनीष का कद पांच फुट नौ इंच। मोनिका की मनीष से अधिक हाइट पर मनोहर लाल ने मीना को धीमे से कहा। अपने से बड़ी पत्नी ली है मनीष से। हमारे यहां पत्नियों का कद पति से छोटा होता है।
मनीष ने बात सुन कर मुस्कुराते हुए मजाकिया स्वर में कहा। "सर उठा कर पत्नी से बात करता हूँ, हिंदुस्तानियों की तरफ सर झुका कर बात नही करता हूँ।"
पुत्र की बात सुन कर मनोहर लाल झेंप गए।
मौसम ठंड का था। मनोहर लाल और मीना घर तक सीमित रहते। वातानुकूलित घर में ठंड का अहसास नही होता था। मनीष औऱ मोनिका सुबह काम पर चले जाते। वे भव्य को स्कूल में छोड़ते जो उन्ही के साथ शाम के समय आता। शनिवार और रविवार मनीष और मोनिका मनोहर लाल और मीना संग रहते औऱ उनके संग घूमने भी जाते।
मोनिका अमेरिकन नही थी। वह ब्राजील की रहने वाली थी। उसका परिवार भी ब्राजील में रहता था। ऑफिस में एक साथ काम करते हुए मनीष और मोनिका एक दूसरे के समीप आये और प्रेम बंधन में बंध कर विवाह बंधन में बंध गए। मोनिका ने मनोहर लाल और मीना को भरपूर प्रेम और इज्जत दी। पोता भव्य भी अंग्रेजी में बात करता था। मनोहर लाल और मीना के आने से पहले मोनिका और भव्य ने कुछ शब्द हिंदी के सीखे। उन सबके बीच का सेतु मनीष था क्योंकि भाषा के कारण संवाद इशारों से होता तब सब खिलखिला कर हँस पड़ते। मोनिका आत्मियता से मनोहर लाल और मीना संग रही। उसका परिवार भी दूर रहता था और उसे भी परिवार का महत्व मालूम था।
मनोहर लाल और मीना सारा दिन घर मे रहते। मीना सिर्फ खाना बनाती क्योंकि वे शुद्ध शाकाहारी थे। मोनिका ने शाकाहारी खाना आरम्भ कर दिया था फिर भी मांसाहारी अधिक बनता था। अधिक ठंड, भाषा के अतिरिक्त सबसे अधिक बात मनोहर लाल को काटती थी वह थी अकेलापन। सारा दिन अनजान देश, जगह और लोगों के बीच सिर्फ शनिवार और रविवार ही बात करने के लिए कोई नजर आता था। जिस कारण मनोहर लाल और मीना दो महीने के वीजा अवधि समाप्त होने पर भारत वापस लौट आये।
मनीष से मिल कर और उसके खुशहाल वैवाहिक जीवन को देख कर मनोहर लाल का चित्त शांत हुआ और मनीष के प्रति नाराजगी भी खत्म हुई। चलने से पहले मनीष ने पिता से पूछा। "पापा क्या आप अब भी मुझसे नाराज हो?"
"ऐसा क्यों सोचते हो?"
"मैं विदेश में बस गया और विदेशी युवती से विवाह किया और भारत कब लौटूंगा, मुझे भी नही मालूम।"
"बेटा शुरू में मैं जरूर नाराज था लेकिन अब तुमसे मिल कर और तुम्हारा काम देख कर मुझे तसल्ली हुई कि तुम गलत दिशा में नही भटके। विदेशी युवतियों के बारे में मेरी धारणा कुछ अलग थी कि वे आजाद ख्याल की होती हैं। मौज मस्ती में लिप्त रहती हैं। गृहस्थी में उनकी रुचि नही होती है। इस कारण आशंकित था। अब तुम दोनों के बीच प्रेम देख कर मन शांत हो गया है। अब मुझे कोई चिंता नही है। यहां तुम्हारी जीविका है, वहां खुश रहो, यही मेरा आशीर्वाद है।"
"पापा विदेश में आपको दोनों तरह की लड़कियां मिलेंगी। बहुत सोच समझ कर मैंने विवाह किया। मोनिका परिवार के महत्व को समझती थी इसलिए विवाह किया। पापा आप रिटायर हो गए हो। हमारे साथ रहिये।"
मुस्कुराते हुए मनोहर लाल ने आशीर्वाद दिया "खुश रहो। हम मिलते रहें यही प्रभु से विनती करता हूँ। अब तुम सब भारत आओ। मोनिका को इंडिया दिखाओ। हम तुम्हारा इंतजार करेंगे।"
मनोहर लाल और मीना भारत वापस आ गए। मनोहर लाल को खुश देख कर मीना निश्चिन्त हो गई। उसकी एक चिंता समाप्त हुई कि पिता और पुत्र के बीच की दूरी कम हुई। कुछ दिन तक मीना अपने अमेरिका दौरे की चर्चा सब मिलने वालों से करती रही। मनोहर लाल की भी सोच कम हो गई और प्रसन्न रहने लगे।
कुछ दिन बाद मनोहर लाल फिर चिंतित रहने लगे।
"अब क्या हुआ?"
"दूसरी चिंता याद आ गई।"
"कौन सी?"
"मान्या की।"
मीना चुप हो गई। बहुत समय हो गया मान्या से बात किये। एक दो बार फोन किया लेकिन न तो मान्या ने फोन उठाया न वापिस फोन किया। चिंता उसे भी हो रही थी लेकिन मनोहर लाल के सामने जाहिर नही करना चाहती थी। रात के समय मीना करवटें बदलते हुए सोचने लगी कि आखिर आज के युग की युवतियों को क्या हो गया है और क्या चाहती है वो? अधिक पढ़ाई और अधिक आजादी का यह अर्थ को कतई नही निकलता कि बिन बिहाई पत्नियों की तरह लिवइन में रहे और कुछ समय बाद लिवइन साथी बदल लें। क्या यह आजादी का दुरुपयोग नही है? हमारे समय में भी हमारी राय पूछी जाती थी। यह बात और है कि प्रेम विवाह कम होते थे जहाँ परिवार रिश्ता सुझाता था वही हामी करते थे। आज प्रेम विवाह अधिक होते हैं उस पर हमें कोई ऐतराज नही, जहाँ इच्छा हो वही विवाह करे लेकिन इसका यह अर्थ नही की लड़के को आजमाने के चक्कर में उसके साथ शारिरिक संबंध बनाए जाएं। यह तो सत प्रतिशत अनैतिक है। परखने का यह तरीका गलत, अनुचित और अनैतिक है। विदेशों में ऐसा होता है, सुना था। यहाँ अपनी लड़की इस राह पर चल रही है। मनीष ने भी विदेशी युवती से प्रेम विवाह किया और गृहस्थी में रम गए हैं। लेकिन मान्या इस राह पर चलेगी जिस राह से उसे नफरत है, कभी सोचा नही था।
सोचते-सोचते मीना को नींद आ गई। अगली सुबह मान्या का फोन आया। उसने मीना को बंगलुरू साथ रहने का आमंत्रण दिया। मीना ने मनोहर लाल की ओर देखा और मनोहर लाल ने मना कर दिया।
"मैं ऐसी लड़की के साथ कभी नही रहूंगा जिसने लड़का परखने के लिए तुझे वापस भेज दिया था और लड़के के संग रहने लगी। या तो उससे शादी कर ले या हमारे से संबंध तोड़ ले।"
"पापा से कहो कि मेरा इससे ब्रेकअप हो गया है। मैं अब अकेली रहने जा रही हैं। अकेले मैं कैसे रहूंगी?"
"जब बिन शादी के वैवाहिक सुख चाहने की हिम्मत लड़की कर सकती है उसे अकेले रहने में किस बात का डर।" मनोहर लाल ने दो टूक मना कर दिया।
मीना भी मनोहर लाल की राय से सहमत थी और उसने भी मान्या के पास रहने से मना कर दिया। मान्या गुस्से में बोल पड़ी कि आधुनिक युग में पुरानी दकियानूसी बातें करते हो। लड़के और लड़की में अंतर रखते हो। भाई कुछ भी करे, उसे पूरी आजादी और मेरे ऊपर पाबंदी। मनोहर लाल ने दो टूक सपष्ट कर दिया कि यदि उसने लड़के और लड़की में अंतर रखा होता तो आज यह नौबत नही आती। उसने मनीष और मान्या दोनों को आजादी दी। मनीष विवाह के बंधन में बंध गया वह भी विवाह के बंधन में अपनी पसंद के लड़के के साथ बंध सकती है। यदि कुंवारी रहना है तब भी उन्हें कोई चिंता नही लेकिन आज एक लड़का कल दूसरा लड़का यह उनकी नजर में व्यभिचार है जो वे पसंद नही करते। इतना कह कर मनोहर लाल ने फोन काट दिया।
माता-पिता के कटु वचन सुन कर प्यार से पली मान्या सन्न रह गई। दो दिन घर मे कैद रह कर इस विषय पर सोचती रही। उसके दिमाग मे पापा के शब्द चुभते रहे। व्यभिचार, व्यभिचार। वह दो दिन तक तड़पती रही कि शादी के लिए लड़के परखने की खातिर वह कौन कौन सी हदे पार कर गई है। उसके माता-पिता ने उसे त्याग दिया। आखिर उसने निश्चय कर लिया। उसने बंगलुरू की नौकरी छोड़ दी और नोएडा में नौकरी ढूंढ ली।
एक महीने बाद वह सुबह की रेलगाड़ी से दिल्ली पहुंची। अपने आने की पूर्व सूचना उसने अपने माता-पिता को नही दी। सुबह छ बजे निजामुद्दीन स्टेशन पर रेलगाड़ी से उतर कर टैक्सी पकड़ी और सुबह के समय दिल्ली की सड़कें खाली थी और आधे घंटे में घर पहुंची।
मनोहर लाल ने दूघ के डिपो जाने के लिए फ्लैट का दरवाजा खोला। सीढ़ियों से मान्या को आते देख ठिठक गए।
"पापा मुझे मांफ कर दीजिए। अब कोई गलती नही होगी।"
मीना ने इशारे से मान्या को अंदर आने को कहा और मनोहर लाल से भी चुप रहने को कहा। मान्या माँ मीना से लिपट कर रो दी।
मान्या को अपनी गलती का अहसास होते देख मनोहर लाल ने मान्या का सामान कमरे में रखा।
"बेटा सफर में थक गई होगी। आराम कर लो।" कह कर मनोहर लाल दूध लेने चले गए।
मनोहर लाल का मान्या को आराम करने के लिए कहना मीना का चित्त शांत कर गया।




ट्यूबवेल


दो वर्ष से बरसात कम हो रही थी जिस कारण फसल कम हुई और आशुतोष को शहर नौकरी करने जाना पड़ा। माता-पिता और छोटे भाई बहन गांव में रह रहे थे। शहर में एक फैक्ट्री में उसे नौकरी मिल गई। मेहनत औऱ लगन से काम करने पर उसे तरक्की भी मिल गई। अब वह हर महीने गांव अपने माता-पिता को खर्चे के लिए रकम भी भेजने लगा।
सर्दियां समाप्त हो गई और गर्मी का आगमन हो गया। आशुतोष के पिता ने आशुतोष को ट्यूबवेल के लिए कुछ रकम भेजने को कहा।
"बेटा तुम्हे तो मालूम ही है कि पिछले दो वर्ष से कम बरसात हो रही है जिस कारण फसल भी कम हुई। ट्यूबवेल लगवा लेते है जिससे पानी की समस्या का हल मिल जाएगा।"
"पापा अच्छा सोचा है आपने। ट्यूबवेल के लिए मैं अगले महीने रकम भेज दूंगा।"
ट्यूबवेल के लिए आशुतोष के पास पर्याप्त रकम नही थी। उसने फैक्ट्री के मालिक से एडवांस की प्राथना की। आशुतोष की ईमानदारी, लगन, निष्ठा को देखते हुए एडवांस मिल गया जो उसने एक साल में चुकाना था। हर महीने उसकी तनख्वा से एडवांस की क़िस्त कट जाएगी। आशुतोष ने अगले महीने एडवांस मिलते ही रकम गांव अपने पिता को भेज दी।
जिस दिन गांव में आशुतोष के पिता को रकम मिली उसके अगले दिन से बरसात शुरू हो गई। हर रोज अच्छी बरसात होने लगी। फसल की बढ़िया बुआई हो गई। अच्छी बरसात के कारण ट्यूबवेल की आवश्कयता ही नही पड़ी। उन्होंने ट्यूबवेल के स्थान पर एक घोड़ी खरीद की।
कुछ दिन बाद आशुतोष ने घर फोन किया।
"पापा ट्यूबवेल लगवा लिया क्या?"
"बेटा इस बार अच्छी बरसात है। ट्यूबवेल की कोई जरूरत नही है।"
"फिर जो रकम मैंने ट्यूबवेल के लिए भेजी थी उसका क्या किया?"
"बेटा हमने घोड़ी खरीद की है।"
घोड़ी सुनते ही आशुतोष अचंभित हो गया "क्या घोड़ी। उसका हम क्या करेंगे?"
"बेटा शादियों में घोड़ी किराये पर देंगे। अच्छी घोड़ी की बहुत मांग रहती है और अच्छा किराया मिलता है। तुम चिंता मत करो। तुम्हारी रकम का हमने सदुपयोग किया है।"
"मैंने वो रकम कंपनी से तनख्वा एडवांस ली है। हर महीने हमारी तनख्वा से कटेगा। मैं अब एक वर्ष तक घर पैसे नही भेज सकूंगा।" मन ही मन आशुतोष को बहुत क्रोध आया लेकिन खुद पर नियंत्रण रखके कुछ नही बोला।
"कोई बात नही बेटा। मैं यहां संभाल लूंगा। तुम चिंता मत करो। घोड़ी से कमाई होगी।"
फोन बंद करके आशुतोष ने अपना सर पकड़ लिया। ट्यूबवेल लगवा लेते जिसके लिए रकम मंगवाई थी। अगर अगले वर्ष बरसात कम हुई फिर क्या करेंगे। धोड़ी से कमाई होगी लेकिन शादियों के सीजन में। पूरे वर्ष उसकी सेवा करनी पड़ेगी। यदि उसे कुछ हो गया तब क्या होगा। सबसे पहले कंपनी को एडवांस वापिस करना है और आप अब कोई रकम पिताजी को नही भेजूंगा। यदि ट्यूबवेल की अगले वर्ष आवश्कयता हुई तब स्वयं अपने सामने लगवाऊंगा।

किस्मत

सुबह से रुक-रुक होती बरसात ने दोपहर के समय उग्र रूप धारण कर लिया। लक्ष्मीनारायण की फ्लाइट कैंसल हो गई और एक दिन अधिक भोपाल में मजबूरन रहना ...