Wednesday, October 31, 2018

हाथों में कुछ नही



हाथों में कुछ नही
दिखाते क्यों है हम
आदमी की फितरत है
शायद कुछ मिल जाए

नींद उखड़ गई
जागती बीती रात
दिल है कि मानता नही
टूट कर भी संभलता नही


कैसे कैसे लोग रहते हैं दुनिया में
हर रोज गले लग मिलते हैं दुनिया में
नही पहचानते दूसरे को दुनिया में
को किसी का नही है दुनिया में


जब वो सामने हो तो चांद क्या देखना
बस तकते रहे उस चांद को जो सामने है
मत ढूंढो दाग किसी भी चांद में
अतुलनीय है वो चांद जो बंधा सात जन्मों के लिए


कुछ आदत ही है नया करने की
तभी अपने किए पर सोचता हूँ
कभी विरुद्ध कभी सहमत होता हूँ
बस ऐसे ही लिखता चला जाता हूँ




Tuesday, October 30, 2018

नफरत के दरख़्त


नफरत के दरख्त हैं चारों ओर
सकून की सांस कहाँ से मिले

दोस्तों से वफ़ा की उम्मीद
अब छोड़ दी है हमने

दोस्ती कभी होती रही होगी
अब तो दूरियां ही दूरियां हैं

कभी साथ चला करते थे
हाथ में हाथ लेकर हम
अब हाथ मिलाने की हिम्मत ही नही
कुछ तो गलती हमारी भी रही होगी

नफरत की हवा चल रही है चारों ओर
दोस्ती बिखर रही है चारों ओर



कुछ बात बने



भूख से मिले आजादी तो कुछ बात बने
अमीर गरीब का घटे अंतर तो कुछ बात बने
भ्रष्टाचार से मिले आजादी तो कुछ बात बने
जाती धर्म छोड़ हम एक बनें तो कुछ बात बने
आरक्षण खत्म हो तो कुछ बात बने
सत्ता की लालच खत्म हो तो कुछ बात बने
नेता स्वार्थ छोड़ देश की बात करें तो कुछ बात बने
फसलें लहलहाए किसान खुश रहें तो कुछ बात बने
आतंकवाद समाप्त हो तो कुछ बात बने
वीरों का बलिदान व्यर्थ जाये तो कुछ बात बने
हर शख्स हो देश पर समर्पित तो कुछ बात बने
हर नागरिक रहे सुरक्षित तो कुछ बात बने
बालक मोबाइल छोड़ पाठ याद करें तो कुछ बात बने
लोगों की सोच बदले तो कुछ बात बने
भ्रूण हत्या बंद हो तो कुछ बात बने
झूठी शान के लिए सम्मान हत्या बंद हो तो कुछ बात बने
गांव में मिले हर सुविधा तो कुछ बात बने
नेता मेरी कविता पढ़ कर अमल करें तो कुछ बात बने
राष्ट्र करे तरक्की तो कुछ बात बने
पूरा राष्ट्र एक रहे तो कुछ बात बने



हाथों में कुछ नही

हाथों में कुछ नही दिखाते क्यों है हम आदमी की फितरत है शायद कुछ मिल जाए नींद उखड़ गई जागती बीती रात दिल है कि मानता...