Saturday, August 29, 2009

हवा पूरी है

कुछ दिनों से आनन्द को परेशान देख कर आनन्दी से आखिर रहा न गया और पति से उदासी का कारण पूछ ही लिया। लेकिन आनन्द बात को टाल गया। सिर्फ इतना कहकर कि कोई खास बात नहीं, बिजनस की आम परेशानी, टेंशन है। व्यापार में उतार चढ़ाव आते जाते रहते हैं। घबराने की जरूरत नहीं है। आनन्दी को दिलासा देकर आनन्द ऑफिस चला गया।

ऑफिस में आनन्द अपने केबिन में फाइलें देख रहा था और फोन की घंटी बार-बार बजकर खामोश हो गई। क्या करे फोन पर बात करके। लेनदारों को जवाब भी क्या दे कि कब तक और कितनी रकम चुका सकेगा आनन्द। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकाउन्टेंट सुरेश से हिसाब लिया, ऊपर से नीचे कर कागज के उन दो चार टुकड़ों को कई बार देख चुका था, जिन पर पिछले एक साल में हुए खर्चों का पूरा विस्तार से ब्यौरा था। आनन्द समझने की कोशिश में था कि आखिर किस कारण उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और फोन सुनने से भी कतराने लगा था।

एक वर्ष में दो विवाह किए। पहले अपनी बिटिया का और छः महीने पहले बेटे का। दोनों विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न किए। खर्चों के ब्यौरे में लगभग अस्सी प्रतिशत विवाह के खर्च थे। खर्च किया कोई गुनाह तो किया नहीं, आखिर कमाते किसलिए हैं। भारतीय संस्कृति है विवाह में खर्च करने की। जैसा दूसरे करते हैं, वही उसने किया है। विवाह समारोह के भव्य आयोजन से ही समाज में प्रतिष्ठा स्थापित होती है। सभी खुश थे विवाह से। चारों तरफ से प्रशंसा, तारीफें मिली थीं उसको। कोई कसर नहीं छोड़ी थी दोनों विवाहों में। सारे कार्यक्रम पंचतारा होटलों में किए थे। किसी भी बाराती, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी को कोई शिकायत का मौका नहीं दिया। सभी को खुशी और तोहफों के साथ विदा किया था। बड़े-बूढ़ों का भरपूर आशीर्वाद और हमउम्र का प्यार था। आज भी कोई मिलता है तो सबसे पहले विवाह समारोहों की तारीफ के साथ ही वार्तालाप आरम्भ करता है। आखिर क्यों न करे, ऐसा विवाह हर रोज थोड़े ही देखने को मिलता है।

पिछले बीस साल से आनन्द व्यापार में है। जीवन के शुरू में पांच सात साल नौकरी की। एक बार जब व्यापार में कूदा, तो पीछे मुड़ कर नही देखा। हर साल तरक्की की। आज रहने को कोठी, फार्महाउस, व्यापार के लिए ऑफिस और तीन बड़े बड़े शोरूम, स्टॉक हेतु गोदाम। आनन्द के तीन बच्चे, दो लड़के और एक लडकी। तीन शो-रूम और तीन बच्चे। हर एक का शो-रूम। आनन्द को इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी कि बिक्री में कोई कमी है। शो-रूम धडल्ले से चल रहे थे। बिक्री पहले जैसी थी, मुनाफा भी पहले जैसा था, लेकिन बरकत खत्म हो गई थी। हकीकत तो यह थी कि मुनाफे के साथ पूंजी भी कम हो गई। जब दो शाही विवाह संपन्न हुए तब खुशी ही खुशी थी चारों तरफ, खर्चे को देखा नहीं, व्यापार से मुनाफे के साथ पूंजी भी खर्च कर दी और अब नौबत यहां तक आ गई कि कम पूंजी में व्यापार नहीं हो रहा है। या तो व्यापार को कम करे, जो आनन्द को गवारा नहीं था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अगर पेमेन्ट नहीं की तो नया स्टॉक आने में दिक्कत होगी। उधार भी एक सीमा तक मिलता है। उसके बाद कंपनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए। नया स्टॉक तो नई पेमेन्ट के बाद ही मिलेगा। यदि नया स्टॉक नहीं आया तो शो-रुम खाली हो जाएंगे। सारी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी। कुछ तो करना ही होगा।

एक विचार आनन्द के मस्तिष्क में बिजली की तेजी की तरह आया। "ओहो, पहले क्यों नहीं सोचा, मेरा दिमाग कहां चला गया था। बैंक में बात करता हूं। लोन तो मिल सकता है।"

आनन्द ने अपने व्यवसाय का नाम आनन्दी, अपनी पत्नी के नाम से रखा था। हर शो-रूम और गोदाम में बडे बडे अक्षरों से आनन्दी लिखा हुआ दूर से ही नजर आ जाता था। रात को तो रंग बिरंगी रोशनी की जगमगाहट एक अलग सी छटा बिखेरती थी। क्या आज आनन्दी की रोशनी फीकी हो जाएगी? प्रिय पत्नी आनन्दी जो जान से भी अधिक प्रिय, उसके नाम से स्थापित व्यवसाय को बिखरने नहीं देगा। यही सोच कर बैंक में कदम रखा।

बैंक मैनेजर से बातचीत सार्थक रही और दिल से बोझ हलका हुआ कि आनन्दी की जगमगाहट कायम रहेगी। मनुष्य की आदत कुछ ऐसी ही है, उन्नति ही देखना चाहता है, स्टेटस, प्रतिष्ठा, रूतबा, शान कम नहीं होनी चाहिए। कम से कम बरकरार तो अवश्य रहे।

चेहरे पर से शिकन उतरी। ऑफिस में आकर टेलिफोन भी अटेंड किए और लेनदारों को भरोसा दिया, कि शीघ्र सब भुगतान हो जाएगा। दुनिया आखिर भरोसे पर ही तो चलती है। नया स्टॉक भी भरोसे पर आ गया। काफी हद तक चिन्ता समाप्त हुई। सयाने सदा सच कहते है, चिंता चिता समान है। जिन्दा आदमी मुर्दा समान ही हो जाता है, कुछ भी करने में समझ नहीं। सयानों की बातें आनन्द को एकदम सटीक लग रही थीं। चिंता ही तो मनुष्य को खा जाती है। क्या बिना चिंता के कोई मनुष्य जीवित रह सकता है? नहीं। आनन्द की भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। परेशानी ने जकड़ रखा था। दम घुटा घुटा सा लगता था। एक भयानक अजगर की गिरफ्त से आजाद आनन्द ठीक से सांसें जिस्म के अंदर ले रहा था। आज आनन्द पिछले एक वर्ष की घटनाओं का अवलोकन कर रहा है। बेटी के विवाह को बड़ी शानो-शौकत, धूमधाम से किया। दिल खोल कर खर्च किया। आखिर करें क्यों न, कमाई किस लिए की है। शादी और मकान में ही तो पैसा खर्च होता है। फिर कंजूसी किस बात की। विवाह के बाद हनीमून के लिए बेटी और दामाद को दो महीने के वर्ल्ड टूर को भेजा। एक शो-रूम दहेज में दे दिया। तीन के बदले अब तो दो ही शो-रूम हैं मुनाफे के लिए।

अभी बेटी के विवाह की बात लोग भूले भी नहीं थे कि बेटे का विवाह उससे भी अधिक शानो शौकत और धूमधान से संपन्न हुआ। बातों का बाजार फिर गर्म हो गया कि ऐसी शादियां तो राजे, महाराजाओं या मंत्रियों के यहां ही होती हैं। आनन्द कौन सा किसी मंत्री से कम है। हर चुनाव में आर्थिक सहायता की है। ऐसी नाजुक स्थिति में मंत्री जी से ही मिल कर कोई मदद हो सके तो अच्छा है। आनन्द को पूरी उम्मीद थी लेकिन आस बेकार ही रही। नेता सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। आनन्द की फरियाद को सरकारी प्रोजेक्टों की तरह लटका कर ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिर भी आस नहीं छोडी आनन्द ने , सहयता के लिए मंत्रीजी के पास एक बार फिर पहुंचे, लेकिन मिल न सके। सहायक मंत्रीजी के पास गया। बाहर आनन्द इंतजार कर रहा था कि उसके कानों में मंत्रीजी के बोल पडे, जो अपने सहायक को कह रहे थे, "देखो, इस आनन्द की हवा निकल चुकी है, यह अब हमारे किसी काम का नहीं है। चुनाव नजदीक है। मेरे पास बेकार के फालतू आदमियों के लिए समय नहीं है, भगा दो।"

सुनकर आनन्द एक पल भी नहीं रूका। सहायक के वापिस लौटने से पहले ही ऑफिस से बाहर आ गया। बात कलेजे में तीर की तरह चुभ गई। आज आनन्द फालतू हो गया, जो हर समय मंत्रीजी की मदद के लिए तैयार रहता था। यही तो जगत की रीत है, पैसा ही सब कुछ है, आज आर्थिक संकट से गुजर रहे आनन्द का कोई साथी नहीं।

शुक्र है कि बैंक से सहयता मिल गई, लेकिन कठिन मुश्किल शर्तों का पालन अनिवार्य था। कोई दूसरा रास्ता नहीं था। पूंजी शादी ब्याह में लग गई, कुछ तुम चलो, तो कुछ हम चलें की तर्ज पर व्यापार में अतिरिक्त पूंजी डालने के लिए फार्म हाउस बिक गया। बाकी बैंक ने लोन दे दिया। व्यापार के लिए धन का जुगाड़ हो गया। धन में एक विचित्र सी चुम्बकीय शक्ति होती है। धन अपने साथ धन ही नहीं जनता को भी तूफानी झटके से खींचता है। जो लेनदार सख्त थे, उनके व्यवहार में नरमी आ गई। आनन्द को वो दिन याद आ गया, जब बिटिया के विवाह का निमंत्रण देने हेतु बोस बाबू से मिला था।

ऑफिस पहुंच कर विजिटर रूम में बैठ कर इंतजार कर रहे थे और विजिटिंग कार्ड पर आनन्द का नाम देख कर बोस अपने केबिन से खुद निकल कर विजिटर रूम तक गए। आनन्द से हाथ मिलाते हुए कहा, "आनन्द बाबू आप को यहां बैठ कर विजटिंग कार्ड भेजने की क्या जरूरत पड़ गई। सीधे केबिन में आ जाते।"

"आप जरूरी मीटिंग में व्यस्त थे, इसलिए आपके काम में बाधा डालना उचित नहीं समझा।" आनन्द ने बोस को स्पष्टीकरण दिया।

"अरे काहे की जरूरी मीटिंग। जब आप आ गए हैं, तो आपके साथ जरूरी मीटिंग के सामने बाकी सब मीटिंगें कैंसल।" कहते हुए बोस ने आनन्द का हाथ पकड़ा और बातें करते हुए केबिन के अंदर प्रवेश किया। कुर्सी पर बैठ कर चाय का ऑर्डर किया और फिर आनन्द से संबोधित होकर बोले, "आप हमें बुला लेते, यहां आकर क्यों कष्ट किया। इस बहाने आपके ऑफिस के दर्शन ही कर लेते।"

"यह तो आप का बडप्पन है, जो इतनी बडी कंपनी के मालिक हो कर हम जैसे छोटे लोगों को आदर सम्मान देते हैं।"

"यह आप का बड़प्पन है, जो एक नौकर को मालिक कह रहे हैं।" बोस ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

"डाइरेक्टर हैं आप, डाइरेक्टर तो कंपनी के मालिक होते हैं।"

"बस आप की मजाक की आदत नहीं गई। जापानी कंपनी है, हम तो नाम के डाइरेक्टर हैं। मालिक तो जापान में रहते हैं। काम पसन्द नहीं आया तो बाहर का रास्ता दिखा देंगे।"

बोस और आनन्द बातें कर रहे थे , तभी आनन्द का अकाउन्टेंट सुरेश ने कुछ कार्ड हाथ में लिए केबिन में प्रवेश किया।

"आज तो पूरी टीम के साथ धावा बोल दिया, इरादा तो नेक है न।" बोस ने चुटकी ली।

"आप के धावे का स्वागत करने का प्रबन्ध किया है। बिटिया का विवाह है। आपको सपरिवार विवाह के सभी समारोह में उपस्थित रह कर धावा बोलना है।" कह कर आनन्द ने विवाह का निमंत्रण पत्र बोस के हाथों में थमाया।

"यह भी कोई कहने की बात है आनन्द जी। कोई हमारे लायक काम हो तो बिना किसी संकोच के कहिए।"

"बस सपरिवार आप विवाह के सभी समारोहों में उपस्थित रहें, यही कामना करता हूं।"

इधर आनन्द बोस के साथ बातों में व्यस्त थे, उधर अकाउन्टेंट सुरेश ने ऑफिस में सभी को शादी के कार्ड वितरित किए।

आनन्द कंपनी के सबसे बड़े डीलर थे, जिस कारण रूतबा था और एक अलग किस्म की धौंस रहती थी। आज वह धौंस खत्म हो चुकी थी। दोबारा व्यापार तो शुरू हो गया, लेकिन वह रुतबा नहीं रहा। वही बोस बाबू आज मीटिंग बीच में छोड़कर आनन्द से मिलने नहीं आए। आधा दिन इंतजार में कट गया। आनन्द की मजबूरी। बाद में आए लोग मिल कर कब के जा चुके थे। आनन्द शाम तक सिर्फ इंतजार करता रहा। ऑफिस से निकलते हुए बोस बाबू ने चंद मिनटों में औपचाकिरता पूरी कर ली। बोस के केबिन से बाहर आते समय आनन्द के कानों में बोस के शब्द पड़ गए, जो बोस ने अपने सहायक को कहे थे।" आनन्द को उधार मत देना, नकद पेमेंट वसूलते रहना, इसकी हवा निकल चुकी है। ज्यादा उधार हो गया और यदि पेमेंट डूब गई तो अपनी नौकरी भी डूबी समझना।" एक बार फिर तीर कलेजे का आर पार कर गया।

बैंक से लोन मिलने के बाद व्यापार फिर से पटरी पर आ गया। आदमी का स्वाभाव सिर्फ भूलने का है। पिछली दिक्कत आनन्द भूल गया। अब छोटे बेटे का विवाह होना है। पंचतारा होटल बुकिंग के लिए अकाउन्टेंट सुरेश को फोन कर चेकबुक होटल में लाने को कहा। अडवांस बुकिंग जो करवानी है। आखिर इजज्त धूल में तो मिलवानी नहीं है।

"बडे बेटे और बेटी का विवाह जिस धूमधाम से हुआ था, सुरेश यह विवाह उसी तरह होना है। रुपये पैसों की ओर नहीं देखना है। आखिर कमाया किसलिए है, खर्च करने के लिए। यही तो टाइम है, खर्च का। आनन्दी सब परिजनों को न्यौता दे दो। जितनी रकम चाहिए, अकाउन्टेंट सुरेश से मांग लेना। मैं कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा कि कोई कसर रह गई।"

आनन्दी विवाह की तैयारी में जुट गई। सुरेश सोचने लगा। पहले फार्म हाउस बिका था, अब...?

कोई सबक नहीं लेता आदमी अपने अनुभवों से। सिर्फ प्रतिष्ठा का ख्याल सताता है। आज आनन्द फिर विवाह का निमंत्रण पत्र देने बोस के ऑफिस पहुंचा। काफी इंतजार के बाद औपचारिकता के लिए बोस ने आनन्द को केबिन में बुलाया। बिना कुछ कहे एक कुटिल मुस्कान के साथ खड़े खड़े आनन्द ने शादी का कार्ड बोस की टेबल पर रख दिया। शादी का कार्ड खोल कर देखा और फिर बोस के चेहरे की रंगत ही बदल गई, उठ कर आनन्द से हाथ मिलाया, चाय, नाश्ते का ऑर्डर दिया।

"बैठिए आनन्द बाबू, बहुत दिनों के बाद आए हैं। पुराने मित्रों को लगते है भूल गए।"

आनन्द मन ही मन सोच रहा था, कार्ड देखने से पहले बैठने को भी नहीं कहा, अब पुराना मित्र बन रहा है। फाइव स्टार होटल में शादी देखकर बोलने का ठंग ही बदल गया। दुनिया की रीत ही यही है, पैसे पर सब झुकते हैं। पैसा ही मां है, पैसा ही बाप है। लेकिन चेहरे पर कोई हाव भाव आए बिना आनन्द ने मुस्कुराते हुए कहा, "शादी के इंतजाम में व्यस्त था, इसलिए आपसे मुलाकात नहीं हो सकी, आप से गुजारिश है, सपरिवार सभी समारोहों में सम्मलित होना है।"

आनन्द के जाने के बाद बोस ने अपने सहयक से कहा, "दोबारा से हवा भर ली है, आनन्द ने। उम्मीद नहीं थी, इतनी जल्दी तरक्की कर लेगा।"


ऑफिस से बाहर आकर आनन्द ने सुरेश से कहा, "देखा था न बोस के चेहरे को, कार्ड देखकर हवाइयां उड़ गई थीं। साला कहता था मेरी हवा निकल गई है। आनन्द की हवा पूरी है। अब मंत्रीजी के ऑफिस चलते है। उसको भी हवा दिखानी है। हवा अभी पूरी है।"

Wednesday, August 26, 2009

निर्दोष

किस्से कहानियों में चंदगीराम ने पढ़ा था, सुना था कि राजा भी रंक बन जाते हैं। आज हकीकत में महसूस होने लगा कि सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए। सहारनपुर में धनी व्यक्तियों की श्रेणी में गिनती होती थी। अच्छा खासा धन था, जो दो तीन पीढ़ियों के आराम से गुजर बसर के लिए काफी समझा जा सकता था। दो तीन वर्षों से व्यापार में आमदनी कम होने लगी और कुछ नुकसान भी हो गया। बढ़ते खर्चों पर नियंत्रण नहीं रखने के कारण जमा पूँजी भी समाप्त हो गई। कर्ज़ के मकड़जाल में फँसने पर संपति बिकने लगी, बड़ी कोठी से छोटे से मकान में आ गए। आर्थिक तंगी के कारण दोनों बच्चों सूरज और सरिता की पढ़ाई भी छूट गई। घर खर्च मुश्किल होने लगा, लेकिन चिंता से कुछ हासिल नहीं होता। रक्षाबंधन के पावन त्यौहार में राखी बाँधने चंपादेवी भाईयों के पास दिल्ली भी न जा सकी। न जाने का सीधा कारण धन की कमी, किस से मदद माँगें। जो राजा की तरह रहते थे, आज किसी के सामने हाथ फैलाते शर्म आने लगी। अपनी द्ररिदता को आखरी लहमे तक छुपाने की भरसक कोशिश की, लेकिन दुनिया सब जान जाती है।
चंपा के माएके में भी बातें होने लगी, कि हालात सही नहीं हैं। चंपा के तीनों भाई इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर बहन चंपा के पास हालात का जायजा लेने पहुँचे तो यकीन न कर सके, कि इतनी जल्दी हालात बदल सकते है, पाँच सात महीने पहले तो बहन से मिल कर गये थे और आज तो मकान तक बिक गया। भाई के आगे चंपा रो पड़ी। जीजा चंदगीराम मुंह से तो कुछ बोल नहीं सका, लेकिन मुरझाए चेहरे के साथ आँखे सब अपने आप बोल गई। भाईयों ने यह निर्णय लिया गया कि सूरज मामाओं के साथ दिल्ली जाए और कोई नौकरी करे। मकान बेच कर सरिता का विवाह कर दिया जाए, बिना कामधंधे के थोड़ी जमा पूँजी भी कभी साफ हो सकती है, इसलिए चंदगीराम और चंपादेवी सूरज के साथ दिल्ली रहें।
इन्दर मामा ने सूरज को एक प्राईवेट कंपनी में एक क्लर्क की नौकरी दिलवा दी। सहारनपुर का मकान बेच कर सब दिल्ली रहने आ गए। एक बडी हवेली के बाद छोटे मकान और अब सिर्फ एक छोटा सा कमरा जहाँ चार जनों के परिवार ने रहना भी है और एक कोने में रसोई भी बनानी है। सरिता के विवाह की बात चली। एक बार सरिता ने कहा कि विवाह में जल्दी न करे, वह पढ़ना चाहती है।
"अपने माँ बाप की आर्थिक स्थति देखो, जागीर बिक गई। किराए के छोटे से कमरे में सुबह बैठक बनती हैं और रात को बिस्तर, रसोई तो सूरज की तनख्वाह से चल जाएगी, पढ़ाई और दूसरे खर्च की मत सोच, जो मकान बेच कर रकम मिली है, चुपचाप शादी करले, ताकी मांबाप की एक समस्या तो हल हो।" इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर तीनों मामा की इतनी बात सुन कर सरिता सामने अधिक कुछ बोल न पाई।"लड़का हमने देख लिया है, आज शाम को देखने आ रहा है। बहना लड़का हमे पसन्द है, अगर उसे सरिता पसन्द आए तो नानुकुर मत करना। बात तय समझो।"
"लड़का करता क्या है।" चंदगीराम के इतना पूछने पर राजिन्दर थोडा नाराज सा लगा।
"लड़का मोटर मैकेनिक है।"
चंपा का मुंह खुले का खुला रह गया, "क्या मैकेनिक।"
"बहना, आपकी स्थति तो देखो, अमीर घराने के सपने छोड़ दो। जेब में कुछ माल पानी हो, तो इस तरफ सोचना। सडक छाप मैकेनिक नहीं है, वर्कशाप में काम करता है, दो वक्त की रोटी आराम से कमाता है। लड़की भूखी नहीं रहेगी।"
राजिन्दर के तेवर गर्म थे, चंदगीराम ने चंपा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "लड़का देख लेते हैं।"
शाम के समय समीर नाम का लड़का परिवार समेत सरिता को देखने आया। समीर सीधे वर्कशाप से आया था, इसलिए उसके हुलिए को देखकर चंपा निराश हो गई। चंपा के लटके मुंह को देखकर राजिन्दर ने कहा, "बहना, इसको कहते हैं, काम की लगन, सीधे वर्कशाप से आ गया, चाहता तो सजधज के भी आ सकता था, लेकिन उसका क्या फायदा। काम करेगा तभी चूल्हा जलेगा। लड़के की लगन देख बहना। भाई साहब हमें लड़का पसन्द है। आप कहे तो मुंह मीठा किया जाए।" बेचारी चंपा और सरिता सिर झुकाए बैठी रहीं और राजिन्दर ने रिश्ता पक्का कर दिया। रात को खाने के समय चंपा ने चंदगी से जिक्र किया, "अपनी लड़की एक मैकेनिक को देने को दिल नहीं मान रहा है।"
"मजबूरी किसी को न दिखाए। हमारी शादी के समय राजिन्दर तीन चार साल का रहा होगा। नाक बह रही होती थी, कच्छे, बनियान में सारा दिन घूमता था। आज मेरे पास कुछ नहीं है, राजिन्दर ने पैसे अच्छे जमा कर लिए हैं। हमें कुछ नहीं समझ रहा है, सब कुछ अपने आप तय कर लिया। हमारी राय भी लेने को तैयार नहीं है। कभी सोचा नहीं था कि एक मैकेनिक के साथ लड़की का विवाह करना होगा। दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना होगा। मेरी मजबूरी देख चंपा।"
"उसी कारण चुप हूँ।"
एक महीने बाद सरिता का समीर के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद चंदगीराम और चंपादेवी यह सोच कर संतोष कर गए कि दामाद मेहनती और कमाऊ है, आज वर्कशाप में मैकेनिक है, कल खुद की वर्कशाप भी खोल सकता है। चार महीने बाद सुबह समीर के वर्कशाप जाने के समय सरिता ने कहा, "आज मैं मम्मी के पास जाऊँगी, आप शाम को वहीं आ जाना, रात को खाने के बाद वापिस आयेंगे।" शाम को समीर वर्कशाप से सीधा ससुराल पहुंचा। चंपादेवी ने दामाद समीर का स्वागत किया। समीर को छोटे से कमरे में सरिता नजर नहीं आई तो सास चंपादेवी से प्रश्न किया,
"सरिता नजर नहीं आ रही, कहीं बाहर गई है, क्या।"
"बेटे सरिता तो आज आई नहीं।"
"सुबह मुझसे कहा था, कि यहाँ आएगी और रात को खाना खा कर वापिस जायेगें।"
"शायद प्रोग्राम बदल गया होगा।"
"हो सकता है, कोई बात नही, मैं चलता हूँ।"
"बैठो, नाश्ता करके चले जाना।"
समीर ने चाय नाश्ता करके घर के लिए प्रस्थान किया। सरिता घर पर भी नहीं थी। माँ से पूछा, तो मालूम हुआ, कि सरिता तो सुबह समीर के वर्कशाप जाने के कुछ समय बाद ही घर से यह कह कर चली गई थी, कि माँ के घर जा रही है।
"वहाँ तो है नही, मैं वहीं से आ रहा हूँ। मुझे कहा था कि माँ के घर जाऊँगी, शाम को वहीं आना, रात का खाना खा कर वापिस आयेंगे। यहाँ नहीं हैं, वहाँ भी नहीं है, फिर कहाँ गई।" किसी आशंका के डर से समीर ने सूरज को फोन पर बात बताई। सूरज ने अपने मामाओं को फोन किया और थोड़ी देर में परिवार के सभी सदस्य एकत्रित हो गए। सलाह मशविरे के बाद सभी जन आस पड़ोस और रिश्तेदारों, बिरादरी से संपर्क करके सरिता की खैरियत पूछने लगे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। दुर्घटना को मद्देनजर सभी अस्पताल छान मारे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। सभी चिन्तित, कि आखिर सरिता कहाँ है। पूरी रात छानबीन होती रही। सुबह थकान से चूर सभी सदस्य एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे, कि क्या किया जाए। सरिता का कहीं पता नहीं चल रहा था। चंदगीराम की सलाह पर सूरज मामा राजिन्दर के साथ सहारनपुर भी चक्कर लगा आए, वहाँ सभी परिचितों, सगे सम्बंधियो और सहेलियों से मिलने के बाद भी निराशा हाथ लगी।
अब पुलिस थाने के अलावा कोई चारा नहीं था। पुलिस ने पूरी जानकारी प्राप्त की। सिपाही रामपाल ने समीर को सम्बोधित करते हुए कहा,
"आपकी पत्नी कहाँ गई।"
"आपको सब कुछ बता दिया, हमें कुछ नहीं पता कि वह कहाँ गई या अपहरण हो गया।"
"अपहरण की बात तो भूल जा, जब किसी ने फिरौती की माँग नहीं की, तब मेरी बात गांठ बांध ले, अपहरण कोई नहीं हुआ। और बोल।"
मामा राजिन्दर बीच में बात काटते हुए बोला, "मर भी सकती है, कोई मर्डर भी कर सकता है।"
"देखो मामला गंभीर है, लड़की गायब है। कहाँ गई होगी, कहीं भाग तो नहीं गई। सच सच बताओ, कोई इश्क विश्क का मामला तो नहीं है।"
"नहीं नही हमारी लड़की ऐसी नहीं है।" चंपादेवी ने रोते रोते कहा।
"सब लोग एक बात सुन लो, रोने धोने से कुछ नहीं होने वाला। यह पुलिस स्टेशन है, तुम्हारा घर नहीं है, घर जाकर विलाप करना। दो घंटे हो गए हैं, यहाँ आए। सिवाए रोने धोने के अलावा कुछ बोल ही नहीं रहे। हमारा टाइम खराब कर रहे हो। कभी एक रोता है, को कभी दूसरा शुरू हो जाता है। पहले घर जाकर रोना धोना कर लो, फिर यहाँ आना।"
रामपाल के इतना कहने पर मामा राजिन्दर गर्म हो गया, "लगता है, बड़े अफसर से बात करनी होगी।"
"मामाजी इतने उत्तेजित होने ही बात नहीं है, थाने में इस समय सबसे बड़ा मैं हूँ, मेरे से बड़े कल मिलेंगे, आज तहकीकात में गए हुए हैं।"
"चलो, चलो फिर कल आयेंगे। कोई फायदा नहीं यहाँ टाइम खराब करने से।" राजिन्दर ने कहा।
"शौक से जो दिल कहे, करिए, लेकिन अपनी लड़की के बारे में सच सच बताओ। चलो ठीक है, माँ बाप तो बतायेंगे नहीं, पति से पूछ लेता हूँ। समीर तुम बताओ, तुम्हारी बीबी का चरित्र कैसा था, कोई शक की गुंजाईश थी, कभी शक हुआ हो, कि शादी से पहले कोई चक्कर रहा हो।"
"अइसा कुछ नहीं लगता, "समीर ने कहा तो, मामा राजिन्दर तैश में आ गया, "लगने का तो कोई सवाल ही नहीं है, जब हमारी लड़की गऊ है, जिस खूँटे बांध दिया, मतलब ही नहीं, कहीं और नजर आए। यहाँ तो चरित्र हनन हो रहा है। चलो जीजा, कल बड़े अफसर से मिलना होगा।"
मझले मामा सुन्दर के एक दोस्त की पुलिस मुख्यालय में जान पहचान निकल आई। उस बड़े अफसर के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने तहकीकात शुरू कर दी। गुमशुदा की रिपोर्ट पर कार्यवाही शुरू हुई। समीर के परिवार के हर सदस्य को अलग अलग बुला कर छानबीन की। लेकिन सरिता कहाँ गई, किसी को नहीं मालूम था। नतीजा कुछ नहीं निकला। पुलिस मुख्यालय के दबाव के बाद थाने में समीर के समस्त परिवार को बुला कर सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी को सरिता के बारे में कुछ नहीं मालूम था। रामपाल ने समीर की पिटाई शुरू कर दी, सख्ती से पूछा, "बता बीबी को कहाँ रखा है।"
"नहीं मालूम साहब।"
बता साले, कह कर और अधिक पिटाई कर दी। लेकिन निर्दोष समीर को कुछ नहीं मालूम था, कि उसकी पत्नी सरिता कहाँ है।
"ऐसे नहीं बताएगा, मोटी चमड़ी का है, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करूँगा, तभी बताएगा, "और पलट कर समीर के बाप की पिटाई कर दी। समीर की माँ ने निर्दोष पति और बेटे को पिटता देख कर रामपाल के पैर पकड़ लिए।" साहबजी, हम निर्दोष हैं, हमें कुछ नहीं मालूम।"
"नहीं मालूम, ऐसे बात नहीं बनेगी।" महिला कांस्टेबल से समीर की माँ की भी पिटाई करवा दी। देर रात को जब काफी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ तब वापिस घर भेज दिया।
अगले दिन राजिन्दर ने एस एच ओ रणबीर को थर्ड डिग्री के लिए कहा। थाने बुला कर समीर और उसके माँ बाप पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर लिया। नतीजा कुछ नहीं निकला, तो रात के समय रामपाल ने एस एच ओ रणबीर से अनुरोध किया, कि लड़के वाले निर्दोष लगते हैं। इतनी पिटाई के बाद तो भूत भी उगल देते। कहानी कुछ और लगती है, कहीं लड़की भाग तो नहीं गई।
"ऐसे कर, छोड़ दे। कुछ दिनों तक इन पर सिर्फ निगरानी रखना। लेकिन ध्यान रहे, ढील मत देना। मुख्यालय से दबाव है। केस पर पूरी नजर रखनी है।"
"आप ठीक कहते हैं जनाब, नजर पूरी रखूँगा, लेकिन मेरा पुलिस में बीस साल का अनुभव यह कहता है, कि लड़के वाले निर्दोष हैं। लड़की भाग गई होगी।"
"हो सकता है, नजर पूरी रखो।"
समीर की नौकरी पुलिस के चक्कर में छूट गई। माँ बाप अलग परेशान। उस पर आग में घी का काम राजिन्दर की हरकतों ने किया। उसने महिला मुक्ति संगठन की महिलाओं से घर के सामने प्रदर्शन करवा दिया। संगठन की महिलाओ ने घर में घुस कर तोड़फोड़ कर दी। दो दिनों तक जम कर हंगामा किया। न्यूज चैनल पर चर्चा होने लगी। परेशान हो कर समीर घर छोड़ कर अपने एक दोस्त के घर चला गया और उसके माँ बाप दूसरे शहर किसी रिश्तेदार के घर रहने चले गए। घर पर ताला। न्यूज चैनल पुलिस की बुराई करने लगे और नाकारा घोषित कर दिया। न्यूज चैनलों से परेशान पुलिस भी, लेकिन करे तो क्या कर। रामपाल ने समीर से संपर्क किया। पुलिस को देखकर समीर कांपने लगा। रामपाल ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "बेटे डर मत, सच बता।"
"मैं कुछ नहीं जानता, हम बिल्कुल निर्दोष हैं।"
"मैं मान सकता हूँ। लेकिन लड़की है कहाँ यह बात गंभीर है और परेशान कर रही है। सबसे अधिक परेशानी न्यूज चैनलों से है। अब तो मंत्री भी केस की रिपोर्ट माँग रहे है। हमारी पोजीशन बहुत ही खराब है। मैं जानता हूँ कि तुम कहाँ हो, अगर मंत्रालय से सख्ती हुई तो न चाहते हुए भी तुम सबको अंदर करना पड़ेगा।" रामपाल चेतावनी देकर चला गया।
आज सरिता को गायब हुए एक महीना हो गया। सूरज ऑफिस में काम कर रहा था। उसके फोन की घंटी बजी। फोन पर अंजान नंबर था।" हेलो।"
"भैया।"
इतना सुनते ही सूरज कुर्सी से उछल पड़ा।" सरिता... कहाँ है, कैसी है तू।"
"मैं ठीक हूँ। घर में सब ठीक हैं न।"
"ठीक कहाँ से होंगे। तेरे जाने के बाद कुछ भी ठीक नहीं हैं। तू अपना बता। कहाँ है।"
"मैं ठीक हूँ, बाद में फोन करूँगी। कोई चिन्ता की बात नहीं है।"
फोन सुनने के बाद सूरज ने तुरन्त सबको सूचित किया। सभी परिवार के सदस्य खुशी की लहर में झूम जाते हैं कि सरिता सही सलामत है, लेकिन क्यों गई और कहाँ गई, यह अभी भी रहस्य बना था। पुलिस ने फोन नंबर ट्रेस करवाया। जिस नंबर से फोन आया था, वह हरिद्वार में एक पीसीओ का था। पुलिस टीम के साथ चंदगीराम, राजिन्दर और सूरज रात को ही टैक्सी से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। पौ फटने से पहले ही हरिद्वार पहुंच कर उस टेलिफोन बूथ के पास डेरा लगाया, जहाँ से सरिता ने फोन किया था। बूथ एक बड़ी सी धर्मशाला भाटिया भवन के मेनगेट से सटी दुकान बद्री टी स्टाल के अंदर था। पुलिस सादे लिबास में थी, ताकि कोई पहचान न सके। टी स्टाल बंद था। टैक्सी को थोड़ी दूर बनी पार्किंग में लगाया, और टी स्टाल के बाहर लोहे की चेन से बँधे बेंच पर बैठ कर डेरा जमाया। साढ़े पाँच बजे टी स्टाल का मालिक बद्री प्रसाद गीत गुनगुनाता कंधे पर छोला लटकाए पहुंचा और सबको नमस्ते कह कर दुकान का ताला खोला। ताला खोल कर बद्री ने सबको सम्बोधित करके कहा,
"सैलानी हो, भवन तो छ: बजे खुलेगा, तब तक चाय पी कर तरो ताजा हो जाईये।। कैसी पीजिएगा, ज्यादा मीठा या तेज कड़क चाय।"
कड़कती अवाज में रामपाल ने सरिता की फोटो दिखाते हुए पूछा, "लड़की कहाँ है।"
रणबीर ने रिवोल्वर बद्री की कमर से सटा दी।
कमर से सटी रिवोल्वर और कड़कती आवाज के साथ सर्दी मे बद्री के पसीने छूट गए। काँपती आवाज में धीरे से बोल सका, "कौन की लड़की।"
"आँखे खोल कर ध्यान से फिर देख ले, लड़की की फोटो।"
"आप कौन।"
"पुलिस।"
पुलिस का नाम सुनते ही काँपते हुए बोला, "मेरे घर में कमरा किराए पर ले रखा है।"
"चल घर।"
दो मिनट बाद एक गली में घर की कुंडी खटखटाई।
"भाग्यवान दरवाजा खोल।"
बद्री की पत्नी ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।" क्या बात हो गई। वापिस क्यों आ गए, तबीयत तो ठीक हैं न।"
"मरवा दिया उस लौंडिया ने, कल ही कह रहा था। निकाल बाहर कर उसे। अब जान बच जाए तो गनीमत समझ।"
रामपाल ने रिवोल्वर बद्री की घरवाली पर तान दी। वह तो रिवोल्वर देख गश खाकर गिर गई।
"माफ कर दो, जान बक्श दो हमारी। हमने कुछ नहीं किया। हम बेकसूर हैं। हमने तो उसे किराये पर कमरा दे रखा है। हमें तो पिछले हफ्ते ही मालूम हुआ, कि पुलिस में मामला दर्ज हैं। वो तो अपने मर्द के साथ एक महीने से किराये पर रह रही है। न्यूज चैनल में जब खबर आई तो मालूम हुआ। हमें तो उसने कहा था, शादी शुदा है, मर्द उसका ऑटो चलाता है, नयी शादी है, हमें शक कैसे होता। जब कल बूथ से फोन किया तब हमे मालूम हुआ।"
कमरे का दरवाजा खटखटाया। थोड़ी देर में एक युवक ने अलसाई हालात, आधी नींद से जाग कर दरवाजा खोल कर सब को देख कर धबरा गया।
कौन... क क कौन ही बोल सका। इतने में रामपाल अंदर गया।" राजिन्दर जी देख लो। लड़की यही हैं न सही सलामत।"
सरिता तब तक जाग चुकी थी, अपने कपड़े संभालते हुए सूरज के गले मिल कर रो बैठी। "भैया।"
"कैसी है, मेरी बेटी।" चंदगीराम ने बेटी को गले लगाया।" तू ठीक तो हैं न।"
"हाँ पापा।"
"यह लड़का कौन है।" चंदगीराम ने सरिता से पूछा।
"पापा ये सागर हैं, हम कालेज में एक साथ पड़ते थे। एक दूसरे से प्यार करते थे। अब मैंने सागर से शादी कर ली है।"
क क क्या, इससे अधिक चंदगीराम कुछ न कह सका। शायद सब कुछ समझ गया। दिल पर एक भारी पत्थर सा बोझ लिए नीचे आकर दरवाजा पकड़ कर खड़ा हो गया फिर धीरे धीरे फर्श पर बैठ कर सोच में डूब गया। कब आखों से आँसू टपकने लगे, खुद चंदगीराम को भी नहीं पता चला।
ऊपर कमरे में रामपाल और रणबीर समझ चुके थे कि यह सब प्यार का चक्कर है। सरिता को सम्बोधित करते हुए कहा।" कपड़े बदल कर नीचे आ जा। दिल्ली चलना है। शेष कार्यवाही वहीं होगी।" फिर रणबीर को सम्बोधित करते बोला, "मैं तो पहले ही समझ गया था, कि प्यार श्यार का मामला है। उस निर्दोष समीर पर थर्ड डिग्री करवा दी। कभी उसने मक्खी तक नहीं मारी होगी। राजिन्दर बाबू आप ने तो मर्डर तक सोच लिया था।"
"हमें किया मालूम था अपना सिक्का खोटा निकलेगा।" फिर चंदगीराम पर बरस पड़ा।" जीजे, मेरी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी। ऊपर तक पहुंच निकाली थी। नाक कटवा दी। लड़की संभाल नहीं सका। शादी से पहले पूछ तो लेता।"
भरी आँखों से चंदगीराम इतना ही कह सका।" तुमने और चंपा ने मौका ही कहाँ दिया। मुझे याद है। सरिता ने कहा था। शादी में जल्दी न करो, लेकिन जबरदस्ती हाँ करवाई थी।"
कुछ देर तक जब सरिता नीचे नहीं आई तो रामपाल ने कहा, "अरे लड़की को जल्दी लाओ। वापिस भी जाना है। खोदा पहाड़, निकली मरी हुई चुहिया। पूरी तैयारी करके आये थे, किसी गैंग के साथ मुठभेड़ होगी। यहाँ क्या बोलू आपको, ऊपर की सिफारिश न होती, चलो छोड़ो अब। जल्दी करो।"
सरिता ने दो टूक जाने से मना कर दिया।
"भैया, मैं वापिस दिल्ली नहीं जाऊँगी। मैं सागर के साथ रहूँगी। हमने विवाह भी कर लिया है।"
"एक के होते दूसरा विवाह वर्जित है। ऐसा नहीं हो सकता।" सूरज की आवाज में तेजी थी। सुन कर सभी ऊपर कमरे में आ गए।
"मैं कुछ नहीं जानती, समीर से विवाह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। राजिन्दर मामा के साथ माँ ने दबाव डाला था। वहाँ मेरा दम घुटता है। मैंने मना भी किया था, लेकिन सभी इस बात पर तुले थे, कि कहीं मकान बेचने पर जो रकम मिली थी, पापा अगर संभाल न पाए तो क्या होगा। उससे पहले मेरी शादी आनन-फानन में कर दी। मैं किसी भी सूरत में नहीं जाऊँगी।"
"कैसे नहीं जायेगी।" राजिन्दर ने सरिता का हाथ पकड़ कर उठाया।
सरिता रो पड़ी।" मामा अगर जबरदस्ती करोगे तो आत्महत्या कर लूँगी। अब नहीं सहूँगी।"
चंदगीराम ने सरिता की यह बात सुन कर हाथ जोड़ कर रणबीर और रामपाल से विनती की।" सरकार मैं कानून नहीं जानता। अगर सरिता नहीं जाना चाहती तो जबरदस्ती न कर।, लड़की ने कुछ कर लिया, तो फिर क्या करेंगें। मैं उसकी गुमशुदा की रिपोर्ट वापिस लेने को तैयार हूँ। लड़की को उसके हाल पर छोड़ दो, वह अपनी जिन्दगी जिए, हम अपनी जी लेंगें। आप मुझे जो सजा देना चाहे, मैं स्वीकार करता हूँ।"

सरिता की जिद और चंदगीराम के अनुरोध के बाद सब बिना सरिता के बैरंग वापिस आ गए। चंदगीराम का मन आत्मग्लानि से भर गया, कि एक निर्दोष को पिटवा दिया और बिना किसी कसूर के थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करवा दिया।

Sunday, August 16, 2009

ब्लू टरबन

टीवी पर न्यूज देखते हुए न जाने अचानक बचपन की यादें ताजा हो गई। समाचार पत्र में भी वोही न्यूज कुछ दिनों से सुर्खियों में चल रही थी। ऑफिस की भागादोडी में सुबह घर से जल्दी निकल कर रात को देर से आना रूटीन बन गया था। यह मार्च का महीना बहुत ही जालिम होता है, अकाउंटेंट के लिए। दम भर की फुरसत नही मिलती, सच कहा जाता है, कान खुजाने का भी समय नही होता। 31 मार्च को वितीय वर्ष समाप्त होता है, सारा पेंङिग काम पूरा करना है. मैनेंजमेंट को प्रोफिट लोस अकाउन्ट और बैलेंस शीट बना कर देनी है। मैनेंजमेंट ने तो कह दिया, कंप्यूटर है, देर किस बात की। कौन समझाए कि काम तो आदमियों ने करना है। कम स्टाफ में इधर उधर के काम भी करने है, और या एकाउंट्स का भी। समय पर कैसे हो काम। खैर छोङिए हर ऑफिस की यही कहानी। एक अप्रैल को काम समाप्त कर बैलेंस शीट मैनेंजमेंट को दी, शाबासी तो कौन सुसरा देता है, बातें सुननी पङी, एक दिन लेट हो गए, पूरी रात काम करते, तो 31 मार्च को तुम बैलेंस शीट बना सकते थे, लेकिन रात को सोना जरूरी भी है न। एक दिन घर नही जाते तो क्या हो जाता। जान तो नही चली जाती। तुम अकाउंटेंट को यही बीमारी है, काम समय पर खत्म नही करते। लटका कर रखने की बीमारी है। कौन जानता है अकाउंटेंट का दर्द। पिछले दस दिनों से घर नही गए, ऑफिस में ही कुर्सी पर पसर कर आधा एक घंटा आराम किया न किया, एक बराबर। बाईस बाईस घंटे काम किया, जिसका परिणाम सिर्फ डांट। खैर बैलेंस शीट सौंप कर दो टूक कह दिया, अब तीन दिन की छुटी चाहिए, शरीर ने जवाब दे दिया है। चाहे मैनेंजमेंट छुट्टी ही कर दे, लेकिन शरीर को भी आराम चाहिए। चौबीस घंटों मशीन, कंमप्यूटर भी चले, तो वो सुसरे भी हैंग हो जाते हैं। आदमी इस बात को नही समझता। उसका बस चले तो दिन के चौबीस घंटों में अडतालीस घंटे काम करवाए।

घर आ कर जो बिस्तर पर लेटा, तो चौबीस घंटे बाद भी नींद नही खुली। आंखें थोडी खुलती, लेकिन शरीर जवाब नही देता। पूरे छतीस घंटों बाद भी अलसाई सी हालात में उठा, टूथब्रश लेकर बाथरूम गया, दांतों को साफ करने के बाद सोचा, नहा लिया जाए, तभी फ्रेश हुआ जा सकता है, वरना तीन दिन की छुट्टी तो नींद में ही गुजर जाएगी। वाकई नाहने के बाद एक दम तरो ताजा हो कर कमरे में आया, जहां श्रीमती जी पहले से ही विद्यमान थी। चाय का कप एक हाथ में था, और दूसरे हाथ में एक बिस्कुट। चाय की धीमी सी चुस्की लेकर मन्द मुस्कुराहट के साथ कुछ व्यगंयात्मक अंदाज में बोली, नींद से जाग ही गए, कुंभकरण के खानदान से ताल्लुक रखने वाले।

भारतीय पत्नियों की मानसिकता कभी बदल नही सकती। मैंने कुर्सी खींच कर बैठते हुए कहा।

इसमें भारतीय पत्नियों की बात कहां से आ गई। दो दिन खर्राटे मारते हुए कुंभकरण की नींद सोए, मैंने न तो आपको जगाया, न ही तंग किया।

ताना मार कर भारतीय पत्नी की मानसिकता तो दर्शा ही दी। यह न सोचा, बीस दिन रात की थकान कम से कम दो दिन आराम के बाद ही तो खुलेगी।

ऐसी नौकरी का क्या फायदा, जो घर की शक्ल ही भुला दे। जीनत अमान ने रोटी कपडा और मकान में बिल्कुल सही गाना गाया था, तेरी दो टकिया दी नौकरी, मेरा लाखों का सावान जाए। छोड तो ऐसी नौकरी, ढूंढ लो कोई दूसरी नौकरी। चाहे कम पैसे मिले, चैन तो हो, जब हम तुम दो पल सुकून से बैठ कर बातें कर सके।

कार लोन की किश्त अगले साल खत्म हो जाऐगी, तब दूसरी ढूंढूगा। सर पर बोझ नही होगा।

अभी से ढूंढना शुरू करो, तब अगले साल तक मिल जाऐगी, वरना मेरा अकेले इस मकान में दम घुट जाएगा। ये तो भारतीय पत्नियों का शुक्र करो, जो ऐसे पतियों के साथ जन्म जन्म का साथ निभाती हैं। अगर अमेरिका या यूरोप में रह रहे होते तो कब का तलाक हो गया होता। पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा।

मैं थोडा खीझ सा गया। अब इस बात में अमेरिका, यूरोप किधर से आ गए।

बस आ ही जाते हैं, जब पत्नियां चारों तरफ से हाताश हो जाती हैं, और कुछ भी नजर नही आता है। तब सोचना ही पढता है और अमेरिका, यूरोप की पत्नियों की याद आ जाती है।

मैंने इस टॉपिक को बंद करना ही बेहतर समझा और बात घुमाते हुए पूछा चाय मिलेगी या उसके लिए अमेरिका, यूरोप जाना पढेगा।

क्या हसीन सपने आ रहे थे, अमेरिका, यूरोप के। सारे तोड दिये। चलो भारतीय पत्नी धर्म निभाते हैं। कहते हुए पत्नी रसोई की तरफ चल पडी।

पत्नी के रसोई जाने पर मैंने अखबार उठाया और टीवी पर न्यूज चैनल लगाया। मुख्य पृष्ठ पर कुछ पाकिस्तान से आए सिख परिवारों की फोटो थी, जो स्वात घाटी, जहां तालीबान के कहर से बचने के लिए अमृतसर आ गए और भारत सरकार से भारत में बसने के लिए अनुरोध कर रहे हैं। टीवी न्यूज चैनल पर भी यही खबर दिखाई जा रही थी। अपना घर छोड कर विस्थापितों की दशा मैं अच्छी तरह समझ सकता था। अपना घर, अपना व्यापार छोड कर दूसरी जगह बसना कोई आसान काम नही हैं, फिर भी हालात ऐसे हो जाते हैं, मजबूरी में घर छोड कर कहीं दूर अनजान जगह बसना पडता है। विस्थापित परिवार गुरूद्वारे में शरणार्थित बने रह रहे थे। खबर सुन और पढ कर अपना बचपन याद आ गया। उम्र उस समय लगभग पांच या छः वर्ष रही होगी, लेकिन घटना अभी भी मस्तिषक पटल पर अंकित है। वजह, कि माता पिता से बचपन में अनगिनत बार उस घटना को सुन चुका हूं। साथ कुछ रह रह कर घटना मस्तिषक के किसी कोने से बार बार निकल आती है। जब भी ऐसी कोई खबर सुनता हूं, तो वो घटना खुद ही ताजा हो जाती है।

पिताजी किसान थे। भारत पाकिस्तान सीमा के नजदीक गांव था। 1971 की जंग से पहले माहौल बहुत गर्म था, हांलाकि सर्दियां शुरू हो चुकी थी। धम्म घम्म धम्म धम्म की चारों तरफ से आवाजें आने लगी। साथ ही अडो़स पडोस से आवाजें आई कि भागो,  बम गिर रहे हैं। रात का समय था,  लगभग आठ बजे के आसपास समय रहा होगा। रात का भोजन समाप्त कर चुके थे। घर के बरामदे मे मैं खाट पर बैठा हुआ आसमान में तारे निहार रहा था और माता पिता का इन्तजार तक रहा था,  कि वे भी घर का काम निबटा कर आ जाए तभी सोने के लिए खाट पर लेटूंगा। अकेले सोने पर डर लगता था।  नींद तो आ रही थी, लेकिन सो नहीं रहा था। पांच साल की उम्र में घबरा गया, लेकिन अवाज नहीं निकल पा रही थी। धम्म घम्म की आवाज के साथ ही बहुत धुंआ उठा,  शायद आस पास ही बम गिरा था। बिना किसी देरी के फटाफट मम्मी पापा तेजी से घर से निकल कर मेरा हाथ पकड़ कर खाई की तरफ भागे और बिना किसी देरी के पास की खाई में छुप गये।

गोलू डर मतमम्मी ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा।
तभी हमारे पडो़सी भी खाई में आ गए। सात आठ बंदों को देख कर कुछ हिम्मत हुई।
कोई बात नहीं, मम्मी. आप साथ हैं तो डर नहीं लगता है। मैंने कहा।
युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, इसीलिए गांव में कई स्थानों पर खाईयां बनाई गई कि संकट के समय खाईयों में सुरक्षा के लिए छुप जाए। तभी मशीनगनों से लगातार गोलियों की धन धना धन आवाजे आने लगी.
पड़ोसी को संमबोधित करते हुए पापा ने कहा कुलजीत लगता है कि हमारे जवानों ने फाईरिंग शुरू कर दी है, अब जल्दी ही बमबारी खत्म होगी।

खामखां हम निहत्ठों पर बम फेंकते है, हमारे जवानों के जवाबी हमले पर डर के मारे भाग जाते हैं। कुलजीत ने गुस्से से जवाब दिया।

लेकिन उस रात फाईरिंग खत्म नहीं हुई। पूरी रात जबरदस्त फाईरिंग होती रही। बीच बीच में दोनों तरफ से तोपों से बम वर्षा भी होती रही। पूरी रात कोई नहीं सो सका। लगता था जैसे कान के परदे फट जाएगें। हमने और पडो़सी कुलजीत के परिवार ने खाई में छुप कर रात गुजारी। सुबह के समय फाईरिंग बंद हुई। लेकिन काफी देर बाद ही हम लोग खाई से बाहर निकले। खाई से निकलने के पश्चात पापा मुझे और मां को घर छोड़ने के बाद गांव की चौपाल के लिए रवाना हुए। गांव के सारे पुरूष चौपाल पर रात की दिल दहलाने वाली गोलीबारी पर चर्चा कर रहे थे। शुक्र था, कि कोई हताहत नहीं हुआ। इतने में फौज के दो अफसर आए। रात की भंयकर गोलीबारी के बाद सीमा पर तैनात बटालियन ने गांव खाली कराने का निर्णय लिया। बडे़ अफसर ने बच्चों और औरतों को फौरन गांव छोड़ने की सलाह दी। सेना के दो ट्रक इस कार्य के लिए लगा दिये, ताकि शाम से पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके। पुरूषों को सलाह दी गई कि वे जरूरी सामान के साथ जितनी जल्दी संभव हो गांव खाली कर दें।

फौजी ट्रक में गांव के सभी औरतों और बच्चों को बिठाया गया। मां के साथ जब मुझे ट्रक में बिठाने लगे, तब मैं रोने लगा, कि मैं पापा के साथ जाउंगा।

गोलू बेटे, तुम मां के साथ जाऔ, मैं पीछे पीछे अपनी बैलगाडी़ में घर का सामान ले कर आता हूं। पापा मुझे पुचकारते हुए कहने लगे।

नहीं मैं आपके साथ जाउंगा। कहते हुए मैं पापा से चिपक गया।  

गोलू जिद्द नही करते, देखो, मैं तुम्हारे साथ साथ चलूंगा, तुम मुझे ट्रक में बैठ कर देखना।. कह कर पापा ने फटाफटा घर का जरूरी सामान बैलगाडी़ मे रखना शुरू किया। फौजी ट्रक रवाना होने में थोडी़ देर हो गई, तब तक पापा ने बैलगाडी़ में सामान रख लिया था। फौजी ट्रक रवाना हुआ और पापा ने पीछे पीछे बैलगाडी़ रवाना की। पापा ने नीली पगड़ी पहनी हुई थी। गांव की कच्ची सड़क पर धीरे धीरे ट्रक आगे बढ़ने लगा। पीछे पीछे पापा बैलगाडी़ में आ रहे थे। मैं पापा को देखते हुए हाथ हिलाता रहा। थोडी़ देर में ट्रक और बैलगाडी़ की दूरी बढ़ने लगी। पापा की शक्ल धुधंली दिखने लगी, लेकिन उनकी नीली पगडी़ देख कर मैं हाथ हिलाता रहा। पापा की नीली पगड़ी मुझे दिलासा देती रही, कि पापा मेरे आसपास हैं। धीरे धीरे ट्रक और बैलगाड़ी के बीच दूरी बढने लगी और पापा की नीली पगड़ी भी दिखाई देना बंद हो गई। ट्रक अब पक्की सडक पर फर्राटे लगाने लगा। दिन ढल चुका था, रात की कालिमा छा चुकी थी। मेरा मन अभी भी पापा की सूरत देखना चाहता था, कि कहीं से पापा की नीली पगड़ी दिखाई दे जाए। लेकिन फासला काफी हो चुका था। एक रात फाईरिंग की वजह से और दूसरी रात पापा की जुदाई से सो नहीं सका था। बार बार उचक उचक कर देखता कि कहीं से चाहे दूर ही हो, पापा की नीली पगड़ी एक बार नजर आ जाए।

पौ फटने से पहले ट्रक ने हमें एक स्कूल में ला कर उतार दिया। सरकार ने एक स्कूल में सीमा पास गांव वालों को ठहराने का बन्दोबस्त किया था। धीरे धीरे स्कूल में एक मेला सा लग गया. एक के बाद एक करके बहुत से फौजी ट्रक आए, जिनमें हमारे जैसे दूसरे गांवों के औरते और बच्चे थे।

हमारे आने के कारण स्कूल बंद कर दिया था। स्कूल  मे दो तरफ लाईन लगा कर कमरे थे और बाकी खाली मैदान।. स्कूल कंपाउंड के बाहर भी काफी खाली मैदान था, जहां टैन्ट लगा कर हमारे रहने का इन्तजाम किया गया था। मेरी निगाहें हमेशा स्कूल के गेट पर रहती और पापा के आने की आहट सदा लगी रहती। धीरे धीरे गांव के पुरुषों ने भी आना शुरू कर दिया था।

पापा अभी तक नहीं आए। मैंने मां से पूछा।

तू फिक्र मत कर, आ जाएगें, देख कुलजीत के घर वाले भी नहीं आए। एक साथ आएगें।. मां ने जवाब मे कहा। बाकी बच्चे बाहर खेल रहे हैं, तू भी उनके साथ खेल। पापा आ जाएगें। लेकिन मेरा मन खेलने मे नही लग रहा था। दो दिन बीत गये, पापा नहीं आए। मैं रोने लगा। मां चुप कराने में लग गई, लेकिन मेरा रोना और ज्यादा हो गया। मुझे इतना ज्यादा व्याकुल, अधीर हो रोते देख बहुत सारी औरते आस पास जमा हो मुझे दिलासा देने लगी। एक औरत ने मुझे गोदी मे उठा कर पुचकारते हुए कहा, “तू तो बड़ा बहादुर बच्चा है, क्यों रोता है, देख मेरा गोगी तेरे से कितना छोटा है, बड़े मजे से खेल रहा है, उसके पापा भी अभी नहीं आए। लेकिन मेरा रोना बंद नही हो रहा था। मेरे पापा कह कर और जोरों से रोने लगा। रोते रोते भी मेरी निगाहें स्कूल के गेट पर टिकी थी, मालूम नहीं, कब पापा आ जाए। तभी स्कूल गेट पर हलकी सी परछाई उठी, नीले रंग की धुधली सी छाया दिखाई देने लगी, मेरी उत्सुकता अधिक हो गई। पापा की नीली पगड़ी मैं चिल्ला पडा। हां वो मेरे पापा ही थे। नीली पगड़ी के बाद पापा हल्के हल्के नजर आने लगे। नजदीक आने पर मां ने चिल्ला कर कहा, “गोलू तेरे पापा आ गए।

पापा ने आते ही मुझे गोद मे ले लिया, पागल रोता क्यों है?“

इतनी देर से क्यों आए?“

बैलगाड़ी ट्रक से रेस थोड़ी कर सकती है। इसलिए देरी हो गई। पापा ने संतावना और दिलासा देते हुए कहा।

मैं पापा से चिपक गया था। पापा को पास पा कर ऐसा लग रहा था, जैसे पूरा जहां मिल गया है। उदासी दूर हो गई थी, चित प्रसन्न हो कर छलागें लगाने लगा, कि फटाफटा दूसरे बच्चों के साथ खेलने भाग जाउं।

पागल कहीं का, मां को परेशान किया। इतने छोटे छोटे बच्चे कितनी मस्ती से खेल रहे हैं। और तूने यहां सबको परेशान कर दिया। अब खेलने नहीं जाएगा।पापा ने पूछा.

मैं फौरन पापा की गोदी से उछल कर कूदा और जोर से चिल्ला कर गोगी की तरफ भागा। गोगी मैं खेलने आ रहा हूं।
उस उम्र में बस खेल कूद से ही मतलब होता था। खेल कर वापिस घर आए तो मां बाप का साथ। दीन दुनिया से बेखबर।

युद्ध समाप्त होने के बाद अपने गांव लौटे। बमबारी के कारण खेती लायक नहीं रहे थे खेत। जीविका की तालाश में शहर आ गए। गांव में बडा खेत, बडा घर, जहां छलांगें मारते खेला करते थे। शहर के एक कमरे के मकान में दम घुटता था। जीवन का दूसरा नाम शायद यही है, यानी कि संघर्ष। हंसता खेलता पल कैसे संकटों में घिर जाता है, कोई कल्पना नही कर सकता है। अनिश्चिता से जीवन का हर पल घिरा रहता है। हंसी जैसे गायब हो गई थी। किसान मां बाप मजदूर बन गए। दो तीन संघर्ष करने के पश्चात गांव की जमीन बेच पाए। औने पौने दामों में जमीन बेच कर अनाज बेचने का काम शुरू किया। मां की मजदूरी समाप्त हुई। मेरी शिक्षा शुरू हुई। वो गांव का आजाद बचपन शहर की कठोर जिन्दगी में बदल चुका था। दूसरी अन्जान जगह जीवन को दुबारा संवारना कोई आसान काम नहीं है। राजा रंक हो जाते हैं। जब भी ऐसी कोई खबर सुनता हूं तो खुद का बचपन और परिवार की व्यथा याद आ जाती है। आज भी वोही हुआ, पाकिस्तान से आए सिख परिवारों की व्यथा देख कर आंखों में पानी आ गया।


इतने में पत्नी चाय बना कर रसोई से आई। चाय बनाने के चंद पलों में चलचित्र की तरह मेरे मन पटल में यादें छा गई। चाय का कप पकडाते हुए बोली कुंभकरण के खानदानी जश्ने चिराग, चाय बिस्कुट के साथ हाजिर हैं। चाय का कप मैंने हाथों में लिया। उसने मेरी आंखों की नमी देख ली थी। पहले भी कई बार वह मेरी आंखों की नमी देख चुकी थी। सामने टीवी पर न्यूज देख कर वह सब समझ चुकी थी। मैं कुछ कह न सका। वह सब समझ चुकी थी।   

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...