Wednesday, August 26, 2009

निर्दोष

किस्से कहानियों में चंदगीराम ने पढ़ा था, सुना था कि राजा भी रंक बन जाते हैं। आज हकीकत में महसूस होने लगा कि सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए। सहारनपुर में धनी व्यक्तियों की श्रेणी में गिनती होती थी। अच्छा खासा धन था, जो दो तीन पीढ़ियों के आराम से गुजर बसर के लिए काफी समझा जा सकता था। दो तीन वर्षों से व्यापार में आमदनी कम होने लगी और कुछ नुकसान भी हो गया। बढ़ते खर्चों पर नियंत्रण नहीं रखने के कारण जमा पूँजी भी समाप्त हो गई। कर्ज़ के मकड़जाल में फँसने पर संपति बिकने लगी, बड़ी कोठी से छोटे से मकान में आ गए। आर्थिक तंगी के कारण दोनों बच्चों सूरज और सरिता की पढ़ाई भी छूट गई। घर खर्च मुश्किल होने लगा, लेकिन चिंता से कुछ हासिल नहीं होता। रक्षाबंधन के पावन त्यौहार में राखी बाँधने चंपादेवी भाईयों के पास दिल्ली भी न जा सकी। न जाने का सीधा कारण धन की कमी, किस से मदद माँगें। जो राजा की तरह रहते थे, आज किसी के सामने हाथ फैलाते शर्म आने लगी। अपनी द्ररिदता को आखरी लहमे तक छुपाने की भरसक कोशिश की, लेकिन दुनिया सब जान जाती है।
चंपा के माएके में भी बातें होने लगी, कि हालात सही नहीं हैं। चंपा के तीनों भाई इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर बहन चंपा के पास हालात का जायजा लेने पहुँचे तो यकीन न कर सके, कि इतनी जल्दी हालात बदल सकते है, पाँच सात महीने पहले तो बहन से मिल कर गये थे और आज तो मकान तक बिक गया। भाई के आगे चंपा रो पड़ी। जीजा चंदगीराम मुंह से तो कुछ बोल नहीं सका, लेकिन मुरझाए चेहरे के साथ आँखे सब अपने आप बोल गई। भाईयों ने यह निर्णय लिया गया कि सूरज मामाओं के साथ दिल्ली जाए और कोई नौकरी करे। मकान बेच कर सरिता का विवाह कर दिया जाए, बिना कामधंधे के थोड़ी जमा पूँजी भी कभी साफ हो सकती है, इसलिए चंदगीराम और चंपादेवी सूरज के साथ दिल्ली रहें।
इन्दर मामा ने सूरज को एक प्राईवेट कंपनी में एक क्लर्क की नौकरी दिलवा दी। सहारनपुर का मकान बेच कर सब दिल्ली रहने आ गए। एक बडी हवेली के बाद छोटे मकान और अब सिर्फ एक छोटा सा कमरा जहाँ चार जनों के परिवार ने रहना भी है और एक कोने में रसोई भी बनानी है। सरिता के विवाह की बात चली। एक बार सरिता ने कहा कि विवाह में जल्दी न करे, वह पढ़ना चाहती है।
"अपने माँ बाप की आर्थिक स्थति देखो, जागीर बिक गई। किराए के छोटे से कमरे में सुबह बैठक बनती हैं और रात को बिस्तर, रसोई तो सूरज की तनख्वाह से चल जाएगी, पढ़ाई और दूसरे खर्च की मत सोच, जो मकान बेच कर रकम मिली है, चुपचाप शादी करले, ताकी मांबाप की एक समस्या तो हल हो।" इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर तीनों मामा की इतनी बात सुन कर सरिता सामने अधिक कुछ बोल न पाई।"लड़का हमने देख लिया है, आज शाम को देखने आ रहा है। बहना लड़का हमे पसन्द है, अगर उसे सरिता पसन्द आए तो नानुकुर मत करना। बात तय समझो।"
"लड़का करता क्या है।" चंदगीराम के इतना पूछने पर राजिन्दर थोडा नाराज सा लगा।
"लड़का मोटर मैकेनिक है।"
चंपा का मुंह खुले का खुला रह गया, "क्या मैकेनिक।"
"बहना, आपकी स्थति तो देखो, अमीर घराने के सपने छोड़ दो। जेब में कुछ माल पानी हो, तो इस तरफ सोचना। सडक छाप मैकेनिक नहीं है, वर्कशाप में काम करता है, दो वक्त की रोटी आराम से कमाता है। लड़की भूखी नहीं रहेगी।"
राजिन्दर के तेवर गर्म थे, चंदगीराम ने चंपा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "लड़का देख लेते हैं।"
शाम के समय समीर नाम का लड़का परिवार समेत सरिता को देखने आया। समीर सीधे वर्कशाप से आया था, इसलिए उसके हुलिए को देखकर चंपा निराश हो गई। चंपा के लटके मुंह को देखकर राजिन्दर ने कहा, "बहना, इसको कहते हैं, काम की लगन, सीधे वर्कशाप से आ गया, चाहता तो सजधज के भी आ सकता था, लेकिन उसका क्या फायदा। काम करेगा तभी चूल्हा जलेगा। लड़के की लगन देख बहना। भाई साहब हमें लड़का पसन्द है। आप कहे तो मुंह मीठा किया जाए।" बेचारी चंपा और सरिता सिर झुकाए बैठी रहीं और राजिन्दर ने रिश्ता पक्का कर दिया। रात को खाने के समय चंपा ने चंदगी से जिक्र किया, "अपनी लड़की एक मैकेनिक को देने को दिल नहीं मान रहा है।"
"मजबूरी किसी को न दिखाए। हमारी शादी के समय राजिन्दर तीन चार साल का रहा होगा। नाक बह रही होती थी, कच्छे, बनियान में सारा दिन घूमता था। आज मेरे पास कुछ नहीं है, राजिन्दर ने पैसे अच्छे जमा कर लिए हैं। हमें कुछ नहीं समझ रहा है, सब कुछ अपने आप तय कर लिया। हमारी राय भी लेने को तैयार नहीं है। कभी सोचा नहीं था कि एक मैकेनिक के साथ लड़की का विवाह करना होगा। दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना होगा। मेरी मजबूरी देख चंपा।"
"उसी कारण चुप हूँ।"
एक महीने बाद सरिता का समीर के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद चंदगीराम और चंपादेवी यह सोच कर संतोष कर गए कि दामाद मेहनती और कमाऊ है, आज वर्कशाप में मैकेनिक है, कल खुद की वर्कशाप भी खोल सकता है। चार महीने बाद सुबह समीर के वर्कशाप जाने के समय सरिता ने कहा, "आज मैं मम्मी के पास जाऊँगी, आप शाम को वहीं आ जाना, रात को खाने के बाद वापिस आयेंगे।" शाम को समीर वर्कशाप से सीधा ससुराल पहुंचा। चंपादेवी ने दामाद समीर का स्वागत किया। समीर को छोटे से कमरे में सरिता नजर नहीं आई तो सास चंपादेवी से प्रश्न किया,
"सरिता नजर नहीं आ रही, कहीं बाहर गई है, क्या।"
"बेटे सरिता तो आज आई नहीं।"
"सुबह मुझसे कहा था, कि यहाँ आएगी और रात को खाना खा कर वापिस जायेगें।"
"शायद प्रोग्राम बदल गया होगा।"
"हो सकता है, कोई बात नही, मैं चलता हूँ।"
"बैठो, नाश्ता करके चले जाना।"
समीर ने चाय नाश्ता करके घर के लिए प्रस्थान किया। सरिता घर पर भी नहीं थी। माँ से पूछा, तो मालूम हुआ, कि सरिता तो सुबह समीर के वर्कशाप जाने के कुछ समय बाद ही घर से यह कह कर चली गई थी, कि माँ के घर जा रही है।
"वहाँ तो है नही, मैं वहीं से आ रहा हूँ। मुझे कहा था कि माँ के घर जाऊँगी, शाम को वहीं आना, रात का खाना खा कर वापिस आयेंगे। यहाँ नहीं हैं, वहाँ भी नहीं है, फिर कहाँ गई।" किसी आशंका के डर से समीर ने सूरज को फोन पर बात बताई। सूरज ने अपने मामाओं को फोन किया और थोड़ी देर में परिवार के सभी सदस्य एकत्रित हो गए। सलाह मशविरे के बाद सभी जन आस पड़ोस और रिश्तेदारों, बिरादरी से संपर्क करके सरिता की खैरियत पूछने लगे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। दुर्घटना को मद्देनजर सभी अस्पताल छान मारे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। सभी चिन्तित, कि आखिर सरिता कहाँ है। पूरी रात छानबीन होती रही। सुबह थकान से चूर सभी सदस्य एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे, कि क्या किया जाए। सरिता का कहीं पता नहीं चल रहा था। चंदगीराम की सलाह पर सूरज मामा राजिन्दर के साथ सहारनपुर भी चक्कर लगा आए, वहाँ सभी परिचितों, सगे सम्बंधियो और सहेलियों से मिलने के बाद भी निराशा हाथ लगी।
अब पुलिस थाने के अलावा कोई चारा नहीं था। पुलिस ने पूरी जानकारी प्राप्त की। सिपाही रामपाल ने समीर को सम्बोधित करते हुए कहा,
"आपकी पत्नी कहाँ गई।"
"आपको सब कुछ बता दिया, हमें कुछ नहीं पता कि वह कहाँ गई या अपहरण हो गया।"
"अपहरण की बात तो भूल जा, जब किसी ने फिरौती की माँग नहीं की, तब मेरी बात गांठ बांध ले, अपहरण कोई नहीं हुआ। और बोल।"
मामा राजिन्दर बीच में बात काटते हुए बोला, "मर भी सकती है, कोई मर्डर भी कर सकता है।"
"देखो मामला गंभीर है, लड़की गायब है। कहाँ गई होगी, कहीं भाग तो नहीं गई। सच सच बताओ, कोई इश्क विश्क का मामला तो नहीं है।"
"नहीं नही हमारी लड़की ऐसी नहीं है।" चंपादेवी ने रोते रोते कहा।
"सब लोग एक बात सुन लो, रोने धोने से कुछ नहीं होने वाला। यह पुलिस स्टेशन है, तुम्हारा घर नहीं है, घर जाकर विलाप करना। दो घंटे हो गए हैं, यहाँ आए। सिवाए रोने धोने के अलावा कुछ बोल ही नहीं रहे। हमारा टाइम खराब कर रहे हो। कभी एक रोता है, को कभी दूसरा शुरू हो जाता है। पहले घर जाकर रोना धोना कर लो, फिर यहाँ आना।"
रामपाल के इतना कहने पर मामा राजिन्दर गर्म हो गया, "लगता है, बड़े अफसर से बात करनी होगी।"
"मामाजी इतने उत्तेजित होने ही बात नहीं है, थाने में इस समय सबसे बड़ा मैं हूँ, मेरे से बड़े कल मिलेंगे, आज तहकीकात में गए हुए हैं।"
"चलो, चलो फिर कल आयेंगे। कोई फायदा नहीं यहाँ टाइम खराब करने से।" राजिन्दर ने कहा।
"शौक से जो दिल कहे, करिए, लेकिन अपनी लड़की के बारे में सच सच बताओ। चलो ठीक है, माँ बाप तो बतायेंगे नहीं, पति से पूछ लेता हूँ। समीर तुम बताओ, तुम्हारी बीबी का चरित्र कैसा था, कोई शक की गुंजाईश थी, कभी शक हुआ हो, कि शादी से पहले कोई चक्कर रहा हो।"
"अइसा कुछ नहीं लगता, "समीर ने कहा तो, मामा राजिन्दर तैश में आ गया, "लगने का तो कोई सवाल ही नहीं है, जब हमारी लड़की गऊ है, जिस खूँटे बांध दिया, मतलब ही नहीं, कहीं और नजर आए। यहाँ तो चरित्र हनन हो रहा है। चलो जीजा, कल बड़े अफसर से मिलना होगा।"
मझले मामा सुन्दर के एक दोस्त की पुलिस मुख्यालय में जान पहचान निकल आई। उस बड़े अफसर के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने तहकीकात शुरू कर दी। गुमशुदा की रिपोर्ट पर कार्यवाही शुरू हुई। समीर के परिवार के हर सदस्य को अलग अलग बुला कर छानबीन की। लेकिन सरिता कहाँ गई, किसी को नहीं मालूम था। नतीजा कुछ नहीं निकला। पुलिस मुख्यालय के दबाव के बाद थाने में समीर के समस्त परिवार को बुला कर सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी को सरिता के बारे में कुछ नहीं मालूम था। रामपाल ने समीर की पिटाई शुरू कर दी, सख्ती से पूछा, "बता बीबी को कहाँ रखा है।"
"नहीं मालूम साहब।"
बता साले, कह कर और अधिक पिटाई कर दी। लेकिन निर्दोष समीर को कुछ नहीं मालूम था, कि उसकी पत्नी सरिता कहाँ है।
"ऐसे नहीं बताएगा, मोटी चमड़ी का है, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करूँगा, तभी बताएगा, "और पलट कर समीर के बाप की पिटाई कर दी। समीर की माँ ने निर्दोष पति और बेटे को पिटता देख कर रामपाल के पैर पकड़ लिए।" साहबजी, हम निर्दोष हैं, हमें कुछ नहीं मालूम।"
"नहीं मालूम, ऐसे बात नहीं बनेगी।" महिला कांस्टेबल से समीर की माँ की भी पिटाई करवा दी। देर रात को जब काफी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ तब वापिस घर भेज दिया।
अगले दिन राजिन्दर ने एस एच ओ रणबीर को थर्ड डिग्री के लिए कहा। थाने बुला कर समीर और उसके माँ बाप पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर लिया। नतीजा कुछ नहीं निकला, तो रात के समय रामपाल ने एस एच ओ रणबीर से अनुरोध किया, कि लड़के वाले निर्दोष लगते हैं। इतनी पिटाई के बाद तो भूत भी उगल देते। कहानी कुछ और लगती है, कहीं लड़की भाग तो नहीं गई।
"ऐसे कर, छोड़ दे। कुछ दिनों तक इन पर सिर्फ निगरानी रखना। लेकिन ध्यान रहे, ढील मत देना। मुख्यालय से दबाव है। केस पर पूरी नजर रखनी है।"
"आप ठीक कहते हैं जनाब, नजर पूरी रखूँगा, लेकिन मेरा पुलिस में बीस साल का अनुभव यह कहता है, कि लड़के वाले निर्दोष हैं। लड़की भाग गई होगी।"
"हो सकता है, नजर पूरी रखो।"
समीर की नौकरी पुलिस के चक्कर में छूट गई। माँ बाप अलग परेशान। उस पर आग में घी का काम राजिन्दर की हरकतों ने किया। उसने महिला मुक्ति संगठन की महिलाओं से घर के सामने प्रदर्शन करवा दिया। संगठन की महिलाओ ने घर में घुस कर तोड़फोड़ कर दी। दो दिनों तक जम कर हंगामा किया। न्यूज चैनल पर चर्चा होने लगी। परेशान हो कर समीर घर छोड़ कर अपने एक दोस्त के घर चला गया और उसके माँ बाप दूसरे शहर किसी रिश्तेदार के घर रहने चले गए। घर पर ताला। न्यूज चैनल पुलिस की बुराई करने लगे और नाकारा घोषित कर दिया। न्यूज चैनलों से परेशान पुलिस भी, लेकिन करे तो क्या कर। रामपाल ने समीर से संपर्क किया। पुलिस को देखकर समीर कांपने लगा। रामपाल ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "बेटे डर मत, सच बता।"
"मैं कुछ नहीं जानता, हम बिल्कुल निर्दोष हैं।"
"मैं मान सकता हूँ। लेकिन लड़की है कहाँ यह बात गंभीर है और परेशान कर रही है। सबसे अधिक परेशानी न्यूज चैनलों से है। अब तो मंत्री भी केस की रिपोर्ट माँग रहे है। हमारी पोजीशन बहुत ही खराब है। मैं जानता हूँ कि तुम कहाँ हो, अगर मंत्रालय से सख्ती हुई तो न चाहते हुए भी तुम सबको अंदर करना पड़ेगा।" रामपाल चेतावनी देकर चला गया।
आज सरिता को गायब हुए एक महीना हो गया। सूरज ऑफिस में काम कर रहा था। उसके फोन की घंटी बजी। फोन पर अंजान नंबर था।" हेलो।"
"भैया।"
इतना सुनते ही सूरज कुर्सी से उछल पड़ा।" सरिता... कहाँ है, कैसी है तू।"
"मैं ठीक हूँ। घर में सब ठीक हैं न।"
"ठीक कहाँ से होंगे। तेरे जाने के बाद कुछ भी ठीक नहीं हैं। तू अपना बता। कहाँ है।"
"मैं ठीक हूँ, बाद में फोन करूँगी। कोई चिन्ता की बात नहीं है।"
फोन सुनने के बाद सूरज ने तुरन्त सबको सूचित किया। सभी परिवार के सदस्य खुशी की लहर में झूम जाते हैं कि सरिता सही सलामत है, लेकिन क्यों गई और कहाँ गई, यह अभी भी रहस्य बना था। पुलिस ने फोन नंबर ट्रेस करवाया। जिस नंबर से फोन आया था, वह हरिद्वार में एक पीसीओ का था। पुलिस टीम के साथ चंदगीराम, राजिन्दर और सूरज रात को ही टैक्सी से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। पौ फटने से पहले ही हरिद्वार पहुंच कर उस टेलिफोन बूथ के पास डेरा लगाया, जहाँ से सरिता ने फोन किया था। बूथ एक बड़ी सी धर्मशाला भाटिया भवन के मेनगेट से सटी दुकान बद्री टी स्टाल के अंदर था। पुलिस सादे लिबास में थी, ताकि कोई पहचान न सके। टी स्टाल बंद था। टैक्सी को थोड़ी दूर बनी पार्किंग में लगाया, और टी स्टाल के बाहर लोहे की चेन से बँधे बेंच पर बैठ कर डेरा जमाया। साढ़े पाँच बजे टी स्टाल का मालिक बद्री प्रसाद गीत गुनगुनाता कंधे पर छोला लटकाए पहुंचा और सबको नमस्ते कह कर दुकान का ताला खोला। ताला खोल कर बद्री ने सबको सम्बोधित करके कहा,
"सैलानी हो, भवन तो छ: बजे खुलेगा, तब तक चाय पी कर तरो ताजा हो जाईये।। कैसी पीजिएगा, ज्यादा मीठा या तेज कड़क चाय।"
कड़कती अवाज में रामपाल ने सरिता की फोटो दिखाते हुए पूछा, "लड़की कहाँ है।"
रणबीर ने रिवोल्वर बद्री की कमर से सटा दी।
कमर से सटी रिवोल्वर और कड़कती आवाज के साथ सर्दी मे बद्री के पसीने छूट गए। काँपती आवाज में धीरे से बोल सका, "कौन की लड़की।"
"आँखे खोल कर ध्यान से फिर देख ले, लड़की की फोटो।"
"आप कौन।"
"पुलिस।"
पुलिस का नाम सुनते ही काँपते हुए बोला, "मेरे घर में कमरा किराए पर ले रखा है।"
"चल घर।"
दो मिनट बाद एक गली में घर की कुंडी खटखटाई।
"भाग्यवान दरवाजा खोल।"
बद्री की पत्नी ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।" क्या बात हो गई। वापिस क्यों आ गए, तबीयत तो ठीक हैं न।"
"मरवा दिया उस लौंडिया ने, कल ही कह रहा था। निकाल बाहर कर उसे। अब जान बच जाए तो गनीमत समझ।"
रामपाल ने रिवोल्वर बद्री की घरवाली पर तान दी। वह तो रिवोल्वर देख गश खाकर गिर गई।
"माफ कर दो, जान बक्श दो हमारी। हमने कुछ नहीं किया। हम बेकसूर हैं। हमने तो उसे किराये पर कमरा दे रखा है। हमें तो पिछले हफ्ते ही मालूम हुआ, कि पुलिस में मामला दर्ज हैं। वो तो अपने मर्द के साथ एक महीने से किराये पर रह रही है। न्यूज चैनल में जब खबर आई तो मालूम हुआ। हमें तो उसने कहा था, शादी शुदा है, मर्द उसका ऑटो चलाता है, नयी शादी है, हमें शक कैसे होता। जब कल बूथ से फोन किया तब हमे मालूम हुआ।"
कमरे का दरवाजा खटखटाया। थोड़ी देर में एक युवक ने अलसाई हालात, आधी नींद से जाग कर दरवाजा खोल कर सब को देख कर धबरा गया।
कौन... क क कौन ही बोल सका। इतने में रामपाल अंदर गया।" राजिन्दर जी देख लो। लड़की यही हैं न सही सलामत।"
सरिता तब तक जाग चुकी थी, अपने कपड़े संभालते हुए सूरज के गले मिल कर रो बैठी। "भैया।"
"कैसी है, मेरी बेटी।" चंदगीराम ने बेटी को गले लगाया।" तू ठीक तो हैं न।"
"हाँ पापा।"
"यह लड़का कौन है।" चंदगीराम ने सरिता से पूछा।
"पापा ये सागर हैं, हम कालेज में एक साथ पड़ते थे। एक दूसरे से प्यार करते थे। अब मैंने सागर से शादी कर ली है।"
क क क्या, इससे अधिक चंदगीराम कुछ न कह सका। शायद सब कुछ समझ गया। दिल पर एक भारी पत्थर सा बोझ लिए नीचे आकर दरवाजा पकड़ कर खड़ा हो गया फिर धीरे धीरे फर्श पर बैठ कर सोच में डूब गया। कब आखों से आँसू टपकने लगे, खुद चंदगीराम को भी नहीं पता चला।
ऊपर कमरे में रामपाल और रणबीर समझ चुके थे कि यह सब प्यार का चक्कर है। सरिता को सम्बोधित करते हुए कहा।" कपड़े बदल कर नीचे आ जा। दिल्ली चलना है। शेष कार्यवाही वहीं होगी।" फिर रणबीर को सम्बोधित करते बोला, "मैं तो पहले ही समझ गया था, कि प्यार श्यार का मामला है। उस निर्दोष समीर पर थर्ड डिग्री करवा दी। कभी उसने मक्खी तक नहीं मारी होगी। राजिन्दर बाबू आप ने तो मर्डर तक सोच लिया था।"
"हमें किया मालूम था अपना सिक्का खोटा निकलेगा।" फिर चंदगीराम पर बरस पड़ा।" जीजे, मेरी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी। ऊपर तक पहुंच निकाली थी। नाक कटवा दी। लड़की संभाल नहीं सका। शादी से पहले पूछ तो लेता।"
भरी आँखों से चंदगीराम इतना ही कह सका।" तुमने और चंपा ने मौका ही कहाँ दिया। मुझे याद है। सरिता ने कहा था। शादी में जल्दी न करो, लेकिन जबरदस्ती हाँ करवाई थी।"
कुछ देर तक जब सरिता नीचे नहीं आई तो रामपाल ने कहा, "अरे लड़की को जल्दी लाओ। वापिस भी जाना है। खोदा पहाड़, निकली मरी हुई चुहिया। पूरी तैयारी करके आये थे, किसी गैंग के साथ मुठभेड़ होगी। यहाँ क्या बोलू आपको, ऊपर की सिफारिश न होती, चलो छोड़ो अब। जल्दी करो।"
सरिता ने दो टूक जाने से मना कर दिया।
"भैया, मैं वापिस दिल्ली नहीं जाऊँगी। मैं सागर के साथ रहूँगी। हमने विवाह भी कर लिया है।"
"एक के होते दूसरा विवाह वर्जित है। ऐसा नहीं हो सकता।" सूरज की आवाज में तेजी थी। सुन कर सभी ऊपर कमरे में आ गए।
"मैं कुछ नहीं जानती, समीर से विवाह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। राजिन्दर मामा के साथ माँ ने दबाव डाला था। वहाँ मेरा दम घुटता है। मैंने मना भी किया था, लेकिन सभी इस बात पर तुले थे, कि कहीं मकान बेचने पर जो रकम मिली थी, पापा अगर संभाल न पाए तो क्या होगा। उससे पहले मेरी शादी आनन-फानन में कर दी। मैं किसी भी सूरत में नहीं जाऊँगी।"
"कैसे नहीं जायेगी।" राजिन्दर ने सरिता का हाथ पकड़ कर उठाया।
सरिता रो पड़ी।" मामा अगर जबरदस्ती करोगे तो आत्महत्या कर लूँगी। अब नहीं सहूँगी।"
चंदगीराम ने सरिता की यह बात सुन कर हाथ जोड़ कर रणबीर और रामपाल से विनती की।" सरकार मैं कानून नहीं जानता। अगर सरिता नहीं जाना चाहती तो जबरदस्ती न कर।, लड़की ने कुछ कर लिया, तो फिर क्या करेंगें। मैं उसकी गुमशुदा की रिपोर्ट वापिस लेने को तैयार हूँ। लड़की को उसके हाल पर छोड़ दो, वह अपनी जिन्दगी जिए, हम अपनी जी लेंगें। आप मुझे जो सजा देना चाहे, मैं स्वीकार करता हूँ।"

सरिता की जिद और चंदगीराम के अनुरोध के बाद सब बिना सरिता के बैरंग वापिस आ गए। चंदगीराम का मन आत्मग्लानि से भर गया, कि एक निर्दोष को पिटवा दिया और बिना किसी कसूर के थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करवा दिया।
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कब आ रहे हो

" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...