Saturday, August 29, 2009

हवा पूरी है

कुछ दिनों से आनन्द को परेशान देख कर आनन्दी से आखिर रहा न गया और पति से उदासी का कारण पूछ ही लिया। लेकिन आनन्द बात को टाल गया। सिर्फ इतना कहकर कि कोई खास बात नहीं, बिजनस की आम परेशानी, टेंशन है। व्यापार में उतार चढ़ाव आते जाते रहते हैं। घबराने की जरूरत नहीं है। आनन्दी को दिलासा देकर आनन्द ऑफिस चला गया।

ऑफिस में आनन्द अपने केबिन में फाइलें देख रहा था और फोन की घंटी बार-बार बजकर खामोश हो गई। क्या करे फोन पर बात करके। लेनदारों को जवाब भी क्या दे कि कब तक और कितनी रकम चुका सकेगा आनन्द। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकाउन्टेंट सुरेश से हिसाब लिया, ऊपर से नीचे कर कागज के उन दो चार टुकड़ों को कई बार देख चुका था, जिन पर पिछले एक साल में हुए खर्चों का पूरा विस्तार से ब्यौरा था। आनन्द समझने की कोशिश में था कि आखिर किस कारण उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और फोन सुनने से भी कतराने लगा था।

एक वर्ष में दो विवाह किए। पहले अपनी बिटिया का और छः महीने पहले बेटे का। दोनों विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न किए। खर्चों के ब्यौरे में लगभग अस्सी प्रतिशत विवाह के खर्च थे। खर्च किया कोई गुनाह तो किया नहीं, आखिर कमाते किसलिए हैं। भारतीय संस्कृति है विवाह में खर्च करने की। जैसा दूसरे करते हैं, वही उसने किया है। विवाह समारोह के भव्य आयोजन से ही समाज में प्रतिष्ठा स्थापित होती है। सभी खुश थे विवाह से। चारों तरफ से प्रशंसा, तारीफें मिली थीं उसको। कोई कसर नहीं छोड़ी थी दोनों विवाहों में। सारे कार्यक्रम पंचतारा होटलों में किए थे। किसी भी बाराती, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी को कोई शिकायत का मौका नहीं दिया। सभी को खुशी और तोहफों के साथ विदा किया था। बड़े-बूढ़ों का भरपूर आशीर्वाद और हमउम्र का प्यार था। आज भी कोई मिलता है तो सबसे पहले विवाह समारोहों की तारीफ के साथ ही वार्तालाप आरम्भ करता है। आखिर क्यों न करे, ऐसा विवाह हर रोज थोड़े ही देखने को मिलता है।

पिछले बीस साल से आनन्द व्यापार में है। जीवन के शुरू में पांच सात साल नौकरी की। एक बार जब व्यापार में कूदा, तो पीछे मुड़ कर नही देखा। हर साल तरक्की की। आज रहने को कोठी, फार्महाउस, व्यापार के लिए ऑफिस और तीन बड़े बड़े शोरूम, स्टॉक हेतु गोदाम। आनन्द के तीन बच्चे, दो लड़के और एक लडकी। तीन शो-रूम और तीन बच्चे। हर एक का शो-रूम। आनन्द को इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी कि बिक्री में कोई कमी है। शो-रूम धडल्ले से चल रहे थे। बिक्री पहले जैसी थी, मुनाफा भी पहले जैसा था, लेकिन बरकत खत्म हो गई थी। हकीकत तो यह थी कि मुनाफे के साथ पूंजी भी कम हो गई। जब दो शाही विवाह संपन्न हुए तब खुशी ही खुशी थी चारों तरफ, खर्चे को देखा नहीं, व्यापार से मुनाफे के साथ पूंजी भी खर्च कर दी और अब नौबत यहां तक आ गई कि कम पूंजी में व्यापार नहीं हो रहा है। या तो व्यापार को कम करे, जो आनन्द को गवारा नहीं था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अगर पेमेन्ट नहीं की तो नया स्टॉक आने में दिक्कत होगी। उधार भी एक सीमा तक मिलता है। उसके बाद कंपनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए। नया स्टॉक तो नई पेमेन्ट के बाद ही मिलेगा। यदि नया स्टॉक नहीं आया तो शो-रुम खाली हो जाएंगे। सारी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी। कुछ तो करना ही होगा।

एक विचार आनन्द के मस्तिष्क में बिजली की तेजी की तरह आया। "ओहो, पहले क्यों नहीं सोचा, मेरा दिमाग कहां चला गया था। बैंक में बात करता हूं। लोन तो मिल सकता है।"

आनन्द ने अपने व्यवसाय का नाम आनन्दी, अपनी पत्नी के नाम से रखा था। हर शो-रूम और गोदाम में बडे बडे अक्षरों से आनन्दी लिखा हुआ दूर से ही नजर आ जाता था। रात को तो रंग बिरंगी रोशनी की जगमगाहट एक अलग सी छटा बिखेरती थी। क्या आज आनन्दी की रोशनी फीकी हो जाएगी? प्रिय पत्नी आनन्दी जो जान से भी अधिक प्रिय, उसके नाम से स्थापित व्यवसाय को बिखरने नहीं देगा। यही सोच कर बैंक में कदम रखा।

बैंक मैनेजर से बातचीत सार्थक रही और दिल से बोझ हलका हुआ कि आनन्दी की जगमगाहट कायम रहेगी। मनुष्य की आदत कुछ ऐसी ही है, उन्नति ही देखना चाहता है, स्टेटस, प्रतिष्ठा, रूतबा, शान कम नहीं होनी चाहिए। कम से कम बरकरार तो अवश्य रहे।

चेहरे पर से शिकन उतरी। ऑफिस में आकर टेलिफोन भी अटेंड किए और लेनदारों को भरोसा दिया, कि शीघ्र सब भुगतान हो जाएगा। दुनिया आखिर भरोसे पर ही तो चलती है। नया स्टॉक भी भरोसे पर आ गया। काफी हद तक चिन्ता समाप्त हुई। सयाने सदा सच कहते है, चिंता चिता समान है। जिन्दा आदमी मुर्दा समान ही हो जाता है, कुछ भी करने में समझ नहीं। सयानों की बातें आनन्द को एकदम सटीक लग रही थीं। चिंता ही तो मनुष्य को खा जाती है। क्या बिना चिंता के कोई मनुष्य जीवित रह सकता है? नहीं। आनन्द की भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। परेशानी ने जकड़ रखा था। दम घुटा घुटा सा लगता था। एक भयानक अजगर की गिरफ्त से आजाद आनन्द ठीक से सांसें जिस्म के अंदर ले रहा था। आज आनन्द पिछले एक वर्ष की घटनाओं का अवलोकन कर रहा है। बेटी के विवाह को बड़ी शानो-शौकत, धूमधाम से किया। दिल खोल कर खर्च किया। आखिर करें क्यों न, कमाई किस लिए की है। शादी और मकान में ही तो पैसा खर्च होता है। फिर कंजूसी किस बात की। विवाह के बाद हनीमून के लिए बेटी और दामाद को दो महीने के वर्ल्ड टूर को भेजा। एक शो-रूम दहेज में दे दिया। तीन के बदले अब तो दो ही शो-रूम हैं मुनाफे के लिए।

अभी बेटी के विवाह की बात लोग भूले भी नहीं थे कि बेटे का विवाह उससे भी अधिक शानो शौकत और धूमधान से संपन्न हुआ। बातों का बाजार फिर गर्म हो गया कि ऐसी शादियां तो राजे, महाराजाओं या मंत्रियों के यहां ही होती हैं। आनन्द कौन सा किसी मंत्री से कम है। हर चुनाव में आर्थिक सहायता की है। ऐसी नाजुक स्थिति में मंत्री जी से ही मिल कर कोई मदद हो सके तो अच्छा है। आनन्द को पूरी उम्मीद थी लेकिन आस बेकार ही रही। नेता सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। आनन्द की फरियाद को सरकारी प्रोजेक्टों की तरह लटका कर ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिर भी आस नहीं छोडी आनन्द ने , सहयता के लिए मंत्रीजी के पास एक बार फिर पहुंचे, लेकिन मिल न सके। सहायक मंत्रीजी के पास गया। बाहर आनन्द इंतजार कर रहा था कि उसके कानों में मंत्रीजी के बोल पडे, जो अपने सहायक को कह रहे थे, "देखो, इस आनन्द की हवा निकल चुकी है, यह अब हमारे किसी काम का नहीं है। चुनाव नजदीक है। मेरे पास बेकार के फालतू आदमियों के लिए समय नहीं है, भगा दो।"

सुनकर आनन्द एक पल भी नहीं रूका। सहायक के वापिस लौटने से पहले ही ऑफिस से बाहर आ गया। बात कलेजे में तीर की तरह चुभ गई। आज आनन्द फालतू हो गया, जो हर समय मंत्रीजी की मदद के लिए तैयार रहता था। यही तो जगत की रीत है, पैसा ही सब कुछ है, आज आर्थिक संकट से गुजर रहे आनन्द का कोई साथी नहीं।

शुक्र है कि बैंक से सहयता मिल गई, लेकिन कठिन मुश्किल शर्तों का पालन अनिवार्य था। कोई दूसरा रास्ता नहीं था। पूंजी शादी ब्याह में लग गई, कुछ तुम चलो, तो कुछ हम चलें की तर्ज पर व्यापार में अतिरिक्त पूंजी डालने के लिए फार्म हाउस बिक गया। बाकी बैंक ने लोन दे दिया। व्यापार के लिए धन का जुगाड़ हो गया। धन में एक विचित्र सी चुम्बकीय शक्ति होती है। धन अपने साथ धन ही नहीं जनता को भी तूफानी झटके से खींचता है। जो लेनदार सख्त थे, उनके व्यवहार में नरमी आ गई। आनन्द को वो दिन याद आ गया, जब बिटिया के विवाह का निमंत्रण देने हेतु बोस बाबू से मिला था।

ऑफिस पहुंच कर विजिटर रूम में बैठ कर इंतजार कर रहे थे और विजिटिंग कार्ड पर आनन्द का नाम देख कर बोस अपने केबिन से खुद निकल कर विजिटर रूम तक गए। आनन्द से हाथ मिलाते हुए कहा, "आनन्द बाबू आप को यहां बैठ कर विजटिंग कार्ड भेजने की क्या जरूरत पड़ गई। सीधे केबिन में आ जाते।"

"आप जरूरी मीटिंग में व्यस्त थे, इसलिए आपके काम में बाधा डालना उचित नहीं समझा।" आनन्द ने बोस को स्पष्टीकरण दिया।

"अरे काहे की जरूरी मीटिंग। जब आप आ गए हैं, तो आपके साथ जरूरी मीटिंग के सामने बाकी सब मीटिंगें कैंसल।" कहते हुए बोस ने आनन्द का हाथ पकड़ा और बातें करते हुए केबिन के अंदर प्रवेश किया। कुर्सी पर बैठ कर चाय का ऑर्डर किया और फिर आनन्द से संबोधित होकर बोले, "आप हमें बुला लेते, यहां आकर क्यों कष्ट किया। इस बहाने आपके ऑफिस के दर्शन ही कर लेते।"

"यह तो आप का बडप्पन है, जो इतनी बडी कंपनी के मालिक हो कर हम जैसे छोटे लोगों को आदर सम्मान देते हैं।"

"यह आप का बड़प्पन है, जो एक नौकर को मालिक कह रहे हैं।" बोस ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

"डाइरेक्टर हैं आप, डाइरेक्टर तो कंपनी के मालिक होते हैं।"

"बस आप की मजाक की आदत नहीं गई। जापानी कंपनी है, हम तो नाम के डाइरेक्टर हैं। मालिक तो जापान में रहते हैं। काम पसन्द नहीं आया तो बाहर का रास्ता दिखा देंगे।"

बोस और आनन्द बातें कर रहे थे , तभी आनन्द का अकाउन्टेंट सुरेश ने कुछ कार्ड हाथ में लिए केबिन में प्रवेश किया।

"आज तो पूरी टीम के साथ धावा बोल दिया, इरादा तो नेक है न।" बोस ने चुटकी ली।

"आप के धावे का स्वागत करने का प्रबन्ध किया है। बिटिया का विवाह है। आपको सपरिवार विवाह के सभी समारोह में उपस्थित रह कर धावा बोलना है।" कह कर आनन्द ने विवाह का निमंत्रण पत्र बोस के हाथों में थमाया।

"यह भी कोई कहने की बात है आनन्द जी। कोई हमारे लायक काम हो तो बिना किसी संकोच के कहिए।"

"बस सपरिवार आप विवाह के सभी समारोहों में उपस्थित रहें, यही कामना करता हूं।"

इधर आनन्द बोस के साथ बातों में व्यस्त थे, उधर अकाउन्टेंट सुरेश ने ऑफिस में सभी को शादी के कार्ड वितरित किए।

आनन्द कंपनी के सबसे बड़े डीलर थे, जिस कारण रूतबा था और एक अलग किस्म की धौंस रहती थी। आज वह धौंस खत्म हो चुकी थी। दोबारा व्यापार तो शुरू हो गया, लेकिन वह रुतबा नहीं रहा। वही बोस बाबू आज मीटिंग बीच में छोड़कर आनन्द से मिलने नहीं आए। आधा दिन इंतजार में कट गया। आनन्द की मजबूरी। बाद में आए लोग मिल कर कब के जा चुके थे। आनन्द शाम तक सिर्फ इंतजार करता रहा। ऑफिस से निकलते हुए बोस बाबू ने चंद मिनटों में औपचाकिरता पूरी कर ली। बोस के केबिन से बाहर आते समय आनन्द के कानों में बोस के शब्द पड़ गए, जो बोस ने अपने सहायक को कहे थे।" आनन्द को उधार मत देना, नकद पेमेंट वसूलते रहना, इसकी हवा निकल चुकी है। ज्यादा उधार हो गया और यदि पेमेंट डूब गई तो अपनी नौकरी भी डूबी समझना।" एक बार फिर तीर कलेजे का आर पार कर गया।

बैंक से लोन मिलने के बाद व्यापार फिर से पटरी पर आ गया। आदमी का स्वाभाव सिर्फ भूलने का है। पिछली दिक्कत आनन्द भूल गया। अब छोटे बेटे का विवाह होना है। पंचतारा होटल बुकिंग के लिए अकाउन्टेंट सुरेश को फोन कर चेकबुक होटल में लाने को कहा। अडवांस बुकिंग जो करवानी है। आखिर इजज्त धूल में तो मिलवानी नहीं है।

"बडे बेटे और बेटी का विवाह जिस धूमधाम से हुआ था, सुरेश यह विवाह उसी तरह होना है। रुपये पैसों की ओर नहीं देखना है। आखिर कमाया किसलिए है, खर्च करने के लिए। यही तो टाइम है, खर्च का। आनन्दी सब परिजनों को न्यौता दे दो। जितनी रकम चाहिए, अकाउन्टेंट सुरेश से मांग लेना। मैं कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा कि कोई कसर रह गई।"

आनन्दी विवाह की तैयारी में जुट गई। सुरेश सोचने लगा। पहले फार्म हाउस बिका था, अब...?

कोई सबक नहीं लेता आदमी अपने अनुभवों से। सिर्फ प्रतिष्ठा का ख्याल सताता है। आज आनन्द फिर विवाह का निमंत्रण पत्र देने बोस के ऑफिस पहुंचा। काफी इंतजार के बाद औपचारिकता के लिए बोस ने आनन्द को केबिन में बुलाया। बिना कुछ कहे एक कुटिल मुस्कान के साथ खड़े खड़े आनन्द ने शादी का कार्ड बोस की टेबल पर रख दिया। शादी का कार्ड खोल कर देखा और फिर बोस के चेहरे की रंगत ही बदल गई, उठ कर आनन्द से हाथ मिलाया, चाय, नाश्ते का ऑर्डर दिया।

"बैठिए आनन्द बाबू, बहुत दिनों के बाद आए हैं। पुराने मित्रों को लगते है भूल गए।"

आनन्द मन ही मन सोच रहा था, कार्ड देखने से पहले बैठने को भी नहीं कहा, अब पुराना मित्र बन रहा है। फाइव स्टार होटल में शादी देखकर बोलने का ठंग ही बदल गया। दुनिया की रीत ही यही है, पैसे पर सब झुकते हैं। पैसा ही मां है, पैसा ही बाप है। लेकिन चेहरे पर कोई हाव भाव आए बिना आनन्द ने मुस्कुराते हुए कहा, "शादी के इंतजाम में व्यस्त था, इसलिए आपसे मुलाकात नहीं हो सकी, आप से गुजारिश है, सपरिवार सभी समारोहों में सम्मलित होना है।"

आनन्द के जाने के बाद बोस ने अपने सहयक से कहा, "दोबारा से हवा भर ली है, आनन्द ने। उम्मीद नहीं थी, इतनी जल्दी तरक्की कर लेगा।"


ऑफिस से बाहर आकर आनन्द ने सुरेश से कहा, "देखा था न बोस के चेहरे को, कार्ड देखकर हवाइयां उड़ गई थीं। साला कहता था मेरी हवा निकल गई है। आनन्द की हवा पूरी है। अब मंत्रीजी के ऑफिस चलते है। उसको भी हवा दिखानी है। हवा अभी पूरी है।"
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