Sunday, December 06, 2009

बडी दादी

धडाम...की आवाज के बाद कुछ पल की शान्ति और फिर उसके बाद जोर से रोने की आवाज आई। देवेन्द्र ने देविका को आवाज लगाई, देखना देवी, यह किसके गिरने की आवाज है। तभी रोने की आवाज और अधिक तेज हो गई। देख देवी कहीं शुभ तो नही रो रहा है, लगता है गिर गया है, कहां है, शुभ। देविका तुरन्त भागी। चार वर्ष का शुभ देवेन्द्र और देविका का प्यारा पोता बाथरूम में फिसल कर गिर गया था। रोते पौत्र को गोद में उठा कर देविका चुप कराने लगी। बेटे बाथरूम में धीरे धीरे जाते हैं, आप तेजी से भागते हुए गये होगे, तभी फिसल कर गिर गए न, कोई बात नही, कहीं भी चोट नहीं आई, मेरा बहादुर बेटा, कपडे गीले हो गए हैं, इनको जल्दी से बदलो, नही तो जुकाम लग जाएगा। दादी की गोद में दादी के प्यार के बाद शुभ चुप हो गया, फिर धीरे से गोद से उतर कर बहुत धीरे धीरे बाथरूम की ओर जाने लगा।

शुभ इतना धीरे धीरे क्यों चल रहे हो, क्या दर्द हो रहा है।

नहीं दादी, आपने कहा न, बाथरूम धीरे धीरे जाते हैं, इसलिए। बहुत जल्दी भूल जाती हैं आप। अभी तो आपने कहा था न।

नन्हे पौत्र की शैतानी भरी बातें सुन कर देविका हंसने लगी.

दादी हंस क्यों रही हो। बडी दादी की पिटाई करो। उसने मेरे को बाथरूम में गिराया है।

बडी दादी के बारे में एैसा नही बोलते हैं।

क्यों नही बोलते, अभी अभी ममता बाथरुम सुखा कर गई है। बडी दादी ने आगे बैठ कर शूशू किया है। बाथरूम का दरवाजा भी बंद नही करती। खुले बाथरूम में बैठ कर शूशू करती हैं। पॉट में भी नहीं बैठती हैं। बडी दादी शूशू करके निकली, मैं बाथरूम में शूशू पर फिसल गया।

नन्हे शुभ के मुंह से सच्ची बात सुन कर देविका सन्न रह गई, यह सोच कर कांप गई, कि कहीं घर में महाभारत न छिड जाए। अगर बडी दादी अर्थात देवेन्द्र की मां और देविका की सास ने शुभ की बातें सुन ली, तो शत प्रतिशत घर में तीसरा विश्वयुद्ध तो किसी भी क्षण छिड सकता है। देवेन्द्र भी तब तक वहीं पहुंच गया। क्या हुआ, शुभ गिर गया, बहादुर बच्चे रोते नहीं हैं। देवेन्द्र ने शुभ को अपनी गोद में लिया और कमरे की तरफ प्रस्थान करने ही वाला था, कि जिस बात की आशंका देविका को थी, वही हो गई। बडी दादी ने शुभ की बात सुन ली थी, जो अभी ड्राईंग रूम में बैठी थी, वहीं से तेज स्वर में बोली, देखो कैसा जमाना आ गया है, छोटा, अभी छटांक भर का है नही, मेरे पर इल्जाम लगा रहा है, मैने कब तेरे को धक्का दिया है।

इतना सुन कर शुभ रोते हुए बोला, आपने शूशू किया है। आपके शूशू पर फिसल गया। कह कर और तेज स्वर में रोने लगा.

हां हां और चीख कर सच्चा बन, शूशू बाथरुम में नहीं करूंगी तो क्या तेरे मुंह में करूंगी। बडी दादी ने रौब से कहा।
यह सुन कर देवेन्द्र और देविका सन्न रह गये कि मां आखिर क्या और क्यों शुभ को बोल रही है। वे दोनो जानते थे कि मां और बुर्जुगों की तरह इंगलिश पॉट का इस्तेमाल नही करती हैं और शू शू पॉट के बारह ही करती हैं। लेकिन छोटे शुभ ने पलटवार किया, शूशू पॉट में करते हैं।

बडा आया पॉट वाला, बाथरूम में किया है, कौन सा तेरे मुंह में कर दिया, जो रोए जा रहा है, चुप कर छटांक।

मां, क्या बोले जा रही हो, शुभ छोटा बच्चा है, बहस करने की कोई जरूरत नही है, आप चुप करो। देवेन्द्र ने मां को समझाते हुए कहा।

मैं भी आपके मुंह मे शूशू करूंगा, तब आपको पता चलेगा, मुंह में कैसे शूशू करते हैं। शुभ बोल पडा।

देख पिद्दी की हरकते, कैसे मुझ बुड्डी से लड रहा है। और सिखाऔ बच्चों को, बडों की बेइज्जती कैसे करते हैं।
मां के लडाके तेवर देख कर देविका शुभ के साथ कमरे में चली गई। देवेन्द्र ने मां को कहा, देखो, हमने शुभ को कुछ नही सिखाया, आप शान्ति रखे। आप ने गलत शुरूआत की तो शुभ भी चुप नही रहा। आपको मालूम है, वह बहुत बातूनी है, हमसे भी सारा दिन प्रश्न पूछता रहता है। आपको एैसा नहीं कहना चाहिए था, हम बडे तो किसी बात पर चुप रह जाएगे, पर बच्चे कभी भी चुप नहीं रहते हैं, उलटा कुछ न कुछ जरूर बोलते हैं, बच्चों को सही बात समझा कर चुप कर सकते है, यदि गलत बात पर बच्चों से बहस करेंगें तो हम खुद बच्चों को गलत संस्कार देंगें। जैसा हम बोलेगें, वैसा ही बच्चे सीखेगें, बोलेगें, जवाब देगें। आखिर हमे देख कर ही बच्चे बढे होते हैं। बच्चों को नकल करने की आदत होती है, तभी हम उन्हे नकलची बंदर कहते है। आपने जो कहा, वैसा ही उसने उलटा जवाब दिया।

अरे तू एक पिद्दी को संभाल नही सकता, मैने पांच बच्चों को पैदा किया, पाल पोस के बडा किया, कह तो एैसा रहा है
जैसे तुम पांचों बच्चे थे ही नहीं, बडे पैदा हुए थे।

पांच भाई बहन तो हैं, लेकिन बनती किसी की नही है। जैसा तुम बहस कर रही हो, वैसा हम आपस में करते हैं।
तू कहना क्या चाहता है, कि मैंनें तुमको गलत पाला।

मां बात को समझो, आप की बहस करने की आदतें हम भाई बहनों में भी हैं। यही आदतें छोटे नन्हे शुभ में आ रही हैं। हमें बहस करता देख कर वह भी बहस करता है। देखा आपके साथ कैसे बहस कर रहा था।

तू कहना क्या चाहता है, मैं गलत हूं, तुम सही हो।

मैं आज की बात करता हूं, आज तो आपने गलत बात की है।

मां तमतमा गई। अब तू मुझे सिखाएगा, मैं क्या बात करूं। उसको सिखाएगा, जिसने पाल पोस कर बडा किया। आज तू दादा बन गया तो यह मतलब नही कि मेरा दादा बन गया है। तेरी मां रहूंगी, बात करता है। अपनी मां की बेइज्जती करता है। कहते हुए मां घर के बाहर मेन गेट पर बैठ गई। बैठ कर शोर मचाने लगी।

क्या जमाना आ गया है, अब मुझे दो चार साल के बच्चों से सीखना पढेगा, किससे क्या बात करूं। मेरा बेटा कहता है, मैं गलत हूं। मां अर्थात बडी दादी के विलाप से गली की सफाई कर्मचारिनी, दो चार राहगीर और पडोसी जमा हो गए। उन्होनें तो केवल तमाशा देखना था। वे हां में हां मिलाते गए। घर के गेट पर शोरगुल सुन कर देवेन्द्र ने बाहर आ कर तमाशबीनों को हटने को कहा। जवाब में एक आदमी ने कमेन्ट कस दिया। बूडी मां को तंग करते हो, माफी मांग कर इज्जत से घर में ले जाऔ, वरना एक फोन घुमाने की देर है, दर्जनों टीवी न्यूज चैनल वाले इक्कठे हो जाएगें। मिस्टर जेल की हवा खानी पड सकती है। इतना सुन कर देवेन्द्र का माथा थनका। सब तमाशबानों से हाथ जोड कर माफी मांगी और मां को मनाने में जुट गया। माफी मांगता देख मां के तेवर और तीखे हो गए। मां कभी गलत नही होती है, समझ ले। काफी ना नकुर के बाद मां घर के अंदर गई और तमाशबीनों की भीड छट गई। देवेन्द्र एक हारे हुए जुआरी की तरह चुपचाप कमरे में आया, जहां देविका रो रही थी। नन्हा शुभ भोचक्का सा देविका की गोद में समहा सा गुमसुम चिपका था। गंभीर वातावरण को बदलने के लिए टीवी ऑन कर कार्टून चैनल लगाकर शुभ को अपनी गोद में लिया।

शुभ उदास क्यों हो, देखो आपका प्यारा मनपसन्द कार्टून चैनल। देवेन्द्र ने नन्हे शुभ के गाल पर एक प्यारा सा चुम्बन लेकर कहा.

दादा, बडी दादी मेनगेट पर बैठ कर लडाई क्यों कर रही थी।

आप इसको भूल जाऔ और कार्टून चैनल देखो। देवेन्द्र ने शुभ को बहलाने की कोशिश की, लेकिन उसने फिर प्रश्न किया बताऔ न दादा, बडी दादी क्यों लडाई कर रही थी। बाहर लोग क्या कह रहे थे। नन्हे शुभ की भोली बाते सुन कर देविका ने कहा, आप जितना यत्न कर लें, एक छोटे बच्चे को बहका नही सकते हैं। मां की गलत बात पर क्यों परदा डाल रहे हैं।

बात परदे की नही है, घर में शान्ति रखने की है। लडाई झगडे से बच्चों के नाजुक मस्तिषक पर गलत असर पडता है।

क्या घर की शान्ति का सारा जिम्मा आपने ले रखा है, मां का कुछ दायित्व नही है, शान्ति बनाने में। एक छोटे नन्हे से बालक से एैसे लड रही थी, जैसे कोई हमउम्र हो। बच्चे की सही बात भी नही मान रही थी। लड कर कोई मान मर्यादा बढ गया क्या। छोटे बच्चे को दुश्मन समझ कर लड रही थी। क्यों आप हमेशा मां से दब जाते हो। आपके दूसरे भाई बहन जमकर उलटे जवाब देते हैं। मां की हिम्मत नही होती किसी से बहस करने की। भीगी बिल्ली की तरह उनके घर चुपचाप पडी रहती है। सारा भडास यहीं आप पर उतरती है। सारी उम्र मां की बाते को सहा है, अब छोटे बच्चे पर मां की भडास नही सह सकूंगी। क्यों नही बोलते मां को।

दादा भीगी बिल्ली क्या होता है। बडी दादी बिल्ली क्यों बन जाती हैं। बताऔ दादा।

भीगी बिल्ली एक मुहावरा है।

मुहावरा क्या होता है। शुभ ने फिर से प्रश्न किया। दादा, पोता थोडी देर तक कार्टून चैनल देखते हुए बातें करते रहे। थोडी देर बाद शुभ को नींद आ गई, तो देवेन्द्र और देविका का वार्तालाप फिर शुरू हो गया। आप मां को समझाते क्यों नही हो, बच्चों से बहस जिद उचित तो है नही।

तेरी बातें उचित हैं, समझाता बहुत हूं, लेकिन बुढापे में हर व्यक्ति समझने पर अपनी तौहीन मानता है। जब पूरी उम्र बच्चों पर अपनी मरजी चलाई, तो बच्चों की सही बात भी अखरती है। इसलिए हर घर में झगडे होते हैं, जिससे मैं कतराता हूं। आज भी मां को समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन सामझने के बजाए गली में तमाशा खडा कर दिया, जिस कारण बिना किसी बात के तमाशबीनों से माफी मांगनी पडी।

सब आप की कमजोरी है, मां को कुछ नही बोलते।

हम अपने बच्चों पर खुद अपने व्यवहार को विरासत में देते हैं। जैसा हमारा व्यवहार, आदतें होती हैं, बच्चे उसी का अनुसरण करते हैं। मैंनें हमेशा कोशिश की है कि खुद अच्छा व्यवहार करूं ताकि हक से बच्चों को कह सकूं कि वे भी अच्छी आदतें अपनाए। अपने बच्चों को देख लो, प्रथम को कोई बुरी आदत नही है, बहू प्रतिमा को देखो, तुमहारा कितना मान सम्मान करती है। बहू कम और बेटी अधिक है। हम बच्चों का ध्यान और ख्याल रखेंगें तो उससे अधिक वो हमारा ध्यान और ख्याल रखेंगें। अब तुम खुद अपने बच्चों की तुलना मेरे भाई बहनों के बच्चों से कर सकती हो। मां बाप को गाली निकाल कर बात करते हैं, क्यों कि खुद मेरे भाई बहनों का उग्र स्वभाव है। विरासत में बच्चों को भी वही स्वभाव मिला। जब बच्चे छोटे होते हैं, गाली निकालने, उनके झगडने पर हम खुश होते हैं, देखो पिट के नही आया, दूसरे बच्चों को पीट कर आया है। बुनियाद बचपन में ही पड जाती है। बङे हो कर झुकना, समझोता करना शानो शौकत के खिलाफ हो जाता है। मैं मानता हूं कि मां का स्वभाव उग्र है, जो गलत है। आज जो शुभ के साथ किया और मेनगेट पर बैठ कर तमाशा किया, बिल्कुल गलत है। यदि मां सिर्फ एक शब्द बोल देती कि शुभ आगे से ख्याल रखूंगी तो एक पल में बात समाप्त हो जाती। बच्चा भी खुश हो जाता और अच्छे संस्कारों के बीज पनपते। बुजुर्ग अपनी हठ नहीं छोडते, कि बच्चों से नीचा हो जाऐगें। अपने बच्चों से तालमेल ही बडपन की निशानी है. इसी कारण अपना बेटा प्रथम कोई भी कार्य करने से पहले हमारे से सलाह लेता है और हम अपने अनुभवों के अनुसार उसका मार्ग दर्शन करते हैं। जबकि मैं मां को कुछ भी नही बताता, क्योंकि उसकी आदत मीनमेंख निकालने की है, कि मेरे से पूछ के कोई काम करते हो, अब क्यों पूछ रहे हो। इसलिए न बताने पर ही भलाई है। दुनियादारी बडी कठिन है। जो भी कर लो, कोई खुश नही होता।

हमने किसी का क्या करना है। अपने घर में शान्ति रहे, बस यही चाहा है। देविका ने कहा.

इसी बात की कोशिश करता हूं।

एक कोशिश और करो, मां को कहो, कम से कम नन्ही जान शुभ को तो बक्श दे। उससे बहस न किया करे। क्या कसूर है शुभ का, जो अपनी भडास आज बच्चे पर निकाली है।

देविका तेरे सामने ही बात बहुत शान्ति के साथ की थी, लेकिन खुद तुमने देखा कि गली में तमाशबीन एकत्रित कर लिए। मैं एैसा मजबूर हुआ कि बिना गलती के माफी मांगनी पडी।

और मांग भी क्या सकते हो।

खाना, शुभ को भी भूख लगी होगी. कुछ बना दे, शान्ति के साथ भोजन करे।

माताश्री से भी पूछ लो, नही तो फिर शुरू हो जाऐगी, बहुऐं सास को भूखा रखती हैं, किसी टीवी चैनल वाले को बुला लिया तो मुसीबत हो जाएगी।

ठीक कहती हो, देविका।

मैं तो हमेशा ठीक कहती हूं, लेकिन सुनता कौन है।

मैं तो सुनता ही हूं।

कहां सुनते हो, एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देते हो।

सफल गृहस्थी के लिए सब कुछ करना पडता है।

भारत में शरीफ पत्नियां होती हैं, अगर अमेरिका, यूरोप होता तो कब का तलाक हो जाता। सास की कोई नही सुनता है। सब अलग अलग रहते हैं।

मैं कभी अमेरिका, यूरोप तो नही गया, लेकिन सुना है, वहां गृहस्थी नाम की कोई चीज ही नही होती है। छोटी सी बात पर तलाक हो जाते हैं। अखबार में पढा, कि एक बार तो शादी के कुछ घंटों बाद ही तलाक हो गया।

भारत में खाना खाना है, या यूरोप जाना है।

अपुन तो भारत में ही रह कर खुश हैं, जीवन के उतार चडाव, गृहस्थी के झमेलों में ही खुश हैं।
देविका ने खाना परोसते हुए पूछा, ऐसा गृहस्थी में कब तक।

अंतिम सांस तक, यही दुनिया है और गृहस्थी का सुख, आनन्द है। मिलजुल कर जिन्दगी के उतार चडाव सहना और जीना ही गृहस्थी की सफल कुंजी है, जिसका परम आनन्द और सुख केवल गृहस्थ इंसान ही प्राप्त करता है। जो डर कर भाग जाता है, शायद साधू बनता है। जो निडरता से सामना करता है, वही सच्चा गृहस्थ इंसान होता है।

देवेन्द्र और देविका खाना खाते हुए बाते कर रहे थे, तभी शुभ की नींद खुली और भोलेपन से पूछा, दादा, बडी दादी क्यों लडाई कर रही थी।

अब नही कर रही है, वो भी खाना खा रही है, आप भी खऔ।

कौन सी सब्जी बनाई हैश्। शुभ ने देविका की गोद में बैठते हुए पूछा।


आपकी मनपसंद गाजर मटर शुभ देविका के हाथों खाना खा रहा था और देविका मन ही मन में सोच रही थी, मासूम बच्चो को भी बहलाया नही जा सकता। नींद से जागने के बाद भी सबसे पहले बडी दादी की लडाई के बारे में पूछा और बडी दादी है, कि बुर्जुग हठ के कारण एक बार भी कोप भवन से बाहर आ कर नही पूछा, कि नन्हे बालक शुभ ने कुछ खाया भी है या नही। आखिर बुर्जुगों की बेकार हठ कब समाप्त होगी।

वो ऑटोवाला

ट्रिन ट्रिन फोन की घंटी तो अब पुरानी हो गई है। मोबाइल फोनो के युग में रिंगटोन बजती है, बडी सुन्दर, सुन्दर कर्ण प्रिय। शायद मैं पुराने जमाने की हो गई हूं? शायद की कोई गुंजाइश नही रखनी पढेगी, जब बच्चे बडे हो जाए और मां को टोकने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि बूढे, नही बूढा शब्द अच्छा नही है, पुराना कहना उचित होगा। पचास साल पहले पैदा हुए। पचास साल तो अब पुराने जमाने की बात हो गई है। हो भी क्यों नही, उस जमाने में मोबाइल तो दूर की बात है, फोन भी रइसों के घरों में होते थे। उस जमाने में तो टेलीफोन की घंटी बजा करती थी और अब मोबाइल की रिंगटोन। जिसका जैसा टेस्ट, वैसी रिंगटोन। पुराने जमाने के जब हो ही गए है, तो शर्म किस बात की, रिंगटोन को घंटी कहने में। सबके हाथों में मोबाइल देख कर आखिर पतिदेव से मोबाइल की फरमाईश कर ही दी। पत्नी को खुश रखना हर पति का धर्म है, अत: एक मंहगा मोबाइल ले आए।
"इसका क्या करु।"
"मोबाइल है, एकदम लेटस्ट। सब कुछ है फोन में कैमरा, म्यूजिक फोन। मन पसंद गाने सुनो। फोटो खींचो।"
"इतना खर्चा करने की क्या जरूरत थी, एक सस्ता सा फोन ही काफी था। मुझे तो इसके सिस्टम ही समझ नही आ रहे हैं।"
बस इतना सुनते ही स्वीट सन ने कह ही दिया, " मैं कोई गलत बोलता हूं क्या। आखिर बूढे हो ही गए हो न। किस जमाने में रहते हो। मोबाइल इस्तेमाल करना नही आता है। लो अभी सिखलाता हूं।" बस अब क्या था, वो बोलता गया और मैं हां हूं करती रही। मुझे तो बस फोन करने और रिसीव करने की विधी ही समझ आई। खैर वोही ठीक है। बात बूढे नही, सौरी पुराने होने की नही है, है तो जरूरत की। एक हाउस वाईफ को मोबाइल शौक के लिए चाहिए। जब सबके पास है तो उसके पास भी होना चाहिए। जब जरूरत होती है तो आदमी चाहे नया हो या पुराना, सब सीख जाता है। समय के साथ बदल भी जाते हैं।

क्या कहा मैनें कि आदमी समय के साथ सीखता है, बदलता है। तौबा तौबा, भगवान झूठ न बुलवाए। दुनिया बदल जाए, लेकिन एक कौम कभी नही बदल सकती है, चाहे सूनामी आ जाए या प्रलय। सुधरना तो दूर की बात है, मुझे यह प्रतीत होता है कि दिन प्रति दिन और अधिक बिगडैल होती जा रही है। यह कौम भारत के हर महानगर में थोक भाव में मिलती है, हम सब को तंग करने के लिए। आम नागरिक परेशान, हमारी सरकार भी कुछ नही कर सक रही है। हम सब असहाय है। उस कौम को नही पहचान पा रहे हो, कोई बात नही। क्या कभी आपने रेलगाडी या बस से सफर किया है। जैसे आप रेलवे स्टेशन य़ा बस अड्डे पर समान के साथ उतरते है, एक आवाज आपके कानों से टकराती है ऑटो। जी हां यह ऑटोरिक्शा चालकों की कौम की बात कर रही हूं मैं। स्टेशन पर ऑटो की आवाज सुन कर आप पूछ ही लेंगें रोहिणी जाना है। जवाब मिलेगा जनकपुरी। कोई इस कौम से पूछे जब जाना जनकपुरी है तो सबको परेशान करने की क्या जरूरत है। ऑटो जनकपुरी की आवाज भी लगा सकते थे। आपके गंतव्य का ऑटो जब मिलेगा तब रेट डबल, ट्रिपल। कोई कुछ नही कर सकता। स्टेशन की बात छोडे, घर ऑफिस से बाहर निकल कर ऑटो पकडिये, वो ही नजारा। शाहदरा जाना होगा, ऑटो वाला मालविय नगर बोलेगा। मीटर से तो कभी चलेगें नही। रेट तय किजिए, मीटर से अघिक, तो शॉर्टकट से ले चलेगें। मीटर से चलने पर तो पूरी दिल्ली दर्शन करवा देंगे। हर दिल्ली वासी इस समस्या से ग्रस्त है।

लेकिन अपवाद हर जगह होते है, वैसे इस कौम मैं भी हैं। कभी भूले भटके कोई शरीफ ऑटो रिक्शावाला मिल जाता है और आप चाहते है कि हर बार शराफत का पुतला मिले, लेकिन संसार का नियम ही यही है, जो हम चाहते हैं, वह नहीं मिलता है। खैर छोडिए बहस को। कुछ दिन पहले की बात है, दोपहर के खाना खाकर सो गई। सो क्यों गई। क्यों न सोऊं, एक हाउसवाईफ दोपहर को सोने की लग्जरी एर्फोड कर सकती है। तभी मोबाइल की घंटी अर्थात रिंगटोन बजी। देखा तो पतिदेव का फोन था। अच्छे पति का धर्म है कि पत्नी को दोपहर के सोने के समय परेशान न करे, इसलिए मेरे पतिदेव कभी भी दोपहर को फोन नही करते। जरूर कोई काम होगा। काम जरूरी था। अचानक ऑफिस का टूर बन गया। दो दिन के लिए चैन्नई जाना है, सुबह की फलाईट से, इसलिए कपडों का बैग तैयार करना था। टूर की तैयारी में ऑफिस से घर आने में देर हो सकती है। ये ऑफिस वाले भी कभी व्यवहारिक नही हो सकते है। सुबह छः बजे की फलाईट पकडने का मतलब है, चार बजे घर से निकलना, जिसका सीधा मतलब है, तीन बजे उठना। रात ऑफिस से देर, पूरी रात खराब। खैर नौकरी करनी है तो चाकरी करनी पडेगी। पतिदेव तो चैन्नई के लिए रवाना हो गए। बच्चे बडे हो जाए तो हाउसवाईफ क्या करे। इसका सदुपयोग मायके जा कर हो सकता है। एक शहर में मायका हो तो फायदे तो बहुत होते हैं। बच्चों को नाश्ता करवाने के बाद ऑटो पकड कर मायके रवाना हुई। उस दिन सौभाग्य से सोसाइटी के गेट पर ही ऑटो मिल गया। किसी सवारी को छोडने आया था। रेट तय किया ताकी शॉर्टकट से जल्दी मायके पहुंच सकूं। लेकिन तौबा तौबा। हवाई जहाज की सपीड से ऑटो चलाने लगा। एकदम रफ तरीके से। ओवरटेक करते समय भद्दी गालियां निकालता रहा। मन ही मन सोचती रही, किस का मुंह देख कर घर से निकली थी। मायके पहुंच कर चैन की सांस ली कि सही सलामत पहुंच गई। किराया दिया तो मुंह फाड दिया छुट्टा नहीं है, खुल्ले पैसे दो। पर्स खोल कर खुल्ले दिये, इस चक्कर में घर के मेनगेट की चाबी ऑटो में रह गई। मैं इससे अनजान थी। शाम को जब घर पहुंची तो सोसाइटी के गार्ड ने घर की चाबी देकर कहा कि आप चाबी ऑटो में भूल गई थी। जिस ऑटो में आप सुबह गई थी, दोपहर में चाबी दे गया कि आपको चाबी गुम होने पर परेशानी होगी। हांलाकि उसे दूसरी तरफ जाना था फिर भी वह चाबी देने यहां आया। मैं गार्ड की बातें सुन कर एकदम सन्न रह गई। उसे सुबह जितना कोसा था, उससे अधिक उस ऑटोवाले का आभार प्रकट किया, कि संसार में ईमानदारी और भलाई अभी भी कायम है। चाहे मात्रा कम हो। शायद इन चन्द भले आदमियों पर ही दुनिया टिकी हुई है। उसे क्या फर्क पडता था, चाबी को फेंक भी सकता था, लेकिन नेकी दुनिया में अभी भी कायम है। जीता जागता सबूत वो ऑटोवाला। दस किलोमीटर ऑटो दौडा कर सिर्फ चाबी वापिस करने आया। मैं उसको आभार भी प्रकट नही कर सकी।

अगले दिन जब पतिदेव चैन्नई से वापिस आए और मैंनें इस घटना की बात बताई तो वो हंस पडे। तुम्हारी बात सही है कि कुछ नेक इंसान हर व्यवसाय में मिल जाएगें और उन चन्द नेक भले इंसानों पर दुनिया की धुरी टिकी है, वरना 99 प्रतिशत लोग तो छल कपट में विश्वाश रखते है। तुम्हे एक नेक ऑटोवाला मिला, कोशिश करोगी कि कही कभी वो ऑटोवाला मिले और उसका आभार प्रकट कर सको। तुम्हारा अनुभव सुखद रहा, लेकिन मेरा अनुभव दिल्ली वाला रहा। ऑटोवाले चाहे दिल्ली के हो या चैन्नई के, सब एक जैसे हैं। चैन्नई में पहला दिन तो ऑफिस के काम में बीत गया। दूसरे दिन सुबह रोज के अनुसार पांच बजे नींद खुल गई। ऑफिस दस बजे जाना था। ऑफिस होटल के नजदीक था, पैदल दो तीन मिन्टों का रास्ता था। सुना था कि चैन्नई के बीच बहुत खूबसूरत है। मॉनिंग वॉक समन्दर में की जाए। होटल के रिशेप्शन से पूछा कि मेरीना बीच पन्द्रह किलोमीटर दूर है। चाय पीकर होटल से बाहर निकल कर देखा, दो तीन ऑटोवाले चाय पी रहे थे। पूछा बीच चलोगे। ऑटोवाले ने कहा वन फिफ्टी। मैनें कहा वापिस भी आना है और समन्दर किनारे घूमने में आधा धंटा तो लगेगा। आने जाने का किराया कितना। वह फिर बोला वन फिफ्टी। मैं सन्तुष्ट हो गया कि किराया तय हो गया। नया शहर है, कोई झिक झिक नही होगी। लगभग बीस मिन्टों में चैन्नई के खूबसूरत मैरीना बीच के किनारे पहुंच गया। सुबह का शान्त समय एकदम खाली बीच, इक्का दुक्का सैलानी नजर आ रहे थे। एकदम साफ सवच्छ समन्दर का किनारा। आती जाती लहरों का एक दिलखुश, खूबसूरत नजारा तन मन को प्रफुल्लित कर गया। दिल्ली शहर में जमुना नदी एक नाले से अधिक नजर नही आती। बचपन में आईएसबीटी के समीप जमुना नदी छलांगे मारती हुई बहती थी। खूबसूरत कुदसिया घाट याद आ गया, लेकिन अफसोस अब वहां जमुना एक नाली से अधिक कुछ नही। चैन्नई के खूबसूरत बीच देख कर मन प्रसन्न हो गया। छितिज से धीरे धीरे उगते सूरज को कैमरे में कैद करने के बाद बीच में टहलता हुआ आती जाती लहरों की खूबसूरती निहारता रहा। मन तो नही कर रहा था कि समन्दर छोड कर होटल जाऊं, लेकिन मजबूरी ऑफिस का काम भी करना था। वापिस ऑटो में बैठा तो चार सो चालिस वॉट का करारा छटका ऑटोवाले ने दिया।
वन फिफ्टी वापिस जाने के। यह सुन कर समन्दर का सारा नशा एक सैकन्ड में उतर गया। अरे यह क्या आने जाने का डेढ सौ तय हुआ था। अब परदेशी का फायदा। इतने में तीन चार ऑटोवाले इकठ्ठे हो गए। उनकी तमिल भाषा मुझे समझ नही आई। मेरे कहने पर कि हिन्दी या अंग्रेजी में बात करो तो सब एक मत से बोले। वन फिफ्टी आना, वन फिफ्टी वापिस जाना। चारों तरफ से चित मैं क्या करता, चुपचाप ऑटो में बैठ गया। ठीक है भाई तीन सौ ले लेना। होटल पहुंच कर गाल पर एक थप्पड और पडा। वेटिंग के फिफ्टी और। डेढ सौ रुपये का सफर साढे तीन सौ रुपयों में पढ गया।
पतिदेव की बात सुन कर मैं चौंक गई।
"क्या चैन्नई के ऑटोवाले भी दिल्ली जैसे हैं।"
"ऑटोवालों की जो कौम है, वह एक ही है। चाहे वो दिल्ली के हो या चैन्नई के। किसी भी भारतीय शहर के हो सकते हैं। सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। सब एक से बड कर एक है।"
बात तो ठीक है। उस दिन के बाद जब भी ऑटो में बैठती, मुझे परेशानी झेलनी ही पडती। ऑटो वालों के नखरे और मुंह मांगे रेट। लेकिन फिर भी दिल है कि मानता नही, जब भी किसी ऑटो में बैठती हूं, एक बार ऑटोवाले की शक्ल ध्यान से देखती हूं, कि शायद कही कभी वो ऑटोवाला मिल जाए और उस का आभार प्रकट कर सकूं।

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...