Sunday, December 06, 2009

वो ऑटोवाला

ट्रिन ट्रिन फोन की घंटी तो अब पुरानी हो गई है। मोबाइल फोनो के युग में रिंगटोन बजती है, बडी सुन्दर, सुन्दर कर्ण प्रिय। शायद मैं पुराने जमाने की हो गई हूं? शायद की कोई गुंजाइश नही रखनी पढेगी, जब बच्चे बडे हो जाए और मां को टोकने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि बूढे, नही बूढा शब्द अच्छा नही है, पुराना कहना उचित होगा। पचास साल पहले पैदा हुए। पचास साल तो अब पुराने जमाने की बात हो गई है। हो भी क्यों नही, उस जमाने में मोबाइल तो दूर की बात है, फोन भी रइसों के घरों में होते थे। उस जमाने में तो टेलीफोन की घंटी बजा करती थी और अब मोबाइल की रिंगटोन। जिसका जैसा टेस्ट, वैसी रिंगटोन। पुराने जमाने के जब हो ही गए है, तो शर्म किस बात की, रिंगटोन को घंटी कहने में। सबके हाथों में मोबाइल देख कर आखिर पतिदेव से मोबाइल की फरमाईश कर ही दी। पत्नी को खुश रखना हर पति का धर्म है, अत: एक मंहगा मोबाइल ले आए।
"इसका क्या करु।"
"मोबाइल है, एकदम लेटस्ट। सब कुछ है फोन में कैमरा, म्यूजिक फोन। मन पसंद गाने सुनो। फोटो खींचो।"
"इतना खर्चा करने की क्या जरूरत थी, एक सस्ता सा फोन ही काफी था। मुझे तो इसके सिस्टम ही समझ नही आ रहे हैं।"
बस इतना सुनते ही स्वीट सन ने कह ही दिया, " मैं कोई गलत बोलता हूं क्या। आखिर बूढे हो ही गए हो न। किस जमाने में रहते हो। मोबाइल इस्तेमाल करना नही आता है। लो अभी सिखलाता हूं।" बस अब क्या था, वो बोलता गया और मैं हां हूं करती रही। मुझे तो बस फोन करने और रिसीव करने की विधी ही समझ आई। खैर वोही ठीक है। बात बूढे नही, सौरी पुराने होने की नही है, है तो जरूरत की। एक हाउस वाईफ को मोबाइल शौक के लिए चाहिए। जब सबके पास है तो उसके पास भी होना चाहिए। जब जरूरत होती है तो आदमी चाहे नया हो या पुराना, सब सीख जाता है। समय के साथ बदल भी जाते हैं।

क्या कहा मैनें कि आदमी समय के साथ सीखता है, बदलता है। तौबा तौबा, भगवान झूठ न बुलवाए। दुनिया बदल जाए, लेकिन एक कौम कभी नही बदल सकती है, चाहे सूनामी आ जाए या प्रलय। सुधरना तो दूर की बात है, मुझे यह प्रतीत होता है कि दिन प्रति दिन और अधिक बिगडैल होती जा रही है। यह कौम भारत के हर महानगर में थोक भाव में मिलती है, हम सब को तंग करने के लिए। आम नागरिक परेशान, हमारी सरकार भी कुछ नही कर सक रही है। हम सब असहाय है। उस कौम को नही पहचान पा रहे हो, कोई बात नही। क्या कभी आपने रेलगाडी या बस से सफर किया है। जैसे आप रेलवे स्टेशन य़ा बस अड्डे पर समान के साथ उतरते है, एक आवाज आपके कानों से टकराती है ऑटो। जी हां यह ऑटोरिक्शा चालकों की कौम की बात कर रही हूं मैं। स्टेशन पर ऑटो की आवाज सुन कर आप पूछ ही लेंगें रोहिणी जाना है। जवाब मिलेगा जनकपुरी। कोई इस कौम से पूछे जब जाना जनकपुरी है तो सबको परेशान करने की क्या जरूरत है। ऑटो जनकपुरी की आवाज भी लगा सकते थे। आपके गंतव्य का ऑटो जब मिलेगा तब रेट डबल, ट्रिपल। कोई कुछ नही कर सकता। स्टेशन की बात छोडे, घर ऑफिस से बाहर निकल कर ऑटो पकडिये, वो ही नजारा। शाहदरा जाना होगा, ऑटो वाला मालविय नगर बोलेगा। मीटर से तो कभी चलेगें नही। रेट तय किजिए, मीटर से अघिक, तो शॉर्टकट से ले चलेगें। मीटर से चलने पर तो पूरी दिल्ली दर्शन करवा देंगे। हर दिल्ली वासी इस समस्या से ग्रस्त है।

लेकिन अपवाद हर जगह होते है, वैसे इस कौम मैं भी हैं। कभी भूले भटके कोई शरीफ ऑटो रिक्शावाला मिल जाता है और आप चाहते है कि हर बार शराफत का पुतला मिले, लेकिन संसार का नियम ही यही है, जो हम चाहते हैं, वह नहीं मिलता है। खैर छोडिए बहस को। कुछ दिन पहले की बात है, दोपहर के खाना खाकर सो गई। सो क्यों गई। क्यों न सोऊं, एक हाउसवाईफ दोपहर को सोने की लग्जरी एर्फोड कर सकती है। तभी मोबाइल की घंटी अर्थात रिंगटोन बजी। देखा तो पतिदेव का फोन था। अच्छे पति का धर्म है कि पत्नी को दोपहर के सोने के समय परेशान न करे, इसलिए मेरे पतिदेव कभी भी दोपहर को फोन नही करते। जरूर कोई काम होगा। काम जरूरी था। अचानक ऑफिस का टूर बन गया। दो दिन के लिए चैन्नई जाना है, सुबह की फलाईट से, इसलिए कपडों का बैग तैयार करना था। टूर की तैयारी में ऑफिस से घर आने में देर हो सकती है। ये ऑफिस वाले भी कभी व्यवहारिक नही हो सकते है। सुबह छः बजे की फलाईट पकडने का मतलब है, चार बजे घर से निकलना, जिसका सीधा मतलब है, तीन बजे उठना। रात ऑफिस से देर, पूरी रात खराब। खैर नौकरी करनी है तो चाकरी करनी पडेगी। पतिदेव तो चैन्नई के लिए रवाना हो गए। बच्चे बडे हो जाए तो हाउसवाईफ क्या करे। इसका सदुपयोग मायके जा कर हो सकता है। एक शहर में मायका हो तो फायदे तो बहुत होते हैं। बच्चों को नाश्ता करवाने के बाद ऑटो पकड कर मायके रवाना हुई। उस दिन सौभाग्य से सोसाइटी के गेट पर ही ऑटो मिल गया। किसी सवारी को छोडने आया था। रेट तय किया ताकी शॉर्टकट से जल्दी मायके पहुंच सकूं। लेकिन तौबा तौबा। हवाई जहाज की सपीड से ऑटो चलाने लगा। एकदम रफ तरीके से। ओवरटेक करते समय भद्दी गालियां निकालता रहा। मन ही मन सोचती रही, किस का मुंह देख कर घर से निकली थी। मायके पहुंच कर चैन की सांस ली कि सही सलामत पहुंच गई। किराया दिया तो मुंह फाड दिया छुट्टा नहीं है, खुल्ले पैसे दो। पर्स खोल कर खुल्ले दिये, इस चक्कर में घर के मेनगेट की चाबी ऑटो में रह गई। मैं इससे अनजान थी। शाम को जब घर पहुंची तो सोसाइटी के गार्ड ने घर की चाबी देकर कहा कि आप चाबी ऑटो में भूल गई थी। जिस ऑटो में आप सुबह गई थी, दोपहर में चाबी दे गया कि आपको चाबी गुम होने पर परेशानी होगी। हांलाकि उसे दूसरी तरफ जाना था फिर भी वह चाबी देने यहां आया। मैं गार्ड की बातें सुन कर एकदम सन्न रह गई। उसे सुबह जितना कोसा था, उससे अधिक उस ऑटोवाले का आभार प्रकट किया, कि संसार में ईमानदारी और भलाई अभी भी कायम है। चाहे मात्रा कम हो। शायद इन चन्द भले आदमियों पर ही दुनिया टिकी हुई है। उसे क्या फर्क पडता था, चाबी को फेंक भी सकता था, लेकिन नेकी दुनिया में अभी भी कायम है। जीता जागता सबूत वो ऑटोवाला। दस किलोमीटर ऑटो दौडा कर सिर्फ चाबी वापिस करने आया। मैं उसको आभार भी प्रकट नही कर सकी।

अगले दिन जब पतिदेव चैन्नई से वापिस आए और मैंनें इस घटना की बात बताई तो वो हंस पडे। तुम्हारी बात सही है कि कुछ नेक इंसान हर व्यवसाय में मिल जाएगें और उन चन्द नेक भले इंसानों पर दुनिया की धुरी टिकी है, वरना 99 प्रतिशत लोग तो छल कपट में विश्वाश रखते है। तुम्हे एक नेक ऑटोवाला मिला, कोशिश करोगी कि कही कभी वो ऑटोवाला मिले और उसका आभार प्रकट कर सको। तुम्हारा अनुभव सुखद रहा, लेकिन मेरा अनुभव दिल्ली वाला रहा। ऑटोवाले चाहे दिल्ली के हो या चैन्नई के, सब एक जैसे हैं। चैन्नई में पहला दिन तो ऑफिस के काम में बीत गया। दूसरे दिन सुबह रोज के अनुसार पांच बजे नींद खुल गई। ऑफिस दस बजे जाना था। ऑफिस होटल के नजदीक था, पैदल दो तीन मिन्टों का रास्ता था। सुना था कि चैन्नई के बीच बहुत खूबसूरत है। मॉनिंग वॉक समन्दर में की जाए। होटल के रिशेप्शन से पूछा कि मेरीना बीच पन्द्रह किलोमीटर दूर है। चाय पीकर होटल से बाहर निकल कर देखा, दो तीन ऑटोवाले चाय पी रहे थे। पूछा बीच चलोगे। ऑटोवाले ने कहा वन फिफ्टी। मैनें कहा वापिस भी आना है और समन्दर किनारे घूमने में आधा धंटा तो लगेगा। आने जाने का किराया कितना। वह फिर बोला वन फिफ्टी। मैं सन्तुष्ट हो गया कि किराया तय हो गया। नया शहर है, कोई झिक झिक नही होगी। लगभग बीस मिन्टों में चैन्नई के खूबसूरत मैरीना बीच के किनारे पहुंच गया। सुबह का शान्त समय एकदम खाली बीच, इक्का दुक्का सैलानी नजर आ रहे थे। एकदम साफ सवच्छ समन्दर का किनारा। आती जाती लहरों का एक दिलखुश, खूबसूरत नजारा तन मन को प्रफुल्लित कर गया। दिल्ली शहर में जमुना नदी एक नाले से अधिक नजर नही आती। बचपन में आईएसबीटी के समीप जमुना नदी छलांगे मारती हुई बहती थी। खूबसूरत कुदसिया घाट याद आ गया, लेकिन अफसोस अब वहां जमुना एक नाली से अधिक कुछ नही। चैन्नई के खूबसूरत बीच देख कर मन प्रसन्न हो गया। छितिज से धीरे धीरे उगते सूरज को कैमरे में कैद करने के बाद बीच में टहलता हुआ आती जाती लहरों की खूबसूरती निहारता रहा। मन तो नही कर रहा था कि समन्दर छोड कर होटल जाऊं, लेकिन मजबूरी ऑफिस का काम भी करना था। वापिस ऑटो में बैठा तो चार सो चालिस वॉट का करारा छटका ऑटोवाले ने दिया।
वन फिफ्टी वापिस जाने के। यह सुन कर समन्दर का सारा नशा एक सैकन्ड में उतर गया। अरे यह क्या आने जाने का डेढ सौ तय हुआ था। अब परदेशी का फायदा। इतने में तीन चार ऑटोवाले इकठ्ठे हो गए। उनकी तमिल भाषा मुझे समझ नही आई। मेरे कहने पर कि हिन्दी या अंग्रेजी में बात करो तो सब एक मत से बोले। वन फिफ्टी आना, वन फिफ्टी वापिस जाना। चारों तरफ से चित मैं क्या करता, चुपचाप ऑटो में बैठ गया। ठीक है भाई तीन सौ ले लेना। होटल पहुंच कर गाल पर एक थप्पड और पडा। वेटिंग के फिफ्टी और। डेढ सौ रुपये का सफर साढे तीन सौ रुपयों में पढ गया।
पतिदेव की बात सुन कर मैं चौंक गई।
"क्या चैन्नई के ऑटोवाले भी दिल्ली जैसे हैं।"
"ऑटोवालों की जो कौम है, वह एक ही है। चाहे वो दिल्ली के हो या चैन्नई के। किसी भी भारतीय शहर के हो सकते हैं। सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। सब एक से बड कर एक है।"
बात तो ठीक है। उस दिन के बाद जब भी ऑटो में बैठती, मुझे परेशानी झेलनी ही पडती। ऑटो वालों के नखरे और मुंह मांगे रेट। लेकिन फिर भी दिल है कि मानता नही, जब भी किसी ऑटो में बैठती हूं, एक बार ऑटोवाले की शक्ल ध्यान से देखती हूं, कि शायद कही कभी वो ऑटोवाला मिल जाए और उस का आभार प्रकट कर सकूं।

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