Thursday, January 07, 2010

थप्पड़

मैनेंजिंग डारेक्टर साहब के केबिन की सफाई करते करते सफाई कर्मचारी अमर आंखें बंद करके फर्श पर बैठ गया और दोनों हाथों से सिर को दबाने लगा। अमर को फर्श पर बैठा देख कर चपरासियों के मुख्यिा भंडारी बोला "अबे यहां बैठ कर हरामखोरी कर रहा है, तुझे पता नहीं है, एक महीने के विदेश दौरे के बाद साहब आज ऑफिस आएगें और तू यहां मस्त बैठा है। उठ काम फटाफट कर वरना साहब नाराज होंगे। इतना भी सोचता नहीं कि एक महीने बाद साहब आज ऑफिस आ रहे हैं, अस्त वयस्त ऑफिस को देख कर तेरी वजह से हम सब डांट खाएगें। उठ उठ।" कह कर भंडारी ने अमर का हाथ पकड कर उठाया और पोंचा हाथ में देकर कहा "ल्दी कर तुझे पता नहीं, साहब कभी भी आ सकते हैं।" अमर फिर से फर्श पर बैठ गया और बहुत नम्रता से बोला "भंडारी जी आज तबीयत कुछ ठीक नही लग रही हैं, बदन भी गर्म हो रहा है, एैसा लग रहा है कि टांगों में जान ही नहीं रही है।"
"कुछ नहीं हुआ तेरी तबीयत को। अच्छा भला तो आया था और गार्ड से खडे़ हो कर खूब बतिया रहा था। तब तबीयत को कुछ नही हुआ था। अब बातें कर रहा है।" भंडारी ने अमर को धमकाया।
"मैं एक दम सच बोल रहा हूं, सुबह तबीयत ठीक थी, एक घंटे से ऑफिस में काम कर रहा हूं, लेकिन अब बदन टूटना शुरू हो गया है और लगता है कि तेज बुखार भी हो रहा है। बदन गर्म हो रहा है। बिल्कुल सच बोलता हूं कि बदन में कुछ भी जान नहीं हैं। हाथ कांपने शुरू हो गए हैं, इसलिए मैं बैठ गया हूं कि कुछ बदन में जान आए तो काम करूं।"
"जब हमारी जान निकलेगी तब तेरी जान आएगी। जब साहब आकर हमें डाटेगें तब तुझे खुशी होगी। हमें नौकरी से निकलवा के खुश होना चाहता है। तेरे इन मंसूबों को मैं कभी पूरा नही होने दूंगा।" इतना कह कर भंडारी दनदनाता हुआ गोली की रफ्तार से भी तेज कमरे से बाहर निकल कर कूदता फांदता सीड़ीयां चढता हुआ मैनेंजर प्रशान्त के केबिन में दाखिल हुआ।  

भंडारी को हांफता देख प्रशान्त ने कहा, "कौन सी आफत आ गई, जो उछलता हुआ नाच बंद नही कर पा रहा है।"
"आज तो हम सबकी नौकरी गई, कोई नहीं बचा सकता"
"क्या अंट शंट बक रहा है, मुंह से कुछ फूट।" प्रशान्त बाबू ने कुर्सी छोडते हुए तेजी से प्रश्न किया।
"साब जी ने एक महीने के विदेश दौरे के बाद आज ऑफिस आना है और अमर मस्त बैठा है। सफाई नहीं कर रहा है। साब जी की नाराजगी पक्की है। आज सबकी छुट्टी होनी है।" हांफते हांफते भंडारी ने कहा।
"क्या कह रहा है तू, चल मेरे साथ, आज तो मौत के मुंह से कोई नहीं बचा सकता है। फटाफट साहब के कमरे की सफाई होनी चाहिए और शीशे की तरह चमकना चाहिए।" कहते कहते अपने सहायक नवीन को आवाज दी, "तू भी फटाफट मेरे साथ चल।"

मैनेंजर प्रशान्त मैनेंजिंग डारेक्टर साहब के केबिन का निरीक्षण करने के लिए फटाफट सीडीयां उतरते हुए नीचे आए। सीडीयों पर गिरते हुए दो बार बचे। नवीन ने यह देख कर कहा, "र जी जरा आराम से।"
"तू आराम की कह रहा है, यहां नौकरी बचेगी तो आराम से काम होगा। आज तो सब मरेंगें।" इतने में अमर साहब के केबिन से बाहर आता नजर आया। उसका हाथ पकड़ कर पूछा,"ह मैं क्या सुन रहा हूं, काम क्यों नही कर रहा है।"
"साब जी, बहुत तेज बुखार हो गया है, काम नहीं हो सकेगा, आप किसी और से काम करवा लीजिए।"
इतना सुनते ही प्रशान्त का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। "तेरा काम और कोई क्यों करेगा। लाटसाब है क्या। नौकरों को आगे चाकर चाहिए।"
"साब जी मेरी तबीयत ठीक होती तो मैं आपसे एैसे कभी नहीं कहता। मैं सच बोल रहा हूं, टांगे कांप रही हैं, बदन बुखार से तप रहा है।"
"झूठ बोलता है, काम कर, साहब कभी भी आ सकते हैं।" कह कर अमर के हाथों में प्रशान्त ने झाडू पकडा दिया।
"आप से एक बार और विनती करता हूं, काम किसी और से करवा लीजिए।" अमर ने हाथ जोडे।
इतना सुन कर प्रशान्त आग बबूला हो गया और चीख कर कहा "काम नही करेगा, हरामखोर, हमारी नौकरी से छुट्टी करवाना चाहता है।"
"एैसा नहीं है, सर जी।"
"काम करेगा नहीं और कहता है एैसे नही।" कह कर प्रशान्त ने एक थप्पड अमर को रसीद कर दिया।
"साब जी मारो मत, बुखार से कांप रहा हूं।"
"मारो मत।" कह कर एक और थप्पड मार दिया, जिससे अमर गिर पडा। अमर को गिरता देख नवीन ने अमर को सहारा देकर उठाया। "र इसे तेज बुखार है, इसका बदन गरम है।" नवीन ने प्रशान्त को कहा।
"मैं इन लोगों के नखरे अच्छी तरह से जानता हूं।" कह कर एक और थप्पड अमर को रसीद किया। अब अमर का सब्र टूट गया। एक अनोखी ताकत के साथ अमर प्रशान्त पर टूट पडा। दाएं हाथ से बाएं गाल पर और बाएं हाथ से दाएं गाल पर जोर से थप्पड़ अमर ने प्रशान्त को ऐसे रसीद किए कि पांचों ऊंगलियां प्रशान्त के दोनों गालों पर छप गई और प्रशान्त भोंच्चका सा देखता रह गया। प्रशान्त की आंखों के आगे तारे नाचने लगे।
इस घटना पर पूरा मौजूद स्टाफ सन्न रह गया। कोई कुछ नही कर पाया, क्योंकि सब कुछ अचानक से इतनी तेजी में हुआ कि कोई सोच समझ नही सका।। अब अमर ने पोंचें वाली बाल्टी, जिसमें फिनाइल वाला पानी था, प्रशान्त के ऊपर उडेल दी और दो चार घूसे मुंह और पेट में लगा दिए। जिससे प्रशान्त दीवार से टकराया। टकराने पर प्रशान्त के दो दांत टूट गये और मुंह से खून निकलने लगा, पूरे शरीर से फिनाइल की दुर्गन्ध आने लगी। नवीन ने अमर को केबिन से बाहर किया और सलाह दी कि बाहर स्किुरिटी गार्ड के पास बैठ जाए। अमर केबिन से बाहर चला गया और गार्ड के पास बैंच पर बैठ गया।
"गार्ड भैया, बुखार की दवा हो तो दे दो।"
गार्ड ने फस्टऐड बाक्स से बुखार की दवा दी और पूछा "क्या बात है, अंदर इतना हंगामा क्यों है।"
"कुछ न पूछो भाई, हिम्मत जवाब दे चुकी है, अगर कहो तो यहां बैंच पर लेट जाऊ।" इतना कह कर गार्ड के जवाब का इंतजार सुने बिना ही अमर बैंच पर अधलेटा हो गया।

अंदर नवीन और दूसरे कर्मचारियों ने प्रशान्त को उठाया और कुर्सी पर बिठा के पानी पिलाया। "र जी आपको अमर पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था। काम किसी और से करवा लेते। उसको कारण बताऔ नोटिस दे कर ऑफिस से बाहर कर सकते थे। आपने हाथ उठाया तो पलट कर उसने क्या हालत कर दी आपकी।" नवीन ने बात आगे बढाते हुए कहा, "चल कर डाक्टर से चेकअप करवा लीजिए, आपके दो दांत टूट गए लगते हैं।"
"नवीन मैं उसको नहीं छोडूंगा, देखता हूं वो कैसे आज के बाद इस ऑफिस में नजर आएगा। उसको अब के बाहर बिठा दिया है, देखना इस आफिस के आसपास भी नहीं फटकेगा।" प्रशान्त ने सिर झुंझला के क्रोध में कहा और कहारते हुए नवीन के साथ डाक्टर के पास चेकअप के लिए गया। प्रशान्त के आगे के दो दांत डाक्टर ने निकाल दिए।
ऑफिस में भंडारी जो अमर की खराब तबीयत के बावजूद उसी से काम करवाने पर लगा हुआ था, अब खुद मैनेंजिंग डारेक्टर साहब के केबिन में सफाई में जुट गया और साहब के आने से पहले केबिन को शीशे की तरह चमका दिया। एक लंबी सांस लेकर खुद से कहने लगा, "जान बची तो लाखों पाए।. यदि साहब जल्दी आ जाते तो आज किसी की खैर नहीं थी। शुक्र है, कि उनके आने से पहले सब व्यवस्थित हो गया है।"

दोपहर के तीन बजे मैनेंजिंग डारेक्टर साहब की कार ने हार्न बजाया। गार्ड ने मुस्तैदी से स्लूयट किया और मेन गेट खोला। सारे ऑफिस में हलचल मच गई कि साहब आ गए हैं। सब अपनी सीटों पर फाईलों और कमंप्यूटरों में एैसे उलझ गये, ताकि लगे कि कोई खाली नहीं हैं, सब काम में व्यस्त हैं। गार्ड के पास बैंच में अमर को लेटा देख मैनेंजिंग डारेक्टर साहब ने कडकती आवाज में गार्ड से पूछा, " डयूटी के समय अमर क्यों सो रहा है।"
साहब की आवाज सुन कर अमर ने धीरे से आंखों को खोलते हुए कहा, "र जी बुखार हो गया है।"
"बुखार है तो दवाई लेकर रेस्टरूम में आराम कर। यहां गेट पर सोने की कोई जरूरत नहीं है।" कह कर मैनेंजिंग डारेक्टर साहब ने मुस्तैदी से ऑफिस में प्रवेश किया। उनके ऑफिस में घुसते ही चारों तरफ से आवाजे आने लगी, गुड ऑफ्टरनून सर। साहब ने दो तीन बार गुड आफ्टरनून कहा और प्रशान्त के केबिन में घुस गए। वहां फटेहाल प्रशान्त को देख कर बोले,"फिस में ये फटे कपडे क्यों पहन कर बैठे हो, कहां से लड कर आए हो।"
कांपते हुए प्रशान्त ने उत्तर दिया, "र अमर ने मारपीट की और कपडे फाड दिये।"
"यह क्या चक्कर है, बाहर अमर बैंच पर बैठा है। कहता है कि बुखार है और तुम कहते हो, झगडा हो गया। बुलाऔ अमर को।"
अमर को अभी भी तेज बुखार था। साहब के पास पहुंच कर उसने सारा किस्सा सुनाया तो साहब प्रशान्त पर बिगड़ पड़े। "प्रशान्त तुम्हे मैनेंजर ऑफिस संभालने के लिए बनाया है या मारपीट करने के लिए। सारे ऑफिस का माहौल बिगाड कर रखा हुआ है। एक आदमी की तबीयत खराब है, उसके साथ मारपीट की क्या आवश्कता थी। उसे घर भेज कर काम किसी और से करवा लेते। एक बीमार आदमी से काम करवाऔगे और उसकी तबीयत ज्यादा बिगड गई तो कौन जिम्मेवार होगा। उसकी बीमारी का खर्चा कौन उठाएगा। मारपीट करो तुम और खर्चा कंपनी करे, यह कहां का नियम है। तुम्हारी सैलरी में से काटू उसके इलाज का खर्चा। अगर उसे कुछ हो जाता तो। उसकी शक्ल ही बता रही है, कि तबीयत ठीक नहीं है, उसकी।" 
"सर आप नहीं जानते, बीमारी तो काम न करने का केवल एक बहाना था।" प्रशान्त ने सफाई देने की कोशिश की।
"हाना, कया बात करते हो, तुम प्रशान्त, कोई भी उसकी हालत देख कर कह सकता है, कि उसकी हालत बीमार जैसी है। तुम्हारे से मुझे यह उम्मीद न थी। सारे ऑफिस का माहौल खराब कर रखा है। ऑफिस को अखाडा़ बना दिया। मारपीट हो रही है। प्रशान्त अमर को फौरन डयूटी पर लो र तुम मुझे लिखित माफीनामा दो कि भविष्य में इस ऑफिस में कोई एैसी घटना नहीं होगी। अगर कोई भविष्य में एैसी कोई घटना हुई तो तुम्हारी सैलरी से खर्चा काटा जाएगा। मुझे आफिस में अनुशासन चाहिए।" प्रशान्त को डांट कर मैनेंजिंग डारेक्टर साहब अपने केबिन में चले गए।
साहब के जाने के बाद अमर रेस्टरुम में आराम करने चला गया और नवीन फाईलों में उलझा सोचने लगा कि जो हुआ अच्छा ही हुआ। प्रशान्त मैनेंजर बनने के बाद से सातवें आसमान में चलता है। डांट डपट और गाली गलौच के बिना तो बात नहीं करता है। अमर को पीटने की क्या जरूरत थी। इनसान को इनसान समझना चाहिए, इनसानियत भी कोई चीज होती है। दुख दर्द को ख्याल में रखना चाहिए। केबिन की सफाई किसी और से करवा लेता। खुद पीटने की पहल की और खुद ही पिट गया। कपडे फट गए, दो दांत टूट गए। ऊपर से पूरे स्टाफ के सामने डांट भी खाई। बंद कमरे में तो डांट की अलग बात होती है, पूरे स्टाफ के सामने डांट ने तो पूरा बेइज्जत ही कर दिया। अब क्या इज्जत रह गई है हमारे सामने। ठीक है, हम उसके आधीन काम करते है, इसलिए कुछ नहीं कहते। दिल करता है कि दो चार हाथ मैं भी लगा देता, प्रशान्त को। लेकिन मेरी मजबूरी है कि अफसर हो कर यह काम नहीं कर सकता। कुछ तो मर्यादा भी होती है। अच्छा हुआ कि सबक मिल गया, लेकिन मुझे लगता है कि कुते की दुम की तरह प्रशान्त सुधरने वाला नहीं है।. मंद मंद मुसकराते हुए नवीन फाईल बंद करके बाथरूम की ओर चल पडा़।

ऑफिस में साहब लोगों की खुशामद ही काम आती है। चम्चों की तरक्की भी जल्दी होती है। काम करने वाले कछुवे की रफ्तार से रेंगते रहते हैं तथा निराशा के साथ काम करते हैं क्योंकि उनका हक चम्चे हथिया लेते हैं। प्रशान्त की गिनती चम्चों में की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही। साहब लोग चमचों पर मेहरबान रहते है, लेकिन बीच में थोडा झटका दे जाते है, कि उनके सिर पर नही चढ सके। चम्चे औकात में ही रहे. इसी सोच के साथ मैनेंजिंग डारेक्टर ने प्रशान्त को आज झटका दिया, कि बाकी स्टाफ सोचे कि साहब उन पर भी मेहरबान है। मालिकों को नौकरों के साथ कोई हमदर्दी नही होती, लेकिन चमचे नही समझ सकते। न समझने के कारण ही प्रशान्त पिट गया।


फटे कपड़ों और दो टूटे दांतों के साथ प्रशान्त कंमप्यूटर पर बैठ कर माफीनामा लिखने लगा। रोनी सूरत वाली आंखों से आंसू टपक कर गालों पर आ गए। अमर के जोरदार थप्पड़, जिसके निशान अभी भी गालों पर चमकदार बने हुए थे, हाथों से सहलाता हुआ सोच में डूब गया कि आखिर आज साहब को क्या हो गया, पहले तो कभी साहब नही डांटते थे। आज तो इज्जत का फलूदा बन दिया। धीरे धीरे आंखे बंद हो गई। कंमप्यूटर के कीबोर्ड पर सिर टिका दिया। बाथरूम से वापिस आता हुआ नवीन प्रशान्त को कंमप्यूटर के कीबोर्ड पर गमगीन मुद्रा में सिर टिकाए देख कर हंसी रोक कर मंद मंद मुस्कुराने लगा, लेकिन मन ही मन खूब ठहाके लगा कर हंस रहा था।    


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