Wednesday, March 17, 2010

अजनबी

जब किसी अजनबी से मिलता हूँ तो लगता है कोई अपना मिला
जब कोई अपना मिलता है तो लगता है कोई अजनबी मिला

अजनबी में चाहत होती है घुलने मिलने की, अपना बना लेने की
अपने में फ़ितरत होती है दूर जाने की, अजनबी बनने की

अजनबी के साथ सफ़र आराम से हंसते हुए सफ़र कट जाता है
अपने के साथ सफ़र कटता ही नही, और लंबा हो जाता है

काश ऐसा हो कि हम तुम अजनबी हो जाए
अपने ना बने अजनबी बन जाए

Saturday, March 06, 2010

रिश्ते

रिश्ते एक ऐसा शब्द है, जिस की व्याख्या कोई नही कर सकता है। पल पल इसकी परिभाषा बदलती रहती है। अपनी सहूलियत के अनुसार रिश्ते का एक नया अर्थ र्निर्मित करने में किसी से कोई नही चूक होती है। आज रिश्ते का जो मतलब है, कल बदल जाता है। वैसे देखा जाए तो रिश्ते बिना पैसों के कोई अर्थ नही रखते है। अमीर और गरीब का कोई रिश्ता नही होता। दो भाईयों तक का कोई रिश्ता नही रहता। रहता है तो सिर्फ रूपयों का रिश्ता। क्या ताकत है, रुपयों में, सुनील जानता तो था, लेकिन रिश्ते रूपयों के तराजू में तुलते है, इसका एहसास पुलिस थाने जाकर हुआ।

सुबह का समय था। ऑफिस जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। खाने की मेज पर नाश्ते का इंतजार सुबह का अखबार पढ़ कर हो रहा था। पत्नी शर्मिला रसोई में नाश्ते के साथ ऑफिस ले जाने का लंच का टिफिन भी पैक करने में व्यस्त थी। मध्यवर्गीय परिवार की तो लिखने-पढ़ने की मेज और खाने की मेज एक ही होती है। शुक्र है कि कुछ समय पहले खाने की मेज खरीदी, वरना बिस्तर पर ही नाश्ता, खाना, सोना सब कुछ होता था।
"
अखबार बंद करो, नाश्ता तैयार है।" शर्मिला ने रसोई से आवाज दी और ट्रे में नाश्ता सजा कर ले आई। ब्रेड मक्खन के साथ आलू के चिप्स देखकर सुनील चहक उठा, "आज तो एकदम छुट्टी के दिन वाला नाश्ता बना दिया। मजा आ गया।"

"
आज मेरा व्रत है, खाना सीधे शाम को ही बनाऊँगी, सोचा सुबह कुछ हल्का और नया बना दूँ आपके लिये।" शर्मिला ने मुसकुराते हुए कहा। उसे सजा धजा और चुस्त देखकर सुनील को याद आया कि आज करवाचौथ है वर्ना शर्मिला सुबह सुबह नहाधोकर तैयार नहीं हो जाती, इस समय तक रात के कपड़ों में ही होती है।
सुनील पहला निवाला मुँह में रखता उसके पहले ही दरवाजे की घंटी बजी।

जैसे ही सुनील ने दरवाजा खोला, सामने पुलिस के सिपाही को देखकर भौचक्का रह गया। सुनील के कुछ कहने से पहले ही सिपाही ने प्रश्न किया "क्या सुनील आपका नाम है?"
 "हाँ, कहिए क्या काम है।"
"
आपके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है। थाने चलना है।"
पुलिस को देख कर शर्मिला भी परेशान हो गई। दोनों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई उनके खिलाफ थाने में शिकायत कर सकता है। गला साफ करते हुए सुनील बङी मुश्किल से पूछ सका। मेरी तो किसी से दुश्मनी भी नही है। शिकायत किसने की है।अब सिपाही ने हरियाणवी अंदाज में कहा घबङा न सुनीण, दुश्मनी न है, तदी तो शिकायत हुई है। शरीफ आदमियां को कोई न जीणे दे। घबडा न।
सिपाही की बाते सुनील को समझ नहीं आई। शर्मिला भी टुकुर टुकुर देखती सुनती रही, कुछ बोल नहीं सकी। सुनील के खिलाफ शिकायत गले के नीचे नहीं उतर रही थी।
"
टैम न खड़ाब कर। मैंणें घणें सारे काम हैं। जल्दी कर। सिपाही की बात सुन कर हिम्मत जुटा कर फुसफुसाया चलिए
सुनील के मुख से इतना सुन कर शर्मिला बोली अकेले नहीं जाने दूंगी। मैं भी चलती हूं। पता नही क्या हो जाए, थाने में।कह कर फटाफट चप्पल पैरों में डाली और सुनील के पीछे सीडियां उतरने लगी। भला हो करवाचौथ का जिसके कारण वह सुबह सुबह तैयार हो गई थी, वर्ना नाइटी में ही चल पडती।

सुनील इस सोच में डूबा था, कि उसने कौन सा गुनाह कर दिया कि पुलिस थाने में पेशी हो रही है। थाने का नाम कर तो अच्छो अच्छो के पसीने छूट जाते है तो सुनील ठहरा एक आम आदमी, जो सुबह ऑफिस निकल जाता है, शाम को घर आकर अपने बीवी बच्चों के साथ तक ही जीवन सीमित है। अड़ोस पड़ोस में क्या हो रहा है, कोई सरोकार नहीं, उसके थाने के नाम पर होश ही गुम हो चुके थे। थाना घर के पास ही था, पुलिस जीप में मुश्किल से दो मिनट लगे होंगे, लेकिन ऐसा लग रहा था कि दो साल से पुलिस जीप में बैठा है और थाना है कि आने का नाम ही नहीं ले रहा है। थाने पहुँच कर चुपचाप एक मुजरिम की तरह हाथों को बाँधकर सिपाही के पीछे पीछे चलने लगा। थानाध्यक्ष के सामने डाक्टर सुभाष को देखकर सुनील एकदम आश्चर्यचकित हो गया। वह कुछ सोच सकता, उससे पहले थानाध्यक्ष के चेहरे के हावभाव शर्मिला का हुलिया देखकर आश्चर्यचकित हो गए मानो आँखों ही आँखों में कह रहा हो थाने आने के लिये सजधज कर बैठी थी क्या?
"
आप कौन।"
"
मेरी पत्नी।सुनील ने कहा।
बैठिए।थानाध्यक्ष ने कुर्सियों की तरफ इशारा करके कहा।
कुर्सी पर बैठ कर शर्मिला ने आँखें थोड़ी ऊपर की और सामने डाक्टर सुभाष को देख कर दंग रह गई। दोनो हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। नमस्ते भाई साहब।

डाक्टर सुभाष ने प्रणाम का कोई जवाब नहीं दिया। वह टस से मस नहीं हुआ। उसने शर्मिला के अभिनंदन को अनदेखा कर दिया। थानाध्यक्ष की अनुभवी आँखे बहुत कुछ बातों की गहराई में पहुँच कर जाँच पड़ताल कर चुकी थी।
"
क्या आप डाक्टर साहब को जानते हैं।"
थानाध्यक्ष के इस प्रश्न पर सुनील ने कहाजी हां, डाक्टर साहब मेरे बडे भाई हैं। हम एक ही घर में रहते हैं।

इतना सुन कर थानाध्यक्ष ने डाक्टर सुभाष से कहाडाक्टर साहब अब आप जाईए। आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। आप चिन्ता न करें।यह सुन कर डाक्टर सुभाष ने प्रस्थान किया। डाक्टर सुभाष के जाने के बाद थानाध्यक्ष ने सुनील और शर्मिला की तरफ देख कर कहा। अपने को स्वस्थ किजिए। आप नर्वस लग रहे हैं। थोडा पानी पीजिए। फिर बात करते हैं।
पानी पीकर सुनील ने पूछामेरा कसूर क्या है, जो आप ने मुझे यहां बुलाया।
"घबराओ मत, पहले मुझे यह समझने दो, कि आपका और डाक्टर सुभाष का रिश्ता क्या है, क्या आपका कोई झगड़ा हुआ है?"
सुनील ने थानाध्यक्ष को समझाना शुरू कियामैं और डाक्टर सुभाष ताऊ, चाचा के लड़के हैं। हमारी उम्र में दो साल का फर्क है। डाक्टर सुभाष मेरे से दो साल बड़े है। हमारा दो मंजिल का मकान है। नीचे के तल में ताऊ जी और ऊपर की मंजिल में हम रहते हैं। डाक्टर साहब अपना क्लिनिक चलाते है। पहले तो रहते भी यही थे, लेकिन अब अलग मकान बना लिया है, सुबह शाम को क्लिनिक आते हैं। हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सुभाष के डाक्टर बनने के बाद हम सब डाक्टर सुभाष ही कहते हैं। बिना डाक्टर लगाए सुभाष नहीं बोलते हैं। डाक्टर साहब की प्रैक्टिस अच्छी चलती है और दो जाने माने हास्पीटल में विजिट भी करते हैं। अच्छा पैसा और नाम बनाया है। मैं तो नौकरी करता हूँ। थोड़ा पढ़ने में मन नहीं लगता था, ज्यादा पढ़ नहीं सका। डाक्टर साहब का नाम अब शहर के नामी डाक्टरों में होता है, थोड़ा मिलना जुलना कम हो गया है। आर्थिक और सामाजिक स्तर में अंतर आ गया है।कह कर सुनील चुप हो गया।
"
कोई आपका खटारा स्कूटर भी है?"
"
स्कूटर पुराना जरूर है, लेकिन खटारा नहीं है। एकदम बढ़िया चलता है।"
"
कहाँ खड़ा करते हो स्कूटर को?"
"
नीचे मकान की दीवार के साथ खड़ा करता हूँ।"
"
जहाँ आप स्कूटर खड़ा करते हो, वहाँ से हटा कर पीछे सर्विस लेन में खड़ा कर लिया करो।"
"
लेकिन क्यों?"
"
डाक्टर साहब की शिकायत है कि आपका स्कूटर उनके क्लिनिक के गेट पर खड़ा रहता है, जिससे मरीजों का रास्ता रूकता है।"
"
सरासर झूठ है, मेंने आज तक क्लिनिक का रास्ता नहीं रोका। गेट छोड़ कर दीवार के साथ सटा कर स्कूटर रखता हूँ। आप खुद चल कर देख सकते है। मेरा स्कूटर कहाँ खड़ा होता है। अभी ऑफिस जाने के लिए निकाला भी नहीं है। अगर मेरे स्कूटर से क्लिनिक का रास्ता जरा सा भी रूके, आप जो सजा कहे, मैं कबूल करूँगा। और यह कह कर सुनील उत्तेजित हो कर एक जोरदार मुक्का मार कर कुर्सी छोड कर उठ गया।
इतनी उत्तेजना सेहत के लिए अच्छी नहीं है। शान्त होकर कुर्सी पर बैठो।थानाध्यक्ष ने इशारा करके सुनील को बैठने को कहा। सुनील बैठ गया। उसकी आंखे नम हो गई। ऐसा लगने लगा कि शायद वह रो पड़ेगा।
"
स्कूटर को थोड़ा पीछे खड़ा करने से आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा और समस्या हल हो जाएगी।"
"
समस्या मैं समझ गया, बात स्कूटर की नहीं, बल्कि अहंकार की है। डाक्टर साहब का स्तर अब मुझ से कहीं अधिक हो गया है। उनका उठना बैठना बड़े लोगों में है। शहर के नामी गरामी लोग उनके मरीज है। नेता, अभिनेता भी डाक्टर साहब से इलाज करवाने आते हैं। एक से एक बड़ी गाड़ी, उनके सामने भाई का पुराना स्कूटर कोई माएने नहीं रखता। वो भूल गये हैं कि इसी स्कूटर पर शादी से पहले भाभी जी से मिलने जाते थे। पिछली सीट पर भाभीजी बैठती थी। इंडियागेट और पुराना किला भी डाक्टर साहब की प्रेम कहानी के गवाह है और आज वोही प्रेम का प्रतीक स्कूटर आँखों में खटक रहा है। कहते कहते सुनील भावुक हो गया।
"ठीक है सुनील जी, में आपके साथ थाने से एक आदमी भेजता हूँ, वो स्कूटर की जगह देख कर मामला शांति पूर्वक सुलझा देगा।

शर्मिला और सुनील पुलिस की जीप में घर वापिस आ गए। स्कूटर घर की दीवार के साथ सटा हुआ खड़ा था, क्लिनिक के गेट से थोडा सा हट कर। स्कूटर की पार्किंग की जगह देखकर सिपाही ने सुनील से कुछ नहीं कहा। वह डाक्टर सुभाष से क्या बातें कर रहा था, सुनील ने नहीं सुनी। वह चुपचाप सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर चला गया। ऑफिस फोन कर के छुट्टी माँगी और बिस्तर पर लेट गया। शरीर शिथिल हो गया था, मन शून्य। छत पर हिलते हुए पंखे को एक टक देखते हुए सुनील अतीत में पहुँच गया।

डाक्टर सुभाष उससे दो साल बड़े और दो क्लास आगे थे। एक ही स्कूल में पढ़ते थे। एक साथ स्कूल आना, जाना। एक ही टिफिन में मध्यानंतर के समय खाना खाना। एक साथ खेलना। सबसे पसंदीदा खेल कंचों का था। संयुक्त परिवार में छोटे बच्चे बड़े बच्चों से सब कुछ सीखते हैं। सुनील ने भी कंचे खेलना सुभाष से सीखा। मकान की छत पर एक लकड़ी के बक्से में कंचे रखे होते थे। स्कूल से आने के बाद माँ और ताई की नजर बचा कर सुनील और सुभाष छत पर चढ़ कर कंचे खेलते थे। मौसम कोई भी हो, कंचों के खेल का नियम नहीं टूटता था। साथ ही नहीं टूटता था, माँ और ताई से पिटाई का सिलसिला। कस कर बेलन से पिटाई होती थी। वे बेलन अब नहीं हैं पर यादगार के लिए कुछ कंचे आज भी सुनील ने सँभाल कर रखे हुए है।

दूसरी ओर शर्मिला का चित भी अशान्त था। सुनील को सांत्वना देने के लिये उसने पूछा सुबह से कुछ खाया नही है। क्या सोच रहे हो।
"बस पुराने दिन याद आ गए। वो भी क्या दिन थे। तेरा मेरा कुछ भी नहीं था। बस हम दोनों भाई थे। सुख दुख में सदा साथ। और आज सुभाष एक सफल मशहूर डाक्टर बन गया तो मेरा स्कूटर उसकी प्रतिष्ठा को कम कर रहा है।"
"
छोड़ो भी इन बेकार की बातों को। क्यों मन अशान्त करते हो। कुछ भी हासिल नहीं होगा। क्या फायदा।
"
बात इतनी बढ़ जाएगी, सोचा नहीं था। तुमसे बताना भूल गया। पिछले महीने जब तुम मायके गई थीं, तब एक दिन ऑफिस जाने के समय मैं स्कूटर स्टार्ट कर रहा था। डाक्टर साहब कार से उतरे और कहने लगे, सुनील तेरा खटारा स्कूटर यहाँ नहीं खड़ा होगा, पिछली लेन में खड़ा कर। मैं अचानक डाक्टर सुभाष के मुख से यह बात सुन कर अवाक रह गया था। उस दिन बात काफी गरम हो गई थी। तू तू मैं मैं भी हो गई थी। मैंने कभी क्लिनिक का रास्ता नहीं रोका। दीवार के साथ सटा कर पिछले तेरह साल से खड़ा कर रहा हूँ। उस दिन तेरह सेकेन्ड में फरमान सुना दिया कि गेट पर खटारा स्कूटर खड़ा करने से उनके नाम पर बट्टा लगता है। उनका स्टेटस खराब होता है। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि डाक्टर सुभाष इस बात पर थाने चले जाएगें। बड़े आदमियों के साथ उठना बैठना है, पुलिस में भी दोस्ती है। इसलिए थानेदार ने इस बात पर थाने में हाजिरी लगवा ली।"
"
क्यों दिल छोटा करते हो। आखिर पुलिस भी मामला समझ गई, आपको तो कुछ नहीं कहा न। शर्मिला ने सुनील का हाथ आपने हाथों में लेकर प्यार से हाथों को सहलाते हुए कहा।

"
तुम्हे याद है शर्मिला हमारी शादी पहले हुई थी, क्योंकि डाक्टर साहब की प्रेक्टिस शुरू में ढीली चल रही थी, उनकी बाद में हुई थी। भाभीजी से मिलने जाते थे, हमारा यही स्कूटर लेकर। हम अपना प्रोग्राम बदल लेते थे, ऑटो में या बस में सफर करते थे, लेकिन डाक्टर सुभाष को कभी स्कूटर के लिए मना नहीं किया। आज वह अपनी प्रेम की निशानी को रूपयों के पलड़े में तोल रहे हैं। क्या आदमी इतना बदल जाता है, रूपये और शोहरत पाने के बाद।कहते कहते सुनील भावुक हा गया।

शर्मिला को पहली बार अहसास हुआ कि छोटी छोटी बातों को लेकर सुनील कितना भावुक हो उठता है। वह अपने बचपन और संवेदनाओं से कितना गहरा जुड़ा है। उसके लिये माया की दौड़ नहीं मन का ठहराव अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह भाई साहब के व्यवहार को देखकर कितना आहत हो गया है। उसने भी एक दो बार प्यार से ही सही स्कूटर बदलकर मोबाइक लेने का अनुरोध किया है सुनील से। क्या उस बात का भी सुनील को बुरा लगा होगा? सुनील ने भले ही कार्यक्षेत्र में धीमी प्रगति की है लेकिन वह एक अच्छा इनसान है, अच्छा पति है, अच्छा पिता है। उसने परिवार के साथ सुंदर पल बिताए हैं और सबको खुश करने के प्रयत्न किये हैं।

कुछ सोचकर वह स्टोर में गई और उस बक्से को निकाल लाई जिसमें सुनील के बचपन की यादें थीं। बक्से में कुछ कंचे सँभाल कर अभी भी रखे हुए थे। एक बार सुनील ने कहा था कि वह अपने बेटे को कंचे खेलना सिखाएगा। लेकिन वह बात हवा होकर रह गई। बेटे को कंचे खेलना नहीं सिखाया उसने। शर्मिला ने उत्तर में कहा था कि कंचे बीते हुए समय की चीज़ हो चुके हैं। यह जमाना कंचे का नहीं क्रिकेट का है। बच्चों को क्रिकेट सिखाओ। पुराने जमाने के खेल कोई नहीं खेलता।

लेकिन आज की घटना ने शर्मिला को सुनील के अतर्मन को समझने का अवसर दिया था। उसे लगा कि रिश्ते केवल इनसानों के बीच नहीं होते। कुछ वस्तुओं से भी इनसान रिश्ते बनाता है। शायद वस्तुओं के साथ बनाए गए रिश्ते, इनसानी रिश्तों से अधिक गहरे होते  हैं। शायद इसलिए वस्तुएं हमें आहत नहीं करतीं। उसे लग रहा था कि भावनात्मक लगाव वाली ऐसी चीज़ों की निंदा करना या उन्हें छोड़ने को मजबूर करना अमानवीयता है। सुनील का कंचों के साथ घना रिश्ता है। ठीक है कि कंचों का खेल पुराना है गया। पर हर पुरानी चीज बुरी नही होती।  और दिखावे की दौड? वह कौन सी चीज है, जिसके लिए लोग अपना सुख चैन बरबाद करते हैं और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता खो बैठते हैं। हर दर्द पर सुनील कंचों की याद का मरहम लगाता है।

इनसान की उम्र कितनी भी हो जाय बचपन समाप्त नहीं होता। वह बड़प्पन का हिस्सा बनकर जीवित रहता है। उस बचपन को हमेशा कहीं जीवित रखना जरूरी है। केवल अपने लिये नही उसे मानवीयता के नाते भी सींचते रहना जरूरी है। शर्मिला ने सुनील को सामान्य करने के लिए कंचों का बक्सा निकाला।
सुनील थोड़ा स्वस्थ हो कर कुर्सी पर बैठ कर सड़क की आवाजाही देख रहा था।

"
शर्मिला, देखो अंकुश की स्कूल बस आ  गई।कह कर एक छोटे बच्चे की तरह कूदता फाँदता सुनील सीढ़ियाँ उतर कर अपने बेटे अंकुश को लेने स्टाप तक गया। बाप बेटे को बतियाते देख कर शर्मिला की चिंता दूर हुई। माँ के हाथों में बक्सा देख कर अंकुश ने पूछा-
"
इसमें क्या है।"
"
बक्सा खोलकर खुद देखो।"
"
अरे यह तो कंचों का बक्सा है। दो कंचें हाथ में लेकर अंकुश बोला।
"
आज पापा तुम्हें कंचे खेलना सिखाएँगें।शर्मिला ने प्यार भरी मुसकान के साथ कहा। फिर सुनील की तरफ देख कर कहा अंकुश को खाना खिला दो। मैं भी तब तक पूजा की तैयारी कर लूं। आज सारे दिन व्रत तो हुआ ही है, साथ में थाने की भाग दौड में रात का खाना भी नही बना है।

सुनील ने शर्मिला की ओर सुखद आश्चर्य से देखा और बरसों के बाद इस पुराने खेल के लिए प्रेम और घर में उसकी स्वीकृति। यह कैसा अचानक से परिवर्तन, वह भी मुसकुराहट के साथ। यह थाने की सैर का फल है या फिर करवाचौथ का व्रत का परिणाम?

सुनील की इस आश्चर्य दृष्टि को देखने के लिये शर्मिला रुकी नहीं थी, वह अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी। सुनील ने भी अंकुश का हाथ पकड़ा और मुसकुराते हुए खाने की मेज पर आ बैठा। रसोई से हलवे की मीठी मीठी सुगंध आने लगी थी।

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...