Wednesday, May 12, 2010

खडूस


"धन्यवाद कर्लन राज, आपके साथ बिताए दो दिन मैं कभी भूल नही सकता। आप सिर्फ एक अच्छे जनरल मैनेजर ही नही, बहुत अच्छे इंसान हैं। अच्छे साथ और मेहमान नवाजी के लिए धन्यवाद।" कार से उतर कर राजेश ने कहा।
"राजेश जी यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे अच्छे और नेक इंसान के साथ कुछ समय व्यतीत करने का मौका मिला।" कर्नल राज ने राजेश के साथ हाथ मिलाते हुए कहा। "वैसे आपकी फ्लाइट कितने बजे की है?"
"आठ बजे की फ्लाइट है। आफिस का काम निबट गया है  एक डेढ़ घंटा थोडा बाजार घूम लेता हूं।"
"गुड आइडिया, आप टीनगर में घूमिए, हर बजट का सामान मिल जाता है। छोटी दुकान से लेकर बडे शोरूम सब टीनगर में मिल जाएंगे।"

टीनगर चैन्नई का सबसे मशहूर बाजार है। राजेश के पास एक छोटा सा हैंडबैग था जिसे हाथ में पकड कर वह टीनगर घूमने लगा। दीवाली से पहले घनतेरस का दिन था। बाजार की रौनक और भीडभाड देखकर ऐसा लग रहा था, कि जैसे पूरा चैन्नई टीनगर में एकत्रित हो गया है। पत्नी के लिए साउथ सिल्क की साडी खरीदी, तभी पत्नी का फोन आया कि सेलम का स्टील मशहूर है और आज घनतेरस का भी दिन है, कुछ जरूर खरीदना।
"तुम दिल्ली से खरीद लो, मैं छोटे से बैग में क्या-क्या उठाऊंगा।"
"छोटी सी टी-कैटल ही ले लो। मार्निंग टी के काम आएगी।"
पत्नी की बात मान कर घनतेरस की शापिंग में छोटी टी-कैटल खरीदी और फिर राजेश ने एयरपोर्ट के लिए टैक्सी की। एयरपोर्ट पहुंच कर राजेश ने टैक्सी का भाडा चुकाया। उसके पास लग्गेज के नाम पर एक हैंड बैग था। सिर्फ दो दिनों के लिए ऑफिस टूर पर चैन्नई आया था। दो जोडी कपडे और तीन चार फाईलें एक हैंड बैग में समा गई थी। लग्गेज ट्राली की कोई जरूरत नही थी। धीरे धीरे कदमों के साथ उसने एयरपोर्ट में प्रवेश किया। बोर्डिंग पास लेते समय पता चला कि फ्लाईट एक घंटा लेट है। रात आठ बजे की फ्लाईट अब नो बजे। दो घंटे पच्चीस मिन्ट की फ्लाईट  फिर एयरपोर्ट से बाहर निकल कर टैक्सी पकड कर घर पहुंचना। रात के एक बजना तो तय है ही। जब फ्लाईट लेट है तो क्या कर सकते है। भूख मिटाने के लिए राजेश के हैंड बैग में बिस्कुट, नमकीन के पैकेट थे। राजेश की आदत बन गई थी
 जब भी घर से निकल कर यात्रा करनी हो, खाने का कुछ सामान और पानी की बोतल साथ जरूर होनी चाहिए। मन पसन्द का खाना परदेस में कभी नही भी मिलता या फिर काम की व्यस्तता किसी मन पसन्द होटल, रेस्टोरेंट से दूरी कर देती है। ऐसे मौके पर बैग में पेट पूजा का सामान बहुत अहम भूमिका अदा करता है। एयरपोर्ट की कैफेटेरिया में तो पिजा बर्गर जैसी खाने की चीजे मिलती हैं जो राजेश पसन्द नही करता। पचास की उम्र में खाने पीने की आदतें बदलना मुश्किल है। आज की युवा पीढी तो पीजा, बर्गर, पास्ता पर मरती है। एक नजर कैफेटेरिया में मिलने वाली वस्तुओं पर डाल कर एक कोक का टिन खरीदा। घीरे घीरे केक, नमकीन के साथ कोक का आनन्द लेता रहा।
इतने में कर्नल राज का फोन फ्लाइट की स्टेटस पूछने के लिए आया।
"कर्नल राज डोंट वरी, आई एम फाईन, एक घंटा फ्लाइट लेट है। एयरपोर्ट में कोई तकलीफ नही। वेटिंग लॉंज एक दम आधुनिक और आराम दायक है।" राजेश ने कर्नल राज को कहा।
साढे आठ बजे यात्री प्लेन में बैठने लगे। प्लेन में राजेश की सीट खिडकी के साथ वाली थी। सफर में समय व्यतीत करने के लिए राजेश हमेशा अपने साथ उपन्यास रखता था। उसने हैंडबैग से एक उपन्यास निकाला। तभी दो युवा लडकियां उससे संबोधित हुई। "अंकल क्या आप हमारी कार्नर वाली सीट खिडकी वाली सीट से चेंज कर सकते है।"
"ठीक है।" कह कर राजेश सीट से उठा और कार्नर वाली सीट पर बैठ गया।
थैंक्स कह कर दोनों लडकियां सीट पर बैठ गई। एक लडकी ने अपना लैपटाप आन किया, फिर धीरे से दूसरी से बोली। "साले खडूस के साथ पूरा रास्ता काटना पडेगा।"
बोला तो बहुत धीरे से था, लेकिन राजेश के कानों में बात प्रविष्ठ कर गई।
साला खडूस शब्द पढी लिखी युवतियों के मुख से सुन कर अटपटा लगा। कोध्र भी आया, लेकिन उसने अपनी भावनाऔ को दबा कर उपन्यास खोला, लेकिन पढने में मन नही लगा। ठीक पचास की उम्र है उसकी। कोई अभ्रद व्यवहार नही किया उसने युवतियों के साथ। उलटे खिडकी वाली सीट देकर एक सभ्य पुरूष का दायित्व भी निभाया, फिर भी खडूस कह दिया। उनको किसी युवा पुरूष के साथ की चाह थी, युवा वर्ग की अपनी बातें होती है जो वह इन युवतियों के साथ नही कर सकता था। लेकिन चाह कर भी उनकी यह इच्छा पूरी नही हो सकती थी क्योंकि प्लेन में कोई सीट खाली नही थी। प्लेन फुल था। राजेश सोचने लगा, क्या वह खडूस है? क्या उसकी शक्ल खडूसों जैसी है? बिल्कुल नही। वह सोचने लगा कि उन युवतियों ने उसे खडूस क्यों बोला। उनके कहने पर बिना किसी चूंचपड के सीट बदल ली। वह मूडी भी नही है। शक्ल से सडा हुआ भी नही लगता है। अपने में खोया हुआ भी नही लगता है। सब से हंस बोल कर बात कर लेता है। बिना बात के बतंगड बनाना या फिर झगडा करना भी उसकी आदत नही है और न ही शक्ल से वह ऐसा लगता है। सनकी और झक्की भी नही है, तो कैसे एक दो सेकंड में वह उन युवतियों को खडूस नजर आ आया। खडूस का वह जो भी मतलब सोच सकता था, उस परिभाषा में राजेश कदापि नही आता था।
प्लेन अभी उडा नही था, इसलिए यात्री मोबाइल पर बातें कर रहे थे फिर प्लेन उडने के बाद लगभग ढाई घंटे मोबाइल का संपर्क टूट जाएगा। तभी खिडकी के पास बैठी लडकी का मोबाइल बजा।
"पापा का फोन है।" उसने दूसरी लडकी को संबोधित
करके कहा और फोन अटैन्ड किया। "हाय पापा।"
दूसरी तरफ पापा ने क्या कहा, राजेश को नही मालूम, लेकिन लडकी का जवाब सुन कर राजेश दंग रह गया। "पापा अभी तो मैं ऑफिस में हूं। दिवाली पार्टी चल रही है। बारह बजे तक फ्री हो जाऊंगी। साढे बारह एक बजे तक घर पहुंच जाऊंगी।"
राजेश यह बात उस युवती के मुख से सुन कर आश्चर्यचकित हो गया। वह तो प्लेन में बैठी है और पिता से कह रही है कि ऑफिस में दिवाली पार्टी हो रही है। सरासर झूठ। वैसे तो वह उन युवतियों को नही जानता था लेकिन सरासर सफेद झूठ सुन कर उसकी उत्सुकता हुई कि आखिर माजरा क्या है। उसने अपने कानों को युवतियों की बातचीत में लगाया। उसके हाथ में उपन्यास था, नजरे उपन्यास पर और कान युवतियों की बातचीत पर।
"युक्ता तूने तो अपने बाप को बेवकूफ बना दिया। ऑफिस की बात मान गया?"
"मुक्ता खुद ऐश कर रहा होगा। मुझ पर निगाह रख रहा है। जैसे मैं जानती नही हूं।"
"क्या सचमुच में तेरी बात मान गये?"
"अपनी तो खबर रख नही सकते, मेरी क्या रखेंगे। पक्का इंतजाम करके निकली हूं।
"मान गई, पूरी उस्ताद हो गई है तू।"
"अच्छा मुक्ता, मेरे बाप ने तो फोन कर के औपचारिकता  पूरी कर ली, तेरे बाप का क्या हाल है?"
"मैं क्या जानू युक्ता। लेकिन तेरे बाप में और मेरे बाप में कोई अंतर नही है।"
"एक अंतर है, मुक्ता।"
"क्या युक्ता?"
"मेरे बाप का फोन आ गया, तेरे बाप का तो आया ही नही। कोई सुध भी नही ली। कहां ऐश कर रही है उसकी लौंडिया।"
कह कर दोनों युवतियां खिलखिला कर हंस दी।
"लौंडिया को तो छोड, वो खुद कहां ऐश कर रहा होगा, मेरी मां को भी नही मालूम होगा। करने दे ऐश। हमारा काम होता रहे, मां बाप का करना क्या है? छोड तू कोई और बात कर।"
हांलकि दोनों बहुत धीमी आवाज में बाते कर रही थी फिर भी उन दोनों की फुसफुहाट राजेश के कानों से बच नही पाई। तेरा बाप, मेरा बाप, ऐश और लौंडिया जैसे शब्द सुन कर राजेश दंग रह गया। पिता के बारे में उनके ख्याल सुन कर राजेश को समझने में देर नही लगी कि दोनों युवतियां अमीर पिता की बिगड़ैल औलाद हैं। वे ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती है, जहां मां-बाप अपनी ही दुनिया में मस्त रहते है। बच्चों के साथ संवाद भूले भटके कभी-कभी होली-दिवाली पर ही होता है।
युवतियों की फुसफुहाट जारी थी। साथ ही राजेश की उत्सुकता भी बढती जा रही थी। आज पहली बार उसको ऐसी युवतियों का सानिग्ध  प्राप्त हुआ था।
"और बता युक्ता, दो दिन क्या किया बॉयफ्रेंड के साथ?"
"जो तूने किया वही मैंने किया फिर पूछ क्यों रही है?"
"मजा आता है।"
"दिल्ली चल कर बात करेंगें। साला खडूस सुन लेगा। मजा किरकिरा हो जाएगा।"
अब की बार खडूस के साथ साला शब्द सुन कर राजेश के तन बदन में आग लग गई। एक बार तो मन में ख्याल आया कि उठ कर दोनों युवतियों का गला घोंट दे। लेकिन शिष्टावश वह चुपचाप सीट पर बैठा रहा और मन मसोस कर रह गया। राजेश को अब तक समझ आ गया था कि दोनों युवतियां सिर्फ मौज मस्ती के लिए चैन्नई गई थी। इस बात की पुष्ठि उनके आगे के वार्तालाप से हो गई।
एक युवती ने लैपटाप आन कर रखा था।
"मुक्ता थ्री इडियट्स लगा।"
अब तक राजेश समझ गया था कि उन युवतियों में से एक का नाम मुक्ता और दूसरी का मान युक्ता था। मुक्ता के अनुरोध पर युक्ता ने लैपटाप पर थ्री इडियट्स लगाई और दोनों फिल्म देखते-देखते खुसरफुसर भी करती रही। दोनों में यह बात जानने की उत्सुक्ता थी कि दूसरी ने अपने दो दिन कैसे बिताए।
"मुक्ता चैन्नई वाले से कहां तक बात पहुंची?"
"आखिर बार मिली हूं। दिल्ली तक तो ठीक था। दो दिन रह ली उसके साथ। ट्रान्सफर परमानेंट हो गया है। कम से कम तीन साल तक तो चैन्नई रहेगा। फाइनल गुडबाय बोल दिया है। तीन साल बाद क्या होगा, किसको पता? तब तक दिल्ली वाले से टाइमपास करते है। तेरा किस पर दिल है मेरे तो दो थे। तेरे पास तो तीन है।"
"अब तो दो ही रह गए है। तेरे वाले की तरह अभी चैन्नई है, कह रहा था कि मु्म्बई सैटल होगा। मेरी बला से जहां भी सैटल हो। चलो साले से पीछा छूटा।"
"दो रह गए है, फिर भी एक के साथ रहेगी या दोनों के साथ मस्ती मारने का इरादा है?"
"अभी सोचा नही। देखी जाएगी।"
राजेश ने उपन्यास को बंद करके हैंडबैग में रखा और आंखें मूंद कर सोचने लगा। किताबी उपन्यास तो एक दम बेकार है इन दोनों युवतियों के जिन्दगी के आगे। शायद ही कोई लेखक, कवि उन युवतियों की भांति सोच सकता है? पच्चीस साल पहले मां बाप की पसन्द की लडकी से शादी रचाई और पिछले ही महीने शादी की सिल्वर जुबली मनाई थी। राजेश और उसकी पत्नी एक दूसरे के लिए बने थे। एक दूसरे पर समर्पित थे कोई अतिश्योक्ति नही कि जिस खूटे बंधे, वही बंधे रह गए। कहीं और मुंह नही मारा। अब शादी के पच्चीस साल बाद पचास का माडल हो गया है। पुराना जरूर हो गया है, उसके ख्याल बहुत अधिक खुले नही है लेकिन आधुनिकता का विरोधी भी नही है। वह समन्वय चाहता और रखता है पुराने और नये विचारों में, इसलिए खडूस तो वह बिल्कुल नही हो सकता है। आज की दो आधुनिक युवतियां किसी खूटे की मोहताज नही। बंध कर रहना उनकी फितरत नही। आजाद पंछी को पूरा आकाश चाहिए। आकाश तो सबको चाहिए उडान भरने के लिए, लेकिन इतना भी ऊंचा मत उडिए, कि धडाम से नीचे गिरे तो संभालने वाला भी कोई नही हो। राजेश सोचता जा रहा था क्या ये दोनों आज की आधुनिक सभी युवतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं? कदापि नही। यह ठीक है कि आज का युवा पहले से कहीं अधिक आजाद है फिर भी तमाम उम्र एक खूटे से बंधना हर कोई पसन्द करता है। अपवाद हर जगह होते है। ये युवतियां भी शायद अपवाद हो तो अच्छा। उसकी सोच एयर होस्टेस की वाणी से टूटी कि विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर रहा है।
दोनों युवतियां चहकती हुई विमान से उतरी। एयरपोर्ट पर दो युवक उनका इंतजार कर रहे थे। हाय कह कर गले मिली और झट से दोनों उन युवकों के साथ कार में बैठ कर छूमंतर हो गई। राजेश ने टैक्सी पकडी और घर पहुंचा। पत्नी ने सबसे पहले पूछा कि घनतेरस की खरीददारी की या नही। बैग से टी-कैटल और साडी निकाल कर पत्नी को दी।
साडी देख कर पत्नी चहक उठी, "ऑफिस के काम से गए थे इतनी मंहगी साडी लाने की क्या जरूरत थी। मैं तो वैसे ही सलवारसूट ही ज्यादा पहनती हूं।"
"जब साउथ गया हूं तो वहां की स्पेशलिटी यादगार के तौर पर तो खरीदनी जरूरी है न।"
"सुबह छुट्टी करनी है या ऑफिस  जाना है?"
"छुट्टी के नाम पर तो ऑफिस वाले सदा के लिए छुट्टी कर देंगें। ऑफिस जाकर चैन्नई टूर की रिपोर्ट जरुरी देनी है।"
"तो सो जाऔ।"
राजेश ने पत्नी को गुडनाईट कहा। बिस्तर पर लेटकर आंखें बंद करके सोना चाह रहा था लेकिन नींद शायद फ्लाइट में ही रह गई थी। बार बार उन दोनों युवतियों का चेहरा आंखों के सामने आ रहा था और उन के कहे शब्द खडूस। चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट आ गई। वह खडूस तो नही है, लेकिन यह भी ठीक है, कि वह किसी की सोच बदल नही सकता है। एक पल में किसी के बारे में कोई धारणा नही बना सकते हैं। फिर भी क्यों कमेंट कसते हैं? क्या सारे पुराने आदमी खडूस होते हैं? क्या चाकलेट टाइप फिल्मी हीरो मार्का लडके स्मार्ट होते हैं? कदापि नही। फिल्मी हीरो टाइप भी खडूस हो सकते हैं और राजेश जैसे पुराने आदमी भी उदारवादी। सोच और धारणा का कोई अंत नही। पलभर में खडूस की पदवी दे दी। अंत उसने करवट ली और पत्नी की तरफ देखा। वह नींद में थी। मन ही मन कहा, मेरा सदा बहार खूंटा और खूंटे से बंधा नई पदवी से नवाजा हुआ खडूस।



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कब आ रहे हो

" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...