Saturday, July 17, 2010

महक

सोचता हूँ कि जिंदगी गुलाब की खुश्बू हो
लेकिन भूल जाता हूँ कि काँटे की चुभन भी होगी
चुभन तो ठीक है
लेकिन दर्द बर्दास्त से अधिक ना हो
दर्द है उम्र के साथ अधिक होता जाता है
लेकिन बर्दास्त करने के लिए सब्र भी आता जाता है
सब्र तो ठीक है
लेकिन सब्र का बाँध बरसात में तो टूटता जाता है
दर्द चाहे बढ़ता रहे
लेकिन खुश्बू गुलाब की महकती रहे
महक दर्द को सहने की शक्ति देती है
सब्र जीने की राह देती है

Saturday, July 10, 2010

सेवा

पुत्र जवान हो गया है. शिक्षा समाप्ति के पश्चात एक मल्टिनॅशनल कंपनी मैं उच्च पद पर नियुक्त हुआ, तब माता पिता की खुशियों का कोई ठिकाना नही रहा. समझो समस्त जग पर विजय प्राप्त हो गई. बड़े लाड़ प्यार के साथ परवरिश हुई. स्कूल जाने के समय टिफिन हाथ मैं पकराना, स्कूल बैग तैयार करना, फिर होम वर्क करवाना. कॉलेज के समय भी यही रुटीन रहा. अब नौकरी के समय सुबह सात बजे कंपनी के लिए रवाना होना पड़ता है. माताजी सुबह का नाश्ता, लंच के लिए टिफिन, देर रात तक खाने का इंतेज़ार. पुत्र को ऐसे माहौल मैं कोई काम करने के आदत नही पड़ी. बस हुकुम किया और सब काम हो गये. हर माता पिता की तरह उनका ध्येह पुत्र की खुशी थी. जिसका हर संभव ध्यान रखा. पुत्र की हर बात मानी.


पुत्र का विवाह सम्पन हुआ. पुत्रवधू ने ग्रहप्रवेश किया. पुत्रवधू भी एक नामीगरामी कंपनी में एक अच्छी पोस्ट पर नौकरी करती थी. जिस परिवेश में पुत्र का लालन पालन हुआ, ठीक उसी परिवेश में पुत्रवधू का लालन पालन हुआ. आज पुत्र और पुत्री में कोई अंतर नही है. दोनो को समान शिक्षा दी जाती है. पुत्रियाँ घर ग्रह कार्यों में कम रूचि लेती है, समय तो शिक्षा मैं बीत जाता है और फिर नौकरी में. घर के कार्यों के लिए समय नही होता.

क्योंकी दोनो उँची पोस्ट पर नियुक्त थे. ऑफिस की जिम्वेवारी सुबह जल्दी जाना और देर रात घर आना दोनो का रुटीन बन गया. माताजी ने सोचा था, पुत्र विवाह के बाद बेफ़िक्र हो जाएँगी. पुत्रवधू यदि घर नही तो पुत्र के कार्य तो संभाल लेगी. परन्तु नौकरी के जंजाल ने पुत्र और पुत्रवधू को जकड रखा था. उनके हर कार्य माताजी को करने पड़ रहे थे.

पिताजी का तो वोही रुटीन रहा. माताजी सोचने लगी, काश वो भी २५ साल बाद पैदा हुई होती, तो आज की पीडी की तरह बिंदास होती. सब पर हुकुम चलाती, पर वो जिस पीडी की है, उसकी समस्या यह है, पहले अपने घर, फिर सास की, बच्चो की सेवा में लिप्त रही.

पिताजी सब देख कर बोले, हर व्यक्ति राजा नही बन सकता. किसी को प्रजा बन कर राजा की सेवा करनी पड़ती है. पहले अपने मातपिता की सेवा की, क्योंकि वे राजा थे, हमें सेवा करने की आदत पड़ गई है. बच्चों को हमने लाड़ प्यार से राजा की तरह रखा, तो किस बात की फ़िक्र कर रहे हैं हम दोनो. किससे और क्यों गिला करे. सब अपने थे और हैं, कुछ ने सेवा करवानी है और कुछ ने सेवा करनी है. हम दोनो सेवा करने वालों की श्रेणी में आते है. बिना किसी गिला शिकवा के अपने कर्तव्य का पालन करे, यही विधान है.

Friday, July 09, 2010

स्वयं

मैं स्वयं नही हूँ.
मैं पति हूँ, पत्नी हूँ.
मैं पिता हूँ, माता हूँ.
मैं पुत्र हूँ, पुत्री हूँ.
मैं भाई हूँ, बहन हूँ.
मैं जमाई हूँ, बहू हूँ.
मैं समाज के हर रिश्ते की
परिभाषा मैं हूँ,
पर स्वयं नही हूँ.

Monday, July 05, 2010

ख्वाब

मेरा एक ख्वाब है, तुम उसे पूरा करवा दो,
हंसना चाहता हूं, खुल कर हंसवा दो।
मेरा एक ख्वाब है, तुम उसे पूरा करवा दो,
एक छोटे से बच्चे की किलकारी जैसी हंसी हंसवा दो।
मेरा एक ख्वाब है, तुम उसे पूरा करवा दो,
रोते हुए छोटे बच्चों को हंसवा दो।
मेरा एक ख्वाब है, तुम उसे पूरा करवा दो,
उदास होठों पर हंसी करवा दो।
मेरा एक ख्वाब है, तुम उसे पूरा करवा दो,

दुश्मनी में क्या रखा है, हंस कर दोस्ती करवा दो।

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...