Sunday, January 30, 2011

निंदे

One who abuses a good person invites disaster upon himself.
He falls into trouble, faces difficulties and continually changes his state of mind.
He can never attain salvation.


जो कोई निंदे साधु को
संकट आवे सोय
नरक जाये जन्मे मरे
मुक्ति कबहुं ना होय

Wednesday, January 26, 2011

विषय

Being detached means renouncing sensual pleasures.
Knowledge means equanimity.
Devotion means creating happiness for all beings.


विषय त्याग बैराग्य है
समता कहिए ज्ञान
सुखदायी सब जीव को
यही भक्ति परमान

Sunday, January 23, 2011

वृक्ष

A tree tells a leaf to listen to the tradition of its family.
Which is “one comes while another goes.”


वृक्ष बोला पात से
सुन पत्ते मेरी बात
इस घर की यह रीत है
इक आवत इक जात

Saturday, January 22, 2011

कबीर वाणी

Kabir says that you are searching for God without proper thinking and knowledge.
He is there within you.
You are yet to discover him.


कबीरा ज्ञान विचार बिन
हरी ढूंढन को जाए
तन में त्रिलोकी बसे
अब तक परखा नाए

Sunday, January 16, 2011

हिन्दी समय

मेरी लिखी 7 कहानियों का संकलन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेबसाईट hindisamay.com के http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=303&pageno=1 पर उपलब्ध है

Misquote

In the corporate world


“We will do it” means “you will do it.”

“You have done a great job” means “more work to be given to you.”

“We are working on it” means “we have not yet started working on the same.”

“Tomorrow first thing in the morning” means “it is not getting done….at least not tomorrow.”

“After discussion we will decide. I am very open to views” means “I have already decided, I will tell you, what to do.”

“There was a slight miscommunication” means “we had actually lied.”

“Let’s call a meeting and discuss” means “I have no time now, will talk later.”

“We can always do it” means “we actually cannot do the same on time.”

“We are on the right track, but there needs to be slight extension of the deadline” means “the project is screwed up, we cannot deliver on time.”

“We had slight differences of opinion” means “we had actually fought.”

“Make a list of work that you do and let’s see how I can help you” means “anyway you have to find a way out, no help from me.”

“You should have told me earlier” means “well even if you told me earlier that would have made hardly any difference.”

“We need to find out the real reason” means “well I will tell you where your fault is.”

“Well family is important, your leave is always granted. Just ensure work is not affected” means “well you know…”

“We are a team” means “I am not the only one to be blamed.”

“That’s actually a good question” means “I do not know anything about it.”

“All the best” means “you are in trouble”

Friday, January 14, 2011

हवा पूरी है

कुछ दिनों से आनन्द को परेशान देख कर आनन्दी से आखिर रहा न गया और पति से उदासी का कारण पूछ ही लिया। लेकिन आनन्द बात को टाल गया। सिर्फ इतना कहकर कि कोई खास बात नहीं, बिजनस की आम परेशानी, टेंशन है। व्यापार में उतार चढ़ाव आते जाते रहते हैं। घबराने की जरूरत नहीं है। आनन्दी को दिलासा देकर आनन्द ऑफिस चला गया।

ऑफिस में आनन्द अपने केबिन में फाइलें देख रहा था और फोन की घंटी बार-बार बजकर खामोश हो गई। क्या करे फोन पर बात करके। लेनदारों को जवाब भी क्या दे कि कब तक और कितनी रकम चुका सकेगा आनन्द। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकाउन्टेंट सुरेश से हिसाब लिया, ऊपर से नीचे कर कागज के उन दो चार टुकड़ों को कई बार देख चुका था, जिन पर पिछले एक साल में हुए खर्चों का पूरा विस्तार से ब्यौरा था। आनन्द समझने की कोशिश में था कि आखिर किस कारण उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और फोन सुनने से भी कतराने लगा था।

एक वर्ष में दो विवाह किए। पहले अपनी बिटिया का और छः महीने पहले बेटे का। दोनों विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न किए। खर्चों के ब्यौरे में लगभग अस्सी प्रतिशत विवाह के खर्च थे। खर्च किया कोई गुनाह तो किया नहीं, आखिर कमाते किसलिए हैं। भारतीय संस्कृति है विवाह में खर्च करने की। जैसा दूसरे करते हैं, वही उसने किया है। विवाह समारोह के भव्य आयोजन से ही समाज में प्रतिष्ठा स्थापित होती है। सभी खुश थे विवाह से। चारों तरफ से प्रशंसा, तारीफें मिली थीं उसको। कोई कसर नहीं छोड़ी थी दोनों विवाहों में। सारे कार्यक्रम पंचतारा होटलों में किए थे। किसी भी बाराती, रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी को कोई शिकायत का मौका नहीं दिया। सभी को खुशी और तोहफों के साथ विदा किया था। बड़े-बूढ़ों का भरपूर आशीर्वाद और हमउम्र का प्यार था। आज भी कोई मिलता है तो सबसे पहले विवाह समारोहों की तारीफ के साथ ही वार्तालाप आरम्भ करता है। आखिर क्यों न करे, ऐसा विवाह हर रोज थोड़े ही देखने को मिलता है।

पिछले बीस साल से आनन्द व्यापार में है। जीवन के शुरू में पांच सात साल नौकरी की। एक बार जब व्यापार में कूदा, तो पीछे मुड़ कर नही देखा। हर साल तरक्की की। आज रहने को कोठी, फार्महाउस, व्यापार के लिए ऑफिस और तीन बड़े बड़े शोरूम, स्टॉक हेतु गोदाम। आनन्द के तीन बच्चे, दो लड़के और एक लडकी। तीन शो-रूम और तीन बच्चे। हर एक का शो-रूम। आनन्द को इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी कि बिक्री में कोई कमी है। शो-रूम धडल्ले से चल रहे थे। बिक्री पहले जैसी थी, मुनाफा भी पहले जैसा था, लेकिन बरकत खत्म हो गई थी। हकीकत तो यह थी कि मुनाफे के साथ पूंजी भी कम हो गई। जब दो शाही विवाह संपन्न हुए तब खुशी ही खुशी थी चारों तरफ, खर्चे को देखा नहीं, व्यापार से मुनाफे के साथ पूंजी भी खर्च कर दी और अब नौबत यहां तक आ गई कि कम पूंजी में व्यापार नहीं हो रहा है। या तो व्यापार को कम करे, जो आनन्द को गवारा नहीं था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अगर पेमेन्ट नहीं की तो नया स्टॉक आने में दिक्कत होगी। उधार भी एक सीमा तक मिलता है। उसके बाद कंपनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए। नया स्टॉक तो नई पेमेन्ट के बाद ही मिलेगा। यदि नया स्टॉक नहीं आया तो शो-रुम खाली हो जाएंगे। सारी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी। कुछ तो करना ही होगा।

एक विचार आनन्द के मस्तिष्क में बिजली की तेजी की तरह आया। "ओहो, पहले क्यों नहीं सोचा, मेरा दिमाग कहां चला गया था। बैंक में बात करता हूं। लोन तो मिल सकता है।"

आनन्द ने अपने व्यवसाय का नाम आनन्दी, अपनी पत्नी के नाम से रखा था। हर शो-रूम और गोदाम में बडे बडे अक्षरों से आनन्दी लिखा हुआ दूर से ही नजर आ जाता था। रात को तो रंग बिरंगी रोशनी की जगमगाहट एक अलग सी छटा बिखेरती थी। क्या आज आनन्दी की रोशनी फीकी हो जाएगी? प्रिय पत्नी आनन्दी जो जान से भी अधिक प्रिय, उसके नाम से स्थापित व्यवसाय को बिखरने नहीं देगा। यही सोच कर बैंक में कदम रखा।

बैंक मैनेजर से बातचीत सार्थक रही और दिल से बोझ हलका हुआ कि आनन्दी की जगमगाहट कायम रहेगी। मनुष्य की आदत कुछ ऐसी ही है, उन्नति ही देखना चाहता है, स्टेटस, प्रतिष्ठा, रूतबा, शान कम नहीं होनी चाहिए। कम से कम बरकरार तो अवश्य रहे।

चेहरे पर से शिकन उतरी। ऑफिस में आकर टेलिफोन भी अटेंड किए और लेनदारों को भरोसा दिया, कि शीघ्र सब भुगतान हो जाएगा। दुनिया आखिर भरोसे पर ही तो चलती है। नया स्टॉक भी भरोसे पर आ गया। काफी हद तक चिन्ता समाप्त हुई। सयाने सदा सच कहते है, चिंता चिता समान है। जिन्दा आदमी मुर्दा समान ही हो जाता है, कुछ भी करने में समझ नहीं। सयानों की बातें आनन्द को एकदम सटीक लग रही थीं। चिंता ही तो मनुष्य को खा जाती है। क्या बिना चिंता के कोई मनुष्य जीवित रह सकता है? नहीं। आनन्द की भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। परेशानी ने जकड़ रखा था। दम घुटा घुटा सा लगता था। एक भयानक अजगर की गिरफ्त से आजाद आनन्द ठीक से सांसें जिस्म के अंदर ले रहा था। आज आनन्द पिछले एक वर्ष की घटनाओं का अवलोकन कर रहा है। बेटी के विवाह को बड़ी शानो-शौकत, धूमधाम से किया। दिल खोल कर खर्च किया। आखिर करें क्यों न, कमाई किस लिए की है। शादी और मकान में ही तो पैसा खर्च होता है। फिर कंजूसी किस बात की। विवाह के बाद हनीमून के लिए बेटी और दामाद को दो महीने के वर्ल्ड टूअर को भेजा। एक शो-रूम दहेज में दे दिया। तीन के बदले अब तो दो ही शो-रूम हैं मुनाफे के लिए।

अभी बेटी के विवाह की बात लोग भूले भी नहीं थे कि बेटे का विवाह उससे भी अधिक शानो शौकत और धूमधान से संपन्न हुआ। बातों का बाजार फिर गर्म हो गया कि ऐसी शादियां तो राजे, महाराजाओं या मंत्रियों के यहां ही होती हैं। आनन्द कौन सा किसी मंत्री से कम है। हर चुनाव में आर्थिक सहायता की है। ऐसी नाजुक स्थिति में मंत्री जी से ही मिल कर कोई मदद हो सके तो अच्छा है। आनन्द को पूरी उम्मीद थी लेकिन आस बेकार ही रही। नेता सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। आनन्द की फरियाद को सरकारी प्रोजेक्टों की तरह लटका कर ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिर भी आस नहीं छोडी आनन्द ने , सहयता के लिए मंत्रीजी के पास एक बार फिर पहुंचे, लेकिन मिल न सके। सहायक मंत्रीजी के पास गया। बाहर आनन्द इंतजार कर रहा था कि उसके कानों में मंत्रीजी के बोल पडे, जो अपने सहायक को कह रहे थे, "देखो, इस आनन्द की हवा निकल चुकी है, यह अब हमारे किसी काम का नहीं है। चुनाव नजदीक है। मेरे पास बेकार के फालतू आदमियों के लिए समय नहीं है, भगा दो।"

सुनकर आनन्द एक पल भी नहीं रूका। सहायक के वापिस लौटने से पहले ही ऑफिस से बाहर आ गया। बात कलेजे में तीर की तरह चुभ गई। आज आनन्द फालतू हो गया, जो हर समय मंत्रीजी की मदद के लिए तैयार रहता था। यही तो जगत की रीत है, पैसा ही सब कुछ है, आज आर्थिक संकट से गुजर रहे आनन्द का कोई साथी नहीं।

शुक्र है कि बैंक से सहयता मिल गई, लेकिन कठिन मुश्किल शर्तों का पालन अनिवार्य था। कोई दूसरा रास्ता नहीं था। पूंजी शादी ब्याह में लग गई, कुछ तुम चलो, तो कुछ हम चलें की तर्ज पर व्यापार में अतिरिक्त पूंजी डालने के लिए फार्म हाउस बिक गया। बाकी बैंक ने लोन दे दिया। व्यापार के लिए धन का जुगाड़ हो गया। धन में एक विचित्र सी चुम्बकीय शक्ति होती है। धन अपने साथ धन ही नहीं जनता को भी तूफानी झटके से खींचता है। जो लेनदार सख्त थे, उनके व्यवहार में नरमी आ गई। आनन्द को वो दिन याद आ गया, जब बिटिया के विवाह का निमंत्रण देने हेतु बोस बाबू से मिला था।

ऑफिस पहुंच कर विजिटर रूम में बैठ कर इंतजार कर रहे थे और विजिटिंग कार्ड पर आनन्द का नाम देख कर बोस अपने केबिन से खुद निकल कर विजिटर रूम तक गए। आनन्द से हाथ मिलाते हुए कहा, "आनन्द बाबू आप को यहां बैठ कर विजटिंग कार्ड भेजने की क्या जरूरत पड़ गई। सीधे केबिन में आ जाते।"

"आप जरूरी मीटिंग में व्यस्त थे, इसलिए आपके काम में बाधा डालना उचित नहीं समझा।" आनन्द ने बोस को स्पष्टीकरण दिया।

"अरे काहे की जरूरी मीटिंग। जब आप आ गए हैं , तो आपके साथ जरूरी मीटिंग के सामने बाकी सब मीटिंगें कैंसल।" कहते हुए बोस ने आनन्द का हाथ पकड़ा और बातें करते हुए केबिन के अंदर प्रवेश किया। कुर्सी पर बैठ कर चाय का ऑर्डर किया और फिर आनन्द से संबोधित होकर बोले, "आप हमें बुला लेते, यहां आकर क्यों कष्ट किया। इस बहाने आपके ऑफिस के दर्शन ही कर लेते।"

"यह तो आप का बडप्पन है, जो इतनी बडी कंपनी के मालिक हो कर हम जैसे छोटे लोगों को आदर सम्मान देते हैं।"

"यह आप का बड़प्पन है, जो एक नौकर को मालिक कह रहे हैं।" बोस ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

"डाइरेक्टर हैं आप, डाइरेक्टर तो कंपनी के मालिक होते हैं।"

"बस आप की मजाक की आदत नहीं गई। जापानी कंपनी है, हम तो नाम के डाइरेक्टर हैं। मालिक तो जापान में रहते हैं। काम पसन्द नहीं आया तो बाहर का रास्ता दिखा देंगे।"

बोस और आनन्द बातें कर रहे थे , तभी आनन्द का अकाउन्टेंट सुरेश ने कुछ कार्ड हाथ में लिए केबिन में प्रवेश किया।

"आज तो पूरी टीम के साथ धावा बोल दिया, इरादा तो नेक है न।" बोस ने चुटकी ली।

"आप के धावे का स्वागत करने का प्रबन्ध किया है। बिटिया का विवाह है। आपको सपरिवार विवाह के सभी समारोह में उपस्थित रह कर धावा बोलना है।" कह कर आनन्द ने विवाह का निमंत्रण पत्र बोस के हाथों में थमाया।

"यह भी कोई कहने की बात है आनन्द जी। कोई हमारे लायक काम हो तो बिना किसी संकोच के कहिए।"

"बस सपरिवार आप विवाह के सभी समारोहों में उपस्थित रहें, यही कामना करता हूं।"

इधर आनन्द बोस के साथ बातों में व्यस्त थे, उधर अकाउन्टेंट सुरेश ने ऑफिस में सभी को शादी के कार्ड वितरित किए।

आनन्द कंपनी के सबसे बड़े डीलर थे, जिस कारण रूतबा था और एक अलग किस्म की धौंस रहती थी। आज वह धौंस खत्म हो चुकी थी। दोबारा व्यापार तो शुरू हो गया, लेकिन वह रुतबा नहीं रहा। वही बोस बाबू आज मीटिंग बीच में छोड़कर आनन्द से मिलने नहीं आए। आधा दिन इंतजार में कट गया। आनन्द की मजबूरी। बाद में आए लोग मिल कर कब के जा चुके थे। आनन्द शाम तक सिर्फ इंतजार करता रहा। ऑफिस से निकलते हुए बोस बाबू ने चंद मिनटों में औपचाकिरता पूरी कर ली। बोस के केबिन से बाहर आते समय आनन्द के कानों में बोस के शब्द पड़ गए, जो बोस ने अपने सहायक को कहे थे।" आनन्द को उधार मत देना, नकद पेमेंट वसूलते रहना, इसकी हवा निकल चुकी है। ज्यादा उधार हो गया और यदि पेमेंट डूब गई तो अपनी नौकरी भी डूबी समझना।" एक बार फिर तीर कलेजे का आर पार कर गया।

बैंक से लोन मिलने के बाद व्यापार फिर से पटरी पर आ गया। आदमी का स्वाभाव सिर्फ भूलने का है। पिछली दिक्कत आनन्द भूल गया। अब छोटे बेटे का विवाह होना है। पंचतारा होटल बुकिंग के लिए अकाउन्टेंट सुरेश को फोन कर चेकबुक होटल में लाने को कहा। अडवांस बुकिंग जो करवानी है। आखिर इजज्त धूल में तो मिलवानी नहीं है।

"बडे बेटे और बेटी का विवाह जिस धूमधाम से हुआ था, सुरेश यह विवाह उसी तरह होना है। रुपये पैसों की ओर नहीं देखना है। आखिर कमाया किसलिए है, खर्च करने के लिए। यही तो टाइम है, खर्च का। आनन्दी सब परिजनों को न्यौता दे दो। जितनी रकम चाहिए, अकाउन्टेंट सुरेश से मांग लेना। मैं कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा कि कोई कसर रह गई।"

आनन्दी विवाह की तैयारी में जुट गई। सुरेश सोचने लगा। पहले फार्म हाउस बिका था, अब...?

कोई सबक नहीं लेता आदमी अपने अनुभवों से। सिर्फ प्रतिष्ठा का ख्याल सताता है। आज आनन्द फिर विवाह का निमंत्रण पत्र देने बोस के ऑफिस पहुंचा। काफी इंतजार के बाद औपचारिकता के लिए बोस ने आनन्द को केबिन में बुलाया। बिना कुछ कहे एक कुटिल मुस्कान के साथ खड़े खड़े आनन्द ने शादी का कार्ड बोस की टेबल पर रख दिया। शादी का कार्ड खोल कर देखा और फिर बोस के चेहरे की रंगत ही बदल गई, उठ कर आनन्द से हाथ मिलाया, चाय, नाश्ते का ऑर्डर दिया।

"बैठिए आनन्द बाबू, बहुत दिनों के बाद आए हैं। पुराने मित्रों को लगते है भूल गए।"

आनन्द मन ही मन सोच रहा था, कार्ड देखने से पहले बैठने को भी नहीं कहा, अब पुराना मित्र बन रहा है। फाइव स्टार होटेल में शादी देखकर बोलने का ठंग ही बदल गया। दुनिया की रीत ही यही है, पैसे पर सब झुकते हैं। पैसा ही मां है, पैसा ही बाप है। लेकिन चेहरे पर कोई हाव भाव आए बिना आनन्द ने मुस्कुराते हुए कहा, "शादी के इंतजाम में व्यस्त था, इसलिए आपसे मुलाकात नहीं हो सकी, आप से गुजारिश है, सपरिवार सभी समारोहों में सम्मलित होना है।"

आनन्द के जाने के बाद बोस ने अपने सहयक से कहा, "दोबारा से हवा भर ली है, आनन्द ने। उम्मीद नहीं थी, इतनी जल्दी तरक्की कर लेगा।"

ऑफिस से बाहर आकर आनन्द ने सुरेश से कहा, "देखा था न बोस के चेहरे को, कार्ड देखकर हवाइयां उड़ गई थीं। साला कहता था मेरी हवा निकल गई है। आनन्द की हवा पूरी है। अब मंत्रीजी के ऑफिस चलते है। उसको भी हवा दिखानी है। हवा अभी पूरी है।"

Thursday, January 06, 2011

वो ऑटोवाला

ट्रिन ट्रिन फोन की घंटी तो अब पुरानी हो गई है। मोबाइल फोनो के युग में रिंगटोन बजती है, बडी सुन्दर, सुन्दर कर्ण प्रिय। शायद मैं पुराने जमाने की हो गई हूं? शायद की कोई गुंजाइश नही रखनी पढेगी, जब बच्चे बडे हो जाए और मां को टोकने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि बूढे। नही बूढा शब्द अच्छा नही है, पुराना कहना उचित होगा। पचास साल पहले पैदा हुए। पचास साल तो अब पुराने जमाने की बात हो गई है। हो भी क्यों नही, उस जमाने में मोबाइल तो दूर की बात है, फोन भी रइसों के घरों में होते थे। उस जमाने में तो टेलीफोन की घंटी बजा करती थी और अब मोबाइल की रिंगटोन। जिसका जैसा टेस्ट, वैसी रिंगटोन। पुराने जमाने के जब हो ही गए है, तो शर्म किस बात की, रिंगटोन को घंटी कहने में। सबके हाथों में मोबाइल देख कर आखिर पतिदेव से मोबाइल की फरमाईश कर ही दी। पत्नी को खुश रखना हर पति का धर्म है, अत: एक मंहगा मोबाइल ले आए।

"इसका क्या करु।"

"मोबाइल है, एकदम लेटस्ट। सब कुछ है फोन में कैमरा, म्यूजिक फोन। मन पसंद गाने सुनो। फोटो खींचो।"

"इतना खर्चा करने की क्या जरूरत थी, एक सस्ता सा फोन ही काफी था। मुझे तो इसके सिस्टम ही समझ नही आ रहे हैं।"

बस इतना सुनते ही स्वीट सन ने कह ही दिया, " मैं कोई गलत बोलता हूं क्या। आखिर बूढे हो ही गए हो न। किस जमाने में रहते हो। मोबाइल इस्तेमाल करना नही आता है। लो अभी सिखलाता हूं।" बस अब क्या था, वो बोलता गया और मैं हां हूं करती रही। मुझे तो बस फोन करने और रिसीव करने की विधी ही समझ आई। खैर वोही ठीक है। बात बूढे नही, सौरी पुराने होने की नही है, है तो जरूरत की। एक हाउस वाईफ को मोबाइल शौक के लिए चाहिए। जब सबके पास है तो उसके पास भी होना चाहिए। जब जरूरत होती है तो आदमी चाहे नया हो या पुराना, सब सीख जाता है। समय के साथ बदल भी जाते हैं।

क्या कहा मैनें कि आदमी समय के साथ सीखता है, बदलता है। तौबा तौबा, भगवान झूठ न बुलवाए। दुनिया बदल जाए, लेकिन एक कौम कभी नही बदल सकती है, चाहे सूनामी आ जाए या प्रलय। सुधरना तो दूर की बात है, मुझे यह प्रतीत होता है कि दिन प्रति दिन और अधिक बिगडैल होती जा रही है। यह कौम भारत के हर महानगर में थोक भाव में मिलती है, हम सब को तंग करने के लिए। आम नागरिक परेशान, हमारी सरकार भी कुछ नही कर सक रही है। हम सब असहाय है। उस कौम को नही पहचान पा रहे हो, कोई बात नही। क्या कभी आपने रेलगाडी या बस से सफर किया है। जैसे आप रेलवे स्टेशन य़ा बस अड्डे पर समान के साथ उतरते है, एक आवाज आपके कानों से टकराती है ऑटो। जी हां यह ऑटोरिक्शा चालकों की कौम की बात कर रही हूं मैं। स्टेशन पर ऑटो की आवाज सुन कर आप पूछ ही लेंगें रोहिणी जाना है। जवाब मिलेगा जनकपुरी। कोई इस कौम से पूछे जब जाना जनकपुरी है तो सबको परेशान करने की क्या जरूरत है। ऑटो जनकपुरी की आवाज भी लगा सकते थे। आपके गंतव्य का ऑटो जब मिलेगा तब रेट डबल, ट्रिपल। कोई कुछ नही कर सकता। स्टेशन की बात छोडे, घर ऑफिस से बाहर निकल कर ऑटो पकडिये, वोही नजारा। शाहदरा जाना होगा, ऑटो वाला मालविय नगर बोलेगा। मीटर से तो कभी चलेगें नही। रेट तय किजिए, मीटर से अघिक, तो शॉर्टकट से ले चलेगें। मीटर से चलने पर तो पूरी दिल्ली दर्शन करवा देंगे। हर दिल्ली वासी इस समस्या से ग्रस्त है।

लेकिन अपवाद हर जगह होते है, वैसे इस कौम मैं भी हैं। कभी भूले भटके कोई शरीफ ऑटो रिक्शावाला मिल जाता है और आप चाहते है कि हर बार शराफत का पुतला मिले, लेकिन संसार का नियम ही यही है, जो हम चाहते हैं, वह नहीं मिलता है। खैर छोडिए बहस को। कुछ दिन पहले की बात है, दोपहर के खाना खाकर सो गई। सो क्यों गई। क्यों न सोऊं, एक हाउसवाईफ दोपहर को सोने की लग्जरी एर्फोड कर सकती है। तभी मोबाइल की घंटी अर्थात रिंगटोन बजी। देखा तो पतिदेव का फोन था। अच्छे पति का धर्म है कि पत्नी को दोपहर के सोने के समय परेशान न करे, इसलिए मेरे पतिदेव कभी भी दोपहर को फोन नही करते। जरूर कोई काम होगा। काम जरूरी था। अचानक ऑफिस का टूर बन गया। दो दिन के लिए चैन्नई जाना है, सुबह की फलाईट से, इसलिए कपडों का बैग तैयार करना था। टूर की तैयारी में ऑफिस से घर आने में देर हो सकती है। ये ऑफिस वाले भी कभी व्यवहारिक नही हो सकते है। सुबह छः बजे की फलाईट पकडने का मतलब है, चार बजे घर से निकलना, जिसका सीधा मतलब है, तीन बजे उठना। रात ऑफिस से देर, पूरी रात खराब। खैर नौकरी करनी है तो चाकरी करनी पडेगी। पतिदेव तो चैन्नई के लिए रवाना हो गए। बच्चे बडे हो जाए तो हाउसवाईफ क्या करे। इसका सदुपयोग मायके जा कर हो सकता है। एक शहर में मायका हो तो फायदे तो बहुत होते हैं। बच्चों को नाश्ता करवाने के बाद ऑटो पकड कर मायके रवाना हुई। उस दिन सौभाग्य से सोसाइटी के गेट पर ही ऑटो मिल गया। किसी सवारी को छोडने आया था। रेट तय किया ताकी शॉर्टकट से जल्दी मायके पहुंच सकूं। लेकिन तौबा तौबा। हवाई जहाज की सपीड से ऑटो चलाने लगा। एकदम रफ तरीके से। ओवरटेक करते समय भद्दी गालियां निकालता रहा। मन ही मन सोचती रही, किस का मुंह देख कर घर से निकली थी। मायके पहुंच कर चैन की सांस ली कि सही सलामत पहुंच गई। किराया दिया तो मुंह फाड दिया छुट्टा नहीं है, खुल्ले पैसे दो। पर्स खोल कर खुल्ले दिये, इस चक्कर में घर के मेनगेट की चाबी ऑटो में रह गई। मैं इससे अनजान थी। शाम को जब घर पहुंची तो सोसाइटी के गार्ड ने घर की चाबी देकर कहा कि आप चाबी ऑटो में भूल गई थी। जिस ऑटो में आप सुबह गई थी, दोपहर में चाबी दे गया कि आपको चाबी गुम होने पर परेशानी होगी। हांलाकि उसे दूसरी तरफ जाना था फिर भी वह चाबी देने यहां आया। मैं गार्ड की बातें सुन कर एकदम सन्न रह गई। उसे सुबह जितना कोसा था, उससे अधिक उस ऑटोवाले का आभार प्रकट किया, कि संसार में ईमानदारी और भलाई अभी भी कायम है। चाहे मात्रा कम हो। शायद इन चन्द भले आदमियों पर ही दुनिया टिकी हुई है। उसे क्या फर्क पडता था, चाबी को फेंक भी सकता था, लेकिन नेकी दुनिया में अभी भी कायम है। जीता जागता सबूत वो ऑटोवाला। दस किलोमीटर ऑटो दौडा कर सिर्फ चाबी वापिस करने आया। मैं उसको आभार भी प्रकट नही कर सकी।

अगले दिन जब पतिदेव चैन्नई से वापिस आए और मैंनें इस घटना की बात बताई तो वो हंस पडे। तुमहारी बात सही है कि कुछ नेक इंसान हर व्यवसाय में मिल जाएगें और उन चन्द नेक भले इंसानों पर दुनिया की धुरी टिकी है, वरना 99 प्रतिशत लोग तो छल कपट में विश्वाश रखते है। तुमहे एक नेक ऑटोवाला मिला, कोशिश करोगी कि कही कभी वो ऑटोवाला मिले और उसका आभार प्रकट कर सको। तुमहारा अनुभव सुखद रहा, लेकिन मेरा अनुभव दिल्ली वाला रहा। ऑटोवाले चाहे दिल्ली के हो या चैन्नई के, सब एक जैसे हैं। चैन्नई में पहला दिन तो ऑफिस के काम में बीत गया। दूसरे दिन सुबह रोज के अनुसार पांच बजे नींद खुल गई। ऑफिस दस बजे जाना था। ऑफिस होटल के नजदीक था, पैदल दो तीन मिन्टों का रास्ता था। सुना था कि चैन्नई के बीच बहुत खूबसूरत है। मॉनिंग वॉक समन्दर में की जाए। होटल के रिशेप्शन से पूछा कि मेरीना बीच पन्द्रह किलोमीटर दूर है। चाय पीकर होटल से बाहर निकल कर देखा, दो तीन ऑटोवाले चाय पी रहे थे। पूछा बीच चलोगे। ऑटोवाले ने कहा वन फिफ्टी। मैनें कहा वापिस भी आना है और समन्दर किनारे घूमने में आधा धंटा तो लगेगा। आने जाने का किराया कितना। वह फिर बोला वन फिफ्टी। मैं सन्तुष्ट हो गया कि किराया तय हो गया। नया शहर है, कोई झिक किछ नही होगी। लगभग बीस मिन्टों में चैन्नई के खूबसूरत मैरीना बीच के किनारे पहुंच गया। सुबह का शान्त समय एकदम खाली बीच, इक्का दुक्का सैलानी नजर आ रहे थे। एकदम साफ सवच्छ समन्दर का किनारा। आती जाती लहरों का एक दिलखुश, खूबसूरत नजारा तन मन को प्रफुल्लित कर गया। दिल्ली शहर में जमुना नदी एक नाले से अधिक नजर नही आती। बचपन में आईएसबीटी के समीप जमुना नदी छलांगे मारती हुई बहती थी। खूबसूरत कुदसिया घाट याद आ गया, लेकिन अफसोस अब वहां जमुना एक नाली से अधिक कुछ नही। चैन्नई के खूबसूरत बीच देख कर मन प्रसन्न हो गया। छितिज से धीरे धीरे उगते सूरज को कैमरे में कैद करने के बाद बीच में टहलता हुआ आती जाती लहरों की खूबसूरती निहारता रहा। मन तो नही कर रहा था कि समन्दर छोड कर होटल जाऊं, लेकिन मजबूरी ऑफिस का काम भी करना था। वापिस ऑटो में बैठा तो चार सो चालिस वॉट का करारा छटका ऑटोवाले ने दिया।

वन फिफ्टी वापिस जाने के। यह सुन कर समन्दर का सारा नशा एक सैकन्ड में उतर गया। अरे यह क्या आने जाने का डेढ सौ तय हुआ था। अब परदेशी का फायदा। इतने में तीन चार ऑटोवाले इकठ्ठे हो गए। उनकी तमिल भाषा मुझे समझ नही आई। मेरे कहने पर कि हिन्दी या अंग्रेजी में बात करो तो सब एक मत से बोले। वन फिफ्टी आना, वन फिफ्टी वापिस जाना। चारों तरफ से चित मैं क्या करता, चुपचाप ऑटो में बैठ गया। ठीक है भाई तीन सौ ले लेना। होटल पहुंच कर गाल पर एक थप्पड और पडा। वेटिंग के फिफ्टी और। डेढ सौ रुपये का सफर साढे तीन सौ रुपयों में पढ गया।

पतिदेव की बात सुन कर मैं चौंक गई।

"क्या चैन्नई के ऑटोवाले भी दिल्ली जैसे हैं।"

"ऑटोवालों की जो कौम है, वह एक ही है। चाहे वो दिल्ली के हो या चैन्नई को। किसी भी भारतीय शहर के हो सकते हैं। सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। सब एक से बड कर एक है।"

बात तो ठीक है। उस दिन के बाद जब भी ऑटो में बैठती, मुझे परेशानी झेलनी ही पडती। ऑटो वालों के नखरे और मुंह मांगे रेट। लेकिन फिर भी दिल है कि मानता नही, जब भी किसी ऑटो में बैठती हूं, एक बार ऑटोवाले की शक्ल ध्यान से देखती हूं, कि शायद कही कभी वो ऑटोवाला मिल जाए और उस का आभार प्रकट कर सकूं।

Saturday, January 01, 2011

अखबारवाला

कॉलिज के दिनों में एक बुरी लत गई, जो आज तक पीछा नही छोङ रही है। कई बार पत्नी से भी बहस हो जाती है, मेरे से ज्यादा प्यारा अखबार है, जिसके साथ जब देखो, चिपके रहतो हो। क्या किया जाए, अखबार पढने का नशा ही कुछ ऐसा है कि सुबह नही मिले तो लगता है कि दिन ही नही निकला। खैर पत्नि की अखबार वाली बात को गंभीरता से नही लेता हूं क्योंकि मेरे ऑफिस जाने के बाद खुद उसने पूरा अखबार चाटना है। पढी लिखी पत्नी चाहे, वो हाऊस वाईफ हो, एक फायदा तो होता है, कम से कम वह अखबार का महत्व समझती है। प्रेम भरी तकरार पति, पत्नी के प्यार को अधिक गाढा करती है। प्रेम भरी तकरार ही गृहस्थ के सूने पन को दूर करती है। तकरार ही आलौकिक प्रेम की जननी है।

पहले ऑफिस घर के समीप था। सुबह अखबार तसल्ली से पढ कर ऑफिस जाता था, लेकिन नई नौकरी और ऑफिस घर से थोडा दूर हो गया तो घर से जल्दी निकलना पङता है। ढंग से अखबार सुबह पढ नही पा रहा हूं। जैसे हर समस्या का समाधान होता है, इसका भी निकल आया। एक नजर ङाल कर ऑफिस रवाना होने लगा। शाम को तसल्ली से संपादकीय और दूसरे ऑर्टिकल पढने की आदत बना ली। इधर कुछ दिनों से कोफ्त होने लगी, कि लत कभी छूट नही सकती। कारण अखबारवाला। अखबारवाले का लङका बदल गया। पुराना लङका सुबह उठने से पहले ही अखबार ङाल जाता था, लेकिन यह नया लङका देरी से आता था, जिस कारण कई बार तो अखबार पढना ही रह जाता। खैर कोई बात नही, शाम को अखबार पढने लगा। महीने बाद अखबारवाला जब बिल के पैसे लेने आया, बिल पकङते ही मुख से खुद बखुद वाक्य अपने आप निकल आए “भाई साहब, बिना अखबार पढे ही बिल का भुगतान कर रहा हूं, इतनी देर से अखबार डालता है, कि पढने का समय ही नहीं मिल पाता।“

“कल से समय पर आ जाएगा।“ कह कर एजेंसी के मालिक ने तसल्ली दी।

वाकई, अगले दिन अखबार पहले वाले समय पर आ गया। शिकायत का असर फौरन। सोचने लगा, यह काम पहले करता तो अखबार शाम में पढने की आदत नही पढती। लेकिन दस बारह दिनों के बाद अखबार का समय फिर से बदल गया, यानी फिर से लेट। यह सिलसिला बीस दिनों तक चला, और फिर कुछ दिन जल्दी, तो कुछ दिन लेट। यह गुथ्थी समझ से परे थी, लेकिन इतना समय नही है, कि दिमाग में बोझ ङाल कर गुथ्थी सुलझाई जाए।

मौसम ने उस दिन करवट बदली, आसमान में काले बादल छाए हुए थे। लम्बी गर्मी के बाद मौसम मस्ती के मूङ में था। रविवार का दिन, दिल चाहता है, कि देर तक साया जाए लेकिन बदन में एक ऑटोमैटिक अलार्म फिट है, नींद सुबह के पांच बजे हर रोज की तरह खुल गई। एसी में ठंङ लगने लगी, बाहर मौसम ने करवट ले रखी थी। एसी बंद करके खिङकी खोली, एक मस्त हवा का झोका सुस्त बदन को खोल गया, इतने मे पत्नी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा “यह क्या, खिडकी क्यों खोल दी, आज संङे को क्यों जल्दी उठ गए।“

“संङे को गोली मार, बाहर मस्त मौसम की बाहार ने आनन्दित कर दिया।“

चादर में से मुंह निकाल कर खिङकी के बाहर मस्त मौसम का जाएजा लिया और राकेट की रफ्तार से बिस्तर छोङ बाथरूम में घुस गई। बाथरूम में से आवाज लगाई “मॉर्निग वॉक चले, मौसम मस्ताना है।“

नेकी और पूछ, कभी कभी बैसाखी, दिवाली पर ही मॉर्निंग वॉक नसीब होती है। सोने पर सुहागा, यह मस्त मौसम वो भी संङे को। बीस मिन्टों में कार स्टार्ट की और सीधे जपानी पार्क। पार्क के पास बहुत सारे अखबारवाले बैठे थे। उनको देख कर मुख से यूही निकल पङा “यहां देखो, अखबार ही अखबार नजर आ रहे हैं, एक हमारा अखबारवाला ग्रेट है, आठ बजे अखबार ङाल कर जाता है।“

“अरे देखो, अपना अखबारवाला भी बैठा है।“

“हां, वोही तो अखबारवाला है।“ कह कर मैने कार उसके पास रोकी। उसका ध्यान हमारी तरफ आया, कि अचानक कौन कार में है, जो एकदम उसके पास आ कर रूका। हमे देख कर एकदम ऐटेंसन की मुद्रा में खङा हो गया। “गुङ मॉर्निग, सर जी, मॉर्निंग वॉक करने आए है। अखबार घर पर ङाल दूंगा। आप शौक से मॉर्निग वॉक कीजिए।” अखबारवाले ने सुझाव दिया तो मैंने कहा “अब पकङा ही दो, मौसम सुहाना है, बैंच पर बैठ कर ठंङी हवा के झोको के बीच अखबार पढने का मजा भी ले लेगें।“

“सर जी, अभी एक अखबार की गाङी नही आई है, वो मैं बाद में घर पर ङाल दूंगा।“ कह कर उसने नवभारत टाइम्स पकङा दिया। मेन अखबार, हेलो दिल्ली और क्लासीफाइङ अलग अलग पकङा दिया।

यह देख कर पत्नी ने नराजगी जाहिर की “यह क्या भैया। अलग अलग पन्ने पकङा दिये।“

हंसते हुए उसने कहा, “कंपनी वाले तो ऐसे ही हमे देते है। हम सप्लीमेंट अखबार में ङाल कर एक बनाते है। आप देख ही रहे हैं। हमारा एक घंटा तो इसी काम में लग जाता है। हम यहां दूसरी गाङी का इंतजार कर रहे है। सुबह चार बजे यहां जाते है। गाङियों के इंतजार में अच्छा खासा समय लग जाता है।“

मौसम की नजाकत देखते हुए नवभारत टाइम्स बगल में दबा कर जपानी पार्क में सुबह की सैर का सुहाने मौसम में लुत्फ लेने लगे। दो घंटे बाद जब वापिस घर पहुंचे, तो श्रीमान अखबारवाला सोसाइटी के गेट पर टकराया।

“क्यों भाई, दूसरे अखबार की गाङी क्या अब आई।“

मेरे प्रश्न पर वह झेप गया और धीरे से इस तरह से बोला कि दूसरे को सुनाई न दे “सर जी, किसी को कहना नहीं, दूसरी सोसाइटी में पहले चला गया था। कल से आने वाले दस दिनों कर पहले आपकी सोसाइटी में आउंगा।“

“क्या कह कहा था।“ पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

अखबारवाले की बात सुन कर पत्नी झल्ला कर बोली। “आपने उसे सिर पर बैठा रखा है। डांट मार कर सबसे पहले अपनी सोसाइटी में आने को कहते।“

“क्या फायदा डांटने का, जिसके यहां देर से अखबार डालेगा, डांट तो सुनेगा।“

“आपने कभी डांट लगाई, क्या। रोज देर से आता है। आप ऑफिस चले जाते हो, अखबार सजा हुआ पूरे दिन टेबुल पर पडा रहता है। बंद कर दो, अखबार। बासी अखबार का क्या फायदा।“

पत्नी ने तो अपनी भडांस निकाल ली, लेकिन अखबार की लत नही छूटी। क्या किसी शराबी ने शराब छोडी? क्या सिगरेट बीडी पीने वाले ने सिगरेट बीडी छोडी? नही न, फिर मैं कैसे अखबार छोड सकता था। अखबारवाला कभी जल्दी तो कभी देरी से। कभी हमारी सोसाइटी में तो कभी दूसरी सोसाइटी में जल्दी। रोज रोज झगडने से क्या फायदा। एक दिन सुबह डोरबेल बजी, दरवाजा खोला तो अखबारवाला था।

“गुडमॉनिंग सर, लीजिए आप का पेपर।“

मैं आश्चर्य चकित कि आज एक मंजिल ऊपर आ कर हाथों में अखबार पकडाया जा रहा है। लेकिन बिना हाव भव प्रकट किए अखबार लेकर उसके गुडमॉनिंग का जवाब दिया।

“सर जी आप की ईएसआई हॉसपीटल में कोई जान पहचान है।“

हॉसपीटल का नाम सुन कर मैं थोडा आश्चर्य में आ गया “क्या हुआ, सब खैरियत तो है न।“

“जी सर सब ठीक है, वहां मैं इंटरव्यू देकर आया हूं। हांलाकि पोस्ट टेम्परेरी है और उम्मीद कम नजर आ रही है, फिर भी कोई जुगाड लग जाए।“

“ईएसआई हॉसपीटल तो सरकारी हॉसपीटल है। मैं तो प्राईवेट नौकरी करता हूं। सरकारी जान पहचान तो है नही।“

“कोई बात नही सर, बस यही कोशिश कर रहा हूं, कि सरकारी नौकरी लग जाए, तो अखबार डालने का काम छोड दूंगा। चार सोसाइटियों में अखबार डालता हूं, जहां देर हो जाए, लोग खाने को पडते हैं। मजे का काम नही है, अखबार डालना।“

उसकी बातों में उदासी थी। वह अपने पेशे से खुश नही था। खैर उसकी बात नही। मैं कौन सा खुश हूं अपनी नौकरी से। दूसरे की थाली में सबको देसी घी नजर आता है। दूसरे की नौकरी और व्यव्साय सबको अच्छे लगते है।

“देखो, मेरी तो कोई जान पहचान है नही, लेकिन तुम कोशिश करते रहो। जब तक कोई नौकरी नही मिलती, अखबार डालते रहो।“

जी सर कह कर अखबार वाला चला गया। पत्नी ने हमारी बातें सुन कर कहा “बहुत फरस्टेटिड लगता है, अखबारवाला।“

“हां, है तो सही, खुद की पेपर ऐजन्सी होती तो खुश होता। करता तो नौकरी है। हर कोई चाहता है, सरकारी नौकरी लग जाए तो ऊम्र भर की तसल्ली हो जाती है और रिटायरमेट के बाद पेंशन।“

कुछ दिनों के बाद एक दिन सुबह अखबारवाला से पूछा तो मालूम हुआ कि नौकरी तो मिली नही। रिश्वत देने के लिए पैसे थे नही और संघर्ष जारी है जिन्दगी में। दिन बीतते गए, अखबारवाला वोही, कुछ फरस्टेरेशन अधिक लगने लगी। दिवाली का दिन था, ऑफिस की छुट्टी, देर तक बिस्तर में लेटा रहा, तभी कॉलबेल बजी। उठ कर दरवाजा खोला तो सामने अखबारवाला हाथ में अखबार लेकर खडा था।

“हैपी दिवाली” कह कर मुसकुराते हुए अखबार आगे पकडाये।

एक फरस्टेटिड इंसान को मुसकुराते हुए देख कर आश्चर्य हुआ, फिर संभल कर मुसकुराते हुए उसकी दिवाली ग्रीटिंग का जवाब दिया। अखबार लेकर मैं वापिस मुडा तो उसकी एक बार फिर से आवाज आई “सर जी हैपी दिवाली।“ मुड कर देखा तो वह खडा कानों पर हाथ फेरने लगा। मैं समझ गया कि वह दिवाली का इनाम चाहता है। जेब में हाथ डाला तो एक बीस रूपये का नोट उसको दिया। बीस रुपये लेकर एक फौजी स्यलूट मार कर चहकता हुआ चला गया। मैं सोचता रहा, कि आज तक किसी अखबार वाले ने कभी दिवाली ईनाम नही मांगा। यह पहला अखबार वाला था, जो देरी से अखबार डालता है और दिवाली ईनाम भी ले गया। भाईदूज के दिन वो मुझे मिला और गीली आंखों से डबडबाते हुए कहा “सर जी आप के और आप जैसे दूसरे नेक आदमियों के दिवाली ईनाम की बदोलत आज भाईदूज पर मैं अपनी बहन को कुछ उपहार हे सकूंगा। दिल्ली शहर की मंहगाई ने कमर तोड रखी है। बस दो वक्त की रोटी और रहने की छत की नसीब है। आधी कमाई तो घर के किराए में निकल जाती है। भाईदूज के दिन खाली हाथ बहन के घर जाते शर्म आती है।“ कहते कहते आंखे उसकी भर आई थी।

आखिर हमे समाज की मान्यताऔ को निभाने के लिए कई समझोते करने पडते हैं। जो हम चाहते है, वो अक्सर नही मिलता है। उस अखबार वाले की भी यही समस्या थी। सरकारी नौकरी मिली नही। निजी नौकरी काम ज्यादा और वेतन कम। थक हार कर अखबार बांटने का काम न चाहते हए भी कर रहा था।

“कोई बात नही। संघर्ष ही जिन्दगी का दूसरा नाम है। देर सवेर तुमहारे मतलब का काम जरूर मिलेगा। काम कोई भी छोटा नही होता। इज्जत से रोटी मिल जाए, वोही काम बढिया है।“ मेरी इस बात का उस पर कितना असर हुआ, मुझे नही मालूम, लेकिन दिवाली के बाद होली का भी ईनाम अखबारवाला ले गया। यह सिलसिला कोई दो तीन साल तक चलता रहा। मुझे नई नौकरी के सिलसिले में चार साल दिल्ली से बाहर रहना पडा। किसी ने ठीक ही कहा है, कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड कर। आखिर चार साल बाद फिर दिल्ली लौट आया। सुबह की ट्रेन से वापिस आ गए, लेकिन घर का सामान वाला ट्रक नही पहुंचा। ट्रक वाले को फोन आया कि सामान कल आएगा। रसोई का सामान ट्रक में था। रात का खाना रेस्टोरेंट में खा कर बाहर निकले तो आईसक्रीम खाने के लिए ट्राली पर जैसे ही रूके, एक जाना पहचाना चेहरा मुसकुरा पडा।

“सर जी कौन सी आईसक्रीम दूं।“

यह आवाज अखबारवाले की थी, जो आईसक्रीम ट्राली के दूसरी तरफ था।

आईसक्रीम खाते खाते उससे बाते होती रही। “क्या अखबार का काम छोड दिया।“

“ नही सर जी, सुबह अखबार बांटता हूं, शाम को आईसक्रीम की ट्राली लगाता हूं। आपकी उस बात ने मेरी जिन्दगी बदल दी, कि कोई काम छोटा नही होता। बस इज्जत का काम होना चाहिए। अखबार बांटना, आईसक्रीम बेचना इज्जत का काम है। कोई ढंग की नौकरी मिली नही, तो काफी सोच विचार के बाद इसी नतीजे पर पहुंचा कि अखबार और आईसक्रीम बेचने में कोई बुराई नही। आज आईसक्रीम की ट्राली है, कल भगवान ने चाहा तो आईसक्रीम पार्लर भी हो जाएगा।“ अखबारवाले में बातों में आत्मविश्वाश था।

“ अब हम वापिस आ गए है। सुबह अखबार डाल देना।“

मुसकुराते हुए अखबारवाले ने कहा “जरूर, कल पहला अखबार आपके घर डालूंगा।“

“चलो आपकी बातों से कम से कम अखबारवाले की फरस्टरेशन की दूर हुई।“ पत्नी ले कहा।

अगले दिन सुबह उठने से पहले बॉलकोनी में अखबार पडा था। वायदे के अनुसार अखबारवाले ने पहला अखबार मेरे घर में डाला था।



बुढापा

कुछ उम्र में बढ़ गया कुछ जिस्म ढल गया कुछ पुराना हो गया कुछ बुढापा आ गया कुछ अनुभव आ गया कुछ कद्र भी पा गया...