Monday, February 14, 2011

कुछ नही

14 फरवरी

महेश चाय की चुसकियों के बीच समाचारपत्र पढ रहा था. ममता नहा कर कमरे में आई और महेश के चेहरे पर मुस्कान देख कर सोफे पर पास चिपक कर बैठ कर महेश के बालों को सहला कर पूछा क्या बात है, आज बहुत चहक रहे हो.” 
आज 14 फरवरी है.
इसमें खास बात क्या है.
खास बात है 14 फरवरी है यानी वलेन्टाइन डे.
अच्छा आज वलेन्टाइन डे है और जनाब को मालूम है.
मालूम न भी हो कि आज क्या है, परन्तु मीडिया ने तो ढिंढोरा पीट रखा है, कि आज क्या है.
तो फिर क्या इरादा है जनाब का.
हेपी वलेन्टाइन डे.
बस रूखा रूखा. दुनिया को देखो. कितने जोर शोर से सेलिब्रेट करते है. उतना नही फिर भी जब जनाब का मूड बन ही गया है तो कुछ तो होना चाहिए.
ठीक है रात का डिनर केंडल लाईट का कार्यक्रम रखते है, अभी तो आफिस चलता हूं.
अगर शाम को आफिस में काम में उलझ गए तो फिर?”
आज का पक्का वादा है आपके गुलाम का, आपकी खिदमद में हाफडे की छुट्टी लेकर तीन बजे तक हाजिर होगा.
बताऔ न आज कोई खास बात है क्या, शादी के बाईस सालों में आज तक कभी वलेन्टाइन डे नही मनाया, आज इतने रोमांटिक हो रहे हो, कुछ खास बात तो लग रही है, जो मुझ से छुपाई जा रही है. हमेशा लेट आते हो, आज हाफडे?
महेश ममता के मुख के पास होठों को लाते हुए बोलाकुछ नही. महेश को पास आते देख कर ममता झठ से पीछे हटी. कुछ नही तो आज क्या हो गया है, बच्चों का भी ख्याल नही.
ममता प्रिय अभी तो आफिस चलते हैं. शाम में पता चल जाएगा. खास बात ही समझो. हाफडे लेकर आ रहा हूं. खाना घर ही खाऊंगा. टिफिन तैयार मत करना

ममता को महेश की बाते पहेली लग रही थी. महेश का यह कहना कुछ नहीममता को समझ नही आया. विवाह के बाईस सालों में उनकी दुनिया एक दूसरे के बाद उनके दो बच्चों बीस साल की पुत्री मानसी और अठारह साल के पुत्र मयंक तक ही सीमित रही. बस इतना सा संसार है, परिवार का.

एक महीना पहले

महेश आफिस के काम से एक कानफ्रेंस में भाग लेने दो दिन के लिए चैन्नई गया. कानफ्रेंस में एक दम साथ वाली सीट पर एक सुन्दर महिला बैठी थी. महेश अपनी स्पीच देकर जैसे अपनी सीट पर  बैठा, साथ वाली सीट पर बैठी एक बेहद खूबसूरत महिला ने कहा महेश जी, आप की स्पीच प्रभावशाली और जोरदार रही. आप के विचार नए, असरदार और प्रैकटिकल हैं. आप ने एक अनोखा, नया और अच्छा सबजेक्ट चुना. महेश ने फोल्डर में रखे कागजों को ठीक करते हुए कहा धन्यवाद. फिर उस महिला की ओर देखा और सुन्दरता की मूर्ती को देखता ही रह गया. उसकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता कोई भी. कुछ पल देखने के बाद उसे एहसास हुआ कि कहीं उसने उस महिला को देखा है. कौन हो सकती है वो. महेश का मन सेमिनार से भटक गया. कौन हे वो, सोचने लगा. महेश की दुविधा को उस महिला ने तोडा. महेश मुझे पहचाना नही मै माया.”

माया जी आपको मेरी स्पीच अच्छी लगी, इसके लिए शुक्रिया. आपके लिखित कमेंट चाहूंगा. यह मेरा विजिटिंग कार्ड है. आप ईमेल से अपने कमेंट भेज सकती हैं. स्पीच जर्नल में प्रकाशित होगी, यदि कुछ अच्छे कमेंट भी साथ हो तो सोने पर सुहागा.
आप दिल्ली में रहते है. यह मेरा कार्ड है. मैं भी आजकल दिल्ली में हूं.कह कर माया ने विजिटिंग कार्ड महेश को दिया.
लंच ब्रेक में माया और महेश साथ साथ थे. बातें होती रही. महेश को लग रहा था कि वह माया को जानता है, परन्तु कैसे, वह भूल रहा था. माया उसमें कुछ अधिक ही रूचि ले रही थी. यह जानने के बाद माया की खुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा, कि महेश भी उसी होटल में रह रहा है, जहां माया रूकी है. शाम को कांनफ्रेंस समाप्त होने पर दोनों बाते करते करते महेश के कमरे तक आ गए  तो महेश ने कहा, जब कमरे तक आ गई हो तो एक कप चाय हो जाए, सारे दिन की थकान खत्म हो जाएगी, आपके साथ कुछ पल का साथ और हो जाएगा.महेश ने रूम सर्विस को दो कप चाय का ऑर्डर दिया. फिर कुर्सी पर बैठते हुए पूछा माया जी आप दिल्ली में कहां रहती हैं.

मेरा घर भी भूल गए महेश और मुझे भी. आज पच्चीस साल हो गए है, तुम मुझे भूल चुके हो. मैं उसी मकान में रहती हूं. पिताजी की मृत्यु के बाद मैं मां के साथ रह रही हूं.
माया के यह शब्द सुन कर महेश सतब्ध रह गया. वह टुकुर टुकुर माया को देखता रहा. क्या माया वही माया है.

हां महेश मैं वही माया हूं. जिसको तुमने पच्चीस साल पहले प्रपोज करना था वलेन्टाइन डे वाले दिन, लेकिन आए नही, मैं इंतजार करती रही थी उस दिन, पर तुम नही आए थे.

महेश चुपचाप चाय पीता रहा. वह कुछ नही बोला. माया को देख कर उसे लगा कि उसने माया को देखा है. वह माया को फौरन पहचान नही सका. पच्चीस साल जो बीत गए. अपना अतीत भूल चुका था. पक्का गृहस्थ जो बन गया था. परन्तु माया तो एक पल में उसे पहचान गई.
तुम्हारे पति, बच्चे. महेश ने चुप्पी तोडी.
तलाक हो चुका है, एक लडका है, पति के साथ. मैं मां के साथ रह रही हूं.
तभी महेश का मोबाइल बजा. फोन ममता का था. ममता के साथ स्नेह और प्रेम के साथ बाते करते देख थोडी देर बाद माया ने रूखसत ली. माया के जाने के बाद महेश अतीत में चला गया.

पच्चीस साल पहले     

महेश दिल्ली विश्वविधालय के हिन्दू कॉलिज से बी.काम ऑनर्स पढ रहा था. माया उसकी सहपाथी थी. महेश पढने में होशियार था. आधी क्लास, जिसमें लडकियां आधिक थी, नोट्स लेने के लिए महेश के नजदीक थी, जिसमें माया भी थी. अति खूबसूरत, सुन्दरी माया जहां महेश पर मर मिटी थी, क्लास के सारे लडके माया के चक्कर में माया के आगे पीछे घूमते रहते थे, लेकिन माया किसी को अपने पास नही फटकने देती थी, वह महेश के आगे पीछे घूमती थी. महेश साधारण रंगरूप का आम लडका था. मध्यम वर्गीय छात्र पढाई में अव्वल हो तो सोने पर सुहागा. और लडकी सुन्दरता में अव्वल तो सोने पर सुहागा. माया को अपने रूप पर घमंड स्वाभाविक था. महेश में शालीनता थी. माया के रूप, सुन्दरता पर महेश भी मर मिटा था, पर कहने में झिझक थी, सिर्फ नोट्स तक ही दोनों का साथ थी. माया उसके पास होती, तो कई बार महेश सोचता कि अपने प्यार का इजहार करे, परन्तु कर नही सका. महेश अपनी सीमाएं जानता था, वह मध्यम वर्ग से तालुल्क रखता था और माया घनी परिवार से. कई अमीर, खूबसूरत लडकों को माया झिडक चुकी थी. यह देख कर महेश जब भी कोशिश करता, तो होंठ खुल नही पाए, कुछ कह नही सका. देखते देखते तीन साल बीत गए. पढाई के सिलसिले में दोनों की दोस्ती बरकरार रही. महेश की झिझक भी बरकरार रही. फाईनल ईयर, पढाई पूरे जोर पर थी. जनवरी के महीने में ठंड के साथ साथ पढाई टाप गियर पर थी. दोपहर में कालेज लान पर गुनगुनी धूप में, बाकी समय लाईब्रेरी और क्लास रूम में महेश को माया के साथ देख कर हर कोई चिढता था, लेकिन कोई कुच कह नही सकता था. कारण माया की झिडकियां कई सुन चुके थे.

कैंपस प्लेसमेंट में महेश ने फार्म भरा। घर की कमजोर आर्थिक स्थिती के कारण बी.काम के बाद नौकरी मजबूरी थी. आगे की पढाई नौकरी के साथ साथ करना ही एकमात्र मिशन था. कुशाग्र बुद्दि और प्रतिभा संपन्न महेश एक अच्छी कंपनी में सलेक्ट हो गया, सिर्फ ऑफर लेटर मिलने की औपचारिकता ही बाकी थी.

14 फरवरी का दिन आ गया. वलेन्टाइन डे पर हर छात्र उत्साहित था. फाईनल ईयर में जुदा होने से पहले अपने प्यार का इजहार करने का आखिरी मौका कोई हाथ से छोडना नही चाहता था. माया को प्रपोज करने के लिए भी कालेज के लडकों में होड थी. उस पंक्ति में महेश भी था. काफी जद्दोजहद के बाद महेश की भी ख्वाहिश प्रबल हुई और अपने दिल के अंदर छुपे प्यार का इजहार करने के लिए अंतिम निर्णय लिया.

तीन साल महेश के साथ साए की तरह रही माया के दिल में भी महेश के प्रति प्यार था. महेश की सादगी पर वह मोहित थी. उसने भी सोचा, यदि महेश ईशारा भी करेगा, वह स्वीकार कर लेगी.

बन संवर कर घर से कालेज जाने के लिए महेश ने सबसे अच्छे कपडे पहने. घर की सीडियां उतरते समय लेटर बाक्स पर नजर पडी. चिट्ठियां देखी. एक चिट्ठी उसकी थी. चिट्ठी खोली, पढते ही दिल खुशियों से नाचने लगा. कंपनी का आफर लेटर था. यह क्या, आज आखिरी दिन है औपचारिकता पूरी करने का. चिट्ठी पर तारीख देखी, कंपनी ने तो बीस दिन पहले लेटर भेजा, डाक विभाग ने बीस दिन लगा दिए, लेटर पहुचाने में. महेश सोच में पढ गया. क्या करे और क्या न करे. एक तरफ प्यार का इजहार करने का दिन है, दूसरी तरफ कैरियर का. नौकरी भी जरूरी है. वह उसे ठुकरा नही सकता. कोसने लगा डाक विभाग को, कभी समय पर डाक नही पहुंचाते. यह तो शुक्र है आखिरी दिन पहुंचा दिया, वरना, लोगों के तो इंटरव्यू निकल जाते हैं. इसी उधेडबुन में वह गली के नुक्कड तक पहुंचा. किसको चुने. नुक्कड पर फूलों की दुकान सजी थी. फूलों को देख कर सोचने लगा. कंपनी में दो तीन घंटे लगेगें. वहां की औपचारिकताएं पूरी करके कालेज में माया को प्रपोज किया जा सकता है, अब वह बेकार नही, काम काज वाला भी तो हो गया है. उसमे आत्म विश्वास अधिक हो गया. गुलाब के फूल खरीद कर भागते हुए घर वापिस गया. घर के नौकर को गुलाब के फूल देकर समझाया कि वह इन्हे क़ॉलिज जाकर माया को दे दे. पढाई के सिलसिले में माया कई बार महेश के घर आ चुकी थी. महेश के परिवार का हर सदस्य माया को जानता था. कहीं न कहीं महेश का परिवार भी चाहता था कि माया परिवार की बहू बने तो सोने पर सुहागा.

समझ गये न ये फूल माया को देना. माया तुम्हे कॉलिज केंटींन में मिलेगी.महेश मे नौकर को समझाते हुए कहा.
समझ गया साब जी, साथ में कुछ कहना है, फूल मैं दे दूंगा.नौकर ने महेश से पूछा.
कुछ सोच कर महेश ने कहा कुछ नही. बस फूल दे देना. बाकी मैं बात कर लूंगा.
माया कॉलिज केंटीन में बैठी महेश का इंतजार कर रही थी. कई लडके माया के साथ बैठने को आतुर थे, लेकिन आज वेलन्टाइन डे पर माया ने महेश के लिए कुर्सी खाली रखी थी. माया को फूल दे कर नौकर ने कहा महेश साब ने आपके लिए भेजे हैं.

महेश कहां है.
कंपनी गए हैं. देर में आएगें.
अच्छा यह बता कि महेश ने फूल देते समय कुछ कहा था.
कुछ नही.

फूल देकर नौकर चला गया. कुछ नही सुन कर माया उदास हो गई. आज के दिन उसके प्यार का इजहार सुनने के लिए बेताब थी. और महेश कुछ नही. माई फुट. फूल जमीन पर पटक कर रूआंसी हो कर चली गई. सारा कॉलिज सतब्ध हो गाय कि आज कालेज सुन्दरी माया को वेलन्टाइन डे पर क्या हो गया है.

महेश ने सोचा तो था कि दो तीन घंटे में फ्री हो जाएगा. नौकरी तो मिल गई, लेकिन छोकरी नही मिली. पूरा दिन लग गया. महेश कॉलिज नही पहुच सका. अगले दिन माया कॉलिज नही आई. महेश की आंखे माया को ढूंठती रही. माया एक सप्ताह बाद कॉलिज आई. महेश से दूर दूर रही. पढाई की कोई बात नही. कोई नोट्स नही लिया. कोई समझ नही सका माया की महेश से दूरी. महेश ने माया से पूछा तो एक उत्तर मिला कुछ नही.

माया महेश से दूर हो गई. माया को कोई नया महेश मिल गया. खूबसूरत होने का यह फायदा तो है, एक गया, कई लाईन में लगे होते हैं. किसी को भी चुन लो. समय बडा बलवान होता है. पुरानी बातें भूल कर नई खोजों में आदमी लग जाता है. पुराने साथी अलविदा होते है, नए जुड जाते हैं. महेश नौकरी और उच्च शिक्षा में व्यस्त हो गया. दोनों साथ साथ करने के कारण कान खुजाने की भी तीन साल फुर्सत नही मिली. माया उसके मस्तिष्क पटल से पूरी तरह गायब हो चुकी थी. माया को भूल गया. तीन साल बाद ममता जीवन संगनी बनी. महेश का जीवन ममता तक सिमट गया. परिवार में दो नन्हे प्राणियों मयंक और मानसी ने महेश और ममता को एक दूजे के और समीप ला दिया.

वर्तमान में    

जब से महेश चैन्नई से वापिस आया, महेश के जीवन में माया का भूचाल आ गया. महेश से मिलते ही माया उसके जीवन में समाने के लिए आतुर हो गई. हर रोज एसएमएस, ईमेल और फोन काल्स, महेश की कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि वह कैसे माया जाल से निकले. ठीक है, कि माया को प्रपोज करने वाला था, नौकरी आडे आ गई, पच्चीस साल पुरानी बात, जो भुला चुका था, याद नहीं करना चाहता है, आज महेश. उसका जीवन पत्नी और बच्चों तक ही सीमित है और रहेगा. महेश ने दृढ निश्चय किया. माया हर संभव कोशिश करने लगी, महेश की जिन्दगी में दुबारा आने के लिए. दो तीन बार तो महेश के आफिस भी पहुंच गई. महेश विवाहित है, कोई फर्क नही. महेश ने कोशिस की, कि माया उसकी जिन्दगी में फिर न आए, पर माया हर हद पार कर महेश को अपनाना चाहती थी. परन्तु महेश ने भी ठान लिया. वह माया जाल में नही फंसेगा. इतिहास खुद को दोहराता है. पच्चीस साल बाद फिर से वही होगा. नियति को भी यही मंजूर था. 14 फरवरी महेश आफिस पहुंचा. अपनी सीट पर बैठा सुबह की चाय पी रहा था. एचआर हैड ने महेश के वर्क स्टेशन पर आकर नमस्ते की.
गुड मॉर्निग मिस्टर महेश.
गुड मॉर्निग पायल जी.
महेश जी आज से आपकी सीट बदल दी है.कह कर पायल ने एक बंद लिफाफा महेश को दिया.
मुस्कुरा कर महेश ने लिफाफा खोला. उसका इंक्रीमेंट लैटर था. सीनियर वाईस प्रेजिडेंट की पोस्ट के साथ एक अच्छी सैलरी इंक्रीमेंट.
आपको केबिन अलॉट किया है, मैं आपका सामान शिप्ट करवा देती हूं.ऑफिस में सब महेश को मुबारकबाद देने लगे. सभी एक मत में बोले सर जी आज पार्टी हो जाए.
आज नही, पार्टी कल दूंगा. आज की खुशी पत्नी और बच्चो के साथ. वलेन्टाइन डे के दिन प्रमोशन पार्टी का हक पत्नी और बच्चों का है.

हिस्ट्री रिपीट इटसेल्फ. कहावत आज सच हो गई. पच्चीस साल  पहले 14 फरवरी को पूरा दिन नौकरी की औपचारकिताएं पूरी करने में बीता था और माया से नही मिल सका था. आज पच्चीस साल बाद फिर से 14 फरवरी वेलन्टाइन डे, महेश सीनियर वाईस प्रेजीडेंट. पच्चीस साल पहले नियती ने माया से जुदा किया, आज भी नियती माया को महेश से नहीं मिलवाएगी. पहले भी नही, आज भी नही, कभी भी नही.
महेश केबिन में शिफ्ट हुआ. कुर्सी पर बैठा. फोन की घंटी बजी. माया फोन पर थी. हेलो महेश, आज वेलन्टइन डे, कुछ खास बात करनी है, कहां मिले, तुमसे बात करनी है.
दो बजे क्नाट प्लेस, क्वालिटी रेस्टारेंट में मिलते हैं.
यह सुन कर माया पुलकित हो गई. पच्चीस साल बाद ही  सही महेश उसका होगा. समय से पहले पहुंच कर टेबुल रिजर्व कर महेश का इंतजार करने लगी. हाफडे करके दो बजे महेश ऑफिस से निकला. गुलाब के फूल लिए. आधे घंटे में क्वालिटी रेस्टारेंट पहुंच गया. दरबान ने गेट खोला. महेश मे नजर दौडाई. माया कोने की देबुल पर बैठी महेश का इंतजार कर रही थी. एक वेटर को गुलाब के फूल माया को देने को कहा. कोने की टेबुल पर जो खूबसूरत सी महिला है, ये फूल उनको दे दो.
कुछ कहना है, फूलों के साथ.
कुछ नही.कह कर महेश रेस्टारेंट से बाहर निकल गया. माया ने महेश को आते देखा. वह उसका इंतजार कर रही थी. वेटर ने फूल माया को दिए. ये फूल आपके के लिए उन साब ने दिए हैं. मुड कर  देखा, महेश जा चुका था. माया ने पूछा. कुछ कहा.
कुछ नही.
कुछ नही सुन कर माया सतब्ध रह गई. फूलों के साथ एक पत्र था. हेपी वेलन्टाइन डे. जो चेप्टर पच्चीस साल पहले समाप्त हो गया था. मैं उसे शुरू नही करना चाहता. वलेन्टाइन डे पत्नी के साथ रिजर्व है.

पत्र पढ कर माया पैर पटक कर रेस्टारेंट से बाहर आई. महेश जा चुका था. पच्चीस साल पहले भी माया पैर पटक कर कॉलिज केंटीन से बाहर आई थी और आज पच्चीस साल बाद क्वालिटी रेस्टारेंट से बाहर आई. उसे उम्मीद थी महेश प्रपोज करेगा. महेश पच्चीस साल पहले प्रपोज करना चाहता था, माया समझ नही सकी और आज वह अपने विवाहित जीवन में रमा बसा था. माया समझ नही सकी. महेश सन्तुष्ट था. माया जाल में नही फंसा.

महेश ने वैंगर से ढेरों  पेस्ट्री, बर्गर, कुकीज, पेटीस लेकर घर पहुंचा. बच्चे कालेज से आ चुके थे. पापा आज किस खुशी में इतना ढेरों खाने का सामान.
आज दो कारण है. पहला आप सब जानते हो.
क्या?”
भूल  गए, कालेज में सेलीब्रेट किया होगा. वलेन्टाइन डे.
पूरा कॉलिज दीवाना था. आज तो, पापा दूसरा कारण बताऔ.
आज मेरी प्रमोशन हुई है. आई एम सीनियर वाईस प्रेजिडेट नाऊ. लेस्ट सेलिब्रेट
दोनों बच्चे खुशी में झूम उठे.
खाना लगा देती हूं. आप टिफिन भी नही ले कर गए थे. कह कर गे थे जल्दी आने को, फिर भी देर कर दी.
नाश्ता लगाऔ. आज केंडल लाईट नाश्ता, डाईनिंग टेबुल पर. यही है हमारा वलेन्टाइन डे. ममता से कहा, हेप्पी वेलन्टाइन डे.
आज तक तो कभी कहा नही. आज क्या बात है.
कुछ नही.
आपका कुछ नही सुबह से समझ नही पा रही हूं. क्या है कुछ नही.
इसमे समझने की क्या बात है. कुछ नही तो कुछ नही.
फिर भी.
पति की प्रेमिका पत्नी होती है. मेरी प्रमिका और पत्नी ममता है, हमीं का जीवन सिर्फ हमीं के साथ है और कुछ भी नही.
सचमुच कुछ नही.
सचमुच कुछ नही.
फिर हेपी वलेन्टाइन डे महेश.

हेपी वलेन्टाइन डे ममता.

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