Sunday, August 28, 2011

शिष्टाचार की जय हो

एक बूडा आदमी, बहुत ही लाचार हालात में सरकार से लड रहा है। अपनी तरफ से वह नेक कार्य कर रहा है। भ्रष्टाचार भगाऔ, कुछ ऐसा ही कह रहा है। उस बूडे व्यक्ति की बात में दम तो है, तभी युवा उस बूडे की बात मान रहे है और उसका समर्थन कर रहे है। बूडा अनशन पर बैठ गया, देश का छोटा से छोटा बच्चा भी समझ रहा है, कि बूडा ठीक कह रहा है। वैसे एक बात जो माननी पढेगी, कि युवा वर्ग आसानी से बूडों की बात मानता नही है, जब मान रहा है, तो बूडे की बात में दम तो अवश्य है।

पर अफसोस। सरकार कहती है, अनशन पर बैठ गया है, तो वो क्या करे, जो बैठा है, उसकी समस्या है, भूख लगे तो खा ले, वर्ना सरकार को उससे कोई सरोकार नही है। अनशन पर अपनी मर्जी से बैठा है। सरकार से पूछा था। नही पूछा था, तो अनशन सरकार क्यों तुडवाए। भारत में प्रजातंत्र है। हर किसी को अधिकार है, कुछ भी करने का। वह बूडा कुछ भी करे। जब वह मनमानी कर सकता है, तो सरकार कोई कम थोडे है। वह भी अपने मन की करेगी। जैसा की सरकार बार बार कह रही है, देश में भ्रष्टाचार है ही नही। जिस बात पर बवाल हो रहा है, वह तो शिष्टाचार है। भारतीय परमपरा तो जीवित रखने की कसम खाई है, सरकार ने, इसी खातिर कोई जोकपाल बिल पारित न करने की कसम खाई है। कोई भी जोकपाल बिल आए, शिष्टाचार की ऊंचाई कम नही होनी चाहिए। सरकार बार बार कह रही है, जोकपाल में कोई जादू की छडी नही है, कि बिल पास किया और शिष्टाचार समाप्त। यदि शिष्टाचार समाप्त हो गया तो भारतीय परमपरा को क्या होगा, जिसका उदहारण पूरे विश्व में दिया जाता है। शिष्टाचार की जय जय। जय हो, जय हो, शिष्टाचार की जय हो।

Saturday, August 27, 2011

भ्रष्टाचार और मंहगाई

भ्रष्टाचार, मुझे माफ करे, मैं इसको शिष्टाचार कहता हूं। मुझे समझ में नही आता कि अण्णा हजारे इसे क्यों समाप्त करना चाहते हैं। सरकार सही कह रही है, कि यह तो केवल शिष्टाचार है, लोग देते है, मंत्री, सरकारी बाबू लेते है, इसमें बुराई ही क्या है। इस शिष्टाचार के बलबूते पर भारत वर्ष में करोडपतियों की संख्या बढी है। हमें इस संख्या को और ऊंचाईयों पर से ले कर जाना है। सोचो, यदि शिष्टाचार समाप्त हो गया तो मंत्री, सरकारी बाबू का तो गुजारा सैलरी में होगा नही। वो मांग करेगें, वेतन बढाने का। वेतन आयोग की सिफारिश पर वेतन बढेगा। बढे वेतन का भुगतान सरकारी खजाने से होगा। खजाना भरने के लिए नये कर लगाए जाएगे। नये करों से मार से गरीब जनता पिस जाएगी। इसका जिम्मेवार कौन होगा? सरकार गरीब जनता को पिसने से बचाना चाहती है, अत: सरकार भ्रष्टाचार सौरी शिष्टाचार और अधिक करना चाहती है। सरकार की इस मुहिम में जनता सहयोग करे।     

Thursday, August 25, 2011

प्रात: स्मरण

प्रात: स्मरण


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती

करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम् ।

समुवसने देवी पर्वतस्तनमण्डले

विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे ।।



हाथ (हथेली) के अगले भाग में लक्ष्मी का निवास है, हाथ (हथेली) के मध्य में सरस्वती तथा हथेली मूल (मणिबन्ध) में ब्रह्मा जी विराजमान हैं, प्रात: काल हाथ (हथेली) का दर्शन करें। हे पृथ्वी माता ! समुद्र आप के वस्त्र हैं, पर्वत आप के स्तनमण्डल हैं, हे विष्णुजी की पत्नी ! मैं आपको प्रणाम करता हूं – मेरे द्वारा आपका पांव से (अपने) स्पर्श के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।



Morning Prayer



On the fore from of hand (palm – tips of the fingers) resides Lakshmi (Goddess of Wealth).

In the centre thereof resides Saraswati (Goddess of Learning). In the bottom of the palm resides Lord Brahma. Every morning one should look at the palm with reverence.

O Mother Earth! The ocean is Thy clothese, the mountains Thy breast, Thou art the consort of Lord Vishnu, I salute Thee, Kindly excuse me for touching Thee with my feet.



शिष्टाचार

हम कहते है, कि वो भ्रष्ट हैं। वो कहते हैं, कि वो शिष्ट हैं। अब जाहिर है, कि एक सत्य कहेगा, और दूसरा झूठ। हम कहते हैं, कि सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है, बढावा देती है, भ्रष्टाचार को। सरकार कहती है, कि सरकार को पता ही नही, कि भ्रष्टाचार किस चिडिया का नाम है, वह जानती नही। वैसे आजकल चिडियां शहरों में से लगभग लुप्त हो गई हैं। चलो मान ही लें, कि भ्रष्टाचार जैसी कोई चिडिया का कोई अस्तित्व ही नही है, तो यह तो मानना पडेगा, कि शिष्टाचार का वजूद तो अवश्य है। शिष्टाचार हमारे संस्कार में कूट कूट कर भरा है। देखिए न, आपके घर में कुछ खत्म हो गया है, जाहिर है, पडोस किस काम आएगा। पडोसी कटोरी, प्लेट या फिर थाली में सामान आपको देगा। एक या दो दिन बाद आप पडोसी को उसकी कटोरी, प्लेट या फिर थाली वापिस करेंगें। जाहिर है, शिष्टाचार भारतीय समाज, संस्कार का एक बेहद अहम अंग है। आप पडोसी को खाली कटोरी, प्लेट या फिर थाली तो वापिस करेगें नही, कुछ ना कुछ तो उसमे रख कर वापिस करेगें। बस आप इसी बात को समझने की चेष्ठा करें। यही शिष्टाचार भारतीय सरकार में कूट कूट कर भरा हुआ है। कोई ठेकेदार, बिजिनेसमैन या कोई भी बैग में या फिर किसी भी चीज में कुछ थोडे या अधिक पैसे, रुपये किसी नेता या फिर अधिकारी को देगा, तो शिष्टाचार वश उसी बैग इतियादि में कोई लाईसेंस या कोई इजाजात या कुछ फायदा रख कर वापिस करेगा। अब हम इसे क्या कहेंगें। भ्रष्टाचार या शिष्टाचार?

यह भ्रष्टाचार नही है, यह तो शिष्टाचार है।

Monday, August 22, 2011

भ्रष्टाचार

देश से भ्रष्टाचार विदेश रवाना हो जाए, यही देश की आम जनता चाहती है। अण्णा हजारे भी कुछ इसी दिशा में काम कर रहे हैं। सरकार इलजाम लगा रही है, कि अण्णा हजारे खुद भ्रष्ट हैं, उनका दामन साफ नही है, इसलिए अण्णा से सरकार दूर रहना चाहती है। प्रश्न यह उठता है, कि भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए, या नही। जनता चाहती है, पर सरकार नही चाहती है।

आदमी गलतियों का पुतला है, कभी न कभी कोई गलती कर ही बैठता है। इसका यह मतलब तो नही, कि वह आदमी भ्रष्टाचार समाप्त करने का मोर्चा ही नही संभाल सकता। बाल्मिकी की कहानी सब जानते है। रामाणय लिखी। सरकार से डर लगता है, कहीं बाल्मिकी रामाणय पर कोई प्रतिबंध न लगा दे, कि बाल्मिकी का अतीत खराब था। तुलसीदास पर भी सवाल उठा सकती है, कि पत्नी की फटकार के बाद बुद्धि आई, इसलिए अतीत में खराबी थी, वे भी रामचरित मानस लिखने लायक नही। इस आधार पर अण्णा को कोई अधिकार नही, कि भ्रष्टाचार समाप्त करने की मुहिम उठाए।

कल टीवी पर देवआनन्द की फिल्म गाईड देख रहा था। देवआनन्द ने राजू गाईड का रोल किया, जो जालसाजी के कारण जेल की हवा खाकर दर दर की ठाकरें खा रहे थे। गांव के भोले भाले निवासियों की आस्था ने जालसाज राजू गाईड को स्वामी बना दिया. राजू स्वामी ने अपने जीवन का बलिदान दिया, किन्तु गांव वासियों की आस्था की लाज रखी।

सरकार को अण्णा या फिर उनकी टीम के किसी भी सदस्य पर आरोप नही लगाने चाहिए, कि उनका अतीत साफ नही है, गलती तो कोई भी कभी भी कर सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नही, कि वह जनता या देश के लिए कोई भी नेक काम नही कर सकता है। अण्णा जब नेक रास्ते पर चल रहे है, तो हम सबका साथ उनके साथ है। सरकार को भ्रष्टाचार का 100 प्रतिशत निर्यात कर देना चाहिए। देश में इतना अभाव हो जाए, कि शब्दकोष में भी ढूंढने से भी नही मिले। यदि सरकार यह करने में सफल होती है, तो अण्णा से एक अनुरोध हे, कि वह श्रैय न ले, सरकार को दे दें। सरकार श्रैय लेना चाहती है, तो दे दो। हम तो भ्रष्टाचार की जडे मिटाना चाहते हैं।

Sunday, August 21, 2011

ट्रैफिक जाम

रेडियो कुछ समय पहले लगभग लुप्त हो रहा था। टेलीविजन ने रेडियो का हुलिया बिगाड रखा था। रेडियो को पुन: जीवन दान में एफ एम रेडियो का योगदान रहा। रेडियो जौकी नाम की प्रजाति ने रेडियो को एक नई दिशा दी। उनकी उल्टी सीधी खट्टी मिठ्ठी चटखारे भरी बाते हमें लुभा गई। रेडियो हमारे जीवन में दुबारा आ गया। लेकिन हम एक बात भूल जाते है, कि रेडियो के पुन: जीवन में महानगरो में बढते ट्रैफिक, घर और ऑफिस की बढती दूरी है। घर से ऑफिस जाने के लिए कार निकाली, दिल्ली का ट्रैफिक है, सुबह सुबह ही ट्रैफिक जाम, ऑफिस कोई दो चार किलोमीटर की दूरी पर तो होता नही कि पहुंच गए, कुछ मिन्टों में। बीस, तीस, कहीं कहीं तो चालीस किलोमीटर का सफर भी हो सकता है। एक सडक पर फरर्टे से निकल गए, तो दूसरी सडक पर जाम मिल जाएगा। ऐसे जाम में तो किया क्या जाए। एफ एम रेडियो पर गानों के साथ साथ रेडियो जौकी की दिलचस्प बाते, और टाइम पास। यदि कार में सफर नही करते, बस या फिर मेट्रो में ऑफिस जाते है, फिर भी दूरी तो तय करनी है, बस भी जाम में फंस सकती है। मोबाइल फोन में भी तो एफ एम रेडियो है, बस टेंशन किस बात की। गीत भी सुनिए और बाते भी। मेट्रो का सफर कौन सा आसान है, ऊपर सीडी चढना, मेट्रो का सफर, नीचे आना, दूसरी मेट्रो पकडना, फिर बाहन आना, फिर रिक्शा पकडना या फीडर बस या ग्रामीण सेवा, सफर का साथी एफ एम रेडियो। धन्य है, दूरी, ट्रैफिक जाम और एफ एम का साथ। ट्रैफिक जाम की टेंशन का एक ईलाज, एफ एम रेडियो की खिच खिच।

Friday, August 19, 2011

जागो ग्राहक जागो

जागो ग्राहक जागो। सरकार का नारा है। नारा एकदम उचित और सही है। ग्राहक को जागना चाहिए। इस नारे ने आज ग्राहक को काफी हद तक जगा रखा है, लेकिन समस्या यह है, कि वह सरकार पर आंख मूंद कर विश्वास करता है, वह भी जाग कर। अत यह कहना बिल्कुल अनुचित है, कि ग्राहक जागता नही है। नौएङा जमीन विवाद में ग्राहक ने आंखे खोल कर सरकार द्वारा आवंटित जमीन पर विश्वास किया, निवेश किया। नतीजा सामने है, कि ग्राहक जाग कर भी धोखा खा गया। सरकार ने जमीन ग्रहण की और बिल्ङरों को दी। ग्राहक का भरोसा करना वाजिब है। भरोसा करके ग्राहक धोखा खा बैठा। सरकार चुप बैठी है। कोर्ट का फैसला सरकार के खिलाफ। नौएङा अथोरिटी अभी मूक दर्शक ही है। बिल्ङर ग्राहकों को दिलासा दे रही है, लेकिन दिलासा है, दिलासों का क्या?  कोई ग्राहक की वेदना नही समझता, जिसने श्रम किया, खून पसीना बहाया, कुछ बचाया, आशियाने की चाहत की। सरकार की आवंटित जमीन पर छोटे से आशियाना का सपना देखा। किसी ने शायद ठीक कहा है। खुली आंख से सपने नही देखने चाहिए। ग्राहक नासमझ है, छोटा सा बच्चा है, नादान है, जागते हुए सपने देखना का परिणाम भुगत रहे ग्राहक की पीठ पर प्यार से हाथ फेर कर यदि सरकार कुछ मदद करे, तो ग्राहक को जागा ही समझो। अब तो कहना चाहिए जागो सरकार जागो, ग्राहक की मदद करो।   

Sunday, August 14, 2011

पप्पू

पप्पू बहुत प्यारा शब्द है। पचास, साठ और सतर के दशक में जन्में हर दूसरे या तीसरे बच्चे का प्यारा सा घर का नाम पप्पू है। नाम कुछ भी हो सकता है, लेकिन ये पप्पू आज सफल डाक्टर, वकील, सीए, इंजीनियर, बिजिनेसमैन है। अच्छे, ऊंचे औहदो पर आसीन इन पप्पुऔं को सिर्फ एक तकलीफ है, चाह कर भी पप्पू नाम से छुटकारा नही पा सकते। मां बाप, भाई, बहनें, रिश्तेदार आज भी इन सफल व्यक्तियौं को पप्पू नाम से पुकारा जाता है। रिश्तेदारों की छोडो, पत्नियां भी प्यार से पतियों को पप्पू पुकारती हैं। वैसे तो पप्पू नाम से इन सफल व्यक्तियों को कोई तकलीफ नही थी, पर एक फिल्मी गीत ने पप्पू जैसे प्यारे नाम पर ग्रहण लगा दिया। आया याद? जी हां पप्पू कांट ङांस साला। थोङा पीछे और जाईए। एक विज्ञापन आया था पप्पू पास हो गया।उस विज्ञापन में दिखाया गया था, कि काफी साल परीक्षा में फेल होने के बाद पप्पू आखिर पास हा गया। संदेश सीधा साधा था, कि पप्पू निकम्मे होते है। अच्छे सफल व्यक्तियों का मजाक होने लगा। सफल व्यक्तियों का सिर शर्म से झुकने लगा। आखिर नाम से छुटकारा नही मिल सकता। सिर्फ मुसकुरा कर रह जाते है, सफल पप्पू। मन में सोचते हैं। पप्पू केन ढू एवरीथिंग। सिर्फ गुजारिश है गीतकारों, विज्ञापनों को बनाने वालों से कि पप्पू नाम बदनाम न करो।  

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...