Sunday, August 14, 2011

पप्पू

पप्पू बहुत प्यारा शब्द है। पचास, साठ और सतर के दशक में जन्में हर दूसरे या तीसरे बच्चे का प्यारा सा घर का नाम पप्पू है। नाम कुछ भी हो सकता है, लेकिन ये पप्पू आज सफल डाक्टर, वकील, सीए, इंजीनियर, बिजिनेसमैन है। अच्छे, ऊंचे औहदो पर आसीन इन पप्पुऔं को सिर्फ एक तकलीफ है, चाह कर भी पप्पू नाम से छुटकारा नही पा सकते। मां बाप, भाई, बहनें, रिश्तेदार आज भी इन सफल व्यक्तियौं को पप्पू नाम से पुकारा जाता है। रिश्तेदारों की छोडो, पत्नियां भी प्यार से पतियों को पप्पू पुकारती हैं। वैसे तो पप्पू नाम से इन सफल व्यक्तियों को कोई तकलीफ नही थी, पर एक फिल्मी गीत ने पप्पू जैसे प्यारे नाम पर ग्रहण लगा दिया। आया याद? जी हां पप्पू कांट ङांस साला। थोङा पीछे और जाईए। एक विज्ञापन आया था पप्पू पास हो गया।उस विज्ञापन में दिखाया गया था, कि काफी साल परीक्षा में फेल होने के बाद पप्पू आखिर पास हा गया। संदेश सीधा साधा था, कि पप्पू निकम्मे होते है। अच्छे सफल व्यक्तियों का मजाक होने लगा। सफल व्यक्तियों का सिर शर्म से झुकने लगा। आखिर नाम से छुटकारा नही मिल सकता। सिर्फ मुसकुरा कर रह जाते है, सफल पप्पू। मन में सोचते हैं। पप्पू केन ढू एवरीथिंग। सिर्फ गुजारिश है गीतकारों, विज्ञापनों को बनाने वालों से कि पप्पू नाम बदनाम न करो।  
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