Friday, August 19, 2011

जागो ग्राहक जागो

जागो ग्राहक जागो। सरकार का नारा है। नारा एकदम उचित और सही है। ग्राहक को जागना चाहिए। इस नारे ने आज ग्राहक को काफी हद तक जगा रखा है, लेकिन समस्या यह है, कि वह सरकार पर आंख मूंद कर विश्वास करता है, वह भी जाग कर। अत यह कहना बिल्कुल अनुचित है, कि ग्राहक जागता नही है। नौएङा जमीन विवाद में ग्राहक ने आंखे खोल कर सरकार द्वारा आवंटित जमीन पर विश्वास किया, निवेश किया। नतीजा सामने है, कि ग्राहक जाग कर भी धोखा खा गया। सरकार ने जमीन ग्रहण की और बिल्ङरों को दी। ग्राहक का भरोसा करना वाजिब है। भरोसा करके ग्राहक धोखा खा बैठा। सरकार चुप बैठी है। कोर्ट का फैसला सरकार के खिलाफ। नौएङा अथोरिटी अभी मूक दर्शक ही है। बिल्ङर ग्राहकों को दिलासा दे रही है, लेकिन दिलासा है, दिलासों का क्या?  कोई ग्राहक की वेदना नही समझता, जिसने श्रम किया, खून पसीना बहाया, कुछ बचाया, आशियाने की चाहत की। सरकार की आवंटित जमीन पर छोटे से आशियाना का सपना देखा। किसी ने शायद ठीक कहा है। खुली आंख से सपने नही देखने चाहिए। ग्राहक नासमझ है, छोटा सा बच्चा है, नादान है, जागते हुए सपने देखना का परिणाम भुगत रहे ग्राहक की पीठ पर प्यार से हाथ फेर कर यदि सरकार कुछ मदद करे, तो ग्राहक को जागा ही समझो। अब तो कहना चाहिए जागो सरकार जागो, ग्राहक की मदद करो।   
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" कब आ रहे हो ?" " अभी तो कुछ कह नही सकता। " " मेरा दिल नही लगता। जल्दी आओ। " " बस...