Sunday, August 21, 2011

ट्रैफिक जाम

रेडियो कुछ समय पहले लगभग लुप्त हो रहा था। टेलीविजन ने रेडियो का हुलिया बिगाड रखा था। रेडियो को पुन: जीवन दान में एफ एम रेडियो का योगदान रहा। रेडियो जौकी नाम की प्रजाति ने रेडियो को एक नई दिशा दी। उनकी उल्टी सीधी खट्टी मिठ्ठी चटखारे भरी बाते हमें लुभा गई। रेडियो हमारे जीवन में दुबारा आ गया। लेकिन हम एक बात भूल जाते है, कि रेडियो के पुन: जीवन में महानगरो में बढते ट्रैफिक, घर और ऑफिस की बढती दूरी है। घर से ऑफिस जाने के लिए कार निकाली, दिल्ली का ट्रैफिक है, सुबह सुबह ही ट्रैफिक जाम, ऑफिस कोई दो चार किलोमीटर की दूरी पर तो होता नही कि पहुंच गए, कुछ मिन्टों में। बीस, तीस, कहीं कहीं तो चालीस किलोमीटर का सफर भी हो सकता है। एक सडक पर फरर्टे से निकल गए, तो दूसरी सडक पर जाम मिल जाएगा। ऐसे जाम में तो किया क्या जाए। एफ एम रेडियो पर गानों के साथ साथ रेडियो जौकी की दिलचस्प बाते, और टाइम पास। यदि कार में सफर नही करते, बस या फिर मेट्रो में ऑफिस जाते है, फिर भी दूरी तो तय करनी है, बस भी जाम में फंस सकती है। मोबाइल फोन में भी तो एफ एम रेडियो है, बस टेंशन किस बात की। गीत भी सुनिए और बाते भी। मेट्रो का सफर कौन सा आसान है, ऊपर सीडी चढना, मेट्रो का सफर, नीचे आना, दूसरी मेट्रो पकडना, फिर बाहन आना, फिर रिक्शा पकडना या फीडर बस या ग्रामीण सेवा, सफर का साथी एफ एम रेडियो। धन्य है, दूरी, ट्रैफिक जाम और एफ एम का साथ। ट्रैफिक जाम की टेंशन का एक ईलाज, एफ एम रेडियो की खिच खिच।
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