Thursday, August 25, 2011

शिष्टाचार

हम कहते है, कि वो भ्रष्ट हैं। वो कहते हैं, कि वो शिष्ट हैं। अब जाहिर है, कि एक सत्य कहेगा, और दूसरा झूठ। हम कहते हैं, कि सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है, बढावा देती है, भ्रष्टाचार को। सरकार कहती है, कि सरकार को पता ही नही, कि भ्रष्टाचार किस चिडिया का नाम है, वह जानती नही। वैसे आजकल चिडियां शहरों में से लगभग लुप्त हो गई हैं। चलो मान ही लें, कि भ्रष्टाचार जैसी कोई चिडिया का कोई अस्तित्व ही नही है, तो यह तो मानना पडेगा, कि शिष्टाचार का वजूद तो अवश्य है। शिष्टाचार हमारे संस्कार में कूट कूट कर भरा है। देखिए न, आपके घर में कुछ खत्म हो गया है, जाहिर है, पडोस किस काम आएगा। पडोसी कटोरी, प्लेट या फिर थाली में सामान आपको देगा। एक या दो दिन बाद आप पडोसी को उसकी कटोरी, प्लेट या फिर थाली वापिस करेंगें। जाहिर है, शिष्टाचार भारतीय समाज, संस्कार का एक बेहद अहम अंग है। आप पडोसी को खाली कटोरी, प्लेट या फिर थाली तो वापिस करेगें नही, कुछ ना कुछ तो उसमे रख कर वापिस करेगें। बस आप इसी बात को समझने की चेष्ठा करें। यही शिष्टाचार भारतीय सरकार में कूट कूट कर भरा हुआ है। कोई ठेकेदार, बिजिनेसमैन या कोई भी बैग में या फिर किसी भी चीज में कुछ थोडे या अधिक पैसे, रुपये किसी नेता या फिर अधिकारी को देगा, तो शिष्टाचार वश उसी बैग इतियादि में कोई लाईसेंस या कोई इजाजात या कुछ फायदा रख कर वापिस करेगा। अब हम इसे क्या कहेंगें। भ्रष्टाचार या शिष्टाचार?

यह भ्रष्टाचार नही है, यह तो शिष्टाचार है।

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