Saturday, August 27, 2011

भ्रष्टाचार और मंहगाई

भ्रष्टाचार, मुझे माफ करे, मैं इसको शिष्टाचार कहता हूं। मुझे समझ में नही आता कि अण्णा हजारे इसे क्यों समाप्त करना चाहते हैं। सरकार सही कह रही है, कि यह तो केवल शिष्टाचार है, लोग देते है, मंत्री, सरकारी बाबू लेते है, इसमें बुराई ही क्या है। इस शिष्टाचार के बलबूते पर भारत वर्ष में करोडपतियों की संख्या बढी है। हमें इस संख्या को और ऊंचाईयों पर से ले कर जाना है। सोचो, यदि शिष्टाचार समाप्त हो गया तो मंत्री, सरकारी बाबू का तो गुजारा सैलरी में होगा नही। वो मांग करेगें, वेतन बढाने का। वेतन आयोग की सिफारिश पर वेतन बढेगा। बढे वेतन का भुगतान सरकारी खजाने से होगा। खजाना भरने के लिए नये कर लगाए जाएगे। नये करों से मार से गरीब जनता पिस जाएगी। इसका जिम्मेवार कौन होगा? सरकार गरीब जनता को पिसने से बचाना चाहती है, अत: सरकार भ्रष्टाचार सौरी शिष्टाचार और अधिक करना चाहती है। सरकार की इस मुहिम में जनता सहयोग करे।     
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नाराजगी

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