Saturday, February 11, 2012

चुनाव Election

पुरानी लत  छूटना मुश्किल ही नही नामुमकिन है। पहले तो हमारे नेताऔ, राजनीति पार्टियों ने नोट बांट कर चुनावों में भीड एकत्रित करनी शुरू की, अब यह हालात हो गए कि बिना नोट के यदि लोग एकत्रित होते हैं, तो नाराज हो कर नेताऔ का भाषण भी नही सुनना चाहते। यह खबर पढ कर आश्चर्य हुआ, कि मिर्जापुर में राहुल गांधी की चुनावी रैली में भीड ने नोट न मिलने के कारण भाषण सुनना उचित नही समझा और राहुल सिर्फ दो मिन्ट ही बोल सके, कि भीड नदारत हो गई। एक तरफ तो यह बात तारीफ के काबिल है, कि बिना नोट बांटे चुनावी रैली का आयोजन किया, लेकिन अफसोस की बात कि जनता सिर्फ नोट चाहती है, भाषण नही। जनता की आदत पार्टियों ने ही खराब की है, अब इतनी खराब हालात है, कि कोई अपना काम छोड कर चुनावी रेली में जाता है, तो हर्जाने की उम्मीद नोटों से चाहता है। भूखे पेट भजन नही गोपाला। भूखे पेट चुनावी रैली में भी कोई नही जाना चाहता। चुनाव आयोग को रैलियों आयोजन में हुए खर्च का हिसाब राजनीति पार्टियों से मांगना चाहिए और उम्मीदवार के चुनावी खर्च में शामिल करना चाहिए।
 

Sunday, February 05, 2012

Moment


“Never think hard about past. It brings tears.
Don’t think more about future. It brings fears.
Live this moment with a smile. It brings cheers.”

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...