Saturday, March 24, 2012

साध्वी


शहर की प्रसिद्ध वेश्या चंपाबाई ने मरते समय बारह साल की कन्या ललिता बाई, शानदार हवेली और दो करोड़ रुपये छोडे थे। चंपाबाई शाही वेश्या थी और बादशाह के संयोग से ललिता बाई का जन्म हुआ, इसलिए वेश्या होते हुए भी समाज में ऊंचा स्थान था। बादशाह के दरबार में आना जाना था। कोई आंख उठा कर चंपाबाई की तरफ नही देख सकता था। शाही वेश्या होने के कारण और बादशाह की खास मेहरबानी के कारण चंपाबाई ने धन, संपति और समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त किया। चंपाबाई की मृत्यु पर ललिता बाई हांलाकि मात्र बारह वर्ष की थी, बादशाह ने उसे मां चंपाबाई का स्थान अर्थात शाही वेश्या का स्थान दिया। ललिता बाई मां चंपाबाई से सुन्दरता में चार कदम आगे थी। बादशाह की कृपा से पढाई और नृत्य, संगीत में महारत मात्र बारह वर्ष की छोटी उम्र में कर ली।

उस दिन शाम का समय था। अब ललिता बाई सोलह वर्ष की हो गई थी। ललिता बाई हवेली की दूसरी मंजिल पर अपने कमरे में गद्दी लगा कर बैठी थी। सुन्दर गोरा रंग। सभी तरह की कलाओं में माहिर थी। मां की तरह उसने भी इस छोटी उम्र में काफी नाम और शोहरत हासिल कर ली थी, आखिर शाही वेश्या का दर्जा जो हासिल था। कमरे में सभी तरह के बाजे रखे थे। अलमारियों में सुकवियों के कविता ग्रन्थ और साहित्य रखा था। कमरे में वह एकदम अकेली थी। सितार उठा कर नाजुक कलाईयों से मधुर संगीत छेडा। गीत गुनगुनाने लगी। काफी देर तक अपने संगीत में डूबी ललिता बाई अपनी सुधबुध खो बैठी। सहसा उसकी नजर सामने दरवाजे पर टिक गई। एक ब्रह्मचारी नवयुवक को दरवाजे पर देख कर हैरान हो गई। कुछ देर तक वह उस नवयुवक को ऊपर से नीचे तक देखती रही। लंबा कद गोरा रंग, चौडी छाती, कोई भी लड़की उस युवक को देख कर गश खाकर संभल नही सकती थी। जैसे ललिता बाई किसी को भी मंत्र मुग्ध कर सकती थी, ठीक उसी तरह वह युवक भी अपने रुप से जादू कर सकता था। दोनों में बस एक फर्क था। जहां ललिता बाई एक ऊंची शाही वेश्या थी, वह नवयुवक ब्रह्मचारी एक फकीर था। उसे देख कर पहले ललिता बाई मंत्र मुग्ध हो गई, लेकिन फिर संभल कर बोली - नीचे मेरा सिपाही नही मिला था?
ब्रह्मचारी - सिपाही तो कोई नजर नही आया। 
ललिता बाई - यहां क्यों आए हो?
ब्रह्मचारी - नीचे एक आदमी से पूछा कि किसी सत्संगप्रिय सज्जन का मकान बताऔ, रात गुजारनी है। फकीर हूं। इस शहर में अजनबी हूं। तो उस ने इस मकान को इशारे से बताया कि ऊपर चले जाऔ र मैं यहां चला आया।
ललिता बाई - वह मुंह से कुछ बोला था?
ब्रह्मचारी - नही।
ललिता बाई - अच्छा तो यह बात है, फिर क्या हुआ?
ब्रह्मचारी - होना क्या है, बस मैं आपके सामने आ गया।
ललिता बाई - और वो सिपाही।
ब्रह्मचारी - कैसा सिपाही। दरवाजे पर कोई नही था। मैं तो किसी सेठजी का मकान समझ कर यहां चला आया। शायद मेरे से गलती हो गई है। आपको तकलीफ हुई। आप मुझे क्षमा करे। मैं प्रस्थान करता हूं। अब ब्रह्मचारी समझ चुका था कि उसके साथ मजाक हुआ है। यह किसी सूफीआना तबीयत वाले सेठ का मकान नही, बल्कि किसी वेश्या की हवेली है।
ललिता बाई - आप अजनबी हैं और सज्जन ब्रह्मचारी। आपसे किसी ने मजाक किया है, लेकिन आप सच्चे मन से रात बिताने आए हैं। आप को आश्रय जरूर मिलेगा। बस इतना सा काम मेरी खातिर करें कि जो भी दरवाजे पर खडा हो, उसे बुला लाए।

ब्रह्मचारी नीचे जाकर एक चौदह साल के लडके को ले आया। उस लड़के का नाम महमूद था। ललिता बाई के सामने वह हाथ जोड कर खडा हो गया। ललिता बाई तपाक से बोली – महमूद, जब ये ब्रह्मचारी ऊपर आ रहे थे तो आप कहां थे?
महमूद - पेशाब कर रहा था।
ललिता बाई - तुमने इनहे ऊपर आते देखा।
महमूद - हां हजूर।
ललिता बाई - रोका क्यों नही?
महमूद - पेशाब करते समय बोलते नही है हजूर, इसलिए नहीं रोका। मैंने सोचा, ऊपर जा रहा है, नीचे भी आएगा।
ललिता बाई - मेरे से मसखरी करता है, कोई और नही मिला तेरे को मसखरी के लिए। एक भोले बाबा के साथ मजाक करता है। अब इसकी सजा भी भुगत। पूरी जिन्दगी पेशाब करता रह, तेरी आज से छुट्टी।
महमूद - हुजूर रहम करें बंदे पर। एक छोटी सी खता पर इतनी कठोर सजा मत दें। मैं माफी मांगता हूं।
ललिता बाई - तू माफी के लायक नही हैं। एक सज्जन, भद्र पुरूष के साथ गंदा मजाक। तमाम उम्र माफी नही दी जाएगी, दफा हो जा यहां से। मेरी नजर से दूर हो जा। बादशाह से कह कर शहर से बाहर निकलवा दूंगी। कुध्र हो कर ललिता बाई ने कहा।
महमूद - मेरी खता की इतनी सजा न दो। मैं कहां जाऊंगा। आपके दर से निकाला गया तो कोई आश्रय भी नही देगा। आपके और बादशाह के हुक्म में कोई अंतर नही है।
ललिता बाई का गुस्सा शान्त नही हो रहा था। उसने चिल्ला कर कहा - मेरी आंखों के आगे से गायब हो जा। 
ब्रह्मचारी ललिता बाई और महमूद का वार्तालाप शान्त भाव से सुन रहा था। जब ललिता बाई गुस्से में चिल्लाई तब हाथ जोड कर उसने ललिता बाई से विनती की।
ब्रह्मचारी - जब आपने मुझे रात भर आश्रय देने का वायदा किया है तो एक वायदा और कीजिये। इसकी छुट्टी मत किजिए। मैं समझ चुका हूं कि इसने मेरे साथ मजाक किया है। एक सेठ की जगह एक वेश्या के घर भेज दिया। इसके मसखरेपन को माफ कीजिये और मुझे प्रस्थान की अनुमति दीजिए। जाने से पहले आप एक वायदा कीजिये कि आप इस छोटे से लडके को माफ करेंगीं। इसकी छुट्टी मत कीजिये।
ब्रह्मचारी की विनम्रता पर ललिता बाई ने महमूद को माफ कर दिया।
ललिता बाई - महमूद जा माफ किया। लेकिन इस बात को हमेशा याद रखना, कि ऐसा मजाक भविष्य में कभी दुबारा न हो।
जाते जाते महमूद ने ब्रह्मचारी के चरण स्पर्श कर माफी मांगी। महमूद के जाने के बाद ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा। यह दुष्ट महमूद तो चला गया, लेकिन मैं आपको इतनी रात में कहीं भटकने नही दूंगी। आप यहीं रूकिए। आप के रहने का प्रबंध मैं करवाती हूं।
ब्रह्मचारी - मैं एक फकीर हूं। एक वेश्या के घर नही रूक सकता। मैं अनजाने में गलती से आपके यहां आ गया।  मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूंगा। फकीर हूं, रात कहीं भी खुले में किसी पेड के नीचे काट लूंगा।
ललिता बाई – नही, आप जिस उद्देश्य से आए हैं, वे तो पूरी होंगी। आप रात्रि विश्राम, भोजन और सत्संग के लिए एक सेठ का मकान ढूंढ रहे है। आपको यहां तीनों चीजें मिलेगीं। आप सत्संगी ब्रह्मचारी बाबा हैं। मुझमें एक लडकी, वेश्या की बजाए सत्संगी सेठ का रुप देखिए। रुप, देह मत देखिए, आत्मा को देखिए। यही तो आपका ज्ञान है। शरीर तो नश्वर है। एक वेश्या नही, बल्कि एक साधारण स्त्री आपसे कुछ शिक्षा चाहती है। आपका फकीराना साथ चाहती हूं। आपसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा जीवन धन्य हो सकता है। हांलाकि मैं शाही वेश्या हूं। समाज में ऊंचा स्थान है। लेकिन मैं जानती हूं कि यह सब बादशाह के डर के कारण है। वरना लोग मुझे इतना ऊंचा स्थान कभी न दें। मेरे नम्र निवेदन को ठुकराईयें मत। अपने ज्ञान के अथाह सागर की चन्द बूंदे मुझे देकर कृतज्ञ करें।

ललिता बाई की फकीराना बातों को सुन कर ब्रह्मचारी वहां रह गया। बादशाह की कृपा से ललिता बाई ने ऊंची शिक्षा प्राप्त की थी। ललिता बाई ने पहले ब्रह्मचारी को भोजन करवाया और फिर सूफियाना बातों में मशगूल हो गई। पूरी रात बीत गई। ललिता बाई ब्रह्मचारी के ज्ञान के अथाह सागर में डूब गई। सुबह ब्रह्मचारी प्रस्थान करने लगा तो ललिता बाई ने ब्रह्मचारी को जाने से रोका।
ब्रह्मचारी - मैं अब यहां रूक नही सकता। जिस उद्देश्य से यहां आया था, वह पूरा हो गया। रात आपके साथ सत्संग में गुजर गई। भोजन भी मिला। मैं आगे प्रस्थान करूंगा।
ललिता बाई - आपके यहां रात में रूकने के तीन उद्देश्य थे। रात्रि विश्राम, भोजन और सत्संग। आपके सिर्फ दो उद्देश्य पूरे हुए, भोजन और सत्संग के। तीसरा उद्देश्य तो अधूरा रह गया, रात्रि विश्राम तो मैंने आपको करने ही नही दिया। आपके ज्ञान के अथाह सागर में इतना डूब गई कि आपको विश्राम नहीं करने दिया। आज आप विश्राम कीजिये, कल चले जाना।

ब्रह्मचारी ललिता बाई के आग्रह पर विश्राम करने रूक गया। बिस्तर में लेटते थके ब्रह्मचारी को नींद आ गई, लेकिन ललिता बाई की नींद गायब हो चुकी थी।
वह उसके व्यक्तित्व पर दिल लुटा चुकी थी। जिस ललिता बाई का बादशाह समेत हर नागरिक दिवाना था, वह एक फकीर ब्रह्मचारी पर मुग्ध हो कर होश गंवा चुकी थी। ब्रह्मचारी नींद में था और ललिता बाई खुली आंखों से ब्रह्मचारी के साथ जीवन बिताने के सपने देखने लगी। ब्रह्मचारी का साथ पा कर ललिता बाई की जिन्दगी सिर्फ एक रात्र में बदल गई। फकीराना बातें कर उसने ब्रह्मचारी को एक हफ्ते तक रोक लिया। हवेली की सबसे ऊपर की मंजिल पर रहने का इंतजाम कर दिया। पूरा हफ्ता ललिता बाई ने अपने वेश्या के पेशे को त्याग दिया और उस नवयुवक ब्रह्मचारी के साथ सुफीयाना और फकीराना अंदाज में रही।
ललिता बाई और ब्रह्मचारी के साथ की बातें शहर में हर जुबान पर होने लगी। बात बादशाह के दरबार में पहुंची। बादशाह ने ललिता बाई को दरबार में आने का हुक्म दिया, जिसे ललिता बाई ने ठुकरा दिया। बादशाह ने नाराज होकर सेना के सिपाही ललिता बाई को बंदी बनाने भेजे। बंदी बना कर ललिता बाई को दरबार में पेश किया गया।
ललिता बाई - बादशाह को सलाम। मैं आपनी शाही वेश्या की पदवी वापिस करती हूं। आप किसी और को इस पदवी से नवाजे।
बादशाह - इस गुस्ताखी की वजह।
ललिता बाई - ब्रह्मचारी के ससंर्ग में आने पर मेरी जिन्दगी का नजरिया बदल गया है। मैं भौतिक सुख त्याग कर फकीराना जिन्दगी बिताना चाहती हूं।
बादशाह - तुम्हे मौत की सजा दी जा सकती है।
ललिता बाई - कोई डर नही।

ललिता बाई के निडर तेवर देख कर बादशाह ने दरबारियों से सलाह कर यह सोचा कि जबरदस्ती ललिता बाई को बंदी बना कर उसके शरीर से खेला जा सकता है, लेकिन उसका दिल नही जीता जा सकता है। एक बेजान शरीर से खेलने का कोई फायदा नही। बादशाह ने ललिता बाई को आजाद कर दिया। हवेली लौटने पर ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा - अब मैं हर बंधन से मुक्त हूं। जैसा आप कहेंगें वैसा ही होगा। आप के साथ फकीराना करूंगी। 
ब्रह्मचारी - यहां रह कर फकीरी नही होगी।
ललिता बाई - आप जहां कहेंगें, वहीं आपके साथ रह कर आपका साथ निभाऊंगीं।
ब्रह्मचारी - मैं एक जगह टिकता नही। शहर शहर गांव गांव जा कर ज्ञान बांटता हूं।
ललिता बाई - मैं भी साथ चलूंगी।
ब्रह्मचारी - तुम्हारी सम्पति का क्या होगा।
ललिता बाई - दान दे दूंगी और हीरे का मुकुट माधव जी को चढाऊंगी फिर तुम्हारे साथ फकीरी करूंगी।
ब्रह्मचारी - सोच लो।
ललिता बाई - अब दुबारा सोचने का समय नही है। मेरा दृढ निश्चय है।

ब्रह्मचारी रूक गया। ललिता बाई ने ब्रह्मचारी को दिए वचन के अनुसार अपनी सारी संपति बेच दी या फिर दान कर दी। पूरे शहर में यह खबर आग की तरह फैल गई कि शाही वेश्या ललिता बाई ने इतनी छोटी उम्र में सब कुछ एक नवयुवक ब्रह्मचारी के लिए त्याग दिया। माधवजी का मंदिर शहर का सबसे प्रतिष्ठित मंदिर था। मुकुट चढाने की पुरानी परंपरा थी। बृहस्पतिवार का दिन, ललिता बाई बाजे गाजे और विशाल जन समूह के साथ माधव जी के मंदिर पचास लाख के हीरे का मुकुट चढाने पहुंची। पूरा नगर सिर्फ माधवजी के मंदिर को उमड पडा। बादशाह भी पूरे दरबार समेत मंदिर में उपस्थित थे। बादशाह के सिपाही भीड को नियन्त्रित कर रही थी। मंदिर के पुजारियों ने एक वेश्या के पैसो से बना मुकुट नही स्वीकार किया। चारो तरफ सन्नाटा छा गया। ब्रह्मचारी ने तब आगे आ कर कहा - माधव जी के मंदिर में नृत्य की परंपरा है। ललिता बाई नाचने के बाद अपने हाथों में मुकुट उठाएगी, अगर माधवजी मस्तक झुका देंगें तो मुकुट पहना देंगें वरना बिना मुकुट पहनाये वापिस चलें जाएंगे।

इस प्रस्ताव पर सहमति हो गई। ललिता बाई दो घंटे तक नृत्य करती रही। उसे न तो खुद का होश था और न ही अपने वस्त्रो का। जैसे ही नृत्य के बाद ललिता बाई ने मुकुट उठाया, माधवजी का मस्तक झुक गया। सभी पुजारी चुप। सबने ललिता बाई का जयजय घोष किया। एक वेश्या ने माधवजी को मुकुट पहनाया।
मुकुट पहनाने के बाद ललिता बाई ने ब्रह्मचारी से कहा - अब चलिए, फकीराना जिन्दगी की शुरूआत करते हैं।
ब्रह्मचारी - हम दोनों जवान है। एक साथ फकीरी नहीं कर सकेंगें। कही बहक गए तो?
ललिता बाई – फिर?
ब्रह्मचारी - तुम इस शहर में रह का फकीराना करो, मैं दूसरे शहर जाता हूं।
ललिता बाई - मुझे स्वीकार है।

यह सुन कर बादशाह ने शहर की सीमा पर ललिता बाई की फकीराना जिन्दगी के लिए जमीन दे दी और रहने के लिए एक छोटी कुटिया का निर्माण करवा दिया। इसके बाद ललिता बाई उस कुटिया में फकीराना जिन्दगी बिताने लगी। ब्रह्मचारी दूसरे शहर चला गया। जाने से पहले ब्रह्मचारी ने ललिता बाई को नया नाम साध्वी मां ममता दिया। साध्वी सुफीआना अंदाज में कीर्तन करती और धर्म प्रचार करती। दूर राज्यों में भी उसकी प्रसिद्धी फैल चुकी थी। सैकडों लोग रोज उसकी कुटिया में साध्वी मां ममता के दर्शनार्थ आते। ब्रह्मचारी हर साल कुटिया आता। साध्वी ब्रह्मचारी से शिक्षा प्राप्त करके आगे बांटती। हर साल कुटिया के स्थापना दिवस पर ब्रह्मचारी मौजूद रहते। साध्वी की बात का सम्मान बादशाह भी करते। साध्वी के अनुयाई बढते गए। 

कुछ वर्ष बाद बादशाह की मृत्यु हो गई। बडा लडका नया बादशाह मनोनीत हुआ। साध्वी का यौवन अभी भी बरकरार था। सादे लिबास में अब भी किसी को मनमोहित कर सकती थी। उसकी कुटिया का विस्तार हो गया था। नया बादशाह एक दिन शिकार के बाद जब लौट रहा था तब उसकी नजर साध्वी पर पडी। देखते ही वह साध्वी पर मुग्ध हो गया। उसे शाही हरम में रखने के लिए फरमान जारी कर दिया। साध्वी ने दो टूक जवाब दिया कि शाही वेश्या की पदवी वर्षो पहले छोड दी है और फकीराना जिन्दगी व्यतीत कर रही है। बादशाह ने काफी दबाव डाला, लेकिन साध्वी टस से मस नही हुई। बादशाह ने सिपाही भेजे। खबर सुनते ही नगरवासी कुटिया पर एकत्रित हो गये। सिपाहियों से जमकर मुकाबला किया। निहत्थे नगरवासी अधिक देर तक बादशाह के सिपाहियों का मुकाबला न कर सके। कई नगरवासी शहीद हो गए। साध्वी ने निहत्थे नगरवासियों के बलिदान पर दुखी होकर समाधी में जाने का फैसला कर लिया। उसने सिपाहियों को खबर पहुंचावाई कि वे निहत्थे नगरवासियों का कत्लेआम रोक दे। कल सुबह बादशाह मेरी कुटिया में आ सकते हैं। फैसला सुन कर बादशाह खुश हो गया। कत्लेआम रोक दिया गया। नगरवासियों ने कुटिया को अभी भी घेरा हुआ था। सिपाही पीछे हट चुके थे। वे सिर्फ हालात पर नजर रखे हुए थे। प्रमुख नगरवासियों ने साध्वी से उसके फैसले पर दुबारा विचार का आग्रह किया।

ललिता बाई - मैं निहत्थे नगरवासियों का दुख नही देख सकती। मैं एक फकीर हूं। मैं आप सबको वचन देती हूं कि बादशाह मेरे जिस्म को हाथ नही लगा सकेगा।

नगरवासी आशंकित थे। कुटिया के चारों तरफ घेरा डाल कर पूरी रात चैकसी करते रहे। कुटिया के अंदर साध्वी ध्यान में डूब गई। ब्रह्मचारी मुझे माफ कर देना, अब इस जन्म में तुमसे मिलन नही हो सकेगा। मैं नगरवासियों की बली नही देख सकती हूं। मैं समाधी में जाकर अपने प्राण त्याग रही हूं। आपके बताए रास्ते पर चली और ज्ञान बांटा, लेकिन अत्याचारी बादशाह के आगे बेबस हूं। मैं नगरवासियों की रक्षा चाहती हूं। उनके, अपने अनुयाईऔं की जान बचाने के लिए प्राण छोड रही हूं।

प्रभात के समय साध्वी ने प्राण त्याग दिए। सूरज की पहली किरण के साथ साध्वी मां ममता के प्राण त्यागने का समाचार आग की तरह फैल गया। निहत्थे नगरवासियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सेना के सिपाहिऔं पर धावा बोल दिया। उन के हथियार छीन कर बादशाह के महल की ओर कूच किया। शहर में बगावत हो गई। बादशाह की हवस के कारण साध्वी के प्राण त्यागने पर सेना के कुछ सिपाहिऔं ने विद्रोह कर दिया और नगरवासियों में हथियार बांट दिए। बादशाह के महल में जमकर युद्ध हुआ। अंत में जीत नगरवासियों की हुई। बादशाह को कत्ल कर दिया गया।

साध्वी मां ममता की कुटिया में उसकी समाधी बनाई गई। हर बृहस्पतिवार को समाधी पर मेला लगने लगा। छोटा सा लडका महमूद, जिसने ब्रह्मचारी से मसखरी की थी, समाधी की देखभाल करने लगा।

आज फिर कुटिया का स्थापना दिवस है। हर साल की तरह ब्रह्मचारी फिर शहर में आया। साध्वी की तलाश की तो मालूम हुआ, कि साध्वी ने शरीर त्याग दिया है। कुटिया में उसकी समाधी बन गई थी। हर बृहस्पतिवार को समाधी पर मेला लगता था। ब्रह्मचारी समाधी पर गया और नमस्तक हो गया। एक वेश्या का चरित्रोद्धार दुनिया के लिए एक अनोखी मसाल थी। ब्रह्मचारी ने कुछ दिन शहर में रूकने का विचार किया। समाधी से बाहर आकर रात्री विश्राम के लिए उसने एक सज्जन से किसी उपयुक्त स्थान का पता पूछा। वह सज्जन महमूद था। ब्रह्मचारी को देखते ही पहचान गया और मुस्कुराते हुए बोला - पहचाना नही ब्रह्मचारी, आपसे बारह साल पहले एक मसखरी की थी।
ब्रह्मचारी – महमूद, बडे हो गये हो। दाढी, मूंछ रखते हो इसलिए पहचान नही सका।
महमूद - ठीक है, मैंने उस रात आपसे मसखरी की थी, लेकिन सच यह भी है, उस मसखरी के बाद एक शाही वेश्या साध्वी बन गई।
ब्रह्मचारी - आज फिर कौन सी मसखरी करने का इरादा है।
महमूद की आंखों मे आंसू छलक आए - सोचा नही था, एक मसखरी साध्वी का जीवन बदल देगी। उसे अपने प्राण त्यागने पडेगे।
ब्रह्मचारी - चाहता तो मैं यह हूं कि तुम फिर से कोई मसखरी करो, शायद फिर कोई ललिता बाई साध्वी का जन्म ले।


नाराजगी

हवाई अड्डे पर समय से बहुत पहले पहुंच गया। जहाज के उड़ने में समय था। दुकानों में रखे सामान देखने लगा। चाहिए तो कुछ ...