Sunday, August 26, 2012

प्रेम धारा

बचपन से छंलाग मार कर यौवन की सीढी चढते हर युवा विवाह के बंधन में कैद होने के सपने देखने लगता है। युवक और युवती में कोई भेद नही है। दोनो का दिल एक जैसा धडकता है। सपनों में खो जाना और किसी के साथ जीवन भर साथ रहने की कामना करना, अपने आप ही दिल में बस जाता है। भारतीय संस्कृति कुछ अलग है, युवा दिल धडकता है, परन्तु जहां परिवार तय करता है, चुपचाप पवित्र विवाह बंधन में बंध जाता है। अपना चाह, पसन्द भूल जाते है। परिवार की पसन्द सिर आंखों में, बस वही सपनों का राजकुमार या फिर राजकुमारी, पूरी जिन्दगी उसी के संग बिताने के लिए पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर सात वचन और सात फेरे भी ले लेते हैं।

जून महीने की उमस वाली गर्मी से बेहाल सरिता साडी के पल्लू से माथे और मुंह पर आया पसीना पोंछ रही थी। अभी सुबह के सिर्फ दस बजे थे, लेकिन जानलेवा गर्मी के कारण घर के काम पूरे होने का नाम ही नही ले रहे थे। गर्मी ने बदन को निचोड कर पूरा दम निकाल रखा था। जब दम ही निकल रहा है, तो काम करने को मन ही नहीं कर रहा था। तभी बिजली गुल हो गई. छत से लटका पंखा मौन हो गया। दिल्ली नगरी में जून की गर्मी वैसे अपने में जानलेवा है, उपर से बिजली का रूठना एक आम बात है, बात बात में रूठ कर कोप भवन में बैठ जाती है, सभी यतन, प्रयतन किसी काम नही आते, कोई नही मना सकता रूठी बिजली रानी को। सरिता ने घडे से एक गिलास पानी लिया और चारपाई पर बैठ कर पीने लगी. तभी सरिता की सासूमां ने आवाज लगाई।

बेटी, मैं कथा में जा रही हूं।
ठीक है, मांजी।

पास के पार्क में एक स्वामीजी की भागवत कथा आज से शुरू हुई, जो एक सप्ताह तक चलनी है। सुबह दस से एक बजे और फिर शाम के पांच से आठ। सासूमां तो चली गई कथा में। बहुत नामी कथावाचक हैं, बहुत नाम है, टेलीविजन पर अक्सर दिखाई देते है। जब पास के पार्क में कथा बांटने आए हैं, तो कोई मौका नही चूकना चाहती है, सासूमां। वहां तो जनेरेटर से पंखे, कूलर चलेगें, सासूमां तो मजे में कथा सुनेगी और बहू सरिता गर्मी में घर के काम करेगी। कोई बात नही, यही नियती है।
पति समीर और ससुर काम पर चले गये थे। सरिता चारपाई पर लेट गई। कुछ बचपन की बाते मस्तिषक के किसी कोने से बाहर आई। कुछ हल्की सी मुस्कुराहट होथों पर छा गई। यह दिल्ली शहर में डीडीए का जनता फ्लैट, एक छोटा सा कमरा, पति, सास ससुर के साथ और वो सहारनपुर की बडी सी हवेली, मशहूर कंपनी बाग के पास, क्या यही नियति है, कि एक धन्ना सेठ की लडकी आज जनता फ्लैट में जिन्दगी बिता रही है? कहां काम करने के लिए नौकर होते थे, आज खुद सब काम करने पढते है? वो बचपन के दिन कितने अच्छे और हसीन थे। क्या कभी लौट के आएगें?

पसीने की चन्द बूंदे माथे से आंखों पर फिसल गई। साडी के पल्लू से माथा और मुंह पोंछा। खिडकी से हवा का एक हल्का सा झोंका आया और सारा चित प्रसन्न कर गया। देखा तो बाहर काले बादलों ने रौशनी को छुपा कर अंधेरे को उजागर कर दिया। बारिश की मोटी बूंदों का पर्दापर्ण हो गया। देखते ही देखते तेज बारिश शुरु हो गई। बालकनी से धुले कपडों को समेटा। सासूमां भी बारिश में भीगती तेज कदमों के साथ वापिस आ गई। सासूमां ने आते ही कथावाचक की तारीफों के पुल बांध दिये, जैसे उस जैसा और कोई कथा वाचक दुनिया में है ही नही। सरिता हूं हां करती रही, उसे किसी कथा वाचक में कोई रूचि नही थी।

पति समीर एक मोटर गैराज में मैकेनिक और ससुर फेरी में सामान बेचने का काम करते है। एक ननद, जिसकी शादी हो चुकी थी। यही उसका परिवार था। एक कमरे में सोना, रहना, बैठना सभी कुछ करना पडता है। मजबूरी है, क्या करे, सबको निर्वाह करना पडता है। रसोई को बालकनी में मिला कर थोडा बडा कर दिया, सास ससुर रात को वहां बेडरूम वनाते है और छोटा का कमरा बन जाता है, सरिता और सागर का बेडरूम।

रात को समीर की बांहों में सरिता गुम हुई पूछने लगीदेर से क्यों आते हो। सारा दिन इंतजार में बीतता है। वक्त काटते नही कटता।
अब तो आ गया हूं, कोई शिकायत नही, यह समय है, सिर्फ प्यार का। कह कर समीर ने सरिता को अपने में समा लिया। पति और पत्नी के बीच अब कोई नही, सिर्फ प्रेम, बहते प्रेम की धारा। बहते प्रेम की धारा में सिर्फ समीर और सरिता। रुपये, पैसों की कमी, जगह की कमी, कुछ नही खलता। बहती प्रेम की धारा सब कुछ भुला देता है। याद रहता है तो सिर्फ प्यार और प्रेम की धारा। पति, पत्नी और बहती प्रेम की धारा।

Sunday, August 12, 2012

स्थापना

घर में सुबह से हलचल थी। बहुत दिनों से सुरेश की चाह घर में एक छोटा सा मंदिर रखने की थी। इस वर्ष नवरात्र के शुभ अवसर पर संगमरमर पत्थर का छोटा सा खूबसूरत मंदिर घर लाए। शेरावाली माता की छोटी सी सुन्दर मूर्ती को चृण्णामत में नहला कर मंदिर में रखा। मंदिर को फूलों से सजाया। रंग बिरंगी बिजली के बल्बों से युक्त लडियों की माला को मंदिर के चारो ओर सजाया। रंग बिरंगी जलती बुझती लाईटें बहुत आकर्षक लग रही थी। सारिका ने दोनों बच्चों रक्षा और रक्षित को प्यार से समझते हुए कहा।
हमारे घर माता रानी विराजमान हुई हैं। अब हर रोज सुबह, शाम को माता रानी के दर्शन कर के आर्शीवाद लेना है। सुबह स्कूल जाने से पहले और शाम को खेलने के बाद।
दोनो बच्चों ने आज्ञाकारी बालकों की तरह सिर झुका कर मां की बात सुनी और माता रानी के सामने नमस्तक हुए।
मां, पापा हनुमान की मूर्ती नही लाए। हम हर मंगलवार को हम हनुमान जी के मंदिर जाते हैं।रक्षित ने मां से पूछा।
सुरेश मां और बच्चों का वार्तालाप चाव से सुन रहा था। बेटे के भोले मुख से निकली वाणी को उसी दिन साकार किया। अच्छा, बेटे, हम आज ही हनुमान जी को भी घर में विराजमान करते हैं।
कहानुसार शाम को घर में हनुमान जी भी विगाजमान हो गए।
मां, अब माता रानी और हनुमान जी घर आ गए हैं, तो हम मंदिर नही जाएगें, क्या?  रक्षा के इस प्रश्न पर हंसते हुए सुरेश ने कहा, मंदिर भी जाएगें। घर में भी भगवान के दर्शन करेंगें। यह मत सोचों कि भगवान मूर्ती में बसते है। हर कण में भगवान समाते हैं। हमें अपने दिल में भगवान रखना चाहिए। जब हमारे दिल में भगवान रहेगें, तो हमारा साथ अवश्य देगें। जो मांगोंगे, जरूर मिलेगा।
अगर हम कहेगें, कि पेपर में हमें अच्छे नंबर दिला कर सर्व प्रथम कर दे, तो क्या भगवान जी हमें सर्व प्रथम कर देगें?”
बच्चों के मुख से यह प्रश्न सुन कर सारिका ने उन्हे समझाया कि उन्हे पढना पढेगा। मेहनत करनी पढेगी। भगवान जी तब अवश्य मदद करेगें। तुम सर्व प्रथम भी आऔगे। पढोगें नही, मेहनत नही करोगें तुम, तो भगवान जी नाराज हो जाएगे, तुम्हे फेल कर देगें। भगवान जी कहते हैं, तुम कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो, फल मिलेगा जरूर।  हमे अपने सुख स्वार्थ के लिए भगवान की पूजा नही करनी चाहिए। हमें सब के सुख, उन्नति की प्रार्थना करनी चाहिए। सब की भलाई में ही हमारी भलाई है। बच्चों को दार्शनिक बाते समझ में कम ही आई। बस माता पिता की बातों को सुनते रहे। कहानुसार माता रानी और हनुमान जी के आगे माथा टेका।
आऔ प्रार्थना करे।
सब प्रार्थना करते हैं।
सुखी रहे संसार सब, दुखी रहे न कोई
यह अभिलाषा हम सब की, भगवान पूरी होए
विद्या बुद्धी तेजबल, सबके भीतर होए
दूध पूत धन धान्य से वंचित रहे न कोई
आप की भक्ति प्रेम से मन होए भरपूर
रोग द्वेश से चित मेरा भागे कोसों दूर
मिले भरोसा नाम का सदा रहे जगदीश
आशा तेरे नाम की बनी रहे जगदीश
पाप से हमे बचाईए करके दया दयाल
अपना भक्त बना कर हमको करो निहाल
दिल में दया उतारता मन में प्रेम और प्यार
देह हृदय में वीरता, सबको दो करतार
नाराण्य तुम आप हो प्रेम के विमोचन हार
क्षमा करो अपराध सब, कर दो भव से पार
हाथ जोड विनती करूं सुनिए कृपा निधान

सद संगत सुख दीजिए दया नमृता दान

Friday, August 10, 2012

रक्षा


रक्षा

सुईवालान की तंग गली में नगमा तेज कदमों के साथ फराटे दार चाल से चल रही थी। सामने रास्ता रोक कर रहमान खडा हो गया। नगमा कुछ नही बोली, साईड से निकलने की नाकाम कोशिश की। रहमान ने नगमा का हाथ पकड लिया।
जानेमन, कब से इंतजार कर रहे है, दिल हथेली पर रखा हुआ है, तडपा कर कहां चली जा रही हो।
नगमा कुछ नही बोली और मौका पा कर साईड से निकल कर भागी, सांस फूल गई, लेकिन भागना नही छोडा। रास्ते में तीन, चार जन से टकरा भी गई। घर पहुंच कर चौखट पकड कर खडी हो गई। सांस फूल रही थी, हांफते हुए दो पल रूकी, फिर घर में प्रवेश किया। घडे में गिलास डाल कर पानी निकाला और गट से पी गई। सलमा राखियां बना रही थी। इस बार अच्छा ऑर्डर मिला। सलमा खुश है, कि ईद अच्छी मनाएगी। नगमा को गुमसुम देख कर पूछा कॉलिज से आ गई, क्या खाएगी।
अभी कुछ नही खाना है, तुम क्या कर रही हो।
इस साल राखियां बनाने का बडा ऑर्डर मिला है। ईद अच्छी जाएगी, बता क्या लेगी ईद पर।
मां को खुश देख कर अपना दर्द भूल गई। सुईवालान की एक पुरानी हवेली के एक छोटे से कमरे में सब कुछ है। कमरा भी, एक तरफ रसोई। बाथरूम, टॉएलेट कॉमन है, सब के साथ। तीन छोटे भाई बहन बाहर उछल कूद कर रहे होगें। अब्बा जुम्मन को घर परिवार से कोई ताल्लुक नही है। दिन में जो कमाना, शाम को शराब में उडाना। बीवी, बच्चों की परवाह किए जमाना बीत गया था। घर का खर्च सलमा छोटे मोटे काम करके बस पूरा कर ही लेती है। रात में जुम्मन ने घर क्या प्रवेश किया, हंगामा खडा कर दिया, एक तो खराब का नशा, ऊपर से गली के लोगों ने नमक मिर्च लगा कर रहमान का किस्सा सुना दिया।
जानती नही, रहमान को, उससे उलझ गई, सुईवालान में रहना दूभर कर देगा। कह देता हूं, अगर रहमान से कोई पंगा लिया, चुपचाप बात मान ले रहमान की।होश था नही, धम से चारपाई पर औंधा लेट गया।
बाप की बात सुन कर नगमा का तन बदन आग से सुलग गया। ऐसे बाप होते हैं, एक नंबर का आवारा, बदमाश लडकी को छेडता है, बाप कहता है, कि उसकी मान ले, रख कर एक देना था उसको।
सलमा ने टोका चुप कर, कोई फायदा नही है, चारपाई पर औंधा पडा है।
मां बेटी रात को रहमान के बर्ताव पर चर्चा करती रही। नगमा ने दो टूक कह दिया, कि वह रहमान के आगे नही झुकेगी, वह सलमा से पूरा सहयोग चाहती है। उसका सपना पढ लिख कर कुछ करने का है। उसके निकाह की बात दिल से ही निकाल दे। सलमा भी सोचने लगी, उसको क्या मिला, छोटी उम्र मे निकाह, चूहले और बच्चों की परवरिश की सारी जिम्मेवारी उठा रही है, पति से क्या मिला, सिर्फ चार बच्चे। बेटी कुछ बन जाए, वही अच्छा है। उसका जमाना कुछ और था, लेकिन अब मुसलमान परिवारों से लडकियां टीवी रिपोर्टर, जर्लनलिस्ट बन रही है। समाज में इज्जत है।

सुबह जुम्मन उठा, नशा टूटा, पडोसियों की कानाफूसी से क्रोध बढ गया। कमरे में घुस कर आसमां सिर पर चढा लिया। दो चार लात जमा कर बर्तनों को तहस नहस किया, शोर मचाया। पडोसी बाहर जमा होकर तमाशा देखने लगे। नगमा ने मां से कहा अब्बा से कहो, घर से चले जाए, ऐसे घर का समान तोडने से कोई इज्जत नही बढेगी। बीवी की कमाई पर शराब उडाने वालों की कोई परवाह नही करता है। मेरे बारे में कुछ न बोले। मैं अपना रास्ता खुद बना रही हूं। अगर मेरे रास्ते में टांग अडाई, तो अच्छा नही होगा।कह कर किताबे उठाई, अम्मी कॉलेज जा रही हूं।
नाश्ता।सलमा ने पूछा।
कॉलेज केंटीन में।
रूक जा। दस मिन्ट में नाश्ता बन जाएगा।
नगमा रूकी नही। कॉलेज की ओर रवाना हुई। सुईवालान से जाकिर हुसैन कॉलेज दो किलोमीटर का सफर कूंचे, गलियां से पैदल ही पूरा होता है। उदास मन से क्लास छोड कर कैंटीन में एक कोने की टेबल पर बैठ गई। भूख लग रही थी, लेकिन खाने का दिल नही कर रहा था। प्रकाश कैंटीन में नगमा को देख कर उसके पास कुर्सी खींच कर बोला। आज क्लास नही है, क्या?”
नगमा ने अपना दुखडा छुपा कर पढाई की बातें शुरू की। प्रकाश नगमा की क्लास में पढता था। रिहाईश भी सुईवालान के समीप बाजार सीताराम में थी। प्रकाश पढने के साथ ट्यूशन भी करता था, इससे वह अपनी पढाई का खर्च पूरा करके कुछ घर में योगदान भी कर देता था। प्रकाश को देख कर नगमा ने भी ट्यूशन करके अम्मी का कुछ बोझ कम करने की ठान ली। समस्या अब्बा, अडोस पडोस की थी। अब उसने ठान ली, कोई कुछ भी कहे, समाज ने सिर्फ ताने ही मारने हैं। कहने के अलावा कुछ नही करना है। उसने अपना रास्ता खुद ही बनाना है। उसने प्रकाश से कुछ ट्यूशन दिलवाने को कहा। पांच दिन बाद प्रकाश ने दो छोटे बच्चों की ट्यूशन की बात की। बच्चे कूचा पातीराम में रहते थे। नगमा ने हामी भर दी। शाम को अम्मी से बात की। सलमा ने हामी दी। वह खुद कामकाजी महिला, जिस का पति, सिर्फ कमाई को शराब में फूंकना जानता था। जुम्मन को पता चला, तो बवाल मचाया। मेरी लडकी हिन्दू घर में बच्चे पढाने नही जाएगी। हवेली जमा हो गई। सब तमाशबीन, आग में घी डालने के अलावा कुछ विशेष नही किया। सलमा ने मोर्चा सम्भाला। जुम्मन की ओर ईशारा कर के कहा।
ऑटो चलाते हो, सवारी को पूछ कर बिठाते हो, वो हिन्दू है या मुसलमान। मैं कपडे सिलती हूं, कौन पहनेगा। मैं नही सोचती। घर चलाने के लिए राखियां बना रही हूं, सब जानते है, कोई मुसलमान नही खरीदेगा, मेरा तो चूल्हा जलता है, इन राखियों से। ये कपडे देखो, भगवान कृष्ण के। सिलती हूं, ताकी मेरे घर का चूहला जलता रहे, बच्चों की स्कूल फीस जाती रहे।
जुम्मन की बोलती बंद हो गई। सलमा ने एक मिंया को कहा। तुम तो बडाई हो, कभी किसी हिन्दू का काम नही किया? और फिर दूसरे मियां से कहा तुम सफेदी करते हो, क्या कभी किसी हिन्दू के घर सफेदी नही की?”
सलमा के प्रश्नों का किसी के पास कोई उत्तर नही था। सब खिसक गए। सलमा की बातों में सोलह आने सच्चाई है।  जब कमाई की बात होती है, कोई जात पात, धर्म नही सोचता, सोचता है, सिर्फ रूपयों की। रूपया कमाने के बाद दूसरों को धर्म का पाठ पढाता है। नगमा ने ट्यूशन शुरू कर दी। अपनी पढाई का खर्च निकाल कर सलमा के हाथ में बाकी रूपये रखे तो सलमा गद गद हो गई।

एक शाम नगमा ट्यूशन पढा कर घर वापिस आ रही थी। गली में रहमान अपने कुछ छुटभईयों के साथ पनवाडी की दुकान पर खडा रौब झाड रहा था। नगमा को देख कर तन कर नगमा के आगे खडा हो गया। फिल्मी अंदाज में नगमा का हाथ पकड लिया जानी, रहमान नाम है, हमारा, रहमान।
छुटभईयों ने ठहाका लगाया भाई जान बोबी के प्रेम चोपडा की याद दिला दी। नगमा भाभी किसी डिम्पल से कम नही है।
नगमा ने हाथ छुडाने की नाकाम कोशिश की। रहमान ने नगमा को अपनी ओर खींचा और सीने से लगा लिया। नगमा हतप्रभ हो गई। छटपटाने लगी। छुटभईये ठहाके लगा रहे थे। गली में भीड थी, लेकिन छटे हुए बदमाश रहमान का सामना करने की कोई हिम्मत नही कर पाया। प्रकाश ट्यूशन खत्म करके वहीं से गुजरा। भीड को देख कर ठिठक गया। बेबस भीड को देख कर रहमान की हिम्मत बढ गई। सुन लो सुईवालान वालों, आज से नगमा मेरी बेगम, शरीकेहयात हुई। किसी को कुछ कहना है। कुछ नही कहना न, शाबाश, सुईवालान वालों, शाबाश।
रहमान शेखी बखार रहा था, बंधन से मुक्त हो नगमा हडबडाई और भागने का प्रयत्न किया। प्रयास असफल रहा, वह गिर पडी। भीड से निकल कर प्रकाश ने कुछ हिम्मत दिखा कर कहा। नगमा को छोड दो।
क्यों तेरी बहन है, क्या?” कह कर रहमान ने ठहाका लगाया।
सलमा तभी राखियां सप्लाई करने के लिए गुजरी, नगमा अम्मी से लिपट गई और हाथ से थैले में से एक राखी निकाल कर प्रकाश के हाथ पर बांध दी।
चितौड की रानी करनावती ने हुमांऊ को रक्षा के लिए सिर्फ राखी भेजी थी। मैंने बांध दी है।
तेरा हुंमाऊ कुछ नही कर सकेगा।कह कर जोर से ठहाका लगाया। रहमान घमंड के नशे में झूम रहा था। हाथ में राखी बांधे प्रकाश में बिजली से भी अधिक तेजी और बल आ गया। हाथ की किताबों को रहमान के मुंह पर दे मारा। अचानक हमले से रहमान संभल नही सका और पास पढे ठेले से जा टकराया। प्रकाश ने दो चार घूंसे उसके पेट और मुंह पर दे मारे। बिना किसी प्रतिरोध के रहमान धाराशाही हो गया। उसके छुटभईये बगलें झाकने लगे। रहमान को चित देख सलमा और नगमा ने भी पिटाई शुरू कर दी। बहती गंगा में सब हाथ धोते हैं। दो चार राहगीर भी रहमान की पिटाई में शामिल हो गए। भीड से धिरा देख छुटभईये भाग खडे हुए। रहमान कहारता रहा, कोई मदद को नही आया। नगमा और सलमा वीरागंना की तरह गर्व से सीना ताने भरी गली में प्रकाश का हाथ थामे कहने लगी। हमारे भाई ने लाज रख ली।
नगमा और सलमा की आंखे नम थी। प्रकाश ने हाथ जोड कर कहा मैंने नगमा की बांधी राखी का मान रखा है।     

षड़यंत्र

कुछ तनतनी सी लगती हो कुछ अनबनी सी लगती हो क्यों झगलाड़ू सी लगती हो क्यों चंडी सी लगती हो मुझे किसी षड्यंत्र ...