Sunday, September 30, 2012

शादी की वजह

शनिवार की शाम, चार मित्रों की महफिल सज गई। बारी बारी से हर शनिवार को किसी एक मित्र के घर महफ़िल जमती है। इस शनिवार महेन्द्र के घर एकत्रित हुए सुरेन्द्र, नरेन्द्र और राजेन्द्र। ताश की गड्डी एकदम नई, चमचमाती हुई। पत्ते फेटने के बाद बाटे गए और ताश के खेल के साथ गपशप शुरू हो गई। चारों बचपन से लंगोटिया यार, स्कूल के जमाने के। एक ताश ने बांध के रखा है, वरना कब के बिछुड गए होते।
ताश के खेल को ब्रेक लगा। महेन्द्र के रिश्तेदार शादी का न्योता देने आए। महेन्द्र रिश्तेदारों के साथ कुछ समय के लिए व्यस्त हो गया। दूसरे कमरे में बैठे बाकी तीन दोस्त गपशप में व्यस्त हो गए। कुछ देर तक जब महेन्द्र रिश्तेदारों के साथ व्यस्त रहा, तब सुरेन्द्र ने ताश की गड्डी एक साइड में रखी।
राजेन्द्र – यार ताश क्यों रख दी?“
सुरेन्द्र – यह महेन्द्र कहां सो गया?“
नरेन्द्र – सोया नही, रिश्तेदारों के साथ व्यस्त है।
सुरेन्द्र – रिश्तेदार शादी का कार्ड देने आए थे। लगता है, डोली यहीं से लेकर जाएगें।
तीनों दोस्त खिलखिला के हंस पडे।
राजेन्द्र – यह शादी के कार्ड पर पुरानी बात याद आ गई। हम शादी क्यों करते हैं?”
नरेन्द्र – सीधी बात है, औरत और मर्द को प्रकृत्या एक दूसरे की जरूरत की जरूरत होती है, इसलिए शादी करते है।
राजेन्द्र – यार तू तो दार्शनिक बात कर रहा है। कोई और कारण भी होगा?“
सुरेन्द्र – जब तक महेन्द्र हमें ज्वाईन नहीं करता, इस बात पर चर्चा करते है, कि आदमी शादी क्यों करता हैं?“
नरेन्द्र – जो बात मैंनें कही, वही कटु सच है, आदमी और औरत को प्रकृत्या एक दूसरे की जरूरत होती है, इसलिए शादी करते हैं। एक उम्र के बाद मां बाप बच्चों के विवाह की सोचते हैं। अगर मां बाप नही सोचते, तो लडका, लडकी खुद इस विषय में सोचते है और प्रेम विवाह करते हैं और कोई कारण हो ही नही सकता शादी का।
राजेन्द्र – तो शादी तुम ने इस कारण की?“
नरेन्द्र – सच बोल रहा हूं। गीता पर हाथ रख कर कह सकता हूं।
सुरेन्द्र और राजेन्द्र हंस पडे – भई, भाभीजी की कसम खा रहा है, यार हमारा।
नरेन्द्र मुस्कुरा दिया – क्या करूं, बीवी का नाम गीता है। बदल नही सकता।
तभी महेन्द्र भी रिश्तेदारों से निबट कर महफिल में शामिल हो गया।
राजेन्द्र – महेन्द्र भी आ गया, चलो इसी से पूछते है, भई इसने शादी क्यों की?”
महेन्द्र गंभीर मुद्रा में – सच कहूं या झूठ?“
नरेन्द्र – जो तेरी इच्छा हो, वोही बोल दे, सच या झूठ, सब चलेगा, यारों की महफिल में।
चारों दोस्तों का जोर का ठहाका लगा।
महेन्द्र – नरेन्द्र की बात में सच्चाई है, शादी के लिए मैं कुछ रूक सकता था। लेकिन एक बात यह भी है कि बाप ने कहा। पार्टी मालदार है। हां कह दे, ऐश करेगा, पूरी लाईफ, कर ली, लडकी अमीर थी, इसलिए शादी कर ली। अब तुम भी कहो, कि तुमने शादी क्यों की?“
सुरेन्द्र – य़ार तुम को तो मालूम है, कि शादी से पहले अवारागर्दी करता था। मां बाप परेशान थे कि लौंडे को कैसे सही रास्ते पर लाया जाए। दादा जी ने कहा। शादी कर दो, बीवी दो जमाएगी। कमाने धमाने लगेगा। बस इसी चक्कर में शादी कर ली।
नरेन्द्र – शादी के चक्कर में फंसे कैसे?“
सुरेन्द्र – पहले तो मैं लडकी देखने को तैयार नही था। बाप मे कहा, एक बार देख ले। खूबसूरत है। सुन्दरता पर मर मिटा। शादी कर ली। दादा का कहना सही निकला। महीने बाद ताने देने लगी। बाप की कमाई पर कब तक ऐश करते रहोगे। काम धन्धा करो। बाप की दुकान पर बैठा, फिर बात बनी, नही तो छोडने की धमकी देने लगी थी। वोही बात आजकल में अपने लौंडे से कर रहा हूं। अब राजेन्द्र तू बता, तूने क्यों की?“
राजेन्द्र – मैं हमेशा से कम बोलने वाला रहा हूं। मांबाप ने शादी की बात की, कहने लगे, चुप रहने से कुछ नही होगा। खानदान, वंश आगे बढाने के लिए शादी जरूरी है। कुछ बोल ही नही सका। खामोश रह गया। मांबाप ने शादी तय कर दी।
तभी महेन्द्र की पत्नी मीना ने कमरे में प्रवेश किया।
मीना – किस बात पर जोरों से ठहाका लगाया जा रहा है।
नरेन्द्र – भाभीजी, मजाक जरूर हो रहा है, किन्तु मुद्दा गंभीर है।
मीना – कुछ बताऔ, तो जाने?“
नरेन्द्र –हम शादी क्यों करते है? कोई वजह तो जरूर होती है। हम अपनी अपनी शादी करने की वजह बता रहे है।
मीना – जरा हमें भी तो मालूम हो, वो क्या क्या कारण रहे, चार यारों के।
नरेन्द्र – "हमारा डिस्कश्न तो हो गया। मैं महिलाऔं से शादी करने के कारण जानना चाहता हूं।
मीना –सच बोलू या दिल खुश करने की बात करूं?“
नरेन्द्र – सच भी बोलिए, ठिठोली भी किजिए।
मीना – मुफ्त में नौकरी करने का सिर पर भूत सवार हो गया था, इसलिए शादी की थी।
महेन्द्र – औह माई गॉड, क्या कह रही है। मेरा तो फलूदा निकाल दिया। सारी कायानात तेरे हवाले कर दी, कह रही है, मुफ्त की नौकरी।
मीना – देखो, नौकर लोगों को हफ्ते में एक छुट्टी मिलती है, हमें कब मिलती है। आज कोई नौकर नही है, घर में एक कह कर छुट्टी ले गया, दूसरा बिन बताए छुट्टी कर गया। हम तो न बता कर छुट्टी कर सकते है, न बिना बताए। जाए तो जाए कहां? करें तो करे क्या? आप तो ताश खेलने बैठ गए। रसोई में तो जुतना पडेगा। कोई रास्ता है ही नही।
महेन्द्र को तो जैसे कोई सांप सूंघ गया हो। नरेन्द्र ने बात सँभाली।
नरेन्द्र – भाभी जी, मुफ्त की नौकरी शादी के बाद हर कोई करता है। पति और पत्नी शादी के बाद एक दूसरे के नौकर होते है और मालिक भी। विवाह के बाद गृहस्थी शुरू होती है। पति, पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं, बिना एक दूसरे के गृहस्थी की गाडी सरकना ही भूल जाती है। कभी कोई नौकर बनता है, तो कभी मालिक। कभी कोई बात मानता है, तो कभी मनवाता है। कभी मान लो, कभी मनवा लो। यही जिन्दगी का सिलसिला है।
मीना – भाई साहब, कुछ ज्ञान महेन्द्र बाबू को भी दीजिए। हमेशा ठिठोली करते रहते हैं।
नरेन्द्र – जिन्दगी खुद एक पहेली और ठिठोली भी है। जिसको जानना, समझना बहुत मुश्किल है। मेरे जैसी गंभीरता हमेशा अच्छी नही, तो महेन्द्र जैसी ठिठोली भी। आपका संतुलन मुझे अच्छा लगता है।
मीना हंसती हुई काम में जुट गई और चार यार ताश खेलने में।
एक प्रश्न फिर भी शेष है?
कौन सा। ?    
हो तो शेयर करें। हैई और चार यार ताश खेलने में।
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वही शादी की असली वजह क्या है? प्रकृत्या या फिर कुछ और? आप की क्या राय है?


Sunday, September 16, 2012

लिव इन रिलेशन

सुबह के समय पार्क में सैर करते हुए रमेश और सुरेश बैंच पर बैठ गए। रमेश ने अखबार खोला, एक पन्ना सुरेश ने लेकर पढना शुरू किया।
यार रमेश, यह दुनिया कहां जा रही है।
मुझे तो दुकान जाना है, दुनिया कहां जा रही है, अधिक सोचना नही चाहिए। हमारा व्यापार कहां जा रहा है, यह सोचने का विषय है।
व्यापार तो पूजा है, धर्म है, उसमें लिप्त हम सारा दिन रहते है, पर कभी कभी घर, समाज के बारे में भी सोचना चाहिए।
व्यापार तरक्की करेगा, घर, बाहर हर तरफ शान्ति रहेगी। बिना लक्ष्मी न तो संगत मिलती है, न ही इज्जत।
हम दोनों व्यापारी है, सारा दिन दुकान पर व्यतीत करते है। जागते, खाते याहां तक की नींद में भी सपने व्यापार के आते है।
हां, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो, सुरेश भाई। लेकिन आज अचानक से समाज, दीन, दुनिया की कहां से याद आ गई।
यह खबर पढ, रमेश। कह कर समाचार पत्र का पन्ना सुरेश ने रमेश को पकडा दिया।
रमेश समाचार पढने लगा। लिव इन रिलेशन में युवती की हत्या। रमेश बोल बोल कर समाचार पढ रहा था। उसकी आवाज से आस पास सैर कर रहे कुछ व्यक्ति इकठ्ठा हो गए। सभी अपनी अपनी राय प्रकट करने लगे।
पहला व्यक्ति – तौबा, तौबा, यह दुनिया कहां जा रही है। आजकल के युवा भ्रष्ट हो गये हैं। विवाह को मजाक बना दिया है। बंधन समझते है, विवाह को। बिना विवाह के साथ रहेगें। नया नाम दे दिया लिव इन रिलेशन। वाह भाई वाह, क्या जमाना आ गया है।
दूसरा व्यक्ति – भाई साहब, आज कल यह एक भयंकर बीमारी है। अधिक पैसे कमाने वाले युवा, युवतियां इसकी चपेट में आ गए है। मैं तो कहता हूं, कि पुराना जमाना सही था, जब छोटी उम्र में विवाह हो जाते थे। कम से कम तो इस बीमारी से तो बचते थे।
तीसरा व्यक्ति – हमारे जमाने में तो यह बीमारी ही नही थी। हमें तो हुई ही नही।
चौथा व्यक्ति – अरे भाई, बिना विवाह के साथ रह रहे हो, रहो, कत्ल शत्ल क्यों करतो है। पहले साथ रहो, फिर कत्ल कर दो। बाप रे बाप।
सुरेश – समाचार में लिखा है, कि लडकी गर्भवति हो गई, उसने शादी का दबाव बनाया। लडका माना नही और छुटकारा पाने के लिए कत्ल कर दिया।
पांचवा व्यक्ति – जब साथ रह रहे है, जो काम हमने शादी के बाद किया, वह अब पहले करते है। चोला पहना दिया, लिव इन रिलेशन का। विवाह करो, जो सब करते है, करो, किसने रोका है। समाज का नियम है। विवाह करो, सब कुछ करो।
छठा व्यक्ति – हर मां बाप की इच्छा होती है, उनके बच्चे शादी करे। बात करो तो साफ मना कर देते है, फिर लिव इन रिलेशन में रहते है। जब साथ रहना है, विवाह कर लो।
सातवां व्यक्ति – भाई साहब, यह सब घर से दूर रहने का नतीजा है। घर में रहे तो इतनी हिमम्त नही हो सकती। दूसरे शहरों में मां बाप से दूर रह कर नौकरी करते है। एक उम्र को बाद इच्छा होती है, पठ्ठे शादी नही करते, इधर उधर मुंह मारते रहते है, कभी किस के साथ, कभी कहां। लिव इन रिलेशन का नाम दे देते हैं।
सुरेश – सब की बातों से एक बात सपष्ट है, कि यदि विवाह के पवित्र बंधन में बंधे तो इस लिव इन रिलेशन की बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।
रमेश – सबसे बडी बात है, औरत और मर्द को प्रकृत्या एक दूसरे की जरूरत होती है। इसलिए विवाह की परमपरा समाज में शुरू हुई। जब एक उम्र के बाद हम इसकी अनदेखी करेगें, तो कुदरत उन्हे खुद बखुद इसके लिए मजबूर करती है। समाज की नजरों से बचने के लिए लिव इन रिलेशन का नाम देते है।
सुरेश – विवाह के बजाए लिव इन रिलेशन में रहने का कारण एक यह है, कि विवाह के बाद परिवार का दायित्व संभालना नही चाहते। बच्चों, उनकी परवरिश, दायित्व नही चाहते। सिर्फ अकेले जीना चाहते है। सेक्स चाहते है, परिवार नही चाहते।
आठवां व्यक्ति – आप इस केस को देखे, लडकी गर्भवति होले के बाद बच्चा चाहती थी, परिवार बनाना चाहती थी, इसलिए विवाह के लिए लडके को कहा, लेकिन ताली एक हाथ से नही बजती। लडका नही चाहता था, छुटकारा पाने के लिए कत्ल कर दिया।
नवां व्यक्ति – यह बीमारी अमेरिका, यूरोप से आई है। वहां कभी एक के साथ, तो कभी दूसरे के साथ। यह हिन्दुस्तान में फैलती जा रही है।
सुरेश – बीमारी कहां से आई, लेकिन खराब है। हम सब को समझना चाहिए, कि विवाह ही एक मात्र उत्तम तरीका और माध्यम है, प्रकृति का फल चखने के लिए।
रमेश – बच्चे जहां भी रहे, घर में, घर से दूर, सब को समझना चाहिए कि यह पल दो पल का छणिक सुख नही है, कि लिव इन रिलेशन से पूरा किया जा सके। विवाह ही एक मात्र माध्यम है। बच्चे बोझ नही, जरूरत है। व्यक्ति में समपूणता परिवार के साथ आती है। पति, पत्नी को एक दूसरे का शारीरिक, मानसिक सहारा होता है, सुख, दुख में साथ साथ रहते है, ये सब लिव इन रिलेशन में नही मिलती हैं।
दसवां व्यक्ति – तुम ठीक कहतो हो। लिव इन रिलेशन में सिर्फ पल भर का मजा है, जिन्दगी का आनन्द नही है। परिवार में सुख, दुख, सबके साथ रहने, शेयर करने में ही जीवन का आनन्द है। जो लिव इन रिलेशन में नही है।

सैर के सभी साथियों ने हां में हां मिलाई। रमेश और सुरेश ने समाचार पत्र लपेटा और भावुक भाव में घर के लिए रवाना हुए।   

बुढापा

कुछ उम्र में बढ़ गया कुछ जिस्म ढल गया कुछ पुराना हो गया कुछ बुढापा आ गया कुछ अनुभव आ गया कुछ कद्र भी पा गया...