Tuesday, December 25, 2012

जय से दोस्ती

नये सत्र में स्कूल का आज दूसरा दिन, जय अब पांचवी कक्षा में पहुंच गया। नये सत्र के पहले दिन बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई थी। सुबह प्राथना सभा के बाद नई कक्षा में सभी बच्चों ने अपनी अपनी सीटों पर बैठना शुरू किया। सभी छात्रों ने पिछली कक्षा के अनुसार सीटों का चुनाव किया। मैडम सहगल ने कक्षा में प्रवेश किया।
गुड मॉर्निंग मैम।
गुड मॉर्निंग स्टूडेन्टस। आज से आपका नया सत्र शुरू हो रहा है और आपका सीटिंग आपके रिजल्ट के हिसाब से बनाया गया है। जिन बच्चों के अधिक नंबर आए है, उनके साथ कम नंबर वाले बच्चों की सीटिंग की गई है।
सभी बच्चों को इस नए क्रम में बिठाया गया। रक्षित के साथ सीट खाली रही। रक्षित सोच में डूब गया, क्या वह अकेला बैठेगा। दो दो बच्चों की जोडी अच्छी रहती है। बच्चों में दोस्ती बनती है। आपस में पढाई से खेल कूद तक सभी में साझीदार बनते है।
मैम मेरे साथ कौन बैठेगा।रक्षित ने उदास हो कर पूछा।
रक्षित तुम्हारे साथ नया छात्र जय बैठेगा। वह एक होनहार और प्रतिभाशाली विद्यार्थी है। इसी सत्र में उसका दाखिला हुआ है।
तभी जय ने कक्षा में प्रवेश किया और मैडम सहगल ने उसे रक्षित के साथ बिठाया। जय रक्षित की उम्र का, लेकिन कद में थोडा लम्बा और बदन गठीला। एक पहलवान की तरह शरीर जय का। लंच अंतराल में रक्षित और जय में बातचीत हुई। दोनों ने अपने टिफिन खोले और नाश्ता करते हुए बाते करते रहे।
रक्षित – तुमने नया एडमिशन लिया।
जय – हां, कल में आया था, लेकिन छुट्टी हो गई थी।
रक्षित – तुम्हे पता है, कल बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हुई थी। जिस बस में मैं आता हूं, उस बस का भी।
जय – अच्छा, तुम्हे चोट आई क्या?”
रक्षित – मुझे सुबह उठने में देर हो गई थी, मेरी बस छूट गई थी। पापा ने कार में स्कूल छोडा। यहां आया तो मालूम हुआ, कि बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई।
जय – देर से क्यों उठे। 
रक्षित – मेरे सपने में शेरां वाली मां आई थी, कहने लगी, कि पापा की कार में स्कूल जाना। मेरे साथ बहुत देर तक बाते करती रही, और इस कारण देर से आंख खुली। स्कूल बस छूट गई और मैं पापा की कार में स्कूल आया। शेरांवाली मां ने मुझे ऐक्सीडेन्ट से बचा लिया।
जय – तुमने सपना देखा होगा। शेरावाली तुम्हारे सपने में कैसे आ सकती है।
रक्षित – सच्ची बोल रहा हूं। मेरे सपने में आई थी, मेरे से बहुत देर तक बाते करती रही। शेरांवाली ने मुझे बचाया है।
जय – तुम सच कह रहे हो।
रक्षित – एकदम सच। मैं झूठ कभी नही बोलता।
लंच अंतराल के बाद पढाई शुरू हो गई। स्कूल छुट्टी के बाद रक्षित रूट नंबर 5 की बस में बैठा। जय भी उसी बस में बैठा।
रक्षित प्रफुल्लित हो कर – जय तुम भी। कहां रहते हो।
जय – मैं सेक्टर 13 में रहता हूं।
रक्षित – मैं भी 13 सेक्टर में रहता हूं।
जय – कौन सी सोसाइटी में रहते हो।
रक्षित – मैं पिंक सोसाइटी में रहता हूं।
जय – में सूर्या सोसाइटी में रहता हूं।
रक्षित – वो देखो मेरी छोटी बहन रक्षा, तीसरी कक्षा में पढती है।
रक्षा अपने दोस्तो के साथ बाते करती आ रही थी और रक्षित के पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
रक्षित – पहले कौन से स्कूल में पढते थे।
जय – मैं पहले बरेली में रहते था। मेरे पापा बैंक में काम करते है। अभी दिल्ली में हस्तांतरण हुआ है। तुम पहले कहां रहते थे।
रक्षित – मैं तो नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहा हूं।
बातों बातों में घर घर आ गया। सभी बस से उतरे। घर में घुसते ही रक्षित ने मां सारिका को जय के बारे में बताया, कि वह उसका देस्त बन गया है, तो रक्षा ने भी बताया, कि उसकी क्लास में वृन्दा ने नया एडमिशन लिया है और वह भी सेक्टर 13 में सवेरा सोसाइटी में रहती है। सारिका ने दोनों को कहा – पहले हाथ मुंह धो कर खाना खा लो, फिर अपने दोस्तों के बारे में बताना। तुम दोनों बहुत उत्तेजित हो, अपने नए दोस्तों से मिल कर।
क्योंकि मैडम ने हमें एक ही सीट में बिठाया है। रक्षित और रक्षा दोनों एक ही स्वर में एक साथ बोले। 

Sunday, December 16, 2012

तैयारी

शहर से दूर प्रकति की गोद में छोटी छोटी पहाडियों के बीच एक छोटा सा गांव, जिसका नाम नवगांव। गांव के अंतिम छोर पर छोटे छोटे मकानों की पंक्तियों के बाद एक कोठी शहर वालों की कोठी के नाम से मशहूर, जिसके गेट पर द्वारकानाथ अंकित है। शहर के धनी सेठ द्वारकानाथ ने शहर से दूर नवगाव में आराम के लिए एक कोठी का निर्माण करीब तीस वर्ष पूर्व किया। जब बच्चे बढे हो गए, व्यापार संभाल लिया, तब द्वारकानाथ ने अपना निवास नवगांव में कर लिया। आज द्वारकानाथ नही है, उनके स्वर्गवास को दो साल हो गए, तब से कोठी लगभग वीरान ही है। द्वारकानाथ के पौत्र सुधीर कभी कभी एक दो दिन के लिए आते थे। कोठी की देखभाल पुराने नौकर बब्बन करते है। बब्बन वहीं नवगांव के निवासी को नौकर कहे या केयरटेकर, कुछ भी कह सकते हैं। द्वारकानाथ के स्वर्ग सिधारने के बाद शायद ही किसी ने नवगांव की कोठी की सुध ली हो।

प्रकृति से प्यार करने वाले ही नवगांव की कोठी की परख कर सकते थे। दो एकड के क्षेत्रफल में फैली कोठी को सेठ द्वारकानाथ ने बडे लगन, चाव और मेहनत से बनवाया था। आठ फुट ऊंची दीवारों के ठीक बीचों बीच साधारण किन्तु सभी सुविधायों से युक्त रहने के लिए चार बेडरूम के साथ बाथरूम, एक बडी बैठक, एक मेहमानों के लिए कमरे के साथ रसोई। मेन गेट से सीधे कोठी के लिए मोटर का पक्का रास्ता। कोठी के एक तरफ खूबसूरत बगीचा और दूसरे तरफ खेत में सब्जियां। चारदीवारी के साथ साथ फलदार वृक्ष। पपीता, केला, जामुन, अमरूद के वृक्ष फलों से लदे हुए एक अदभुद अनोखी सी छटा प्रदान करते है।

बब्बन को आज कान खुजाने की भी फुरसत नही थी। कोठी की साफ सफाई में पूरी तरफ व्यस्त। गांव के कुछ नौजवानों को भी काम पर लगा रखा था।

बब्बन मियां थका दिया आपने। मालिक आपके आ रहे है, थका हमें दिया। दोपहर हो गई। खाना तो खिलाऔ, मियां। अब तो खाना खा कर आराम करेगें। बाकी काम कल करेगें। सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन भडक गया। कल के छोकरे दो मिन्टों में थक जाते हैं। कामचोर हो। जरा सा काम बता दो, बहाने निकालते हैं। ढेर सारा काम क्या तुम्हारा बाप करेगा। बब्बन गुर्राया।
बब्बन की बात पर सुजाद ने भी फिकरा कस दिया - बाप से ही करा लो। मैं तो चला। कह कर सुजाद उठा और आवाज लगाई, चलो शमशाद, कबीर और मुस्तफा, चलो। बब्बन मियां सठिया गए है। भोजन करने नही दे रहे है। भूखे पेट भजन नही गौपाला। मियां बब्बन अपने आप कर लेगें।

सबको उठता देख बब्बन थोडा नरम हुए। सुजाद का हाथ पकड कर बोले – बच्चे के बच्चे रहोगे। बडे कभी मत बनना। काम को क्या कह दिया, रोटी याद आ गई। खुदा गवाह है। बब्बन ने कभी किसी को भूखा नही रखा है। अगर हिसाब लू तो रोटी भूल जाऔगे। पेडों से कितने अमरूद, पपीते, केले और जामुन तोड तोड कर खाए हैं।
सुजाद कौन सा कम था। बब्बन पर रौब डालने लगा – मियां बब्बन, तोते चोंच मार कर खराब कर दे, वो अच्छा, हमने दो, चार क्या तोड लिए। हिसाब करने लगे।
सुजाद को गर्म देख बब्बन ने कहा – आधे घंटे की मोहलत देता हूं, सुजाद, खाना यहीं बन रहा है। चलो आधा घंटा आराम और फिर खाना गरमा गरम। लेकिन याद रहे, काम आज ही खत्म करना है। कल की बात नही सुनुगा।
पूरी रात लगा देगें, मियां बब्बन लेकिन एक शर्त है, रात को एक एक पउआ मिलना चाहिए। सुजाद ने बब्बन के कान में कहा।
तौबा तौबा, कल के पैदा हुए लौंडे बाप समान बब्बन से पउआ मांगते है। अपने बाप से मांग जाकर। बब्बन ने एक लात सुजाद को लगाई।
सुजाद थोडा नरम हो गया – बाप की उम्र के हो, इसलिए छोड देता हूं, लेकिन पउआ लूगां जरूर।
तौबा तौबा। लौंडे बिना पउए के मानेगें नही – बब्बन ने एक लात सुजाद को और लगा दी।
कितनी लातों के बाद पउआ दोगे – कह कर सुजाद टांगे पसर कर वही लंबा लोट गया।
कुछ मिन्टों बाद बब्बन ने आवाज लगाई – उठ सुजाद और अपने लौडों को भी कह, खाना खा ले।
खाना तो खाना ही है, पहले पउए का पक्का कहो – लेटे लेटे ही सुजाद बोला।
भूत छोडे, पिशाच छोडे, मगर बिना पउए के तू ना छोडेगा। तौबा, तौबा – कानों को हाथ लगा कर बब्बन ने कहा, ले लेना पउए के पैसे।
यह सुन बिजली की तेजी जैसी फुर्ती सुजाद के बदन में आई और आवाज लगाई – उठो लौडों, खाना खा कर कमर कस लो, काम शाम से पहले पूरा नही किया, तो खाल में भूसा भरवा दूंगा।

खाना खाने के बाद सभी काम पर जुट गए। शाम तक कोठी की सारी सफाई कर दी। दो साल बाद कोठी चमकने लगी। जाने से पहले सुजाद ने बब्बन को पकड लिया – पउए के पैसे।
बाप से भी पैसे मांगते हो पउए के – बब्बन पैसे देते हुए बोला।
बाप भी तो रोज पीता है। शर्म कैसी। बेटे जवान हो जाते है, तो बाप के साथ बैठ कर पीते हैं। - सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन बडबडाने लगा – यह सब फिल्मों की सोहबत है। बिगाड दिया है, फिल्मों के साथ टीवी सीरियलों ने।
बडबडाते बब्बन से सुजाद ने चुटकी ली – कुछ कहा क्या।
तौबा, मेरे बाप की तौबा, कि बरखुरदार आप से कुछ कह दूं। मैं तो सोच रहा था, कि कल क्या करना है। - बब्बन ने बात पलटी।
मन ही मन सुजाद ने कहा – साला बुड्ढा, कुडता है हमारे से। काम करवाना है, तो हमारी माननी पडेगी।


अगले तीन चार दिनों तक जी जां एक कर बब्बन के नेतृत्व में सभी ने कोठी को चमका दिया। दो वर्ष तक धूल चाटती कोठी आज बोलने लगी – मुझे साफ सुधरा रखो, मुझसे बात करो, मैं चार दीवार नही हूं, आपका सदस्य हूं। आपका अंग हूं। आपके संग हूं। नवगांव के सभी बाशिन्दे कोठी को आकर देख रहे थे, जैसी वह किसी शहर की इतिहास से जुडी पुरानी इमारत हो। नवगांव के लिए तो यह किसी किले से कम नही। सभी जुबां पर यही बात थी, कि कोठी में मालिक रहने आ रहे है, यह नवगांव के लिए शुभ खबर है। पहले जब भी सेठ द्वारकानाथ रहते थे, नवगांव की भलाई, तरक्की के लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। शहर में बडे अफसरों से मिलते थे। ट्यूबवैल लगवा दिए। सडके बनवा दी। बिजली का काम भी करवाया, यह और बात है, कि चाहे दो घंटे आए। नवगांव का हर नागरिक कोठी में रहने के लिए आने वालों का बेसबरी के साथ स्वागत करने को तैयार था।   

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...