Sunday, December 29, 2013

मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर

मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर,
मन मेरा गाया गाया गाया,
नाले शहनशाह नाले फकीर,
मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर।
मन मेरा गाया गाया गाया।।

सुध बुध भूल गई तन मन की,
चिन्ता छोडी जन्म मरण की,
सारी हर गई मन की पीर
मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर।
मन मेरा गाया गाया गाया।।

पाठ प्रेम का ऐसा पढाया,
भक्ति का रास्ता ऐसा दिखाया,
मेरी बदल गई तकदीर,
मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर।
मन मेरा गाया गाया गाया।।

सत्तगुरूआं ने दित्ति ऐसी मस्ती,
मन तो हट गई मेरी हस्ती,
तेरे चरणों में होवे आखिर मस्ती,
मेरा सत्तगुरू पीरां दा पीर।

मन मेरा गाया गाया गाया।।
(परंपरागत भजन)

दुनिया क्या जाने

मेरी लगी श्याम संग प्रीति दुनिया क्या जाने,
मुझे मिल गया मन का मीत दुनिया क्या जाने,
क्या जाने कोई क्या जाने,
मेरी लगी श्याम संग प्रीति दुनिया क्या जाने।

छवि देखी मैंने श्याम की जब से, भई बावरी मैं तो तब से,
बांधी प्रेम की डोर मोहन से, नाता तोडा मैंने जग से,
ये कैसी पागल प्रीति दुनिया क्या जाने,
यो कैसी निगौडी प्रीति दुनिया क्या जाने।

मोहन की सुन्दर सुरतिया, मन में बस गयी मोहन मुरतिया,
लोग कहें मैं भई बावरिया, जब से ओढी श्याम चुंदरिया,
मैंने छोडी जग की रीति दुनिया क्या जाने।

हर दम अब तो रहूं मस्तानी, लोकलाज दीनी बिसरानी,
रूप राशि अंग अंग समानी, हेरत हेरत रहूं दिवानी,
मैं तो गाऊं खुशी के गीत दुनिया क्या जाने।

मोहन ने ऐसी बंसी बजाय़ी, सबने अपनी सुध बिसरायी,
गोप गोपियां भागी आयी, लोक लाज कुछ काम न आयी,
फिर वाज उठा संगीत दुनिया क्या जाने।

भूल गई कहीं आना जाना, जग सारा लागे बेगाना,
अब तो केवल श्याम को पाना, रूठ जाएं तो उन्हे मनाना,

अब होगी प्यार की जीत दुनिया क्या जाने।

(परंपरागत भजन) 

Saturday, December 28, 2013

गुणगान करूं तेरा

मुझे ऐसा वर दे दो गुणगान करूं तेरा।
इस बालक के सिर पर प्रभु हाथ रहे तेरा।।

सेवा नित करूं तेरे दर पर जाऊं मैं,
चरणों की धूली को माथे पे लगाऊं मैं,
चरणामत पी कर के नित भजन करू तेरा।
इस बालक के सिर पर प्रभु हाथ रहे तेरा।।

भक्ति और शक्ति दो अज्ञान को दूर करो,
अरदास करूं भगवन अभिमान को दूर करो,
नही द्वेष रहे मन में हो वास प्रभु तेरा।
इस बालक के सिर पर प्रभु हाथ रहे तेरा।।

विश्वास हो ये मन में तुम साथ ही हो मेरे,
तेरे ध्यान में सोऊं मैं सपनों में मिलो आके,
चरणों से लिपट जाऊं तुम ख्याल रखो मेरा।
इस बालक के सिर पर प्रभु हाथ रहे तेरा।।

एक आस यही मेरी तुम दर्शन देते रहो,
हे दीनबंधु मेरी तुम खबर ही लेते रहो,
मेरे होठों पे भगवन रहे नाम सदा तेरा।
मुझे ऐसा वर दे दो गुणगान करूं तेरा।

इस बालक के सिर पर प्रभु हाथ रहे तेरा।।

(परंपरागत भजन)

चन चढिया चन चढिया


चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।

देन वधाई गणपति आये, रिधि-सिधि नाल ले आये
दर्शन करके मन ठरिया, मन ठरिया नाले तन ठरिया।
चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।।

देन वधाई रामजी आये, सीताजी नूं नाल ले आये,
दर्शन करके मन ठरिया, मन ठरिया नाले तन ठरिया।
चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।।

देन वधाई शामजी आये, राधाजी नूं नाल ले आये,
दर्शन करके मन ठरिया, मन ठरिया नाले तन ठरिया।
चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।।

देन वधाई शिवजी आये, पारबतीजी नूं नाल ले आये,
दर्शन करके मन ठरिया, मन ठरिया नाले तन ठरिया।
चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।।

देन वधाई सत्त गुरूजी आये, संगतजी सारी नूं नाल ले आये,
दर्शन करके मन ठरिया, मन ठरिया नाले तन ठरिया।
चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।।

चन चढिया चन चढिया, साडे वेडे चन चढिया,
मिह वसिया मिह वसिया, खुशियां वाला मिह वसिया।

(परंपरागत भजन)

Wednesday, December 25, 2013

इक झोली में फूल भरे हैं

इक झोली में फूल भरे हैं इक झोली में कांटें, रे कोई कारण होगा।
तेरे बस में कुछ भी नही ये तो बांटने वाला बांटे, रे कोई कारण होगा।।

पहले बनती हैं तकदीरे, फिर बनते हैं शरीर।
यह तो प्रभु की कारीगरी, तू क्यों गम्भीर।।
अरे कोई कारण होगा

नाग भी डस ले तो मिल जाये, किसी को जीवन दान।
चींटी से भी मिट सकता है, किसी का नामों निशान।
अरे कोई कारण होगा

धन का बिस्तर मिल जाये पर, नींद को तरसे नैन।
कांटों पर भी सो कर, आये किसी के मन को चैन।।
अरे कोई कारण होगा

सागर  से भी बुझ नहीं सकती, कभी किसी की प्यास।
कभी एक ही बूंद से पूर्ण, हो जाती है प्यास।।
अरे कोई कारण होगा

इक झोली में फूल भरे हैं इक झोली में कांटें, रे कोई कारण होगा।

तेरे बस में कुछ भी नही ये तो बांटने वाला बांटे, रे कोई कारण होगा।।

(परंपरागत भजन)

जब से तेरा नाम लिया है


जब से दाता मैंने तेरा नाम लिया है, धीरे धीरे मेरा हर काम हुआ है।
मेरा हर काम हुआ है, जब से तेरा नाम लिया है।।

कौन करे इतना किसी के लिए, इतना कर दिया तूने मेरे लिए।
मेरी हर खुशी का इन्तजाम किया है, मेरा हर काम हुआ है, जब से तेरा नाम लिया है।।

जिन्दगी में दाता बडे दुख पाये हैं, और फिर हम आपकी शरण में आए हैं।
मिट गई तकलीफ अब आराम मिला है, मेरा हर काम हुआ है, जब से तेरा नाम लिया है।।

ये तो बडा सच्चा सौदा जी श्याम, बस नाम लेने से बन जाते काम।
दाता मैंने सुख का सौदा जान लिया है, मेरा हर काम हुआ है, जब से तेरा नाम लिया है।।

जब से दाता मैने तेरा नाम लिया है, धीरे धीरे मेरा हर काम हुआ है।

मेरा हर काम हुआ है, जब से तेरा नाम लिया है।।

(परंपरागत भजन)

Sunday, December 22, 2013

अस्तित्व


पच्चीस जवानों का एक समूह अपने अधिकारी के नेतृत्व में काश्मीर सीमा में एक चौकी की ओर बढ रहा था। ठंड का मौसम था और जवानों की टुकडी ने अगले तीन महीने तक वही रहना था। रात का समय था, उनकी इच्छा चाय पीने की हो रही थी। उन्हे चाय की एक दुकान दिखी, परन्तु रात के समय वह बंद थी। दुकान बंद देख कर एक जवान ने अधिकारी से कहा, सर य़दि आपकी अनुमति हो, तो हम दुकान का ताला तोड कर चाय बना सकते है, तनिक आराम करके चाय पीकर तरोताजा हो कर हम चौकी की ओर रवाना हो सकते हैं। दुकान का ताला तोडने के निर्णय पर अधिकारी सोचने लगा, कि यह अनुचित और अनैतिक है। फिर कुछ सोच कर उसने अनुमति दे दी। ताला तोड कर दुकान खोली और जवानों ने चाय बनाई, केक बिस्कुट खाकर तरोताजा हए। चलने से पहले जवानों ने अधिकारी से पूछा, कि चाय तो पी ली, परन्तु भुगतान किसे करें। वे कोई चोर नही हैं, कि ताला तोड कर चोरी करे। किसी भी अनुचित कार्य के लिए सेना अनुमति नही देती। अधिकारी ने एक हजार रूपये चीनी के कनस्तर के नीचे कुछ इस तरह से रखे, कि दुकानदार जब सुबह दुकान खोले तो रुपये आसानी से नजर आ जाएं। अब कोई अपराधबोध जवानों के मन में नही था। उन्होनें दुकान का दरवाजा बंद किया और ताला लटका कर अधिक उत्साह से चौकी की ओर रवाना हुए।
तीन महीने बीत गए, अब नई टुकडी ने चौकी संभाल ली। अधिकारी अपनी टुकडी को लेकर दिन के समय वापिस बेस के लिए रवाना हुए। रास्ते में उसी चाय की दुकान पर रूके। दिन का समय था, इसलिए चाय की दुकान खुली थी और उसका मालिक मौजूद था। वह एक गरीब वृद्ध था। मालिक एक साथ सेना के पच्चीस जवानों को देख कर खुश हो गया कि आज एक साथ ही बिक्री से अच्छे पैसे मिल जाएगें। सभी ने चाय की चुस्कियों के साथ केक, बिस्कुट खाए। सेना के जवान उस वृद्ध से बातचीत कर रहे थे और अपने अनुभव बता रहे थे। वृद्ध की बातों से एक बात स्पष्ट झलकती थी, वह बात थी उसकी परमात्मा में अटूट विश्वास। एक सिपाही ने वृद्ध को उसकाते हुए पूछा, कि यदि भगवान जैसा कोई है, तब आप इतनी ठंड में चाय की दुकान नही चला रहे होते। वह आपको घर बिठा कर खिला सकते थे। इतना सुन कर वह वृद्ध बोला, न बाबू, बडे बोल न बोलो। वह है, उसका अस्तित्व भी है। अभी तीन महीने पहले की बात है, मेरा बेटा दुकान पर बैठा था। आतंकवादियों ने उसे अधमरा कर दिया था। मरा समझ कर सारी दुकान भी लूट गए। लडके को अस्पताल में भरती कराया। जरूरी दवाईयों के लिए भी पैसे नही थे। सुबह स्नान करने के पश्चात भगवान से मदद की विनती की। रात को दुकान बंद की। सुबह आ कर देखता हूं, कि दुकान के दरवाजा का ताला टूटा हुआ है। मैं समझा कि आज तो पूरा लुट गया, लेकिन चीनी के कनस्तर के नीचे एक हजार रूपये रखे थे। किसी ने चाय बनाई थी और उसकी कीमत से कहीं अधिक रूपये ऱख कर चला गया। यह तो सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है, जिसने मेरी फरियाद सुन ली और तकलीफ में मेरी मदद की। वो रूपये मेरे बहुत काम आए, जिनसे मैं जरूरी दवाईयां खरीद सका। उन रूपयों की बदोलत मेरा लडका मौत के मुंह से बाहर आ सका। आज वह बिल्कुल ठीक है। मैं आपको बता नही सकता कि उस दिन उन रूपयों की मुझे कितनी जरूरत थी। आप समझ सकते हैं, कि यह केवल परमात्मा की असीम कृपा थी और परमात्मा ने ही किसी की मार्फत रूपये रखवाए। मेरा परमात्मा में अटूट विश्वास है और आपसे से भी अनुरोध करता हूं, कि आप उसके अस्तित्व पर कोई प्रश्न चिन्ह न लगाए।
उस बूढे आदमी की आंखों में अटूट विश्वास था। वो पच्चीस जवान कुछ कहे, कि उनके अधिकारी ने ईशारा किया और सब समझ गए। अधिकारी की आंख के ईशारे ने सब जवानों को चुप कर दिया। पेमेन्ट करने के पश्चात अधिकारी ने कहा, बाबा आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। परमात्मा का अस्तित्व है। जब हम उसके अस्तित्व पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाते है, तब वह हमें अपना रूप दिखा कर हमें उसके अस्तित्व पर अटूट विश्वास करने पर मजबूर करता है।

वृद्ध की आंखे नम थी। जवानों की टुकडी बेस की ओर रवाना हो गई।   

Sunday, December 15, 2013

समझदार बालक


माता पिता ने अच्छे संस्कार दिए, जिन्हे बालक ज्ञानप्रकाश ने पूर्ण रूप से ग्रहण किए। एक दिन पिता जी ने कुछ सामान पडोसी बीरबल को दिने हेतु भेजा। पडोसी बीरबल के नौकर ने ज्ञानप्रकाश को बैठक में बिठाया। पडोसी उस समय नहा रहे थे, अत आने में कुछ विलम्ब हो गया। बैठक में सेंटर टेबुल में फलों की टोकरी में उच्च कोटी के सेब, संतरे सजा कर रखे थे। ज्ञानप्रकाश ने उनको हाथ नही लगाया। कुछ देर बाद बीरबल बैठक में आए। शांत भाव से ज्ञानप्रकाश को बैठा देख बीरबल ने कहा, मुझे आने में देर हो गई, तुम को सेब, संतरे पसन्द हैं, तुम खा लेते। ज्ञानप्रकाश ने उठ कर बीरबल को नमस्ते किया और पिता जी का सामान दिया। बीरबल को पता था कि ज्ञानप्रकाश को फल पसन्द है, लेकिन उसने अकेले में भी किसी फल को नही हाथ लगाया। बीरबल ने स्नेह से पूछा, तुम्हे फल पसन्द है, टोकरी में से कोई भी पसन्द का फल ले सकते थे। अपने घर और यहां कोई अन्तर नही है।
ज्ञानप्रकाश ने हाथ जोड कर उत्तर दिया, यह ठीक है, कि मैं बैठक में अकेला था, कोई भी देखने वाला नही था, कोई भी फल खा सकता था, लेकिन मैं अपने माता पिता के दिए संस्कारों को भूल नही सकता। घर आपका है, मैं तो पिता जी का कुछ सामान आपको देने आया हूं। बिना आपकी अनुमति मुझे कोई अधिकार नही है, कि आपके घर किसी भी चीज या वस्तु को हाथ लगाऊं। यह काम अनैतिक है। मेरी शिक्षा और संस्कारों ने मुझे रोका और मेरे विवेक ने धैर्य से आपके आने तक इन्तजार करने की अनुमति दी।


बालक ज्ञानप्रकाश की बात सुन कर बीरबल ने उसे गले से लगाया और फलों की टोकरी उपहार में दी। 

दिल दीदार हो गया

मिले सतगुरू जी बेडा पार हो गया, कबसे आस लगी दिल दीदार हो गया।
कीती कृपा गुरूआं ने ऐ संयोग मिलिया, साडा मुद्दतांदा अज सारा रोग टलिया।
जदों पाया दर्श बेडा पार हो गया, मिले सत्तगुरू जी बेडा पार हो गया।
मिले सतगुरू जी बेडा पार हो गया, कबसे आस लगी दिल दीदार हो गया।

दुख जन्मा जन्मा दे पावंदे हां, मन मति दियां ठोकरा खावदें हां।
सत्तगुरू तो पाया उपकार हो गया, मिले सत्तगुरू जी बेडा पार हो गया।
मिले सतगुरू जी बेडा पार हो गया, कबसे आस लगी दिल दीदार हो गया।

मिल सेवक गुरूआं नूं खुशहाल होदें ने, दे दे फिरन वधाईआं ते निहाल होदें ने।
अज सेवक ते सत्तगुरू दयाल हो गये, मिले सत्तगुरू जी बेडा पार हो गया।
मिले सतगुरू जी बेडा पार हो गया, कबसे आस लगी दिल दीदार हो गया।

दासन दास एवें गुरूआंतो बलिहार जाईये, सच्ची लिव गुरू चरणादे नाल लाईये।
फिर जन्म सफल विच संस्कार हो गया, मिले सत्तगुरू जी बेडा पार हो गया।

मिले सतगुरू जी बेडा पार हो गया, कबसे आस लगी दिल दीदार हो गया।

(परंपरागत भजन)

Saturday, December 14, 2013

शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे

शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे,
शाम ने लित्ता है अवतार नी वधाई होवे।

पहली वधाई यशोदा मैया नूं होवे,
जैंदी गोदी विच आया सूडा लाल,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे।

दूझी वधाई नन्द बाबा नूं होवे,
जिन्हादा वध्या है परिवार नी वधाई होवे,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे।

तीजी वधाई सारी सखियां नू होवे,
जिन्हा ने गाया मंगला चार नी वधाई होवे,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे।

चौथी वधाई सतगुरूआं नू होवे,
जिन्हा दी कृपा होई अपार नी वधाई होवे,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे।

देवता सारे फुल वरसावन,
बोलन जय जय कार नी वधाई होवे,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे।

सारी वधाई सारी संगत नूं होवे,
जिन्हा दा शाम नाल हे प्यार नी वधाई होवे,
शाम दी बोलो जय जय कार नी वधाई होवे,

शाम ने लित्ता है अवतार नी वधाई होवे।

(परंपरागत भजन)



तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,

तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,
(परंपरागत भजन) 

तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊं मैं।

जब से याद भुलाई तेरी लाखों कष्ट उठाये हैं,
क्या जानू इस जीवन को कितने अंदर पाप कमाये हैं,
हूं मैं शर्मिन्दा आपसे क्या बतलाऊं मैं।

मेरे पाप कर्म ही तुझ से प्रीत न करने देते हैं,
कभी जो चाहूं मिलूं आप से रोक मुझे ये लेते हैं,
कैसे स्वामी आप के दर्शन पाऊं मैं।

है तू नाथ वरों का दाता तुझ से सब वर पाते हैं,
ऋषि मुनि और योगी सारे तेरे ही गुण गाते हैं,
छींटा दे ज्ञान का होश में आऊं मैं।

जो बीती सो बीती लेकिन बाकी उम्र संभालू मैं,
प्रेम पाश में बंधी आपके गीत प्रेम के गाऊं मैं,

जीवन आपके चरणों में सफल बनाऊं मैं।

(परंपरागत भजन)

मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे

मेरे बाबा ने दरबार लगाया दर्शन कर लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

दीवाना हो गया मैं जब ये श्रंगार देखा,
मेरा मन झूम उठा जब ये दरबार देखा,
गुरूजी बागा पहने बाबा मुस्करा रहे हैं,
और मस्ती में झूमें यही समझा रहे हैं,
जमकर प्यार बरसता देखा बाबा के दो नैन से,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

तुम्हारे दर पे सतगुरू जो भी आया सवाली,
झोलियां भर दी उसकी, गया ना कोई खाली,
द्वार सा चाहें तेरा, चाहू में ढंका बजता,
जिसे भी सत्तगुरू चाहें नसीब पल में बदलता,
मुझ को भी इनकी चौखट पे मत्था टेक लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

भक्त जितने भी आये तेरी जयकार करते,
और मेरे दाता तुमसे बडा ही प्यार करते,
सभी बाबा के दर पे खजाना लूटते हैं,
मैं भी आया बडी दूर से झोली तो भर लैण दे,

मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

(परंपरागत भजन) 



Sunday, November 24, 2013

पहला सौदा


सुबह के छ: बज रहे थे। चिडियों के चहचाहने की आवाज आने लगी। सर्दियों के दिन, अभी अंधेरा ही था। धर्मपाल रजाई ओढ कर खर्राटे भर रहा था। खर्राटों की आवाज में तेजी से पत्नी ने बिस्तर ही छोड दिया। सुबह हो गई है, सर्दियों में बिस्तर मरीज हो जाता है, हर आदमी। उठने का समय हो ही रहा है, यह सोच कर वह उठी और फ्रेश होने बाथरूम चली। पत्नी दया बाथरूम में ही थी, कि फोन की घंटी बजी।
ट्रिन, ट्रिन, ट्रिन......
दया बाथरूम से निकल नही सकती थी और धर्मपाल खर्राटे भर रहा था। फोन की घंटी सुन कर धर्मपाल की नींद खुली। कच्ची पक्की नींद में उसने फोन उठाया।
हेल्ल्लइयो
धर्मफोन पर दूसरी ओर दौलतराम था।
दौलत की आवाज सुन कर धर्म ने पूछा। क्या हुआ। आधी रात को फोन कर रहा है।
सत्तू मर गया, बिस्तर छोड। फटाफट अस्पताल पहुंच। आधी रात नही है, बिस्तर छोड कर देख, दिन निकल आया है।
क्या बोल रहा है।
मरने की झूठी बात क्यो बोलूंगा। मैं भी अस्पताल जा रहा हूं, वहीं मिलते हैं।
दौलतराम ने फोन रख दिया। धर्मपाल ने रजाई छोडी। आंखे मल कर नींद खोली।
किसका फोन था?” दया ने बाथरूम से बाहर आते पूछा।
सत्तू सेठ मर गया। चाय बना दे। फटाफट निकलना है।कह कर धर्मपाल बिस्तर से फुर्ती से निकला और फ्रेश होने बाथरूम में घुसा।
सेठ सत्यपाल अनाज मंडी के बादशाह थे। मंडी में जब भी माल पहुंचता था, पहला सौदा सेठ सत्यपाल ही करते थे। यहां तक बात थी, कि अनाज का पहला ट्रक सेठ सत्यपाल के गोदाम में आता था। सेठजी की इतनी धाक थी, बाकी व्यापारी औपचारिक तौर पर पहला सौदा नही करते थे। सेठजी के हाथों ही पहला सौदा खुलता था। पिछले तीस वर्षों से वे अनाज मंडी के प्रधान थे। कोई उन को प्रधान के पद से हटा नही सका। मंडी में पीठ पीछे सब सेठ सत्यपाल को सत्तू कह कर चिढाया करते थे। करीब चालीस वर्ष पहले सत्तू ने अनाज मंडी में दलाली करनी शूरू की, फिर धीरे धीरे सफलता की सीडियां चढते चढते दस साल बाद मंडी में अपनी धाक जमा दी। एक बार प्रधान बने तो कोई उन के बराबर नहीं पहुंच सका। जब सेठ जी दलाली करते थे, तब सत्तू दलाल के नाम से मशहूर थे। प्रधान बनने पर मुंह पर तो नही, परन्तु पीठ पीछे सत्तू कह कह गालियां निकाल कर अपनी भडास निकालते थे। आज एक लम्बी बीमारी के बाद सेठ सत्यपाल का निधन हो गया। पिछले एक महीने से अस्पताल में भरती थे। सुबह छ: बजे राउंड पर आए डाक्टर ने सेठ जी को मृत्य घोषित किया। डाक्टर की घोषणा के बाद फोन पर फोन, सभी नजदीकियों को सूचना दी गई। कुछ ही देर में मंडी के हर व्यापारी, दलाल को सेठ सत्यपाल की मौत का समाचार मिल चुका था।
धर्मपाल और दौलतराम सेठ सत्यपाल के दूर के रिश्तेदार है और अनाज मंडी में छोटे दुकानदार हैं। सेठ सत्यपाल ने दुकानदारी शूरू करने में मदद की और इसका अहसान हमेशा सेठ सत्यपाल दोनों पर जताते थे। दोनों सेठ जी को सलामी करते थे, मेहनत करते हुए तरक्की के रास्ते पर अग्रसर थे, इसीलिए दोनों सेठ जी का कद्र करते थे, कभी कभी सेठ जी दबाते भी बहुत थे, फिर भी शिकायत नही करते थे। एक ही बात करते थे, कोई बात नही, एक रास्ता दिखाया था सेठ जी ने, अग्रसर हैं। रास्ता दिखाने का कर्ज चुकाना है, चुका रहे हैं।
दोनों अस्पताल पहुंचे। सेठ जी का पूरा परिवार थोडी देर में एकत्रित हो गया। दोनों परिवार के हर सदस्य की बात सुन कर सारे काम करने में वय्स्त हो गए। सेठ जी के बेटे रमाकांत और उमाकांत हुक्म चला रहे थे और दोनों फटाफट अपने आका का हर हुक्म पूरा करने में वय्स्त थे। तभी मंडी के कुछ व्यापारी भी अस्पताल पहुंचे। दोनों को भागमदौड करते देख एक ने कहा – सत्तू ने सालों को बंधुआ मजदूर बना रखा है। अपना तो दिमाग लगाते ही नही।
दूसरा व्यापारी – दिमाग हो तो लगाए न।
कह कर मंद मंद मुसकाने लगे।
उनकी बाते सुन कर धर्मपाल और दौलतराम चुप रहे। धर्मपाल ने दौलतराम के कंधे पर हाथ रख कर कहा – अभी चुप, यह समय नही है, कुछ कहने का। बाद में देखेंगे।
दोनों धर्मपाल और दौलतराम काम में व्यस्त भी थे, साथ ही साथ उन दोनों के चार कान सभी रिश्तेदारों और व्यापारियों की बातों पर भी थे।
मृत्य देह को अस्पताल से घर लाया गया। विचार विमर्श के बाद दोपहर तीन बजे दाह संस्कार का समय तय हुआ। सेठ जी की कोठी पर मंडी के दूसरे पदाधिकारियों ने चार दिनों के शोक की घोषणा की, कि कोई सौदा नही होगा। दुकानों के शटर डाउन रहेंगें। मंडी सेठ जी के चौथे की रसम के बाद ही खुलेगी। थोडी देर में सभी वयापारी रूकसत हुए। रमाकांत ने धर्मपाल और दौलतराम को हिदायत दी की वो मंडी की हर गतिविधी पर उन को अवगत कराते रहे। उन दोनों को कोठी से अधिक मंडी की हर गतिविधी पर नजर रखने के काम पर लगा दिया।
भाई उन दोनों को तुम ने मंडी भेज दिया। यहां काफी काम हैं।उमाकांत ने बडे भाई को अपनी नाराजगी जाहिर की।
काम तो घर के नौकर कर लेंगें। हम मंडी जा नही सकते। हमारी गैरमौजूदगी में मंडी के बाकी व्यापारी फायदा उठाने की कोशिश करेंगें। चावलों की नई खेप आज कभी भी आ सकती है। मैनें फतेह सिंह की ड्यूटी गोदाम पर लगा दी है। ट्रक ड्राईवर का फोन था, दोपहर तक वह ट्रक गोदाम में लगा देगा। पहला ट्रक हमारा ही आएगा। ड्राईवर का इनाम दुगना देना है। पिता जी नही हैं तो क्या हुआ। उन की हर बात को हमने आगे बढाना है। आज तक नए माल का पहला सौदा सेठ सत्यपाल ने किया था, आज भी यह परमपरा निभाई जाएगी। उन के बेटे उन की परमपरा को जीवित रखेगें।रमाकांत ने उमाकांत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
भाई हम तो मंडी चार दिन तक जा नही सकते। कैसे करेगें।छोटे भाई उमाकांत ने आशंका जताई।
दौलत और धर्म किस काम आएगें। नाम उम दोनों का होगा, परन्तु पहला सौदा हमारा ही होगा, तभी उन दोनों को मंडी की टोह लेने भेजा है। यदि पहला सौदा हमारा नहीं हुआ तब लानत है हम पर और हमें सेठ सत्यपाल की औलाद कहने का कोई हक नही। रमाकांत ने फोन की घंटी बजने पर बात समाप्त की।

उधर मंडी में व्यापारी अलग अलग लामबंद हो चुके थे। सभी की निगाहें चावलों की नई खेप के आने पर टिकी थी। हर किसी की कोशिश थी कि पहला ट्रक उनका आए और पहला सौदा भी उनका हो। विभिन्न रणनितियां बनाई जा रही थी। धर्मपाल और दौलतराम दोनों अपनी ड्यूटी मुसतैदी से निभा रहे थे। पल पल की खबर रमाकांत को दी जा रही थी। दोपहर एक बजे चावलों का ट्रक सेठ सत्यपाल के गोदाम में पहुंच गया।
ड्राईवर को तिगुना इनाम दो, किसी को खबर नही लगनी चाहिए, कि चावलों की पहली खेप हमारी है। ड्राईवर की खूब खातिर करो। ड्राईवर पहले सौदे के बाद ही गोदाम से बाहर आएगा।रमाकांत ने फतेह सिंह को हिदायत दी और धर्मपाल, दौलतराम को कोठी पर पहुंचने का कहा।

रमाकांत के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। जिस धर्रे पर सेठ सत्यपाल ने काम किया, आज रमाकांत उसी ओर चल रहा था। पहला सौदा हमारा ही होगा।

ठीक तीन बजे सेठ सत्यपाल के मृत्य देह को नगर के सबसे बडे शमशान लाया गया। अंतिम संस्कार की सभी तैयारियां पूरी हो गई थी। शमशान में मंडी के सभी व्यापारी एकत्रित थे। रिश्तेदार एक ओर जमा थे और व्यापारी अपना अपना गुट बना कर मंडी की बातों पर चर्चा कर रहे थे। कुछ मन की भडास निकाल रहे थे।
एक व्यापारी – भई, सत्तू में जो बात थी, उस के लौडों में नही है।
दूसरा व्यापारी – भई, ठीक कह रहे हो, साले सत्तू ने लौडों को अपने पल्लू में बांध कर रखा था, कभी आगे आने नही दिया। शर्त लगा ले, बादशाहत खत्म समझो।
तीसरा व्यापारी – कितने की लगा रहे हो। हजार की मेरी भी लगा लो।
दूसरा व्यापारी – साले, तू जिन्दगी भर टुच्चा रहेगा। सत्तू पर हजार की चाल, लानत है। शर्म कर। कम से कम लाख की बात कर, तो लगाता हूं।
तीसरा व्यापारी – इतना मत एतराऔ। चाल उलटी न पर जाए।
चौथा व्यापारी – साले, तू छोटा है, छोटी बात ही करेगा। यहां बादशाहत की बात हो रही है, अगला बादशाह कौन?”
तीसरा व्यापारी वहां से खिसक कर दूसरे दल के पास गया।
पांचवा व्यापारी – तुम तो सब बच्चे हो। हमने तो सत्तू को उस जमाने से देखा है, जब दलाली करता था। आज बादशाह कहलाता है। साला पक्का व्यापारी था। पढे लिखों की छुट्टी करता था। कभी स्कूल नही गया, पर चाणक्य नीति पूरी जानता था। साम, दंड, भेद से मंडी को अपने वश में कर रखा था।
छटा व्यापारी – देखते है, अब लौडे क्या करते है, मंडी का पहला सौदा किसका?“
सातवां व्यापारी – सुना है, वर्मा और शर्मा इस बादशाहत को तोडने की पूरी तैयारी करे बैठे हैं।
पांचवा व्यापारी – सुना तो है, पर देखते हैं।

एक कोने में वर्मा और शर्मा अपने चेलों के साथ रणनीति में मशगूल थे।
वर्मा – अपना ट्रक कब तक आ जाएगा?”
शर्मा – रात तक आ जाएगा।
वर्मा – कल पहला सौदा अपना ही होगा।
शर्मा – कोई शक नही। इस बार पहला सौदा अपना है।
कुछ व्यापारी – पहले सौदे में कुछ हिस्सा मिल जाए, तो सोने पर सुहागा। बरकत होती है, पहले सौदे में। चाहे एक बोरी मिल जाए। पूरा सीजन लाभ का होता है।
वर्मा और शर्मा एक स्वर में – हां, हां, बिल्कुल, हर किसी को हिस्सा दिया जाएगा। हमें क्या सत्तू समझ रखा है? साला सारा हडप जाता था।
एक व्यापारी – सेठ जी मजा आ जाएगा, अब की बार।

तभी मुखाग्नि दी गई। यह इशारा था, धर्मपाल और दौलतराम के लिए। दोनों वर्मा और शर्मा के ग्रुप के समीप खडे हो गए।
धर्मपाल – सेठजी पहले सौदे का रेट लगा रहा हूं। बोलो कौन ले रहा है।
धर्मपाल के मुख से पहले सौदे के रेट सुन कर सब सतब्ध रह गए।
शर्मा – क्या कह रहे हो?”
दौलतराम – सही सुन रहे हो, सेठ जी। चावलों की पहली खेप गोदाम एक बजे ही पहुंच गई थी। आप सेठ सत्यपाल के बेटो को कम मत आंको। रेट सुना दिया है। हम धर्मपाल और दौलतराम बेच रहे हैं। क्या कहते हो?”
शर्मा और वर्मा सकते में आ गए। पहला सौदा हो गया। व्यापारियों झट से पाला बदला, जो वर्मा और शर्मा के पाले में थे, झट से दल बदल कर धर्मपाल और दौलतराम के दल में शामिल हो गए। सबने सौदा बुक कर लिया।
मृत्य देह अभी ठंडी भी नही हुई थी कि पहला सौदा हो चुका था। रमाकांत छोटे भाई उमाकांत के साथ वहां से गुजरे। एक नजर वर्मा और शर्मा पर डाली और आगे बढ गए। धर्मपाल और दौलतराम ने ईशारा किया कि पहला सौदा आपका ही हुआ है।

उधर पंडित ने अंतिम विधी की और सबको चौथे की सूचना दी। सुबह सात बजे शमशान में फूल चुने जाएगें और उठाला शाम चार से पांच सांई मंदिर के परिसर में। परिवार के सभी सदस्य एक तरफ खडे हो जाए और बिरादरी शोक प्रकट करते हुए अपने घरों को प्रस्थान करें। बिरादरी रूकसत होने लगी। शर्मा और वर्मा रमाकांत, उमाकांत के सामने शोक प्रकट करते गए। उनका सिर हार से झुका हुआ था और रमाकांत, उमाकांत के चेहरों पर हर्षल्लास था। 

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...