Friday, March 29, 2013

नवगांव

नाम नवगांव, सुनने में ऐसा प्रतीत होता है, कि जैसे कोई आधुनिक सुख सुविधायों से लैस गांव होगा, लेकिन नाम में क्या रखा है। नाम नवगांव सिर्फ नाम ही है, किसने रखा होगा, क्या सोच कर रखा होगा, किसी को नही पता होगा। एक छोटे से गांव का कौन इतिहास रखेगा। मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग से कटती पतली सी सडक आगे जा कर छोटी छोटी पहाडियों में से गुजरती हुई कच्ची सडक में बदल जाती है। लगभग पांच वर्ष पहले चुनावों के समय की बात है, कि सेठ द्वारका नाथ की बदौलत पक्की सडक बनी थी, फिर किसी ने बेचारी सडक रानी की सुध नही ली। सेठ द्वारका नाथ दो साल पहले स्वर्ग सिधार गए, उससे पहले बीमारी के चलते नवगांव आ नही सके। बरसातों में सडक की हालात बिगडते रहे और आज टूटी फूटी हाल सिर्फ इतिहास के पन्ने की कहानी बन गई, कि कभी पक्की सडक होती थी, जहां सेठ जी की मोटर कार दौडा करती थी।

छोटी पहाडियों के नीचे नवगांव है, कुल इक्कासी मकान। सडक के दोनों ओर छोटे छोटे, कुछ पक्की छत के साथ, तो कुछ कच्ची छत के साथ मकान। सडक के दाई तरफ तीस मकान, सभी हिन्दुऔ के, तो दूसरी और बाई तरफ पचास मकान मुसलमानों के। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं सेठ द्वारका नाथ की दो एकड में बनी कोठी। सभी बाशिंदे शहर वालों की कोठी के नाम से जानते और पुकारते हैं। कोठी के बाद गांव समाप्त, न कोई सडक, न कोई पगडंडी।

गांव के अधिकतर लोगों का पेशा दूध बेचना, कुछ के छोटे, छोटे बगीचेनुमा खेत, जहां सब्जियां उगती है। गाय, भैंस लगभग सभी के पास हैं। सुबह, शाम दूध निकालते है, अपनी खपत का दूध रख कर बाकी सहकारी समिती को बेचा जाता है। सेठ द्वारका नाथ ने गांव वालों को सहकारी समिती का मेंबर बनवाया, जिसकी गाडी हर रोज सुबह, शाम दूध ले जाती है। शहर से आढती सब्जियां खरीदता। सभी गांव वाले सेठ द्वारका नाथ को भगवान का दर्जा देते थे, जिन्होने गांव वालों के लिए उनके दरवाजे पर ही आमदनी का प्रबंध करवाया, नही तो उनको दूर शहर जाना पढता था। सभी खुशहाल है, अमीर तो नही, गुजारे लायक सभी के पास पैसे थे, छोटे से गांव में कुछ सौ बाशिदों इसी में खुश रहते हैं और सेठ जी को दुयाएं देते नही थकते। हर बात पर सेठ जी की मिसाल देते नही थकते हैं। आखिर करने को क्या है, पूरे दिन, सुबह से शाम तक। सुबह दूध निकाल कर सहकारी समिती की गाडी को देना है, फिर गाय, भैंस की देखभाल। सारा दिन कुछ और काम नही। कुछ इधर की, कुछ उधर की गपशप। घरों के आगे चारपाई डाल कर बैठ कर हुक्का, बीडी पीते हुए समय व्यतीत होता है। पढाई लिखाई से किसी को कोई सरोकार नही। पास के गांव में स्कूल है, जो बच्चा, जब तक पास होता है, पढता रहता है, फेल होते ही स्कूल क्या होता है, किसी को कोई सरोकार नही। दो बच्चे पढ गए, शहर रहने चले गए। गांव में सोच गहरी बैठ गई, बच्चों को अपने से दूर करना है, तो ज्यादा पढाऔ। शाम को सहकारी समिती की गाडी ने फिर आना, दूध लेना। सब्जी आढती सप्ताह में दो बार आकर सब्जी ले जाता था।

कम पढे लिखे गांव निवासियों कम आमदनी के बावजूद आत्म संतुष्ट, सुख चैन से जीवन व्यतीत कर रहै हैं। सेठ द्वारका नाथ कैसे नवगांव में बसे। बब्बन जो सेठ जी कोठी का केयर टेकर पिछले बीस सालों से, जब कोठी बनी थी, बहुत चाव से, गर्व से, छाती चौडी करके बताता है, कैसे सेठ द्वारका नाथ ने कोठी बनाई और रहना शुरू किया।

बीस साल पहले बब्बन गरीबी से परेशान शहर में कोई काम तलाशने के लिए गांव से निकला और मुख्य राजमार्ग पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। सेठ द्वारका नाथ की कार बस स्टाप से कुछ पहले पंचर हो गई थी। ड्राईवर कार का पहिया बदलने के लिए कोशिश कर रहा था, लेकिन पहिए के नट जाम होने के कारण वह पहिया बदल नही सका। किसी मदद के लिए बस स्टाप तक आया, जहां सिर्फ बब्बन बस की प्रतीक्षा में सो गया था। ड्राईवर ने बब्बन को झंझोर कर उठाया। बब्बन ने ड्राईवर की मदद की। पहिया बदला गया।

सेठ जी ने बब्बन से पूछा – कहां रहते हो।
बब्बन – थोडा अंदर गांव में रहता हूं।
सेठ जी – क्या नाम है, गांव का।
बब्बन – नवगांव नाम है।
सेठ जी – शाम हो गई है, कहो तो तुम्हे घर छोड दें।
बब्बन – मैं तो शहर जाने के लिए बस की प्रतीक्षा कर रहा हूं। यहां काम है, नही। पैसे की तंगी है। अब्बा कर्ज में डूबे है। काम की तलाश में शहर जा रहा हूं।
सेठ जी – चलो, कार में बैठो। शहर छोड दूंगा।

सेठ जी की पारखी नजरों ने बब्बन की शराफत पहचान ली, अपने कारखाने में उसको नौकरी दी। एक बार सेठ जी की तबीयत खराब हो गई। डाक्टर ने हवा पानी बदलने को कहा। फैमिली डाक्टर गुप्ता थोडा मजाकिया भी थे।

सारा दिन गल्ले पर बैठा रहता है। लक्ष्मी चंचल है। पतली गली से कब निकल कर मेरे पास आ जाएगी, तुझे पता ही नही चलेगा। थोडा हिल स्टेशन भी घूमा कर। जा मैं तुझे देखने वही मिलता हूं।
सेठ जी ने डाक्टर की सलाह मान कर हिल स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में बब्बन ने कहा।
सेठ जी, रास्ते में कुछ देर आराम मेरे गरीब खाने में कीजिए।

सेठ जी ने ड्राईवर ने नवगांव रूकने का कहा। राजमार्ग से मुडते सडक पतली होती गई, फिर कच्ची सडक नवगांव पर समाप्त हो गई। बब्बन के सेठ गांव आए है, पूरा गांव बब्बन के घर एकत्रित हो गया। बब्बन का परिवार गर्व से फूले नही समा रहे था। सेठ जी के चर्चे पहले ही बब्बन मशहूर कर चुका था। गांव निवासियों के लिए सेठ द्वारका नाथ किसी भगवान से कम नही थे। भीड छटी, सेठ जी घर के बाहर चारपाई पर विश्राम करने लगे।

बब्बन ये छोटी पहाडियां ठलते सूरज की रौशनी में बहुत खूबसूरत दिख रही है, वहां जाने का रास्ता कहां से है।
बब्बन – सेठ जी, गांव के बाद कोई रास्ता नही है। छोटी पहाडियां पर कोई नही रहता है, और न कोई रास्ता है।
सेठ जी – बब्बन, मालूम नही क्यों, ये छोटी पहाडियां देख कर दिल कहता है, यहीं बस जाऊं। रात में यहां मैं क्या रूक सकता हूं। में यहां की सुबह देखना चाहता हूं।
बब्बन – सेठ जी, यह तो हमारा भाग्य है, कि कृष्ण सुदामा के घर रहेगें।

पूरा गांव सेठ जी की आवभगत में जुट गया। ठीली सी चारपाई में सेठ जी आराम करने लगे। पौ फटते सेठ जी पहाडियों की ओर चल पडे। उगते सूरज की किरणें पहाडी पर पडती रही, हल्के ग्रे से गुलावी फिर औरेंज, नांरगी रंग से बदलते नजारे ने सेठ द्वारका नाथ को मंत्र मुग्घ कर दिया।
बब्बन से पूछा जहां गांव के मकान समाप्त होते है, वह जमीन किस की है।
बब्बन – पहाडी तक खाली जमीन गांव की है।

बस फिर सेठ द्वारका नाथ ने उस जमीन पर कोठी बनाई और बब्बन को केयर टेकर बना दिया। 

Sunday, March 03, 2013

कल्याण प्रार्थना


कल्याण प्रार्थना

असतो मा सदगमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्माअमृतं गमय
सर्वेषां शान्तिर्भवतु
सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु
लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु
सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कशिचद दुखभाग्भवेत

(हे प्रभु)
मुझे असत से सत की ओर ले चलो
मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो
मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो
सब को शान्ति मिले
सब का भला हो
सारे लोक सुखी हों
सब सुखी हों
सब निरोग हों
सब कल्याणमय हो
कोई दुखी न हो

Welfare Prayer

(O, God)
Lead me from non-existent to the existent
Lead me from darkness to the light
Lead me from death to Immortality
Let all be healthy
Let all be bestowed with peace
Let all be blessed
Let all planets be happy
Let all be happy
Let everyone be free from disease
Let all may look for welfare and prosperity
None may suffer

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...