Sunday, August 25, 2013

हवेली

शहर सहारनपुर, कंपनी बाग के ठीक सामने बडी सी हवेली। दरवाजे पर नाम लिखा है चंदगी राम। नाम चंदगी राम, सुनने में ऐसी प्रतीत होता है, कोई पहलवान होगा। चंदगी राम, हवेली के मालिक, पहलवान तो नही है, फिर भी लंबे चौडे शरीर के मालिक, कुछ कुछ पहलवान जैसे ही लगते हैं। पेशा, व्यापारी। नगर के मशहूर कपडा व्यापारी। रूपया, सम्मान, प्रतिष्ठा, सब के स्वामी। नगर में सेठ जी के नाम से मशहूर हैं। कोई कमी नही जिन्दगी में। सब कुछ है, पत्नी चंपावती, पुत्री सरिता, पुत्र सूरज। हवेली का एक बडा सा दरवाजा। मजबूत और भारी भरकम दरवाजा, जिसे खोलने और बंद करने में भी दो, तीन आदमी धक्का लगाते है। खूबसूरत नक्काशी से युक्त दरवाजा बंद ही रहता है। उस बडे दरवाजे में एक छोटा सा दरवाजा है, वोही खुलता है। उसी दरवाजे से हवेली के अंदर आया जाया जाता है। हवेली में रहते है, चार जन मालिक चंदगी राम, मालकिन चंपावती, पुत्री सरिता और पुत्र सूरज। इन चार सदस्यों के बारह नौकर हवेली में ही रहते है। चार लोग और बारह नौकर, यही हवेली की भव्यता दर्शाती है। नगर में सभी की जुबान पर हवेली को देख कर यही बात होती है, कि चंदगी राम की सात पुशते खाली बैठ कर खाये, तब भी धन में कोई कमी नही आएगी।

हवेली के छोटे दरवाजे से अंदर जा कर देखिए, बहुत बडा दालान। ठीक बीचों बीत एक कुंआ, जिसका पानी एकदम मीठा और ठंडा। गर्मियों में भी बिना फ्रिज में रखे सीधे कुंए का पानी पी कर शरीर तृप्त हो जाता है और दिमाग ठंडा। जब गर्मियों में बिजली चली जाती है, कहा जाए, कि लुप्त हो जाती है, तब अडोस पडोस चंदगी राम की हवेली के कुंए का पानी पीते हैं। पानी के लिए हवेली के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। पयाऊ पुराने समय से भारतीय परमपरा का एक अहम हिस्सा रहे है। कोई प्यासा न रहे, यही चंदगी राम कहते थकते नही हैं। बच्चे नाराज हो जाते है, कि पापा, सारा दिन लोग जमा रहते है, मुहल्ले वालों का दिमाग सर पर चढा रखा है। चंदगी राम यही कहते है और बच्चों को समझाते रहते हैं, कि दुआए लो, सबकी। इन्ही दुआऔं से बरकत है। खैर बच्चे इन बातों को नही समझ सकते है।

हवेली के बीच में दालान, जहां बच्चे खेला करते है। सुबह, शाम चंदगी राम की बैठक रहती है। दरवाजे के ठीक सामने दालान पार करके चार कमरे, चंदगी राम, चंपावती, सरिता और सूरज के लिए। बाएं ओर मेहमानों के लिए चार कमरे। दाएं तरफ रसोई, बैठक, दीवाने आम और खास। मेहमानों के कमरों के ऊपर नौकरों के कमरे। दरवाजे के दोनों ओर फलदार पेड। आम, अमरूद, पपीता और जामुन के पेड सदा फलों से लदे रहते है। सीजन में चंदगी राम खुद फलों के टोकरे रिश्तेदारों को भिजवाया करते है।

गर्मियों के दिन हैं। सुबह सुबह सरिता अपनी सहेलियों के साथ झूला झूल रही है। सूरज छत पर दोस्तों के साथ बेडमिंटन खेल रहा है। चंपावती नौकरों के साथ सिर खपाई कर रही है। आज कोई नही बचा चंपावती की डांट खाने से। किसी का काम पसन्द नही आ रहा है। सभी चंपावती से बचने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन अफसोस, चंपावती से कोई नही बच पा रहा है। सारे के सारे निकम्मे हो गए है। खा खा कर सांड बन गए है, सारे। किसी से कोई काम न कहो। सारे सेठ बन गए है। अब नौकरों को भी आगे नौकर चाहिए। चंपावती के क्रोध से बचना आज नामुमकिन था। सेठ चंदगी राम भी नही बच पाए।

बेगम, मैं तुम्हारा ताबेदार जरूर हूं, लेकिन नौकर नही। नौकरों का गुस्सा मुझ पर क्यों निकाल रही हो।सेठ चंदगी राम झल्ला कर बोले। सेठ जी अपने व्यापारियों और मुनीमों के साथ खाते का मिलान कर रहे हैं, उन्हे चंपावती का चिल्लाना पसन्द नही आ रहा है, लेकिन मौके की नजाकत देखते हुए धीरे से चंपावती को सलाह देने लगे।
चंपावती का गुस्सा शांत नही हो रहा है। यह सब आप के कारण हो रहा है। आपने सब को सिर पर चढा रखा है। सब को मुफ्त में खाने की आदत हो गई है। आप कुछ कहते नही हैं, तभी सबों का दिमाग खराब हो गया है।
सेठ चंदगी राम ने चुपचाप अपने काम में मशगूल हो कर चंपावती के क्रोध से मुक्ति पाई।
सरिता और सूरज खेलते खेलते नौकरों को आवाज लगा रहे थे। नौकर बच्चों के आगे पीछे घूम कर उनकी फरमाईशों को पूरा कर के चंपावती के क्रोध से बच रहे थे।
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