Sunday, September 01, 2013

उलझन

सेठ चंदगी राम दिवाने खास में अपने मुनीमों के साथ व्यापार के खाते देख रहे थे। चंदगी राम के माथे पर चिंता की लकीरे उभरने लगी।
मुनीम जी, उधार बढता जा रहा है। यह सही नही है। इतना व्यापार, इतनी बडी हवेली, खर्चो का कोई अंत नही है। हमारा मान सम्मान, कर्मचारियों की एक फौज है। उन सबके परिवार हम पर आश्रित है। बात हमारे खर्चों की नही है। मैं तो कम से कम में गुजारा कर सकता हूं, लेकिन जब हमारे इतने कर्मचारी हैं, उनके परिवार के हर सदस्य के बारे में भी सोचना मेरा दायित्व बनता है।सेठ चंदगी राम के माथे पर चिंता की लकीरे सपष्ट नजर आ रही हैं, लेकिन मुनीम को शायद अपनी तनख्वाह से अधिक कुछ नही सूझता था। बाकी कर्मचारी के बारे में चंदगी राम को तो चिन्ता है, लेकिन मुनीम को नही थी। वह बस इतना ही कह सका, कि जो व्यापार में हो रहा है, वह खातों में लिखता रहा है। जो लिखा है, वोही बता रहा है।
मुनीम, वह ठीक है, लेकिन अगर कुछ अलग सा व्यापार में हो रहा है, तो यह उसका फर्ज बनता है, कि मुझे बताए। हर चीज को वह खुद नही देख सकते हैं, इसीलिए कर्मचारियों की फौज रखी है, कि वे बारीकियों को उसके सामने लाए, लेकिन कोई अपना फर्ज ठीक तरीके से नही निभा रहा है।कुछ देर की चुप्पी के बाद सेठ जी ने इशारा किया, कि मुनीम जाए।

सेठ चंदगी राम अकेले ही दिवाने खास में दिवारों को ताकते रहे। काफी देर तक जब सेठ जी दिवाने खास से नहीं निकले, तो चंपावती अंदर गई। पति को उदास कमरे की दिवारों को ताकते देख कारण पूछा।
व्यापार की चिंता हो रही है, मालूम नही, नौकरों की पलटन क्या करती है, सभी की ख्याल रखता हूं। तनख्वाह ही देता हूं, सुख, दुख में पूरी मदद करता हूं। अब लगने लगा है, कि कोई ठीक से काम नही कर रहा है। बाजार में उधार बढ गया है। नकदी कम हो गई है। जहां बैंकों में रूपयों का भंडार होता था, आज कम होने लगा है।
दुकान तो मैं देखती नही, लेकिन घर के नौकर कामचोर हो रखे है। आप कुछ कहते नही, सिर पर चढ रखे है। काम कहो, पता नही कहां भाग जाते है। हम चार जन के लिए बारह नौकरों की पलटन पाल रखी है, आपने। भगा दो, सबको। सिर्फ दो ही काफी हैं। मैं खुद सब काम करती हूं। बच्चों को भी आदत डालो, काम करने की। ठीक हैं, नौकरों से करवाऔ, खुद हाथ पैर चलाने की आदत डालनी चाहिए।
तुम ठीक कह रही हो, बच्चों को खुद काम करने की आदत होनी चाहिए। रही बात नौकरों की, जो छोड जाए, उसकी जगह नया नौकर नही रखना। मेरा व्यापार ढीला नजर आ रहा है, किसी की तनख्वाह नही बढानी। मुझे अधिक सतर्क रहना पढेगा। नौकरों का भी परिवार है, किसी के पेट पर लात मत मारों, लेकिन अब अपने पेट को भी बचाना है।
सेठ और सेठानी बातचीत करके दिवाने खास से बाहर आए। नौकरों ने दोपहर का खाना लगाया। खाना खाने के पश्चात सेठ जी आराम करने के लिए शयन कक्ष में चले गए।
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