Sunday, September 22, 2013

लाइसेंस


This story is unedited version of prized story in Delhi Press 2006 story competition.

लंच के फौरन बाद जैसे ही रोहित अपने केबिन में पहुंचा, इंटरकॉम बजा। लाईन पर कम्पनी के मैनेजिंग डारेक्टर मिस्टर सूद थे। मिस्टर रोहित फौरन मेरे पास आयो। 

रोहित तुरन्त पलक झपकते मैनेजिंग डारेक्टर मिस्टर सूद के केबिन में पहुंच गया। सूद साहब कुछ परेशान लग रहे थे। रोहित भांप गया कि कोई सीरियस बात है।

बैठो। कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए सूद साहब ने रोहित से कहा।

मिस्टर रोहित मेरी पोजीशन बहुत खराब हो रही है। सूद साहब धीमे से स्वर में कांपती हुई आवाज में कहना शुरू किया। पहली तारीख को बोर्ड ऑफ डारेक्टरस की मीटिंग है, फैक्टरी तैयार हो चुकी है, ट्रायल प्रोडक्शन कल से शुरू होना है, लेकिन फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस अभी तक नही मिला है, अभी अभी खबर मिली है, कि विस्फोटक विभाग में हमारी फाईल अटक गई है, वहां से कारण बताऔ नोटिस जारी होने वाला है, लाईजिनींग हेड मिस्टर दास से मुझे पता चला है। यदि लाइसेंस मिलने में देर हो गई, तब हम किसी को अपना मुंह नही दिखा सकते है। बोर्ड ऑफ डारेक्टरस ने मीटिंग के फौरन बाद प्रेस कान्फ्रेंस में फैक्टरी प्रोडक्शन की घोषणा करनी है, बिना लाइसेंस के प्रोडक्शन शुरू नहीं कर सकते। प्रोडक्शन हमे हर हालात में शुरू करना है, क्यों कि अगले महीने हमारे प्रतिद्विन्दी प्रोडक्शन कर के बाजार में कब्जा करना चाहते हैं। दास ने खबर दी है कि उन्होने हमारे खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज की है, ताकि हमें लाइसेंस मिलने में देर हो जाए, और बाजी वो मार ले। मैं ऐसा हरगिर्ज नही होने दूंगा। हमारी प्रोडक्शन शुरू नही हुई तो हमारी कम्पनी के शेयर डूब सकते हैं और हम कहीं के नही रहेगें। तुम जानते हो कि जो पहले प्रोडक्शन शुरू करेगा, वही मार्किट पर अधिक कब्जा कर लेगा। कह कर सूद साहब चुप हो गये।

यह सब अचानक से कैसे हो गया।रोहित ने पूछने की कोशिश की।

यह सब मुझे विपिन का किया लगता है। बहुत ही शातिर निकला. मुझसे एक हफ्ते की छुट्टी ले कर गया था, कि लखनऊ शादी मे जाना है, और आज सुबह ईमेल से इस्तीफा भेज दिया। वह लखनऊ गया ही नही हैं, उसने दूसरी कम्पनी ज्वाईन कर ली है। हमारे सारे सीक्रेट दूसरी कम्पनी को बता कर हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। मैं उसे किसी भी कीमत पर नही छोडूगा। दूसरी कम्पनी ने हमारे खिलाफ शिकायत की है, जिस के आधार पर हमारा लाइसेंस रोक लिया है।. दास को मैनें नवयुग सिटी मे रोक रखा है, तुम फौरन वहां चले जाऔ। दास अकेले काम सम्भाल नहीं पा रहा है, तुमने दास के साथ मिल कर किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है. साम, दंड, भेद किसी भी नीति से मुझे फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस चाहिए। पैसा पानी की तरह बहा दो। बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना। यू अंडरस्टेन्ड बैटर। नाऊ यू कन गो मिस्टर रोहित।

रोहित सूद साहिब की बात सुन कर परेशान हो गया, खास तौर पर आखिर शब्द तीर की तरह सीने के पार चले गये कि किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है और बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना। यू अंडरस्टेन्ड बैटर। नाऊ यू कन गो मिस्टर रोहित। सूद साहिब के आदेश के अनुसार उसे फौरन नवयुग सिटी के लिये रवाना होना था, इसीलिए रोहित फटाफट ब्रीफकेस उठा कर घर वापिस चला गया।

घर आ कर फटाफट कपडे सूटकेस मे डालते हुए पत्नी श्वेता को चाय बनाने को कहा।
क्या बात है, आफिस से जल्दी आ कर सूटकेस तैयार कर रहे हो।. श्वेता ने रसोई से आवाज लगाई।
ऑफिस के काम से नवयुग सिटी अभी जाना है। ऑफिस की कार बाहर खड़ी है. बहुत जरूरी काम है, दो तीन दिन लग सकते हैं। रोहित ने सूटकेस तैयार करते हुए कहा।
वहीं पास मे न्यू समरहिल है, एक दिन के लिए वहीं चले। श्वेता ने पूछा।
मुश्किल है, बहुत जरूरी काम है. उसको करना जरूरी है। रोहित बोला।
काम खत्म होने पर एक दिन छुट्टी ले लेना। काम के साथ आराम और एन्जऑय भी हो जाऐगा।, कहते कहते श्वेता चाय के साथ कमरे में आ गई। कुछ सोचा हजूर.
यदि काम हो गया, तो एक दिन क्या, एक सप्ताह न्यू समरहिल के नाम, नही तो सोचना पडेगा, वापिस आ कर।. रोहित ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। 
चाय पी कर रोहित ने सूटकेस उठाया और शवेता को बॉय कह कर नवयुग सिटी के लिए रवाना हो गया।

रोहित की उम्र लगभग 45 साल मिस्टर सूद की कम्पनी में जरनल मैनेजर की पोस्ट पर पिछले 5 साल¨ से काम कर रहे थे। अपने बीस साल के केरियर में रोहित ने कभी पीछे मुड कर नही देखा। सफलता की सभी सीडियां चढते हुए आधुनिक सफलता की तमाम ऊचाईयां हासिल कर रखी है। रोहित ने कभी असफलता का स्वाद नही चखा था। राजधानी दिल्ली में एक बडी सी कोठी में खूबसूरत पत्नी श्वेता और दो बच्चो पुत्र पुनीत और पुत्री रूची के साथ रहते है। दोनों बच्चे कालेज में पड़ते है।

दोपहर के तीन बजे रोहित नवयुग सिटी के लिए रवाना हुआ. दिल्ली से दो सौ किलोमीटर दूर उतर भारत मे स्थित नवयुग सिटी एक खूबसूरत शहर, जहा विस्फोटक विभाग के मुख्यालय में लाइसेंस की फाईल अटकी पडी थी। रात के नौ बजे रोहित ने नवयुग सिटी के ब्रिस्टल होटल मे चेक इन किया। दास ने पिछले एक सप्ताह से यहां डेरा जमाया हुआ था।

आईये रोहित साहब, वेलकम, सुस्वागतम, आप को देखकर मुरदे मे जान आ गई है। दास ने मुस्कराते हुए कहा।
एक तो थकान से बदन टूट रहा है, तुमहे मजाक सूझ रहा है। रोहित ने थकान से बेहाल स्वर मे कहा।
तनिक स्नान कर लिजिए। थकान दूर करने की दवाई मेरे पास है।.दास ने मेज पर व्हिस्की की बोतल की और इशारा किया।

नहाने के बाद रोहित के चेहरे पर फुरती आ गई। जश्न अकेले मनाया जा रहा है। रोहित ने कुर्सी खीचते हुए दास से कहा।
प्यारे रोहित, यह जाम जश्न मे नही, गम भुलाने के लिए पिया जा रहा है। वैसे जनाब यह चेहरे पर रौनक स्नान की वजह से है या फिर जाम को देख कर। दास ने व्हिस्की का पैग बनाते पूछा।
किस गम की बात कर रहे हो। रोहित ने व्हिस्की का पैग दास के हाथ से लेते हुए पूछा।
वोही लाइसेंस का गम। उसने मिलना नहीं और नौकरी के हाथ से निकलने का गम। दास की आवाज मे गम्भीरता थी।
मजाक छोड कर सीरियस बात कर दास। रोहित ने उत्सुकता से पूछा।
रोहित मै मजाक नही कर रहा हूं। आज दोहपर को सूद साहब से बात की थी, लाइसेंस नहीं मिल रहा है। सूद साहब ने यहां तक कह दिया, अगर लाइसेंस नही मिला, तो फिस मत आना। मैंने सारे पापड़ बेल कर देख लिए, रोहित कल फाईल साईन हो जाएगी। एसिस्टेन्ट कन्ट्रोलर मोहन आज ही फाईल साईन कर के हमारी एपलीकेशन रिजेक्ट कर रहे थे, बहुत मिन्नतों के बाद फाईल को एक दिन के लिए पेंड़िग किया है। तभी तो सूद साहब ने आपको यहां भेजा है। दास कहते कहते रूक गया।

सूद साहब ने खुली ऑफर दी है, कि जितना पैसा खर्च हो, लाइसेंस हर हालात में चाहिए। रोहित ने दास को कहा। मेरी पूरी अटैची नोटो से भरी हुई है, फिर क्यों काम मे रूकावट आ रही है।
हमारी फाईल एसिस्टेन्ट कन्ट्रोलर मोहन के पास है, और वह रिश्वत नहीं लेता है। यही परेशानी का कारण है।
मैं मानने को तैयार नही हूं कि आज के समय कोई रिश्वत नही लेता है। रोहित ने आश्चर्य से पूछा।
सच यही है, कि आज के इस भ्रष्ट युग में मोहन जैसा वयक्ति भी है। दास की आवाज धीमे धामे कांप रही थी।
उसकी कोई तो कमजोरी होगी, जिसका हम फायदा उठा सकते है। रोहित ने समय की नजाकत को भांपते हुए पूछा।
रीफ आदमी की कोई कमजोरी नहीं होती है। शराफत ही उसकी कमजोरी समझो या ताकत, मुझे मालूम नहीं, लेकिन एक बात साफ है, उसका भ्रष्ट न होना हम दोनों की जिन्दगी की दिशा मोड सकता है। मुझे मालूम है कि तुमने जिन्दगी मे कभी असफलता का मुहं नही देखा, लेकिन इस बार सावधान रहना।
दास तुम इतना डरा क्यो रहे हो।
रोहित मै न तो तुम्हे डरा रहा हूं और न ही तुम्हारा हौसला पस्त कर रहा हूं। मैं सिर्फ तुम्हें सच्चाई से अवगत कराना चाहता हूं, कि कल रोज जब लाइसेंस के बदले शौ कॉज नोटिस मिलेगा, तुम उसके लिए पहले से तैयार रहो।
दास मोहन तो एसिस्टेन्ट कन्ट्रोलर है, हम चीफ कन्ट्रोलर से मिल सकते है।
रोहित कोई फायदा नही होने वाला है। मोहन के फाईल पर लिखे नोट्स को चीफ कन्ट्रोलर भी नजर अंदाज नही कर सकता है।
मगर क्यो?”
लगता है कि सूद साहब ने तुम्हे पूरी बात नहीं बताई है, तभी तुम ज्यादा उत्साहित लग रहे हो, रोहित सुनो, दास ने बात आगे बढाते हुए कहा। विस्फोटक नियमों के अनुसार हमे जितना औपन एरिया रखना था, हमने उसका आधा भी नही रखा, जिसकी लिखित शिकायत हमारी प्रतिद्विन्द्वी कम्पनी ने की है, जिसके आधार पर मोहन ने हमारी फैक्टरी का निरीक्षण किया है,र अब हमे शौ कॉज नोटिस दिया जायेगा, र हम बिना लाइसेंस के प्रोडक्शन शुरू नहीं कर सकते। नियमों के पालन करने का मतलब है, फैक्टरी में तोडफोड, और समय और पैसे का नुकसान। हमारे प्रतिद्विन्द्वी बाजी मार लेगें। यह सब सूद साहब को बरदास्त नही है।
क्या हमे नियम मालूम नही थे।
मालूम थे, लेकिन एक सूद साहब का लालच और दूसरा चम्चों की गलत राय। फैक्टरी पहले नियमों के अनुसार बन रही थी, पन एरिया भी नियम¨ के अनुसार छोडा जा रहा था, लेकिन बाद में नक्शे में परिवर्तन करके औपन एरिया कम कर दिया।
लेकिन क्यो?”
ज्यादा प्रोडक्शन के लिये और अधिक मशीनें लगाई गयी है।
कुछ समझ नही आ रहा है।

दास ने आगे बात बढाते हुए कहा, तुमहे विपिन की कहानी शायद मालूम नहीं है, इसलिए सूद साहब की बात पर यकीन करते हो, वो एक दम शुध व्यवसायिक हैं, सिर्फ रूपयों की जुबान जानते है, इंसानियत, नियम कुछ मायने नहीं रखते हैं, समझते है, कि पैसे से हर चीज खरीदी जा सकती है, इसी कारण विस्फोटक नियमो की परवा किए फैक्टरी का निर्माण किया। विपिन ने सलाह दी थी, कि लाइसेंस लेने के बाद औपन एरिया कवर करना चाहिए, लेकिन सूद साहब को पैसे का घमंड था, उसकी सलाह के विपरीत फैक्टरी निर्माण होता रहा और विपिन को खुले आम सभी के सामने ड़ाट लगाई और खिल्ली उड़ाई। स्टाफ और मजदूरों के बीच हुए अपमान को वह सहन नहीं कर सका और नौकरी छोड़ दी। शायद अपने अपमान का बदला लेने के लिए उसने प्रतिद्विन्द्वी कम्पनी ज्वाइन की और लिखित शिकायत विस्फोटक विभाग मे की, और शिकायत के बाद भी चुप नही बैठा, बकायदा जांच मे भरपूर मदद कर रहा है, जिस कारण हमे लाइसेंस नही मिल रहा है. हमारी फैक्टरी के एक एक इंच की जानकारी विभाग को है, इसी कारण चीफ कन्ट्रोलर भी कुछ सहायता नही कर पा रहा है। रोहित मैं तो हार गया, अब गेंद तुम्हारे पाले में है।
चलो सुबह देखते हैं। कह कर रोहित बिस्तर पर लेट गया, लेकिन काफी देर तक आंखों में नींद नही आई। आंखें बंद कर सोचता रहा, कि कैसे इस मसले कोहल किया जाए।

सुबह दस बजे से पहले रोहित और दास विस्फोटक विभाग पहुंच गए और एसिस्टेन्ट कन्ट्रोलर मोहन के केबिन के बाहर इंतजार करने लगे। ठीक दस बजे मोहन दफ्तर आये, अपने केबिन के आगे रोहित और दास को देख कर मोहन रूक गया।
रोहित
मोहन
दोनो एक दूसरे से हाथ मिलाने के बाद गले मिले।
वहॉट ए पलेजेन्ट सरप्राईज, रोहित, कितने सालो बाद मिल रहे है। मोहन ने खुशी से हंसते हुए पूछा।
वाकई, मोहन सालो की गिनती याद नही, आज हमारा सालों बाद मिलना यह सिद्ध करता है, कि दुनिया गोल है, घूम फिर कर उसी बिन्दु पर मिल जाते है।
आऔ रोहित केबिन में बैठ कर आराम से बात करते है।
मोहन और रोहित केबिन के अन्दर चले गये। बाहर दास आश्चर्य से सोचने लगा, क्या यह महज इत्फाक है, कि मोहन और रोहित बचपन के दोस्त निकले। शायद इसी बहाने कम्पनी का कुछ फायदा हो जाए।
केबिन के अन्दर मोहन और रोहित बाते करते रहे। दोनो बचपन के दोस्त थे, स्कूल और कॉलेज मे एक साथ पढते थे। दोनो के परिवार पुरानी दिल्ली के कूचा घासीराम मे रहते थे। रोहित का परिवार अमीर था और मोहन का परिवार मध्यम वर्गीय।. हम उम्र और एक ही गली में रहने के साथ एक ही स्कूल में पढने के कारण दोनो का समय एक साथ बीतता था, सिर्फ रात को सोने के लिए अलग होते थे। दो जिस्म एक जान वाली बात थी। स्कूल और कॉलेज मे एक साथ एक बैंच पर पढाई की। बी कॉम करने के पश्चात रोहित एमबीए करने अमेरिका चला गया। घर की आर्थिक स्थिती अच्छी न होने के कारण मोहन ने नौकरी कर ली।
इतने में चपरासी चाय ले आया. चाय की चुस्कियों मे मोहन ने रोहित से पूछा।
आजकल रिहाइश कहां रखी है। लगभग दस बारह साल पहले दिल्ली गया, तुमने मकान बेच दिया था, सब कर्मशियल हो गया है। तुम्हारे नये मकान का पता नही चल सका। आस पास सभी जगह ऑफिस बन गये। जिस बिल्डिग में मैं रहता था, वहां बैंक खुल गया. मैं अपनी बिल्डिग ही पहचान न सका।
हॉवर्ड यूनिर्वसिटी से एमबीए करने के बाद जब दिल्ली वापस आया, तब तुम मकान छोड़ चुके थे। दो तीन साल बाद हमने मकान बेच कर ग्रेटर कैलाश में कोठी बनवा ली, तभी से वहीं रह रहे है।
बडे़ भाग्यशाली हो यार ग्रेटर कैलाश जैसी पॉश कालोनी मे रहते हो। तुमहे पता है, हम लोग तो किराये पर रहते थे। मकान मालिक ने पूरी बिल्डिग ही बेच दी थी। दो तीन साल प्राईवेट नौकरियां की, फिर यहां नौकरी लग गई। बीस सालों से नवयुग सिटी में रह रहा हूं। अच्छा यह बताऔ, इस ऑफिस मे कैसे आना हुआ।
मोहन मै सूद एण्ड कम्पनी मे जरनल मैनेजर हूं और यहां लाइसेंस के सिलसिले मे आया हूं।
कुछ छण की खामोशी के बाद मोहन ने कहा,  बच्पन के लंगोटिया लगभग बीस सालों के बाद मिले भी, तो भी किन हालात में, यह एक इतफाक अजीब सा है।
रोहित भी कुछ बोल न सका। बचपन के लंगोटिया से लाइसेंस की कोई बात न कर सका।
चुप्पी तोडते हुए मोहन ने कहा, रोहित तुम्हारे आने का मकसद मैं समझ सकता हूं, लेकिन मैं तुम्हारी मदद नही कर सकता हूं। तुम्हारी कम्पनी के खिलाफ शिकायत की मैने जांच की है, मेरे कुछ सिद्धांत है, मै रिश्वत नही लेता हूं, र निरीक्षण के दौरान जो अनिमिताएं पाई है, उन आधार पर लाइसेंस के लिए अनुमति दे नही सकता हूं।
मोहन यह बात सच है, कि मैं रिश्वत के लिए अटेची भर कर नोट लाया हूं, तुम्हे बच्पन से जानता हूं। इस विषय पर अब मैं क्या बोलू। तुमसे दिल की बात कह सकता हूं। जीवन में जो मांगा, मिला, कभी असफलता का सामना नहीं किया, अगर लाइसेंस नहीं मिला, तो मुझे नौकरी छोड़नी पडेगी, पहली बार असफलता का कारण दोस्ती बनेगी। मुझे इस असफलता पर तुमसे कोई श्किायत नही होगी, लेकिन मोहन कुछ रास्ता निकालो। हर समस्या का समाधान होता है, इस भ्रष्ट समाज में तुम जैसे ईमानदार आदमी को देख कर मुझे अति प्रसन्ता है। सबसे अधिक खुशी यह देख कर है, कि वो ईमानदार मेरा लंगोटिया दोस्त है।
रोहित की बात सुन कर मोहन ने कहा, रोहित मैं जानता हूं, कि यहां मुझे छोड़ कर हर कोई भ्रष्ट है, मैं समाज के भ्रष्टाचार को समाप्त नही कर सकता हूं, तरीके तो सब हैं, मुझे सोचने के लिए वक्त दो। कल सुबह बात करते हैं।
तुम बुरा तो¨ कहीं नहीं मानोगे, झिझकते हिए रोहित ने मोहन से पूछा, क्या शाम को घर आ सकता हूं।
तुम्हारा ही घर है, बेझिझक आ सकते हो।कहते हुए मोहन ने एक कागज पर पता लिखा।

रोहित और दास होटल आ गए। रोहित क्या बात हुई, दास ने बात शुरू करते हुए चुप्पी को तोडा।
मोहन ने सोचने के लिए कल तक का समय लिया है। सोचता हूं, कि शाम को उसके घर चल कर बात करते हैं। वहां शायद खुल कर बात हो सकती है।
मोहन तुम्हारा दोस्त है।
हां दास, हम दोनो बच्पन के लंगोटिया दोस्त है। आज लगभग बीस साल बाद मिले, लेकिन मिले भी तो किन हालात में। सोच कर परेशानी हो रही है, कि आज उससे उसके सिद्धांतो की बली मांग रहा हूं।
क्या वो काम करेगा।
मैं उसको जानता हूं, कुछ रास्ता जरूर निकालेगा।

शाम को रोहित और दास मोहन के घर रूप नगर के लिए चले। रास्ते मे एक स्वीट शॉप पर रूक कर मोहन के लिए मिठाई खरीदी।
कुछ गिफ्ट ले चलते है। दास ने कहा।
हीं, दोस्ती को पैसे में नही तौलना चाहता हूं। ऐसे दोस्त बहुत किस्मत से मिलते हैं, मैं उसे खोना नहीं चाहता।. अगर आज पहली बार असफलता भी मिले, तो काई गम नही। सोच लिया है, कि अगर लाइसेंस नही मिला, तो नौकरी छोड़ दूंगा, अगर मिल गया तब जिन्दगी के मायने बदल जाऐगें।
इतने में मोहन का घर आ गया। नवयुग सिटी के अंतिम छोर पर बसा रूप नगर, जिसके बाद शहर की सीमा समाप्त हो जाती है और पर्वत मालाऔं की श्रंखलाए शुरू हो जाती हैं। लगभग तीस किलोमीटर पर न्यूसमर हिल एक खूबसूरत सा छोटा हिल स्टेशन।  पर्वत श्रंखलाऔ से हल्की हल्की ठंडी हवा के झोकों से वातावरण मधुर हो चला था। दो सौ मीटर के प्लाट पर सिर्फ दो कमरो का सेट बना था, र सारा प्लाट खाली। मोहन लॉन मे बैठा एफ एम रेडियो सुन रहा था। घर के बाहर और अंदर दीवार के साथ फल दार पेड़ और पौघे घर की खूबसूरती को चार चांद लगा रहे थे। रोहित और दास का स्वागत मोहन ने किया और घर के अन्दर बैठक मे मोहन की पत्नी नीलम ने नाश्ते का इन्तजाम कर रखा था। रोहित ने मिठाई का डिब्बा पकडाते हुए धीरे से हेलो कहा।
रोहित इस तकल्लुफ की कोई जरूरत नही है। चाय लो, मोहन ने चाय का कप रोहित को पकडाते हुए कहा। चाय पीने के बाद मोहन ने अपना घर रोहित को दिखाया। यह छोटा सा मकान है, एक बैठक कम हमारा बेडरूम, दूसरा बच्चों का बेडरूम, रसोई, बाथ और पीछे फिर लॉन, जहा फिर नींम्बू के झाड़ के साथ पपीते और अमरूद के पेड़। एक छोटा सा साफ सुथरा घर, जहां हर जरूरत की चीज बडे़ करीने से मौजूद थी, लेकिन कोई भी विलासता का समान नजर नही आया।
यार मोहन तुमने खाली प्लाट छोड़ रखा है, एक दो कमरे और बनवा लो।
उसके लिए रकम चाहिए, तुम तो जानते हो, रिश्वत मैं लेता नही और तनखवाह मे यह मुश्किल है, बच्चे बडे़ हो रहे हैं, उनकी पढा़ई और कुछ भविष्य के लिए भी बचत करनी है।
बच्चे नजर नही आ रहे है। रोहित ने उत्सुकता से पूछा।
भई, तुमहारे लाइसेंस के चक्कर मे बच्चो का जिक्र ही रह गया। एक लड़का और एक लड़की, दोनो कॉलेज मे पढते है। छुट्टियां मनाने न्यूसमर हिल गये है। हम भी कल सुबह दस दिनों के लिये बच्चों के पास जा रहे है। शाम को छ्ट्टी मंजूर करवाई है।

छुट्टी का नाम सुनते ही रोहित हक्का बक्का रह गया और मोहन इस बात को भांप गया। घबरायो मत रोहित, तुम इस बात को कभी समझ नही सकोगे, तुमहे अपनी कहानी सुनाता हूं। ग्रेजुएशन के बाद लगभग तीन साल तक प्राइवेट नौकरी की। मैने खुद रिश्वत दे कर कम्पनी के लिये काम करवाये है। स्टील मिल मे काम करता था। ईराक, ईरान युद्ध के बाद काफी स्क्रेप स्टील मिलों मे वहां से आया था। उस स्क्रेप में जिन्दा कारतूस और बम भी निकलते थे। उनको कभी भी अलग नही किया जाता था। एक बार स्क्रेप में जिन्दा बमों की मात्रा ज्यादा थी, जिसके भट्टी मे जाते ही भयानक विस्फोट हुए, जिसके कारण तीस के करीब मजदूरों की मौत हो गई। मैं उस फैक्टरी मे काम करता था, अपनी आंखों से वो मंजर देखा था। जिन्दगी और मौत के फासले की दूरी मैने महसूस की है। पैसो के जोर पर केस रफा दफा हो गया। क्यों कि मजदूर दूर गांव के थे, उनके परिवार जनों को उनकी मौत का पता ही नही चला। रोहित उस हादसे के बाद मेरी सरकारी नौकरी लग गई और मैंने निश्चय किया कि रिश्वत नही लूंगा, ताकी कुछ हद तक गलत काम रोक सकूं। मैं मानता हूं कि मैं सिस्टम को अकेला सुधार तो नहीं सकता, लेकिन कुछ केसों मे मेरे काम को मेरे अफसर सहारते है, इसी से आत्म सन्तुष्टिी होती है। कई बार मेरे काम को नजर अंदाज किया जाता है, क्यो कि पैसो के बोझ में सब दफन हो जाता है। ऑफिस में मेरी मौजूदगी में तुमहे लाइसेंस मिल नहीं सकता है. क्योंकि ऐसे काम मेरी गैर मौजूदगी में होते है। सारी दुनिया के गलत काम होते है, एक और सही, दोस्ती की खातिर, इसीलिए मैने चीफ साहब से बात कर ली है, मैं दस दिनों की छुट्टी जा रहा हूं, तुम्हारा काम हो जाएगा।

रोहित को अपनी काबलियत और पैसे पर घमंड था। वह हमेशा समझता था, कि पैसों के बलबूते सब कुछ हो सकता है, लेकिन आज यहां बाजी पलट गई। पैसे पर पुरानी दोस्ती हावी हो गई। पैसा हार गया और दोस्ती जीत गई। रोहित मोहन की बात चुपचाप सुनता रहा।
रोहित जब मेरी न की गई फाईल को पास करना होता है, तो मुझे छुट्टी पर भेज दिया जाता है, ताकी कोई दूसरा अफसर उसे पास कर सके, आज मैने खुद छुट्टी मांगी है, ताकी तुम्हारा काम हो सके। चलो छोडो इस टापिक को। रात काफी ह चुकी है। कल सुबह न्यूसमर हिल भी जाना है, पैकिंग भी करनी है। डिनर करते है।
डायॅनिग टेबल पर खाना खाते हुए दास पहली बार बोला, जो चुपचाप रोहित और मोहन की बातें अबतक सुन रहा था।
वाकई खाना बहुत स्वादिष्ट है, मोहन जी, भाभी जी के हाथों की तारीफ किये बिना यहां से जा नहीं सकता। एक बात और, मैं आपके सिद्धांतो की कद्र करता हूं, क्या मैं आपका दोस्त बन सकता हूं।
बेशक, हर सच्चा आदमी मेरा दोस्त बन सकता है।
मैं आपकी कसौटी पर खरा उतरने की भरपूर कोशिश करूंगा।
डिनर के बाद रोहित और मोहन होटल वापस आ गये। रोहित खामोश था। दास ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, रोहित तुम्हे अपने दोस्त मोहन पर गर्व होना चाहिये, जिसने दोस्ती पर सिद्धांतों की बली दे दी। जिस काम को पैसे नही कर सके, उसे दोस्ती ने कर दिखाया।
लेकिन पैसे तो फिर भी लगेगें। रोहित ने उदासी भरे स्वर मे कहा।
आज पहली बार तुम असफल हुए हो, र वो भी दोस्त के कारण, इसीलिए तुम्हें खुश होना चाहिये, लेकिन तुम उदास हो, किस मिट्टी के आदमी हो तुम रोहित. मेरी बात मानो, इस दोस्ती को कभी मत छोड़ना। सच्चे दोस्त आज के कलयुग में नही मिलते है। एक तुम्हे मिला है, तुम उसे ठुकरा रहे हो। यह अच्छा नहीं कर रहे हो।
लेकिन रोहित आज एक पिटा हुआ खिलाडी़ था, इसलिए शर्म से डूबा जा रहा था।

अगली सुबह मोहन ऑफिस नही था, उसके टेबल से फाईल को उसके सहयोगी सोहन के पास दी गई। फाईल में से आपति जनक कागजों को निकाल कर दूसरे कागज लगा दिये गये। ऑफिस में बैठ कर फैक्टरी का निरीक्षण भी हो गया और संतोषजनक रिपोर्ट लगा कर तीन दिनों में लाइसेंस जारी कर दिया गया। कल तक जो काम असंमभव लग रहा था, पैसों के बोझ में दब कर संभव हो गया। लाइसेंस मिलते ही रोहित खुशी से उछल पड़ा, झट से सूद साहब को फोन किया।
गुड न्यूज सर, लाइसेंस मिल गया।
वैल डन, रोहित, मैं जानता था, कि तुम यह काम कर पाऔगे, इसीलिए तुम्हें काम सौंपा था। यू डिजर्व इन्क्रिमेंट। सूद साहब की आवाज में एक नई ताकत नजर आ रही थी।

रोहित तुम मानो या न मानो, लाइसेंस पा कर तुम अभी भी असफल हो। यह लाइसेंस जरूर पैसों के बूते पर मिला है, लेकिन पहले यही विभाग पैसों को हाथ नहीं लगा रहा था, मोहन की सिर्फ दोस्ती की खातिर तुमने बाजी जीत कर हारी है, र मोहन ने दोस्ती के नाम पर अपने सिद्धांतो की बली दे कर बाजी जीत ली है। कह कर दास मंद मंद मुस्करा रहा था और रोहित आवाक दास को देखता रह गया।

        
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मौसम

कुछ मौसम ने ली करवट दिन सुहाना हो गया रिमझिम बूंदें पड़ने लगी आषाढ़ में सावन आ गया गर्म पानी भाप बन कर उड़ गया ...