Friday, October 11, 2013

कदंब

कदंब

जीवन की भागदौड ने
उन्मुक्त जीना भुला दिया।
हंसना भुला दिया
सोचना भुला दिया।
बस भागता ही जा रहा हूं
जनसमूह के साथ
दिशा को भुला दिया
स्वयं को भुला दिया।
अनुभूती ने कदम ने
कदंब का पेड याद दिला दिया
बचपन याद दिला दिया
हंसना खेलना याद दिला दिया।
वो तितली पकडना याद दिला दिया।
झूला याद दिला दिया
मित्रता संबंध याद दिला दिया
फूलों को तोडना याद दिला दिया।
माली के आगे भागते भागते
घर पहुंच कर मां के आंचल में छिपना याद दिला दिया।
कुछ छण के लिए अनुभूति के कदम ने
उन्मुक्त जीवन याद दिला दिया।
क्या मैं अपने बच्चों को अपना बचपन दे सकता हूं, यह याद दिला दिया
अनुभति के कदम ने जीवन का दृष्टिकोण
बदलना याद दिला दिया।
कदंब के पास कदम पहुंच कर
एक नई अनुभूती को

याद दिला दिया।
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