Saturday, December 14, 2013

मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे

मेरे बाबा ने दरबार लगाया दर्शन कर लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

दीवाना हो गया मैं जब ये श्रंगार देखा,
मेरा मन झूम उठा जब ये दरबार देखा,
गुरूजी बागा पहने बाबा मुस्करा रहे हैं,
और मस्ती में झूमें यही समझा रहे हैं,
जमकर प्यार बरसता देखा बाबा के दो नैन से,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

तुम्हारे दर पे सतगुरू जो भी आया सवाली,
झोलियां भर दी उसकी, गया ना कोई खाली,
द्वार सा चाहें तेरा, चाहू में ढंका बजता,
जिसे भी सत्तगुरू चाहें नसीब पल में बदलता,
मुझ को भी इनकी चौखट पे मत्था टेक लैण दे,
मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

भक्त जितने भी आये तेरी जयकार करते,
और मेरे दाता तुमसे बडा ही प्यार करते,
सभी बाबा के दर पे खजाना लूटते हैं,
मैं भी आया बडी दूर से झोली तो भर लैण दे,

मैनू नच लैण दे, मैनू नच लैण दे।

(परंपरागत भजन) 



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