Saturday, December 14, 2013

तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,

तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,
(परंपरागत भजन) 

तेरे दर को छोड कर किस दर पर जाऊं मैं,
सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊं मैं।

जब से याद भुलाई तेरी लाखों कष्ट उठाये हैं,
क्या जानू इस जीवन को कितने अंदर पाप कमाये हैं,
हूं मैं शर्मिन्दा आपसे क्या बतलाऊं मैं।

मेरे पाप कर्म ही तुझ से प्रीत न करने देते हैं,
कभी जो चाहूं मिलूं आप से रोक मुझे ये लेते हैं,
कैसे स्वामी आप के दर्शन पाऊं मैं।

है तू नाथ वरों का दाता तुझ से सब वर पाते हैं,
ऋषि मुनि और योगी सारे तेरे ही गुण गाते हैं,
छींटा दे ज्ञान का होश में आऊं मैं।

जो बीती सो बीती लेकिन बाकी उम्र संभालू मैं,
प्रेम पाश में बंधी आपके गीत प्रेम के गाऊं मैं,

जीवन आपके चरणों में सफल बनाऊं मैं।

(परंपरागत भजन)
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