Sunday, December 22, 2013

अस्तित्व


पच्चीस जवानों का एक समूह अपने अधिकारी के नेतृत्व में काश्मीर सीमा में एक चौकी की ओर बढ रहा था। ठंड का मौसम था और जवानों की टुकडी ने अगले तीन महीने तक वही रहना था। रात का समय था, उनकी इच्छा चाय पीने की हो रही थी। उन्हे चाय की एक दुकान दिखी, परन्तु रात के समय वह बंद थी। दुकान बंद देख कर एक जवान ने अधिकारी से कहा, सर य़दि आपकी अनुमति हो, तो हम दुकान का ताला तोड कर चाय बना सकते है, तनिक आराम करके चाय पीकर तरोताजा हो कर हम चौकी की ओर रवाना हो सकते हैं। दुकान का ताला तोडने के निर्णय पर अधिकारी सोचने लगा, कि यह अनुचित और अनैतिक है। फिर कुछ सोच कर उसने अनुमति दे दी। ताला तोड कर दुकान खोली और जवानों ने चाय बनाई, केक बिस्कुट खाकर तरोताजा हए। चलने से पहले जवानों ने अधिकारी से पूछा, कि चाय तो पी ली, परन्तु भुगतान किसे करें। वे कोई चोर नही हैं, कि ताला तोड कर चोरी करे। किसी भी अनुचित कार्य के लिए सेना अनुमति नही देती। अधिकारी ने एक हजार रूपये चीनी के कनस्तर के नीचे कुछ इस तरह से रखे, कि दुकानदार जब सुबह दुकान खोले तो रुपये आसानी से नजर आ जाएं। अब कोई अपराधबोध जवानों के मन में नही था। उन्होनें दुकान का दरवाजा बंद किया और ताला लटका कर अधिक उत्साह से चौकी की ओर रवाना हुए।
तीन महीने बीत गए, अब नई टुकडी ने चौकी संभाल ली। अधिकारी अपनी टुकडी को लेकर दिन के समय वापिस बेस के लिए रवाना हुए। रास्ते में उसी चाय की दुकान पर रूके। दिन का समय था, इसलिए चाय की दुकान खुली थी और उसका मालिक मौजूद था। वह एक गरीब वृद्ध था। मालिक एक साथ सेना के पच्चीस जवानों को देख कर खुश हो गया कि आज एक साथ ही बिक्री से अच्छे पैसे मिल जाएगें। सभी ने चाय की चुस्कियों के साथ केक, बिस्कुट खाए। सेना के जवान उस वृद्ध से बातचीत कर रहे थे और अपने अनुभव बता रहे थे। वृद्ध की बातों से एक बात स्पष्ट झलकती थी, वह बात थी उसकी परमात्मा में अटूट विश्वास। एक सिपाही ने वृद्ध को उसकाते हुए पूछा, कि यदि भगवान जैसा कोई है, तब आप इतनी ठंड में चाय की दुकान नही चला रहे होते। वह आपको घर बिठा कर खिला सकते थे। इतना सुन कर वह वृद्ध बोला, न बाबू, बडे बोल न बोलो। वह है, उसका अस्तित्व भी है। अभी तीन महीने पहले की बात है, मेरा बेटा दुकान पर बैठा था। आतंकवादियों ने उसे अधमरा कर दिया था। मरा समझ कर सारी दुकान भी लूट गए। लडके को अस्पताल में भरती कराया। जरूरी दवाईयों के लिए भी पैसे नही थे। सुबह स्नान करने के पश्चात भगवान से मदद की विनती की। रात को दुकान बंद की। सुबह आ कर देखता हूं, कि दुकान के दरवाजा का ताला टूटा हुआ है। मैं समझा कि आज तो पूरा लुट गया, लेकिन चीनी के कनस्तर के नीचे एक हजार रूपये रखे थे। किसी ने चाय बनाई थी और उसकी कीमत से कहीं अधिक रूपये ऱख कर चला गया। यह तो सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है, जिसने मेरी फरियाद सुन ली और तकलीफ में मेरी मदद की। वो रूपये मेरे बहुत काम आए, जिनसे मैं जरूरी दवाईयां खरीद सका। उन रूपयों की बदोलत मेरा लडका मौत के मुंह से बाहर आ सका। आज वह बिल्कुल ठीक है। मैं आपको बता नही सकता कि उस दिन उन रूपयों की मुझे कितनी जरूरत थी। आप समझ सकते हैं, कि यह केवल परमात्मा की असीम कृपा थी और परमात्मा ने ही किसी की मार्फत रूपये रखवाए। मेरा परमात्मा में अटूट विश्वास है और आपसे से भी अनुरोध करता हूं, कि आप उसके अस्तित्व पर कोई प्रश्न चिन्ह न लगाए।
उस बूढे आदमी की आंखों में अटूट विश्वास था। वो पच्चीस जवान कुछ कहे, कि उनके अधिकारी ने ईशारा किया और सब समझ गए। अधिकारी की आंख के ईशारे ने सब जवानों को चुप कर दिया। पेमेन्ट करने के पश्चात अधिकारी ने कहा, बाबा आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। परमात्मा का अस्तित्व है। जब हम उसके अस्तित्व पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाते है, तब वह हमें अपना रूप दिखा कर हमें उसके अस्तित्व पर अटूट विश्वास करने पर मजबूर करता है।

वृद्ध की आंखे नम थी। जवानों की टुकडी बेस की ओर रवाना हो गई।   
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