Sunday, January 26, 2014

टैक्स


शाम के साढे छ: बजे ऑफिस में कंप्यूटर बंद करने के पश्चात बैग उठाया और घर के लिए रवाना हुआ। पार्किंग से कार निकाली। साकेत से रोहिणी तक का सफर कितने समय में तय होगा, यह तो भगवान भरोसे है, कि वह कितना ट्रैफिक कहां खडा कर दे। तीस किलोमीटर का सफर डेढ घंटे से तीन घंटे तक का हो सकता है। खैर क्या कर सकते हैं, यह तो दिल्ली शहर में रहने का टैक्स है। टैक्स का नाम है ट्रैफिक टैक्स। फिर भी नौकरी तो करनी है। यह एक विडम्बना ही है, कि घर के पास पसन्द और मतलब की नौकरी नही मिलती है। रहते दिल्ली में है, तो नौकरी नोएडा या गुडगांव में मिलेगी। यदि नोएडा रहने लगो, तब तो शर्तिया नौकरी गुडगांव या दिल्ली में मिलेगी। गुडगांव वाले दिल्ली या नोएडा नौकरी करने जाते हैं। कहां जाए, कहां रहे, कहां नौकरी करें? यह तो खुदा भी नही बता सकता है। नौकरी तो आती जाती है, रह रोज घर तो बदला नही जाता। बच्चों के स्कूल देखना है। नौकरी तो मिल जाती है, स्कूल में एडमिशन नही मिलता, खैर छोडो इन बातों को, क्या रखा है? क्या कहा, कुछ नही रहा है, इन बातों में?  झूठ बोल रहे हो आप, सच बोलना नही आता। आता तो है, पर बोला नही जाता।

चलो, घर के लिए निकलते है, कहां कहां कितना टैक्स देना है, मालूम नही। पहला टैक्स तो साकेत में ही दे देते हैं। पार्किंग से कार निकालने में ही दस मिन्ट लग गए, चारों तरफ कारों का काफिला। एक साथ ऑफिस से नौकरों का जत्था छूटता है और ऊपर से तीन मॉल्स, जहां शॉपिंग करने के लिए कम, मस्ती, धमा चौकडी के लिए ज्यादा कारें ही कारें। शाम को ऑफिस के नौकर तो चले जाते है, मनचलों की फौज धमा चौकडी करके सबूत छोड जाती है, बियर, शराब की टूटी बोतले पार्किंग में मिलती है, कार टायर के नीचे आ कर टायरों का सत्यानाश, पहला टैक्स तो यही है।

अगले टैक्स की बात करे, वह है ट्रैफिक टैक्स, हर मोड पर देना पडता है। मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन महज डेढ किलोमीटर, समय मात्र तीस मिन्ट। तीसरा टैक्स यहीं देना है। ट्रैफिक सिगनल तीन मिन्ट का, तीन से चार बार के बाद आप सिगनल पार कर सकेगें। तब क्या करे, टैक्स देने के लिए तैयार है। एक के बाद एक भिखारी कतार से कारों के शीशे खटखटा कर भीख मांगने का काम शुरू। मना करने पर भी हिलते नही। वही परीचित भिखारियों के चेहरे, उनका ही इलाका है, मजाल है, कोई नया दिखाई दे जाए। हम तो नौकरी करते है, वे तो व्यापारी है, खुद का बिजनेस है, हम से ज्यादा कमाते है। हम कार में घूमते हैं, वे भी कारे चलाते है। मना करने पर भी हिलते नही। चुपचाप कार में बैठे रहते है, जब सिगनल लाल से हरा होता है, तब पट्ठे हिलते हैं, गुस्सा तो बहुत आता है, टैक्स चुकाने में, गाली टैक्स। पट्ठे गंदी, भद्दी गाली निकाल कर जाते हैं। समझ गए न, कौन सी वाली? ठीक समझे, मां बहन की जो मैं लिख नही सकता, पर सुननी पढती हैं। हर दूसरे दिन गाली टैक्स देना पढता है। समझ नही आता, कि क्यों गाली देते है? भीख भी क्यों दें, यह उनकी कोई मजबूरी नही है, पेशा है। भीख मांग कर हमसे ज्यादा कमाते है। खैर जब सरकार ने खुली छूट भीख मांगने की दे रखी है, तब बेचारी बेबस जनता सिर्फ गाली सुन सकती है। छोडो, अगला ट्रैफिक सिगनल प्रेस एन्कलेव, अरबिंदो मार्ग टी पाइंट पर है, कार रोकी, यहां पूरा परिवार एक नही, एक से अधिक परिवार छोटे बच्चो के साथ टूट पडते है, कारों पर। छोटा सा बच्चा, गोद में लिए भीख मांगती महिलाएं। मैं बहुत ध्यान से देखने लगा, बच्चा बेसुध था. ठंड के मौसम में जहां कार के अंदर ब्लोअर चला कर बैठे हैं, वही कडाके की ठंड में लगभग नग्न अवस्था में महिला की बांह में झूलता बच्चा। मुझे मौसमी मुखर्जी की बात याद आ गई। मेरी पडोसन मौसमी मुखर्जी एक एनजीऔ में कार्य करती है और जब कभी अपने हेडऑफिस हौजखास आती है, तब सुबह मेरे साथ कार में हौजखास तक का सफर तय होता है। उसी ने बताया कि उनकी एनजीऔ सर्वे करती है और एक सर्वे भिखारियों पर भी था। चौकाने वाला तथ्य यह था, कि ये भिखारी बच्चों को अफीम और दूसरे नशे की वस्तुएं देते है, जिस कारण बच्चों को और उन्हे भी कोई ठंड का असर नही होता है। जब नशे के पैसे है, तो भीख क्यों दें। वोही परीचित चेहरे हर रोज, सरकार सिर्फ अपनी कुर्सी की चिन्ता करती है, भिखारियों की कौन करे। उन्हे किसी काम धंधे पर लगाए। आलम यह है, कि न तो सरकार उनकी सुध लेती है, न ही भिखारी काम करना चाहते है। धार्मिक मान्यताऔं के चलते हम भीख देते जाते है और भिखारी नये हथकंडे अपनाते जाते है। आलम यह है, कि सरकार भी समझती है, जब जनता उसका काम कर रही है, भिखारियों को पैसे दे कर, तब वह क्यों कष्ट उठाए?


इसके बाद का सफर आऊटर रिंग रोड और रिंग रोड का है, कही ट्रैफिक कही स्मूथ, मधुबन चौक पहुंच गए। यहां हिजडों ने कब्जा जमाया है। यहां भिखारी नही है। शायद हिजडों से डरते हैं?  यहां एक सकून है, कि हिजडे गाली नही निकालते। भीख मांगने का काम जरूर कर रहे है, न देने पर एक सैकेन्ड में चले जाते हैं। कुछ नही कहते। घर आने से पहले अंतिम पडाव रोहिणी ईस्ट मेट्रो स्टेशन। फिर से भिखारी और भीख न देने पर गाली निकाल कर जाते है। आखिर हर मेट्रो स्टेशन पर गाली निकालने वाले भिखारी क्यों मिलते है। जनाब यह तो टैक्स है, चुकाना ही है, दिल्ली महानगर में रहने का। चुकाते जाऔ, ट्रैफिक टैक्स और गाली टैक्स। जय़ हो। यह आप बीती नही है, जग बीती है, कही भी चले जाएं, यही हाल है, जनाब। क्या आपको साथ भी कभी कुछ मिलता जुलता ऐसा हुआ है?

सुखी रहे संसार

सुखी रहे संसार सब, दुखी रहे न कोई
यह अभिलाषा हम सब की, भगवान पूरी होए
विद्या बुद्धी तेजबल, सबके भीतर होए
दूध पूत धन धान्य से वंचित रहे न कोई
आप की भक्ति प्रेम से मन होए भरपूर
रोग द्वेश से चित मेरा भागे कोसों दूर
मिले भरोसा नाम का सदा रहे जगदीश
आशा तेरे नाम की बनी रहे जगदीश
पाप से हमे बचाईए करके दया दयाल
अपना भक्त बना कर हमको करो निहाल
दिल में दया उतारता मन में प्रेम और प्यार
देह हृदय में वीरता, सबको दो करतार
नाराण्य तुम आप हो प्रेम के विमोचन हार
क्षमा करो अपराध सब, कर दो भव से पार
हाथ जोड विनती करूं सुनिए कृपा निधान

सद संगत सुख दीजिए दया नमृता दान

(परंपरागत भजन)

Sunday, January 19, 2014

अच्छा भूत


कुफरी में स्कीइंग का लुफ्त उठाने और पूरा दिन मौज मस्ती करने के पश्चात कुमार, कामना, प्रशान्त और पायल शाम को शिमला की ओर बीएमडब्लू में जा रहे थे। सर्दियों के दिन, जनवरी का महीना, शाम के छ: बजे ही गहरी रात हो गई थी। गोल घुमावदार रास्तों में अंधकार को चीरती, पेडों के झुरमुठ के बीच कार चलती जा रही थी। सैलानी ही इस समय सडकों पर कार चलाते नजर आ रहे थे। टूरिस्ट टैक्सियां भी वापिस शिमला जा रही थी। कुफरी की ओर इक्का दुक्का कारें ही जा रही थी। बातों के बीच चारों शिमला की ओर बढ रहे थे। लगभग आधा सफर कट गया था, कार स्टीरियो की तेज आवाज में हंसी ठिठोली करते हुए सफर का आनन्द उठाते हुए समय का पता नही चल रहा था। तभी कार झटके मारते हुए रूकने लगी।
अरे, क्या कर रहे हो कुमार? ठीक तरीके से कार चलाऔ। झटके मारते हुए कार क्यों चला रहे हो?” प्रशान्त ने झटकती हुई कार में झूलते हुए कुमार से पूछा।

प्रशान्त भाई, मैं तो कार ठीक चला रहा हूं, मालूम नही, यह अचानक से झटके क्यों खा रही है?” कुमार ने झटके खाती कार को संभालते हुए कहा।

कार को थोडा साईड करके देख लेते हैं।

हो सकता है, कि डीजल में कचरा आ गया हो, थोडी रेस दे कर देखता हूं, कि कार रिदम में आ जाए।कुमार ने क्लच दबाते हुए कार का ऐक्सीलेटर दबाया, लेकिन कोई खास कामयाबी नही मिली, कार झटके खाती हुई रूक गई।

अब क्या करे?” चारों के मुख से एक साथ निकला। सभी सोचने लगे, कि काली रात के साए में कुछ भी नजर नही आ रहा था, सोने पे सुहागा तो धुन्ध ने कर दी थी। धीरे धीरे धुन्ध बढ रही थी। ठंडक भी धीमे धीमे बढ रही थी। कार सडक की एक साईड पर खडी थी। इक्का दुक्का कार, टैक्सी आ जा रही थी।

प्रशान्त बाहर निकल कर मदद मांगनी पडेगी। कार में बैठे रहने से कुछ नही होगा। कार तो हम चारों का चलाना आता है, लेकिन कार के मैकेनिक गिरी में चारों फेल है। शायद कोई कार या टैक्सी से कोई मदद मिल जाए।कह कर कुमार कार से बाहर निकला। एक ठंडे हवा के तेज झोके ने स्वागत किया। शरीर में झुरझरी सी फैल गई। प्रशान्त भी कार से बाहर निकला। पायल और कामना कार के अंदर बैठे रहे। ठंड बहुत अधिक थी, दिल्ली निवासियों कुमार और प्रशान्त की झुरझरी निकल रही थी। दोनों की हालात दयनीय होने लगी।

थोडी देर खडे रहे तो हमारी कुल्फी बन जाएगी।कुमार ने प्रशान्त से कहा।

ठीक कह रहे हो, लेकिन कर भी क्या सकते है।प्रशान्त ने जैकेट की टोपी को ठीक करते हुए कहा।

लिफ्ट मांग कर शिमला चलते है, कार को यहीं छोडते है। सुबह शिमला से मैकेनिक ले आएगें।कुमार ने सलाह दी।

ठीक कहते हो।रात का समय था। गाडियों की आवाजाही नगण्य थी। काफी देर बाद एक कार आई। उनको कार के बारे में कुछ नही मालूम था, वैसे भी कार में पांच सवारियां थी। कोई मदद नही मिली। दो तीन कारे और आई, लेकिन सभी में पूरी सवारियां थी, कोई लिफ्ट न दे सका। एक टैक्सी रूकी। ड्राईवर ने कहा, जनाब मारूती, होंडा, टोएटा की कार होती तो देख लेता, यह तो बीएलडब्लू है, मेरे बस की बात नही है। एक काम कर सकते हो, टैक्सी में एक सीट खाली है, पति, पत्नी कुफरी से लौट कर शिमला जा रहे हैं। उनसे पूछ तो, तो एक बैठ कर शिमला तक पहुंच जाऔगे। वहां से मैकेनिक लेकर ठीक करवा सकतो हो। टैक्सी में बैठे पति, पत्नी ने इजाजत दे दी। कुमार टैक्सी में बैठ कर शिमला की ओर रवाना हुआ। प्रशान्त कार में बैठ गया। प्रशान्त पायल और कामना बातें करते हे समय व्यतीत कर रहे थे। धुन्ध बढती जा रही थी। थोडी देर बाद प्रशान्त पेशाब करने के लिए कार से उतरा। कामना, पायल कार में बैठे बोर हो गई थी। मौसम का लुत्फ उठाने के लिए दोनों बाहर कार से उतरी। कपकपाने वाली ठंड थी।

कार में बैठो। बहुत ठंड है। कुल्फी जम जाएगी।प्रशान्त ने दोनों से कहा।
बस दो मिन्ट मौसम का लुत्फ लेने दो, फिर कार में बैठते हैं।पायल और कामना ने प्रशान्त को कहा।
भूतिया माहौल है। कार में बैठते है।प्रशान्त ने कहा।
प्रशान्त की बात सुन कर पायल खिलखिला कर हंस दी। भूतिया माहौल नही, मुझे तो फिल्मी माहौल लग रहा है। किसी भी फिल्म की शूटिंग के लिए परफेक्ट लोकेशन है। काली अंधेरी रात, धुन्ध के साथ सुनसान पहाडी सडक। हीरो, हीरोइन का रोमांटिक मूड, सेनसुएस सौंग। कौन सा गीत याद आ रहा है।

तुम दोनों गाऔ। मेरा रोमांटिक पार्टनर तो मैकेनिक लेने गया है।कामना ने ठंडी आह भर कर कहा।
 तीनों हंस पडे। तीनों अपनी बातों में मस्त थे। उनको मालूम ही नही पडा, कि कोई उन के पास आया है। एक शख्स जिसने केवल टीशर्ट, पैंट पहनी हुई थी, प्रशान्त के पास आ कर बोला आपके पास क्या माचिस है?” इतना सुन कर तीनों चौंक गए। जहां तीनों ठंड में कांप रहे थे, वही वह शख्स केवल टीशर्ट और पैंट पहने खडा था, कोई ठंड नही लग रही थी उसे। प्रशान्त ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर से देख कर कहा। आपको ठंड नही लग रही क्या?”

उसने प्रशान्त के इस प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया बल्कि बात करने लगा आप भूतिया माहौल की अभी बातें कर रहे थे। क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? क्या आपने कभी भूत देखा है?”

नही, दिल्ली में रहते है, न तो कभी देखा है और न कभी विश्वास किया है, भूतों पर।प्रशान्त ने कह कर पूछा, क्या आप विश्वास करते है?“
हम पहाडी आदमी है, हर पहाडी भूतों को मानता है। उन का अस्तित्व होता है।
उस शख्स की भूतों की बाते सुन कर कामना और पायल से रहा नही गया। उनकी उत्सुक्ता बढ गई।
भाई, कुछ बताऔ, भूतों के बारे में। फिल्मी माहौल हो रखा है, कुछ बात बताऔ।
उस शख्स ने कहा देखिए, हम तो मानते है। आप जैसा कह रहे हैं, कि शहरों में भूत नजर नही आते, हो सकता है, नजर नहीं आते होगें, मगर पहाडों में तो हम अक्सर देखते रहते है।
कहां से आते है भूत और कैसे होते हैं, कैसे नजर आते है।प्रशान्त ने पूछा।
उस शख्स के हाथ में सिगरेट थी, वह सिगरेट को हाथों में घुमाता हुआ बोला भूत हमारे आपके जैसे ही होते हैं। वे रौशनी में नजर नही आते है।
होते कौन है भूत, कैसे बनते है?“ पायल ने पूछा।
यहां पहाडों के लोगों का मानना है, कि जो अकस्मास किसी दुर्घटना में मौत के शिकार होते है या फिर जिनका कत्ल कर दिया जाता है, वे भूत बनते है।उस शख्स ने कहा।
क्या वे किसो को नुकसान पहुंचाते है, मारपीट करते हैं?” प्रशान्त ने पूछा।
अच्छे भूत किसी को कुछ नुकसान पहुंचाते है। अच्छा मैं चलता हूं। सिगरेट मेरे पास है। आप के पास माचिस है, तो दीजिए, सिगरेट सुलगा लेता हूं।उस शख्स ने कहा।
प्रशान्त ने लाईटर निकाल कर जलाया। उस शख्स ने सिगरेट सुलगाई। लाईटर की रौशनी में सिर्फ सिगरेट नजर आई, वह शख्स गायब हो गया। लाईटर बंद होते ही वह शख्स नजर आया। तीनों के मुख से एक साथ निकला – भूत। तीनों, प्रशान्त, पायल और कामना का शरीर अकड गया और बेसुध होकर एक दूसरे पर गिर पडे। अकडा शरीर, खुली आंखें लगभग मृत्य देह के सामान तीनों मूर्क्षित थे। वह शख्स कुछ दूरी पर खडा सिगरेट पी रहा था। तभी वहां आर्मी का ट्रक गुजरा। उसने ट्रक को रूकने का ईशारा किया। ट्रक ड्राईवर उसे देख कर समझ गया, कि वह कौन है। ट्रक से आर्मी के जवान उतरे और तीनों को ट्रक पर डाला और शिमला के अस्पताल में भरती कराया। कुछ देर बाद कुमार कार मैकेनिक के साथ एक टैक्सी में आया। अकेली कार को देख परेशान हो गया, कि तीनों कहां गये। वह शख्स, जो कुछ दूरी पर था, कुमार को बताया, कि ठंड में तीनों की तबीयत खराब हो गई, आर्मी के जवान उन्हें अस्पातल ले गये हैं। कह कर वह शख्स विपरीत दिशा की ओर चल दिया। मैकेनिक ने कार ठीक की और कुछ देर बाद शिमला की ओर रवाना हुए। कुमार सीधा अस्पताल गया। डाक्टर से बात की। डाक्टर ने कहा कि तीनों को सदमा लगा है। वैसे घबराने की कोई आवश्कता नही है, लेकिन सदमें से उभरने में समय लगेगा। कुमार को कुछ समझ नही आया, कि उन्होनें क्या देखा, कि इतने सदमे में आ गए। अगली सुबह आर्मी ऑफिसर अस्पताल में तीनों को देखने आया।
कुमार से कहा – आई एम कर्नल अरोडा, मेरी यूनिट ने इन तीनों को अस्पातल एडमिट कराया था।
कुमार ने पूछा – मुझे कुछ समझ में नही आ रहा, कि अचानक से क्या हो गया?“
कर्नल अरोडा ने कुमार को रात की बात विस्तार से बताई, कि वह शख्स भूत था, जिसे देख कर तीनों सदमें में चले गए और बेसुध हो गए। वह एक अच्छा भूत था। अच्छे भूत किसी का नुकसान नही करते। उसने तीनों की मदद की। हमारे ट्रक को रोका और कुमार के वापिस आने तक भी रूका रहा।
शाम तक तीनों को होश आ गया। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली और सभी दिल्ली वापिस  गए, लेकिन सदमें से उभरने में लगभग तीन महीने लग गए।

आज सात साल बीत गए उस घटना को। चारों कभी भी घूमने रात को नही निकलते। नाईट लाईफ बंद कर दी। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, बस यही रूटीन है उन का। उस घटना को याद करके आज भी उनका बदन ठंडा होने लगता है।    

Thursday, January 16, 2014

बडी दादी - बोलती कहानी

अर्चना चावजी ने मेरी कहानी "बड़ी दादी" को स्वर दिया है। कहानी रेडियो प्लेबैक इंडिया के निम्न लिंक पर सुनी जा सकती है:
http://radioplaybackindia.blogspot.in/2014/01/badi-dadi-by-manmohan-bhatia.html 
आप कहानी को MP3 में डाउनलोड भी कर सकते है।
कृपया सुनकर अपने विचारों से अवगत कराएं।


Saturday, January 11, 2014

तृष्णा


तृष्णा मनुष्य के समस्त गुणों को समाप्त कर देती है। समस्त सुख चैन शांति छीन लेती है। जैसे खटमल से भरी खाट पर हम चैन से सो नही सकते, उसी प्रकार तृष्णा भी हमें चैन से रहने नही देती। मन के ख्याल जब हम पर हावी हो जाते हैं तो हमारे जीवन में भारीपन आ जाता है। एक के बाद एक अनेक ख्याल आते है, यह क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ, अब आगे क्या होगा? इस प्रकार क्यों, कैसों की कभी भी समाप्त न होने वाली एक लम्बी कतार लग जाती है। इस टेंशन के कारण हमारा स्वास्थय खराब होने लगता है। कई बीमारियां शरीर को लग जाती हैं। हम अस्वस्थ हो जाते हैं। फिर स्वस्थ होने के लिए डाक्टरों के चक्कर शुरू हो जाते हैं। जीवन के इस चक्र से निकलने के लिए हम साधुऔं, फकीरों के भी चक्कर लगाते हैं, फिर भगवान से दुआ करते है, कि स्वस्थ हो जाए और तृष्णा समाप्त हो। पर तब तक उम्र का अंतिम पडाव आ जाता है, फिर भी हम तृष्णा के चक्रव्यूह से बाहर नही निकल पाते। हताशा जकड लेती है। आशा की किरण नजर नही आती। तृष्णा के चक्रव्यूह में जीने की कला ही भूल जाते हैं।

मनुष्य को लोभ की बीमारी है। इतना कमा लूं, कुछ और जोड लूं। मकान बन गया, नौकरी लग गई। दुकान अच्छी चल रही है, फिर भी कुछ और के चक्रव्यूह में सारा दिन और रात भी चैन नही आता। वास्तविकता यह है कि उन सुख सुविधाऔं के भरपूर होने पर भी कभी भी हम आध एक घंटा विश्राम नही कर पाते। थकान रहती है रात में भी उलझनों में नींद नही आती है।

विष्णु के अवतार कृष्ण के ज्ञान को हम भूल जाते है। आइए, याद करे कि कर्म करें, कर्म पूजा है, अर्चना है। लेकिन तृष्णा को त्यागना है। तृष्णा से मुक्त होना है, और वो हम तब हो सकते है, जब फल की चिंता छोड कर अपने कर्मों में व्यस्त हो जाए।


व्यस्त रहो लेकिन अस्तव्यस्त ना रहो। फल की चिंता छोड कर कर्म करे। जब तृष्णा को छोड कर कर्म करेगें, तब समस्त प्रकार के चक्रव्यूहों से बाहर निकल कर जीवन को जी पाएंगें।

मेरे भाग जो

मेरे भाग जो होवन चंगेरे, मैं तेरे दर ते आवां,
जो होवे कृपा तेरी, मैं रज रज दर्शन पावां,
जो मैं होवां फुल गुलाबी, ते कोई भगत तोड ले जावे,
औ हार श्याम गल पावे, मैं हृदय नाल लग जावां,
मेरे भाग जो होवन चंगेरे, मैं तेरे दर ते आवां,
जो होवे कृपा तेरी, मैं रज रज दर्शन पावां।

जो मैं होवां मोर रंगीला, ते मैं वन विच पहलियां पावा,
मेरा श्याम बलावे बंसी, मैं नच्च नच्च के ते नाले पावां,
मेरे भाग जो होवन चंगेरे, मैं तेरे दर ते आवां,
जो होवे कृपा तेरी, मैं रज रज दर्शन पावां।

जो मैं होवा जल दी मच्छली, ते मैं जल विच तरियां लावां,
मेरा श्याम करे इश्नान, ते मैं चरणा नाल लग जावां,
जो मैं होवां शुद्ध आत्मा, ते मैं कद्दे वी न घबरावां,
मेरे भाग जो होवन चंगेरे, मैं तेरे दर ते आवां,

जो होवे कृपा तेरी, मैं रज रज दर्शन पावां।

(परपंरागत भजन)

भाग मेरे जागे

भाग मेरे जागे मुझको राम मिल गया, दुख सारे भागे सुख धाम मिल गया।
सारे जगत ने मुझको ठुकराया, एक प्रभु ने अपना बनाया,
सोया होया चैन ते आराम मिल गया, दुख सारे भागे सुख धाम मिल गया।

छोड सारे जग दे धन्धे हरिगुण गावांगी, झूठी काया माया विच मन ना जगावांगी,
पाके हो गई मस्त, दुख सारे भागे सुख धाम मिल गया।

नाम रूपी अमृत पीके सुद्ध बुद्ध खो गई, राम मेरे हो गये मैं रामजी की हो गई,
सत्संग में आने का आराम मिल गया, दुख सारे भागे सुख धाम मिल गया।

छोड सारे जग दे द्वारे, तेरे द्वारे आवांगी, मंगिआं मुरादा सतगुरू कोलो पावांगी,

इस दर पर आने का आराम मिल गया, दुख सारे भागे सुख धाम मिल गया।

(परपंरागत भजन)

Sunday, January 05, 2014

आपका ही नाम बार बार

ऐ मेरे सदगुरू प्रणाम बार बार, होंठों पर हो आपका ही नाम बार बार।।

चरणों में हो मन सदा, चरण में हो मंजिल सदा, हे दयालु भक्ति का दे दान।
मेरे दाता आपने क्या नही दिया हमें, धन्य धन्य आपको प्रणाम बार बार।
ऐ मेरे सदगुरू प्रणाम बार बार, होंठों पर हो आपका ही नाम बार बार।।

सोये जग को फिर जगाने, आये हो गुरूवर सदा, भक्ति में मन को लगाना नाथ।
बार बार हो जन्म, हर जन्म में आप हम, यू ही हम को देना आप ज्ञान बार बार।
ऐ मेरे सदगुरू प्रणाम बार बार, होंठों पर हो आपका ही नाम बार बार।।

चांदनी का दीप ले कर, थाल फूलों से सजा, आरती हम आपकी करे रोज।

ऐ मेरे सदगुरू प्रणाम बार बार, होंठों पर हो आपका ही नाम बार बार।।

(परंपारगत भजन)

श्रेष्ठ मनुष्य

महर्षि व्यास ने श्रेष्ठ मनुष्य में आठ गुणों की प्रधानता बताई है।
1.       शांत – जो व्यक्ति अनावश्यक क्रोध न करता हो।
2.       सहनशीलता – जो व्यक्ति प्रत्येक स्थिति में सम रहते हुए कभी उत्तेजित नही होता है।
3.       दानशीलता – दान केवल धन का नही, अपितु ज्ञान, श्रम और भावना का भी होता है।
4.       स्थिर – व्यक्ति का स्थिर चित होना आवश्यक है।
5.       सत्यवाद – सत्य बहुआयामी है। अत: ऋषियों ने सम्यक सत्य का ग्रहण करने का आहवान किया है।
6.       जितेन्द्रिय – व्यक्ति को आपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए।
7.       दयावान – मानव मन में प्रत्येक प्राणियों के प्रति उत्पन्न होने वाला करूण भाव से किया व्यवहार दया है।

8.       विनम्रता – जब मनुष्य अहंकार रहित होकर भेजकारी भावना से मुक्त हो जाता है, तो वह विनम्रता ही होती है।

तस्वीर तेरी

तस्वीर तेरी भगवन नजरो में समाई है, नजरो में समाई है।
तेरे नाम की मस्ती ने सारी दुनिया भुलाई है, सारी दुनिया भुलाई है।।

उपकार तेरा भगवन हरगिज न भुलाऊंगा,
तेरे नाम की महिमा दिन रात मैं गाऊंगा,
तेरे नाम की मस्ती ने सारी दुनिया भुलाई है, सारी दुनिया भुलाई है।।

प्रकाश बरसता है आशा की डगरिया में,
बिखरें हैं अब मोती जीवन की डगरिया में,
तेरी जोत से मैंने भी इक जोत जगाई है,
तेरे नाम की मस्ती ने सारी दुनिया भुलाई है, सारी दुनिया भुलाई है।।

तुम ज्योती कलश भगवन मैं एक पतंगा हूं,
शबरी की तरह मैं भी तेरे नाम में रंगा हूं,
तेरे नाम की मस्ती ने सारी दुनिया भुलाई है, सारी दुनिया भुलाई है।।

तस्वीर तेरी भगवन नजरो में समाई है, नजरो में समाई है।

तेरे नाम की मस्ती ने सारी दुनिया भुलाई है, सारी दुनिया भुलाई है।।

(परंपरागत भजन)

Friday, January 03, 2014

लगे जिन्दडी नूं आन हुलारे

लगे जिन्दडी नूं आन हुलारे,
जदों दा तेरा लडा फडया।
वे सहारियां नूं मिलांगे सहारे,
जदों दा तेरा लडा फडया।

जदों दी निहारी छवि तेरी तस्वीर दी,
सुध बुध भुल गई मैं अपने शरीर दी.
मेरा रोम रोम बोले जयकारे,
जदों दा तेरा लडा फडया।

अखियां दे विच तेरा नूर समा गया,
मुदत्ता दी सुत्ती सडी आत्मा जगा गया,
मेरा रोम रोम तेरी आरती उतारे,
जदों दा तेरा लडा फडया।

चढया जदों दा तेरा नाम वाला रंग नी,
नचदा वे प्यार विच मेरा अंग अंग जी,
ओ पाणं गे तेरा दर्शन प्यारे,
मेरा रोम रोम बोले जयकारे,
जदों दा तेरा लडा फडया।

लगे जिन्दडी नूं आन हुलारे,

जदों दा तेरा लडा फडया।

(परंपरागत भजन)

मौज फकीरां दी

वाह वाह भई मौज फकीरां दी,
वाह वाह भई मौज फकीरां दी।

कभी तो खाऐ चने का दाना,
और कभी लपटे लेवे खीरां दी।
वाह वाह भई मौज फकीरां दी।

कभी तो ओढे शाल दुशाला,
और कभी लंगोटी लीरां दी।
वाह वाह भई मौज फकीरां दी।

मांग मांग कर भिक्षा पावे
और चलदे चाल अमीरां दी।
वाह वाह भई मौज फकीरां दी।

मौज न तेरी मौज न मेरी
मौज तां दास गुरूआं दी।

वाह वाह भई मौज फकीरां दी।

(परंपरागत भजन)

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...