Saturday, January 11, 2014

तृष्णा


तृष्णा मनुष्य के समस्त गुणों को समाप्त कर देती है। समस्त सुख चैन शांति छीन लेती है। जैसे खटमल से भरी खाट पर हम चैन से सो नही सकते, उसी प्रकार तृष्णा भी हमें चैन से रहने नही देती। मन के ख्याल जब हम पर हावी हो जाते हैं तो हमारे जीवन में भारीपन आ जाता है। एक के बाद एक अनेक ख्याल आते है, यह क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ, अब आगे क्या होगा? इस प्रकार क्यों, कैसों की कभी भी समाप्त न होने वाली एक लम्बी कतार लग जाती है। इस टेंशन के कारण हमारा स्वास्थय खराब होने लगता है। कई बीमारियां शरीर को लग जाती हैं। हम अस्वस्थ हो जाते हैं। फिर स्वस्थ होने के लिए डाक्टरों के चक्कर शुरू हो जाते हैं। जीवन के इस चक्र से निकलने के लिए हम साधुऔं, फकीरों के भी चक्कर लगाते हैं, फिर भगवान से दुआ करते है, कि स्वस्थ हो जाए और तृष्णा समाप्त हो। पर तब तक उम्र का अंतिम पडाव आ जाता है, फिर भी हम तृष्णा के चक्रव्यूह से बाहर नही निकल पाते। हताशा जकड लेती है। आशा की किरण नजर नही आती। तृष्णा के चक्रव्यूह में जीने की कला ही भूल जाते हैं।

मनुष्य को लोभ की बीमारी है। इतना कमा लूं, कुछ और जोड लूं। मकान बन गया, नौकरी लग गई। दुकान अच्छी चल रही है, फिर भी कुछ और के चक्रव्यूह में सारा दिन और रात भी चैन नही आता। वास्तविकता यह है कि उन सुख सुविधाऔं के भरपूर होने पर भी कभी भी हम आध एक घंटा विश्राम नही कर पाते। थकान रहती है रात में भी उलझनों में नींद नही आती है।

विष्णु के अवतार कृष्ण के ज्ञान को हम भूल जाते है। आइए, याद करे कि कर्म करें, कर्म पूजा है, अर्चना है। लेकिन तृष्णा को त्यागना है। तृष्णा से मुक्त होना है, और वो हम तब हो सकते है, जब फल की चिंता छोड कर अपने कर्मों में व्यस्त हो जाए।


व्यस्त रहो लेकिन अस्तव्यस्त ना रहो। फल की चिंता छोड कर कर्म करे। जब तृष्णा को छोड कर कर्म करेगें, तब समस्त प्रकार के चक्रव्यूहों से बाहर निकल कर जीवन को जी पाएंगें।
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