Thursday, February 27, 2014

हम, हमारी आधुनिकता,और हमारे बुजुर्ग


बुजुर्गो के पास अनुभव का अथाह खजाना है। आज जो हम हैं, आधुनिक है, कल बुजुर्ग बनेगें। आज और कल में काल का अंतर है। अंतर अनुभव में भी है। आज नही है, कल होगा। काल बदलेगा, अनुभव होगा, अधिक होगा और आधुनिकता भी बदलेगी। आधुनिकता समय के साथ चलती हुई बदल जाती है। हम अपने को जकडे हुए महसूस करते हैं। जिस शैली में बंधते है, निकल नही पाते। कल जो आधुनिक था, वह आधुनिकता के दायरे से बाहर आ गया। काल चक्र घूमता है, आधुनिक दकियानूस हो जाते है। आधुनिकता का चेहरा बदल जाता है। हम नही बदलते।  जो जिस काल में पला बढा होता है, उसी के गुण गाता है, अपने को श्रेष्ठ कहता है। हमें यही मानसिकता बदलनी है।
हर युग आधुनिक है। बीते युग को पिछडा कहते हैं। यही सोच हर समस्या को जन्म देती है, जो हमारे समाज में एक बुराई की तरह देखी जाती है। समाधान भी हमारे और आपके हाथ में है। जरा सी सोच बदली, समस्या का समाधान सामने है। दकियानूसी को त्यागना ही हनारा मकसद होना चाहिए।
बचपन को देखें। हम माता पिता और अपने बुजुर्गों पर आश्रित होते है। बच्चों की इच्छा, ख्वाहिश कुछ पाने की, कुछ करने की होती है। अभिभावक अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चों का लालन पालन करते है और बच्चों की इच्छायों की पूर्ति करते हैं। बच्चे बडे होते है, युवा अवस्था में प्रवेश करना,  जीवनज्ञापन करना, विवाह के बाद अपनी गृहस्थी और परिवार का पालन करना। परिवार में अब बच्चों के साथ उनके माता पिता का भी अहम हिस्सा होता है। मां बाप सेवानिवृत हो जाते है। जो कल तक अभिभावक थे, आज आश्रित हो जाते है। कल बच्चों की जिद, इच्छा, ख्वाहिश होती थी, आज माता पिता की भी हो सकती है। माता पिता ने अपनी सामर्थ्य के हिसाब से लालन पालन किया, आज बच्चे उनको अपनी सामर्थ्य के हिसाब से पूरा ध्यान रखेंगें। कुछ ख्वाहिशें कल बच्चे की पूरी नही हुई, कुछ आज बुजुर्गों की भी पूरी नही हो सकती।
बचपन, बुढापा एक समान बोता है। जिद पकड कर बैठ जाते है, बच्चे मचलते है, रोते बिखलते है। बच्चों को डराया, धमकाया जाता है, कुछ मान लेते है, कुछ नही मानते है। बुढापें में भी बुजुर्ग जिद करके बैठ जाते हैं, कि हमने बडे लाड, प्यार से बच्चों को पाला, उनकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब बडे हो गए, तो हमारी उपेक्षा हो रही है। यही सोच गलत है, हमने बच्चों की हर ख्वाहिश कभी भी पूरी नही की, बुजुर्गों की भी हर ख्वाहिश पूरी नही की जा सकती। बुढापें में हमें अपनी इच्छाऔं को थोडा कम करना चाहिए। बच्चे अपने बुजुर्गों को देख कर बढे होते है, उनका अनुसरण करते है। उनकी आदते सीखते है। जो कल बुजुर्ग करते थे, आज बच्चे युवा अवस्था में करते हैं। हमारे संस्कार बच्चों में हंस्तातरण होते हैं। यदि हमने बच्चों की उपेक्षा की है, तो बच्चें भी बुजुर्गों की उपेक्षा कर सकते हैं।
हम कह सकते हैं, कि बच्चे माता पिता को बुढापें में छोड देते है। दोनों के कारण समझिए। बच्चों को नौकरी, व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर, देश में रहना पढ सकता है। बुजुर्ग अपना घर छौडना नही चाहते। अकेले रहते है, दोष बच्चों पर मढते हैं, कि बुजुर्गों को छोड दिया। बुढापें में अकेले रहने के कई कठिनाईऔं का सामना करना पढ सकता है। जरा सोचिए, आपनें भी कई बार नौकरी, व्यापार के कारण कई शहरों में मकान बदला होगा, बच्चें भी अपके साथ साथ स्कूल बदलते रहे। अब बुढापें में बच्चों के साथ जाना नही चाहते। दुनिया की रीत यही है, बच्चा, बुजुर्ग एक समान।  किसी न किसी उम्र में आश्रित रहना है।
आज के युग में संचार क्षेत्र में एक गजब की क्रांति छा गई है। इंटरनेट ने सारी दुनिया को छोटा कर मुठ्ठी में कैद कर लिया है। आज बच्चा हमसे अधिक जानकारी रखता है। कंप्यूटर और स्मार्ट फोन की दुनिया से बुजुर्गों को अपनाना चाहिए। यह उनको उनको बच्चों, नातियों को सामान प्लेटफार्म पर लाता है। बच्चों की आधुनिकता स बराबर कंधे से कंधा मिलाने में अहम रोल निभाता है। दूर रह रहे बच्चे भी अभिभावको के समीप होते हैं।
आज हम भी स्मार्ट फोन, इंटरनेट औक कंप्यूटर के बिना नही रह सकते। बच्चों से बुजुर्गों की पसंद एक ही है। हम, हमारी आधुनिकता,और हमारे बुजुर्ग विषय पर अपने विचार भी इंटरनेट पर व्यक्त कर रहे हैं।

बच्चों पर नजर रखने की आवश्कता होती है, कि गलत संगत में न पडे। एक बार सही संस्कार, सही राह पर बच्चे चलने लगे, तो बुजुर्गों को कोई चिन्ता नही। हमें सिर्फ देखना है, कि गलत राह पर न चले। जैसा बोया, वैसा काटा। सही राह पर चलते बुजुर्गों की कभी उपेक्षा नही करते। सब धीरज रखने का परिणाम है। मेरी राय में जो बच्चों की ध्यान रखते है, वोही बच्चे बुजुर्गों का ध्यान रखते है। हर युग की यही कहानी है।   
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