Sunday, March 30, 2014

बड़बोला


गुड मॉर्निग सर। केबिन में प्रवेश करते हुए विपुल ने कहा और मुझे अपना अपाइंटमेंट लैटर दिया। मैं अकाउन्टस डिपार्टमेंट का हैड और विपुल ने आज ऑफिस ज्वाइन किया। कुर्सी पर बैठने का संकेत विपुल को किया और इंटरकॉम पर अपने सहायक महेश को केबिन में आने को कहा।
महेश ने केबिन में आते ही नमस्ते कहा और कुर्सी पर बैठ कर कहा। सर आज दो घंटे जल्दी जाना है। वाईफ शाम की ट्रेन मे माएके से वापिस आ रही है।
चले जाना, इनसे मिलो, विपुल तुम्हारे सहायक रहेगें। काफी दिनों से शिकायत कर रहे थे, कि काम अधिक है, एक आदमी की जरुरत है। विपुल अब तुम्हारे अधीन काम करेगा। विपुल के अतिरिक्त सुरेश ने भी अगले सप्ताह ज्वाइन करना है। ऑफिस मे स्टाफ पूरा हो जाएगा, जिसके बाद पेंडिग काम पूरा हो जाएगा। अच्छा विपुल तुम अब से महेश के साथ काम करोगे। अब तुम अपनी सीट पर जा कर काम शुरू कर दो।
विपुल बीस साल का बी.कॉम करने के बाद पिछले सप्ताह जब इंटरव्यू देने आया था, उसको काम का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन एक गजब का आत्मविश्वास जरूर था, जिसको देख कर मैंने उसे नौकरी पर रखा। मझले कद का गोरा चिट्टा हंसमुख नौजवान विपुल नवगांव मे रहता था। नवगांव नवयुग सिटी से लगभग 80 किलोमीटर दूर एक छोटा सा कस्बा है। बस से एक तरफ का सफर लगभग दो ढ़ाई घन्टे मे पूरा होता है। ऑफिस का समय सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे है। आठ घन्टे की डयूटी के बाद बस पक़ड़ने के लिए आधा घन्टा और लगभग पांच घन्टे बस मे, लगभग चैदह घन्टे की डयूटी जब इंटरव्यू में विपुल को बताई कि किस तरह वह समय को मैनेंज कर पायेगा, कहीं कुछ दिन काम करने के बाद नौकरी छोड़ दे और हमे नया आदमी ढूढ़ने के लिए प्रयत्न करने पढ़े, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। अगर गांरन्टी दे सकोगे, तब नौकरी पक्की समझना। लेकिन उसके आत्म विश्वास और जवाब देने के ढंग ने मुझे निरुत्तर कर दिया कि हर हालत और मौसम में सुबह 10 बजने से 10 मिनट पहले ही ऑफिस पहुंच जायेगा, और यही हुआ, बिना नागा ऑफिस खुलने से पहले विपुल पहुंच जाता और दो महीने के छोटे से समय के अंदर सभी कार्यों में निपुण हो गया। ऑफिस का पेंडिग काम समाप्त हो गया और काम रुटीन पर आ गया। विपुल काम में तेज, स्वभाव में विन्रम, लेकिन एक बात मुझे पसन्द नहीं थी। वह बात उसके अधिक बोलने की थी। वह चुप नहीं रह सकता था। कई बार मुझे लगता था, कि वह बात को बढा़ चढ़़ा कर करता था और ऑफिस स्टाफ पर अपने अमीर होने का। धीरे धीरे उसने पूरे ऑफिस में सभी को यकीन दिला दिया कि वह एक अमीर घर से ताल्लुक रखता है। कपडे, जूते अच्छे और मंहगे अपने आप उसके कुछ अमीर होने का अहसास कराते थे। ऑफिस में सहयोगियों को अक्सर दावत देना उसका नियम बन गया था। ऑफिस में कमप्यूटर ऑपरेटर श्वेता और टेलीफोन ऑपरेटर सुषमा के आस पास मंडराते देख ऐसा लगता था कि ऑफिस मे लडकियों में उसकी कुछ खास रुचि थी। लंच वह सुषमा और श्वेता के साथ करता था। उन दोनों को इम्प्रेस करने में उसका खाली समय व्यतीत होता था। इन सब बातो को देख कर मेंने विपुल को कभी टोका नही क्योंकि ऑफिस का काम उसने कभी पेंड़िग नही किया। बाकी सब हरकतों को उसका निजी मामला समझ कर नजरअंदाज करता रहा क्योंकि कम्पनी के काम में सदा अग्रणी रहता था।
एक दिन मैं ऑफिस में रिपोर्ट देख रहा था। शाम के चार बजे चाय के साथ चपरासी समोसा, गुलाबजामुन और पनीर पकोड़ा टेबल पर रखता हुआ बोला, “सर समोसा पार्टी विपुल की तरफ से है।
किस खुशी में दावत हो रही है।मैं चपरासी से पूछ रहा था, तभी महेश केबिन में आता हुआ बोला, “सर विपुल तो छुपा रुस्तम निकला। मोटी असामी हैं। यह दावत तो कुछ नही, बड़ी पार्टी लेनी पडेगी, विपुल से। ऐसे नही छूट सकता हैं। आज दो ट्रक खरीदे हैं, उसने। सोलह ट्रक पहले चल रहे हैं, नवगांव की दाल मिल में। टोटल अठारह ट्रकों का मालिक है। समोसा पार्टी तो शुरुआत है, फाइव स्टार दावत पेंडिग है, सर जी।    
महेश एक बात समझ नही आती, अठारह ट्रकों के मालिक को एक क्लर्क की नौकरी करने की क्या जरुरत है।
सर जी मुझे लगता है कि अनुभव लेने के लिए नौकरी कर रहा है। साल दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर अपने व्यापार में पिता जी का हाथ बटाएगा।
मेरा अनुभव यह कहता है, कि अमीर घराने के बच्चे कभी नौकरी नही करते हैं, पढाई के बाद अपने घर के व्यापार में जुट जाते हैं। आईएएस की नौकरी या मैनेंजमेंट ड्रिग्री के बाद किसी मैनेंजर के पद पर नौकरी समझ आती है, लेकिन एक क्लर्क की नौकरी कोई बिजिनेस मैंन अपने बच्चों से नही करवाता है।
आपके कहने में वजन है, सर जी, लेकिन हमें इससे क्या मतलब, अपन तो दावत का मजा लेते हैं।कहते हुए महेश ने एक घंटा पहले जाने की छुट्टी मांगी।
महेश के जाने के बाद मेरी नजर रिसेप्शन पर गई, विपुल श्वेता और सुषमा के साथ हंस हंस कर अपनी दी हुई पार्टी के मजे ले रहा थी। मैं सोचने लगा कि कहीं यह दावत लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए तो नही कर रहा। एक दिन ऑफिस से घर जाते हुए सामान खरीदने के लिए बाजार रूका। शाम के समय बाजार में बहुत भीड़ रहती है, बाजार में समान खरीदते समय मुझे अहसास हुआ, कि विपुल श्वेता के साथ हंसता हुआ हाथ में हाथ डाले हुए टहल रहा था। एक दूसरे से चिपके हुए अपने में मस्त दुनिया से बेखबर मुझे भी नहीं देख सके। दो हंसों का जोड़ा प्रेम की गहराई में उतर चुका था। युवा प्रेमी युगल को डिस्टर्ब करना मैंने उचित नही समझा। मैं समान खरीद कर घर को कूच कर गया। मैं सोचने पर मजबूर हो गया, कि विपुल कब नवगांव जाता होगा और कैसे टाइम मैंनेंज करता होगा। ऑफिस में विपुल और श्वेता की नजदीकियां अधिक बढ़ने लगी। चाय ब्रेक में दोनों एक साथ चाय के सिप लगाते नजर आते और लंच टाइम में एक साथ खाना खाते नजर आते। काम के बीच दो मिन्ट के ब्रेक में विपुल झट से किसी न किसी बहाने श्वेता से बतियाता नजर आता। धीरे धीरे विपुल और श्वेता का प्रेम परवान हो गया। ऑफिस में सबकी जुबान पर सिर्फ विपुल और श्वेता के प्रेम प्रसंग के चर्चे थे।
एक दिन लंच समय में मैं आराम कर रहा था। महेश केबिन में आ कर सामने कुर्सी खींच कर बैठ गया।
सर आपने नयी खबर सुनी।
मुझे पुरानी की खबर नहीं, तुम नई की बात कर रहे हौ। तुम्हारी शक्ल से लगता है, कि कोई सनसनी है क्या?”
सर आपके लिए सनसनी होगी। ऑफिस आते हैं, काम करके चले जाते हैं आप को दीन दुनिया की कोई खबर नही होती है। हम तो पर्दा उठने की फिराक में कब से टकटकी लगाये बैठे हैं।
लेखकों की तरह भूमिका मत बांधो महेश। सीधे बात पर आऔ।
सीधी बात यह है कि विपुल और श्वेता का प्रेम एक दम परवान हो चुका है। बस अब तो शहनाई बजने की देरी है।
शापिंग मॉल में मैं कई बार दोनों को एक साथ प्रेम के मूड में देख चुका हूं।
आपने तो शापिंग मॉल में देखा हैं। सर आपको मालूम नही, विपुल आजकल नंवगांव जाता ही नहीं है। आजकल श्वेता के घर रहा है। हफ्ते में एक या दो दिन ही नंवगांव जाता है। अंदर की खबर बताता हूं। शादी अनाउन्स होते ही श्वेता नौकरी छोड़ देगी। सर इतने अमीर घर जा रही है। नौकरी की क्या जरुरत है सर जी।
क्या श्वेता के घर वाले ऐतराज नहीं करते, शादी से पहले विपुल का घर आना जाना तो आज कल आम बात है, लेकिन रात को सोना क्या वाकई हो सकता है? कहीं तुम लम्बी बात तो नहीं छोड़ रहे हो?”
कसम लंगोट वाले की, एकदम सच बोल रहा हूं।
कसम लंगोट वाले की, यह महेश का तकिया कलाम था, मैं समझ गया कि बात में कुछ सच्चाई तो अवश्य हैं। आफिस में लगता है महेश आजकल हम लोग काम कम और इधर उधर की बातों में अधिक ध्यान दे रहे हैं। मैंनें बात पलटते हुए कहा।
सर आप ऐसी बातें मुझसे नहीं कर सकते हैं। आपको मालूम है कि सारा काम समाप्त करने के बाद ही आपसे गपशप करता हूं। महेश मेरी बात का बुरा मान गया।
महेश मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा हूं। मैं विपुल की सोच रहा हूं, कि आजकल जब देखो, वह श्वेता और सुषमा के ईर्द गिर्द मंड़राते नजर आता है। अपना काम कब करता है। मैंनें कुछ हैरान हो कर पूछा।
महेश हंसते हुए बोला, “सर आप इस बात की फ्रिक मत किजिये। उसका काम जब तक समाप्त नहीं हो जाता, शाम को ऑफिस से घर जाने नही देता हूं। श्वेता के प्यार से उसकी रफतार गोली की तरह हो गयी हैं। शाम तक सारा काम अपटूडेट रहता हैं।
रफ्तार के चक्कर में कहीं काम में गलती न हो जाए। इस बात का ध्यान रखना हैं। मैंनें महेश को खास हिदायत दी।
सर जी। आप बिलकुल निश्चिंत रहें। काम में कोई शिकायत अगर मिल जाए, तो विपुल की सजा भी में भुगतने को तैयार हूं।
ऑफिस के काम में मुझे कोई शिकायत नहीं मिली, इसलिए विपुल और श्वेता के आपसी रिश्तों में मैनें विशेष महत्व देना छोड़ दिया। दिन बीतते गये, विपुल और श्वेता के प्रेम प्रसंग के किस्से कुछ अधिक सुनाई देनें लगे। एक दिन लंच टाईम में काफी पी रहा था, तभी विपुल और महेश ने केबिन में प्रवेश किया।
सर बधाई हो, विपुल की बहिन की शादी है। आप का निमंत्रण प्रत्र। महेश ने शादी का कार्ड मुझे दिया।
विपुल बहुत बहुत बधाई हो। मैंनें विपुल से हाथ मिलाते हुए कहा।
सर जी, सूखी बधाई से काम नहीं चलेगा। शादी में आपको अवश्य आ कर रौनक करनी है। विपुल ने आग्रह किया।
जरुर शादी में रौनक करेगें। मैंने मुस्कराते हुए कहा।
शादी से एक दिन पहले महेश ने लंच समय में कहा, “सर जी, कल विपुल की बहिन की शादी है, पूरा स्टाफ शादी में जाएगा, कल लंच के बाद ऑफिस की छुट्टी, आप ने भी चलना है, कोई बहाना नही चलेगा।
देखो महेश शादी नवगांव में है, रात को वापिस आने में देर हो सकती है, वापिस आने के लिए कोई सवारी नहीं मिलेगी। मैनें आशंका जताई।
सर जी इसकी चिन्ता आप मत किजिये, वापिसी का प्रबंध विपुल ने कर दिया है। नवगांव के सबसे अमीर परिवार में विवाह बहुत ही भव्य तरीके से हो रहा है, इसीलिए तो सारा स्टाफ जा रहा है। वहां पहुंचते ही एक चमचमाती कार हमारे और सिर्फ हमारे लिए होगी, हम उसी कार में वापिस आएगें। इसलिए आप बिलकुल कोई चिन्ता नहीं कीजिये। महेश ने बहुत ही आराम से कहा। ऐसी शादी देखने का मौका जीवन में केवल एक बार मिलता है, पूरे नवगांव में कारपेट बिछे होगें, एक पुरानी हवेली में शादी का भव्य समारोह होगा। जिस तरह 26 जनवरी के दिन राष्ट्रपति भवन को सजाया जाता है, उसी तरह हवेली सजेगी। जहां बस हमें उतारेगी, यानी दाल मिल के गेट से हवेली और विपुल के घर तक सड़क पर कालीन और खूबसूरत कनातें होंगी। सर जी आप यह शादी कैसे मिस कर सकते है। इतना विवरण सुन कर मैंने हामी भर दी। मना किस तरह करता, आखिर इतनी भव्य शादी हम जैसे मिडिल क्लास लोगों को नसीब से ही देखने का मौका मिलता है।
आखिर वह शुभ घड़ी आ गई। विपुल की बहिन की शादी के दिन पूरे ऑफिस का स्टाफ नये शानदार चमकते कपड़े पहन कर ऑफिस को एक तरह से बारात घर बना दिया।
महेश को संमबोधित करते हुए मैनें पूछा, “क्या बात है, श्वेता नजर नहीं आ रही।
सर जी आप भी क्या मजाक करते है, शादी से पहले अपनी ससुराल कैसे जा सकती है, बस आज बहिन की शादी हो जाए, बस अगले महीने विपुल का भी बैंड़ बजा समझो।
लंच के बाद सभी बस अड्डे पहुंच गये। थोडी देर इन्तजार करने के बाद नवगांव की बस मिली। दोहपर के लगभग चार बजे बस चली। बस चलते ही महेश और सुषमा शादी की बातें करने लगे, खासतौर से शादी के इन्तजाम के बारे में और मैं उनकी पिछली सीट पर बैठा मन्द मन्द मुस्काने लगा। तभी मेरे साथ सीट पर बैठे सज्जन ने बीडी सुलगाई और मेरे से पूछा
बाई साब, क्या आप भी नवगांव जा रहे है, इन लोगों के साथ, बिहारी की छोरी की शादी में। 
आपकी बात मैं समझा नही। मैनें बीड़ी वाले सज्जन से पूछा।
बीड़ी का कश लगाते हुए उसने कहा, “मेरा नाम बांके है, मैं और बिहारी अनाज मंडी में दलाली करते हैं, बिहारी का छोरा नवयुग सिटी में किसी बडे ऑफीस में काम करता है, ऐसे लगे कि तुम लोग उसी ऑफिस में काम करते हो और उसकी बैन की शादी में जा रहे हो। मैं तुम लोगों की बातों से समझ गया कि तुम वहीं जा रहे हो। इती लम्बी बातें पूरे नवगांव में बिहारी का खानदान ही कर सके। इगर इता अमीर होता तो उसका छोरा हजार दो की नौकरी करता, ठाट से अठारह ट्रक चलाता। बिहारी के मुहल्ले में रहता हूं, हम इक्ट्ठे नवयुग सिटी की अनाज मंडी में दलाली करते हैं, जिस दाल मिल की बात कर रहे हो, उसे बंद हुए दस साल हो गए। मैं और बिहारी उस दाल मिल में नौकरी करते थे, जब मिल बंद हुई तब से अनाज मंडी में दलाली कर रहे हैं। बीड़ी का कश लगाते हुए बांके ने कहा। उस की अवाज में व्यंग्य और चिडाने की मुद्रा थी। बांके की बाते सुन कर हम सब सकते मे आ गए, मानो कि किसी बिच्छु ने डंक मार दिया हो, सबकी बोलती बंद हो गई और भौच्चके से एक दूसरे की शक्ले देखने लगे। साहस जुटा कर बड़ी मुश्किल से अवाज निकाल कर सुषमा बोली, “अंकल आप सच कह रहो हो, कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो।
बांके ने एक और बीड़ी सुल्गाई, कश लगाते हुए बोला, “नवगांव पहुंच कर देख लेना, मेरी कोई दुश्मनी थोड़े है। इता गपोड़ी निकलेगा, पता नही था, पूरा नवगांव बिहारी को एक नम्बर का गपोड़ी मानता है, बेटा तो दस कदम आगे निकला।
अब बाकी का रास्ता काटना दूभर हो गया, सभी उधेडभुन में थे, कि जल्दी से नवगांव आ जाये और हकीकत से सामना करें, तभी बस एक पुरानी बिल्ड़िग के सामने रूकी। तब बांके ने कहा, “नवगांव आ गया, यह खंडर ही दाल मिल है, जहां बिहारी का छोरा अठारह ट्रक चला रहा है। हम टूटे से मन से बस से उतरे, अब करते भी क्या, कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था, जो दाल मिल दस साल से बंद है, उसकी हालत खंडर से कम क्या और ज्यादा क्या? कच्ची टूटी सड़क पर हम कारपेट ढूढते रह गये। अब स्टाफ का सब्र टूट गया, सब विपुल को गालियां निकालने लगे, अपनी झूठी शान के लिए विपुल इतना झूठ बोलेगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। इतने बड़बोलेपन का क्या फायदा? झूठ एक दिन सामने आ जाता है, उस को कब तक छुपाया जा सकता है। तभी सामने से एक तांगे में कुछ कारपेट और कुर्सियों के साथ आता विपुल दिखाई दिया। उसे देख कर सुषमा जोर से चिल्लाई, “विपुल के बच्चे नीचे उतर, हमें बेवकूफ बना कर कहां जा रहा है। इन टूटी खड्डे वाली सड़को पर टांगे टूट गई हैं, तू मजे में तांगे की सवारी कर रहा हैं।
हमें देख कर विपुल तांगे से नीचे आया, “आईये सर जी, कारपेट बिछने के लिये गली में जा रहे हैं, बांके अंकल तांगे का सामान घर पहुंचवा दो, मैं सर जी के साथ हवेली जाता हूं।
महेश ने विपुल का कालर पकड़ कर पूछा, “बेटे इतना झूठ बोलने ही क्या जरूरत थी, इतने महंगे कपड़े पहन कर आए, खराब करवा दिये, अगर सच बता देता तब भी शादी में आते, और ज्यादा खुशी होती। पागल बना के रख दिया, अब राष्ट्रपति भवन नुमा हवेली के दर्शन भी करवा दे, उस को भी देख कर तृप्त हो जाएं।
शायद विपुल को हमारे शादी में आने की उम्मीद नहीं थी, एक पल के लिये वह हमें देख कर वह सन्न रह गया, लेकिन हर बड़बोले की तरह चतुराई से बातें बनाने लगा। ऐसे व्यक्ति आदत से मजबूर हार नहीं मानते, बात को पलटते हुए बोला, “आइए सर जी, हवेली चलते हैं, आप सफर में थक गये होंगे, कुछ जलपान कर लेते हैं। तीन चार मिन्ट पैदल चलने के बाद हवेली में हम सब पहुंच गये। हवेली एक पुरानी इमारत निकली। हवेली को देखकर प्रतीक होता था कि किसी समय जमींदार या रईसजादे की रिहाइश रही होगी, जो अब एक धर्मशाला बन के रह गई है, जिसके दो तरफ कमरे बने हुए थे, और बाकी दो तरफ खाली मैदान। रोशनी के नाम पर तीन चार खंम्भों पर बल्ब लटक रहे थे। दो तीन कमरो में कुछ हलचल हो रही थी, जहां वर पक्ष के पुरूष तैयार हो रहे थे, कुछ महिलाए तैयार हो कर एक तांगे पर बैठ कर जा रही थी। तभी विपुल ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा, “हमारे यहां औरतें बारात में नही जाती, इसीलिए पहले हमारे घर वधु के पास जा रही हैं।
एक कोने में हलवाई बस अंगीठी को बस बुझाने ही वाला था। विपुल के आग्रह पर बडे बुझे मन से कुछ पकौडे तल दिये और चाय बना दी। जली भुनी सुषमा ने जली कटी सुनाने लगी। विपुल यह काम अच्छा नही किया, इतना झूठ तो कोई अपने दुश्मन से भी नही बोलता। सारा मेकअप खराब हो गया, इतनी मंहगी साड़ी धूल से सन गई, ड्राईक्लीनिंग के पैसे तेरे से लूंगी।
हां हां क्यो नही, बिलकुल बिलकुल।झेपती हंसी के साथ विपुल बोला।
इतनी भूख लग रही है, और खिलाने को तूने ये सड़े हुए बैंगन और सीताफल के पकौडे़ ही मिले थे तुझको। नहीं चाहिए तेरी दावत। इससे तो उपवास अच्छा।कहते हुए सुषमा ने पकौड़ो की प्लेट विपुल को ही पकड़ा दी। विपुल ने एक पकोडा़ मुंह मे डालटे हुए कहा, “सुषमा नाराज नही होते, फाइवस्टार होटल से अच्छे पकोडे़ हैं।
तेरे घर का एक बूंद पानी भी नही पीना। सुषमा तमतमाती हुई बोली।
सर जी इस में नाराजगी की क्या बात हैं, आप इतनी दूर से आए हैं, कुछ तो लीजिए।पकोड़ों की प्लेट मेरे आगे करते हुए विपुल ने कहा।
एक पकोड़ा खाते हुए मैं सुषमा से बोला, “छोड़ो नाराजगी, भूखे पेट रहना ठीक नही, कुछ खालो।लेकिन सुषमा टस से मस नही हुई। उसने कुछ नही खाया। सुषमा और महेश ने अपनी नाराजगी विपुल को जाहिर कर दी, बाकी स्टाफ चुप रहा, लेकिन मेरे समेत सभी दुखी थे, जिस बात की कल्पना की थी, उसका एक प्रतिशत भी नहीं देख कर आसमान से पाताल में समा गये। पूरे सोलह आने झूठ की उम्मीद तो हमने सपने में भी नही की थी। पकोड़े
खाने के बाद हम विपुल के घर गये, वहां भी वोही हालात थे। गली में कनात, साधारण कुर्सियां और दरियां। घर के साथ वाला प्लाट खाली था, जहां खाने का प्रबंध था। शहरी वातावरण से बिलकुल उलट दरियों पर बैठ कर खाने का प्रबन्ध था। शादी का माहौल देख कर पूरा स्टाफ दंग रह गया। तभी बारात आ गई। आतिशबाजी के नाम पर बन्दूक के दो चार फायर देखने को मिले। भूख से बुरा हाल हुआ जा रहा था, इसलिए चुपचाप दरियों पर बैठ गये। लेकिन सुषमा ने तो जैसे प्रण कर लिया था, वह अपने इरादे से नही पलटी। उसने खाना तो दूर, पानी की एक बूंद भी नही ली।, विपुल ने काफी आग्रह किया, लेकिन सब बेकार। शहर में पले बड़े हम लोगों के लिये यह एक बहुत खट्टा अनुभव था, क्यों कि मैं उम्र मे सबसे बड़ा था और मेरे एक दोस्त की शादी गांव मे हुई थी, मुझे इसका अनुभव था, एक पुरानी शादी याद आ गई, रीति रिवाज बिलकुल वैसे, कुछ भी नही बदला। तभी यादे टूट गई, जब पत्तल सामने रख दी गई और भोजन परोसा जाने लगा। महेश का मन खाने से अधिक वापिस जाने के जुगाड़ मे लगा था। उस वक्त मोबाइल का जमाना नहीं था, घर फोन कर के बता भी नही सकते थे, कि वापिस कब पहुंच पाएगें। विपुल के घर फोन भी नही था। मालूम करने पर पता चला कि टेलिफोन एक्सचेंच में खराबी के कारण पूरे नवगांव के फोन खराब हैं। ऐसी हालत में महेश बहुत गुस्से में था।
कसम लंगोट वाले की, ऐसी बेइज्जती कभी नही हुई, विपुल से ऐसी उम्मीद नही थी। सर जी मुझे चिन्ता वापिस जाने की है। यहां रहने का कोई इन्तजाम नही है, रात को कोई बस भी नही जाती है। सुबह ऑफिस कैसे पहुचेगें। स्टाफ की लड़कियां परेशान हैं, उनके घर कैसे सूचना दें, कि हम यहां फंस गये हैं। हमारी बाते सुन कर साथ में बैठे वर पक्ष के एक सज्जन ने कहा, “आप कितने व्यक्ति हैं, हमारी एक बस खाना समाप्त होने के बाद वापिस मेरठ जाएगी, हम आपको नवयुग सिटी के बाईपास पर छोड़ देगें। शहर के अन्दर बस नही जाएगी, क्योंकि वहां जाने से हमें देर हो जाएगी। यह बात सुन कर पूरा स्टाफ खुशी से झूम उठा। जहां दो पल पहले खाने का एक निवाला गले के नीचे जा रहा था, अब भूख से ज्यादा खाने लगे। एैसा केवल खुशी मे ही हो सकता है। वर पक्ष को धन्यवाद देते हुए बस मे बैठे। यह उनका बडप्पन ही था, कि बस में जगह न होते हुए हम आठ लोगों को बस में जगह दी। स्टाफ की लड़कियों को सीट दी और खुद ड्राईवर के केबिन में बोनट पर बैठ गये। रात के एक बजे नवयुग सिटी के बाईपास पर बस ने हमे उतारा। चारों तरफ सन्नाटा, सबसे बड़ी समस्या बस अड्डे जाने की थी, जहां हमारे स्कूटर खड़े थे। मन ही मन सब विपुल को कोस रहे थे, कहां फंसा दिया, कोई आटो रिक्शा भी नहीं मिला। आधे घंटे इन्तजार के बाद एक रोडवेज की बस रूकी, तब जान मे जान आई, हांलाकि बस ने पीछे से किराया वसूल किया। हम तो कोई भी किराया देने को तैयार थे, हमारा लक्ष्य केवल अपने घरो को पहुंचने का था। बस अड्डे पहुंच कर अपने अपने स्कूटर उठाये और स्टाफ की लड़कियों को उनके घर छोडते हुए सुबह के चार बजे घर पहुंचे। उसके बाद न तो नींद आई न ही चैन आया। सारा बदन टूट रहा था, आंखों मे नींद, लेकिन ऑफिस भी जाना था, क्योंकि स्टाफ की लड़कियों ने ऑफिस आने से मना कर दिया और लड़कों की भी तबीयत पतली लग रही थी। गिरता पड़ता ऑफिस पहुंचा। पूरे ऑफिस में सन्नाटा, सिर्फ कमप्यूटर ऑपरेटर श्वेता ही आफिस में थी। मैं कुर्सी पर निठाल बैठे बैठे कब सो गया, पता ही नही चला। दोहपर के दो बजे महेश ने आकर जगाया। बाकी समय हम दोनो सिर्फ शादी की बातें करते रहे। श्वेता के कान हमारी तरफ थे। हमने तो अपनी भड़ास कह कर निकाल दी, लेकिन वज्रपात श्वेता पर गिरा, बेचारी के सारे सपने टूट गए। कहां तो उसने एक राजकुमार से शादी का सपना संजोया था, और वह राजकुमार फक्कड निकला। बात को बडा चढा कर कहने की आदत तो बहुतों की होती है,
लेकिन एक रुपये का पांच सौ रुपये विपुल बना गया। श्वेता इस आडम्बर को सह नही सकी और उसने तीन चार दिन बाद त्यागपत्र दे दिया। ऑफिस में सब विपुल के व्यवहार से नाराज थे, लेकिन हम कर भी कुछ नही सकते थे। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा वाली कहावत आखिर चरितार्थ हो गई। एक दिन शाम को जब विपुल ऑफिस से निकला तो श्वेता के भाई ने अपने तीन दोस्तो के साथ उसे घेर लिया और उसकी जमकर पिटाई करने लगे। हॉकी ,क्रिकेट बैट से जम कर धुनाई हुई। विपुल जोर से चिल्लाने लगा, बचाऔ, बचाऔ, लेकिन ऐसे मौके पर लोग केवल तमाशबीन बन कर रह जाते है, कोई बचाने नही आया, तभी हम वहीं से गुजरे और महेश भीड़ को देख कर रुक गयाविपुल की आवाज सुन कर मुझे आवाज लगाई, “सर जी यह तो अपना विपुल है। विपुल को पिटता देख कर हम दोनों उसे बचाने की कोशिश करने लगे। उसके बचाव में हम भी पिट गए, हमारे कपड़े भी फट गए। हमे देख कर भीड़ मे से दो चार आदमी बचाव करने आगे आए, भीड़ को देख कर हमलावर भाग गए। विपुल की बहुत पिटाई हुई थी। आंखे सूज गई, शरीर पर जगह जगह नील पड़ गए थे। उसे पास के नर्सिगहोम में ईलाज के लिए ले गये, जहां उसे दो दिन रहना पड़ा। नर्सिगहोम में महेश ने जमकर विपुल को भाषण पिलाया।
देख लिया अपने बडबोलेपन का नतीजा, इतनी सुन्दर सुशील कन्या का दिल तोड़ दिया, क्या क्या सपने संजो कर रखे थे, उसने? सब बर्बाद कर दिया, शुक्र कर हम वहां पहुंच गये समय पर, वरना तेरा तो क्रियाकर्म आज हो जाता। इतना झूठ बोलने की क्या जरुरत थी, इन चीजों की कोई वैल्यू नही है, ठकोसला है सिर्फ और कुछ नहीं। सच एक दिन सबके सामने आ जाता है। संभल जा अब तो, सबक ले आज की पिटाई से।
विपुल चुपचाप सुनता रहा। दर्द से कराह रहा था, महेश का भाषण जले पर नमक का काम कर रहा था, लेकिन कड़वी दवाई तो पीनी ही पड़ती है। लेकिन आदमी अपनी आदत से मजबूर होता है, फिर उसी रास्ते पर चल पड़ता है। कुछ दिन खामोश रहने के बाद विपुल की बोलने की आदत फिर शुरु हो गई। लेकिन अब स्टाफ उसकी बातों को गंभीरता से नही लेता था। एक दिन विपुल मेरे केबिन में आया।
सर जी आपकी हेल्प की जरुरत है।
बोलो विपुल, अगर मेरे बस में होगा, तो जरुर करुंगा।
हमने नवगांव का मकान बेच दिया है, यहां नवयुग सिटी में सेक्टर बीस में सरकार ने प्लाट काटे है, एक प्लाट खरीदा है, कोठी बनवानी है, आपको मालूम है, कि ठेकेदार, मजदूरों के सर बैठना पड़ता है, नही तो वे काम नहीं करते। सुबह कुछ देर से आने की इ़जाजत मांगनी है, शाम को देर तक बैठ कर ऑफिस का काम पूरा कर लूंगा, कोई काम पेंडिग नही होगा सर जी। हमनें यहां किराये पर मकान ले लिया है, शाम को डैडी कोठी की कंस्ट्रेकशन का काम देख लेंगें। सर जी बस एक महीने की बात है।
मैंने उसको इजाजत दे दी और सोचने लगा कि एक महीने में कौन सी कोठी बन कर तैयार होती है।, तभी महेश केबिन में आया।
विपुल अंग्रेजों के जमाने का बड़बोला है, जिन्दगी में कभी नहीं सुधरेगा।
अब क्या हो गया?”
सर जी सेक्टर बीस में तो पच्चीस और पचास गज के प्लाट कट रहे है, वहां कौन सी कोठी बनवाएगा? मकान कहते शर्म आती है, इसलिए कोठी कह रहा है, यदि उसकी पचास गज में कोठी है, तो सर जी मेरा सौ गज का मकान तो महल की कैटीगरी में आएगा और आपका दो सौ गज का मकान तो लाल किले की कैटीगरी में आएगा।
मैं महेश की बातें सुन कर हंस दिया और जलभुन कर महेश विपुल को जली कटी सुनाने लगा।
खैर विपुल ने एक महीना कहा था, लेकिन लगभग चार महीने बाद मकान बन कर तैयार हो गया। मकान के महुर्त, गृहप्रवेश पर विपुल ने पूरे स्टाफ को आंमत्रित किया, लेकिन स्टाफ ने कोई रुचि नही दिखलाई। सब बड़े आराम से ऑफिस के काम में जुट गये। मेरे कहने पर सबने एकजुट हो कर विपुल के यहां जाने से मना कर दिया।
महेश विपुल जैसा भी है, हमारा सहपाठी है, बड़े प्रेम से गृहप्रवेश पर बुलाया है, हमे वहां जाना चाहिए।
सर जी प्रेम आपको मुबारक हो, मुझे चलने को मत कहिए, उसकी कोठी मैं बर्दास्त नही कर सकूंगा। मैं अपने झोपड़े में खुश हूं।
महेश ऑफिस से दो घंटे जल्दी चल कर बधाई दे देंगें, उसकी कोठी हो या झोपड़ा, हमे इस से कुछ नही मतलब। वह अपनी कोठी में खुश और हम अपने झोपड़े में खुश।
यह बात सुन कर महेश खुशी से उछल पड़ा। कसम लंगोट वाले की, आपकी इस बात नें दिल बाग बाग कर दिया। अब आपका साथ खुशी खुशी।
शाम को चार बजे हम ऑफिस से चल कर विपुल की कोठी पहुंचे। पचास गज के प्लाट पर दुमंजिला मकान था, विपुल का। महेश ने चुटकी ली, “यार कोठी के दर्शन करवा, बड़ी तमन्ना है, दीदार करने की।
हां हां देखो यह ड्राईग रुम, रसोई, बाथरुम, बैडरुम, अपनी आदत से मजबूर साधारण काम को भी बड़ाचढा कर बताने लगा कि कोठी के निर्माण में पचास लाख रुपये लग गये।
सुधर जा विपुल पांच लाख को पचास मत कर।
नही नही, आपको पता नही है कि हर चीज बहुत महंगी है, जिस चीज को हाथ लगाऔ, लाखों से कम आती नही है।विपुल आदत से मजबूर सफाई देने लगा।
महेश शाईरी करने लगा, “इतनी भी ज्यादा सफाई न दे, गुनहगार समझेगी दुनिया तुझे।
विपुल खीं खीं कर के हंसने लगा।
विपुल समय बड़ा बलवान है, इतना झूठ बोलना छोड़ दे, एक दिन तेरा सच भी हम झूठ मानेंगें। सुधर जा, सुधर जा।
बाई गॉड की कसम, झूठ की बात नही है, बिलकुल सच है।विपुल सफाई पर सफाई दे रहा था, हमनें वहां से खिसकने की अपनी बेहतरी सोची, कि विपुल से बहस करना बेकार है, हमने उसे शगुन का लिफाफा पकड़ाया और विदा ली।
मकान से बाहर आ कर हम दोनों के मुख से एक साथ बात निकली।

विपुल कभी नही सुधरेगा। बड़बोला था, बड़बोला है और बड़बोला रहेगा।            

Sunday, March 23, 2014

बच्चों की भावना


अकी, बेटा अकी, उठो, सुबह हो गई, स्कूल जाना है। उठो प्यारी अकी। अनुभव ने अपनी लाडली लडकी आकृति को सुबह सुबह जगाने के लिए आवाज लगानी शुरू की। हूं कह कर अकी ने करवट बदली और रजाई को कानों तक खींच लिया। अकी यह क्या, रजाई में अब और ज्यादा दुबक गई हो, उठो, स्कूल को देर हो जाएगी।
अच्छा पापा।कह कर अकी और अधिक रजाई में छुप गई।
यह क्या तुम अभी भी नही उठी, लगता है, रजाई को हटाना पडेगा।
अभी उठती हूं।
नही अकी, अब फटाफट रजाई से बाहर आ।कह कर अनुभव नें अकी की रजाई को हलके हलके धीरे से हटाना शुरू किया।
नही पापा, अभी उठती हूं। बंद आंखों में ही अकी ने कहा।
नही अकी अब देरी अच्छी नही, साढे पांच बज गये हैं, तुम्हे टायलेट में भी अच्छा टाइम लग जाता है।
यह सुन कर अकी ने धीरे से आंखें खोली, “अभी तो पापा रात है, अभी उठती हूं। अब अनुभव ने कुछ नही सुना और अकी को उठाया और टुथब्रश हाथ में देकर टायलेट में वाशबेसन के आगे खड़ा कर दिया। पापा ऊ हूं कह कर बेमन दांतो को ब्रश करने लगी। आंखों में उसके अभी भी नींद थी। सर्दियों में रातें लम्बी होने के कारण सुबह सात बजे के बाद ही उजाला होना शुरू होता है और ऊपर से घने कोहरे के कारण लगता ही नही कि सुबह हो गई। बस घड़ी देख कर दिनचर्या आरम्भ कर दो। आकृति की स्कूल बस साढे छः बजे आ जाती है। वैसे तो स्कूल आठ बजे लगता है, लेकिन घर से स्कूल की दूरी चौदह किलोमीटर तय करने में पूरा सवा घंटा बस लेती है। रास्ते में हर चार कदम पर बस स्टाप और बच्चों को लेते हुए सवा घंटा बच्चों को तोड़ देता है। एक तो सुबह सुबह आकृति की नींद नही खुलती और सवा घंटे की बस यात्रा स्कूल पहुंचने से पहले ही आकृति को थका देती थी। जैसे तैसे अकी स्कूल के लिए तैयार हुई। फ्लैट से बाहर निकलते आकृति ने पापा से कहा, “अभी तो रात है, दिन भी नही निकला। मैं आज स्कूल जल्दी क्यों जा रही हूं।
आज कोहरा बहुत अधिक है, इसलिए उजाला नही हुआ, एैसा लग रहा है, कि अभी रात है, लेकिन अकी, घड़ी देखो, पूरे साढे छः बज गये है। बस आती ही होगी।
कोहरा बहुत घना था। सात आठ फीट से आगे कुछ नजर नही आ रहा था। सड़क एक दम सुनसान थी, इक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे। सोसाइटी के गेट पर स्कूल बस आती थी। आज आकृती के अलावा और कोई बच्चा नही था। बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। उनकी एक सोच होती है। अपनी सोच और समझ के मुताबिक वे सोचते विचारते है, जिस को हम बड़े नही समझते है या समझने की कोशिश ही नही करते है। मस्तिष्क हम बडो़ में होता है तो वैसा मस्तिष्क बच्चों में भी होता है। हम बच्चों के मस्तिष्क को समझने की कोशिश नही करते है। यह जरूर है कि उनकी एक छोटी दुनिया होती है, जिसमें वे अपना ताना बाना बुनते है। उनकी बातों को बचपना कह कर टाल जाते है, लेकिन हमें उनकी बातों को ध्यान से समझना चाहिए। उन की भावनाऔ की कद्र करनी चाहिए।
घने कोहरे के बीच सर्द हवा के झोकों से आकृती के शरीर में झुरझिरी सी होती और इसी झुरझराहट ने उसकी नींद खोल दी। अपने बदन को ब्रेक डांस जैसे हिलाते डुलाते वह बोली पापा लगता है, आज बस नही आएगी।
आपको कैसे मालूम अकी।
देखो पापा, आज स्टाप पर कोई बच्चा नही आया है, आप स्कूल फोन करके मालूम करो, कहीं आज स्कूल में छुट्टी न हो?”
आज छुट्टी किस बात की होगी?”
ठंड की वजह से आज छुट्टी होगी। इसलिए आज कोई बच्चा नहीं आया। देखो पापा इसलिए अभी तक बस भी नही आई है।
बस कोहरे की वजह से लेट हो गई होगी।
पापा कल मोटी मैडम शकुन्तला राधा मैडम से बात कर रही थी कि ठंड और कोहरे के कारण सर्दियों की छुट्टियां जल्दी हो जाएगी।
जब स्कूल की छुट्टी होगी तो सब को मालूम हो जाएगा।
आप ने टीवी में न्यूज सुनी, शायद आज से छुट्टियां कर दी हैं।
नही, बेटे, अभी ऐसी कोई न्यूज नही है।
आकृति ही क्या सारे बच्चे ठंड में यही चाहते है, कि स्कूल बंद रहे, लेकिन स्कूल वाले इस बारे में कुछ सोचते है। चाहे ठंड पहले पड़े या बाद में, छुट्टियों की तारीखें पहले से तय कर लेते है। ठंड और कोहरे के कारण न तो छुट्टियां करते है ना स्कूल का टाइम बदलते है। सुबह के बजाए दोपहर का समय कर दें, लेकिन हम बच्चों की कोई नहीं सुनता है। सुबह सुबह इतनी ठंड में बच्चे कैसे उठे। आकृती मन मन में बडबड़ा रही थी।
अकी क्या सोच रही हो।
कुछ नही, पापा।
तभी दो तीन बच्चे स्टाप पर आ गये। सभी ठंड में कांप रहे थे, बच्चे आपस में बतियाने लगे कि मजा आ जाएगा, बस न आए। तभी एक बच्चे की मां ने अनुभव को सम्बोधित करते हुए कहा, “भाभी जी के क्या हाल है? अब तो डिलीवरी की तारीख नजदीक है। आप अकेले कैसे मैनेंज कर पाएगे। अकी की दादी या नानी को बुलवा लीजिए। वैसे कोई काम हो तो जरूर बताइए।
अकी की नानी आज दोपहर की ट्रेन से आ रही है। अनुभव ने उत्तर दिया।
पापा क्या नानी आ रही है? आपने मुझे क्यों नही बताया। अकी नाराज हो कर बोली।
तभी स्कूल बस ने हॉर्न बजाया, कोहरे के कारण रेंगती रफ्तार से बस चल रही थी। किसी को पता ही नही चला कि बस आ गई। बच्चे बस में बैठ गये, सभी पैरेन्ट ने बस ड्राइवर को बस धीरे चलाने की सलाह दी। बस ड्राइवर ने पलट के जवाब दिया कि यह भी कोई कहने की बात है। बच्चों की सुरक्षा सबसे पहले, इस कारण रेंगती रफ्तार से बस चला रहा हूं।
अनुभव बस के रवाना होने के बाद जल्दी से घर आया। स्नेह को लेबर पेन शुरू हो गई थी, “अनु डाक्टर को फोन करो। अब रहा नही जा रहा है। स्नेह के कहते ही अनुभव नें डाक्टर से बात की। डाक्टर ने फौरन अस्पताल आने की सलाह दी। फौरन फ्लेट को ताला लगा कर अनुभव कार में स्नेह को नर्सिग होम ले गया। डाक्टर ने चेकअप के बाद कहा। मिस्टर अनुभव आज ही आपको खुशखबरी मिल जाएगी। अनुभव ने अपने बॉस को फोन करके स्थिती से अवगत कराया और ऑफिस से छुट्टियां ले ली। अनुभव की चिन्ता अब रेलवे स्टेशन से आकृती की नानी को घर लाने की थी, कि नर्सिग होम में किसको स्नेह के पास छोड़े। आज के समय एकल परिवार में ऐसे मौके पर यह एक गंभीर परेशानी करती है कि अकेले कब क्या क्या और कहां क्या करे। सुबह आकृती को तैयार करके स्कूल भेजा और फिर स्नेह के साथ नर्सिग होम। स्नेह को अकेला छोड़ नही सकता, मालूम नही कब क्या जरूरत पड़ जाए। नानी अकेले स्टेशन से कैसे घर आएगी। घर में ताला लगा है। सुबह पड़ोसी वर्मा जी के घर कालबेल बजाई लेकिन सब व्यस्त, घर का दरवाजा खोलने में देरी कर दी और अनुभव इन्तजार नही कर सका। नर्सिग होम के वेटिंगरूम में बैठ कर अनुभव का मस्तिष्क तेजी से चल रहा था, कि कैसे सब कुछ मैनेंज किया जाए। वर्मा जी को फोन लगाया और स्थिती से अवगत कराया। नर्सिग होम घर के नजदीक था, आधे घंटे में मिसेज वर्मा थर्मस में चाय, नाश्ता लेकर उपस्थित हो गई। बेटा पहले तो आप चाय और नाश्ता लीजिए, मैं यहां स्नेह के पास बैठती हूं। आप आकृती की नानी जी को रेलवे स्टेशन से लाईए। अनुभव ने बिस्कुट के साथ चाय पी और रेलवे स्टेशन रवाना हुआ। स्टेशन पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि गाड़ी दो घंटे लेट है। रेलवे प्लेटफार्म के बैंच पर बैठा अनुभव सोचने लगा कि एकल परिवार के जहां एक तरफ अपने सुख हैं तो दूसरी और दुःख भी। आज जब प्रसव के समय किसी अपने की जरूरत है, तो अकेले सभी कार्य खुद को करने पड़ रहे है। लेकिन यह उसकी मजबूरी है। नौकरी जहां मिलेगी, वही रहना पड़ेगा। अपने घर के पास नौकरी न मिले तब कोई कुछ नही कर सकता है। घर से दूर रहना पड़ता है। कोई सगा तो पास नही होता। ऐसे समय पड़ोस ही सगा होता है। पता नही डाक्टर भी डिलीवरी की गलत तारीख क्यों बताते है, तारीख के हिसाब से नानी को दस दिन पहले बुलाया है, लेकिन यह बातें सोचने का समय तो नही है, फिर भी इन्तजार में समय व्यतीत करते हुए मस्तिष्क में पता नहीं, कहां से क्या क्या विचार आ जाते हैं।

पडोसी वर्मा जी की भी कुछ ऐसी स्थिती है। दोनों बुजर्ग दंपति रिटायरमैंट के बाद अकेले रह रहे है। एक पुत्र विदेश में नौकरी कर रहा है, दो तीन साल बाद दो महीनों के लिए मिलने आता है और दूसरा पुत्र बंगलूरू में आईटी कम्पनी में नौकरी करता है। साल में दस एक दिनों के लिए मिलना होता है। दो पुत्रियां हैं, एक अहमदाबाद में रहती है, लेकिन दूसरी पुत्री नोएड़ा में रहती है, जो हर रविवार को सपरिवार मिलने आती है। बाकी सप्ताह वर्मा दंपति अकेले। इसी कारण एक दूसरे की पूर्ती के लिए अनुभव और वर्मा जी के बीच काफी नजदीकियां हो गई थी। अनुभव और स्नेह दोनो नौकरी करते थे। आकृति की वजह से वर्मा दंपति की नजदीकियां बड़ी। दोपहर को आकृति स्कूल से वापिस आती तो अधिक समय उसका वर्मा जी के घर बीतता। घर के कार्य के लिए अनुभव ने दिन की नौकरानी रखी हुई थी, लेकिन नौकरानियां आकृति का कम और अपना ध्यान अधिक रखती थी। एक छोटे से बच्चे ने क्या खाना पीना था, उससे कई गुणा अधिक नौकरानियां हजम कर जाती थी, इस कारण कई नौकरानियां आई और चली गई। लेकिन वर्मा परिवार से संबंध बढ़ता ही गया। अकेलेपन को दूर करने के लिए एक छोटे बच्चे का सहारा वर्मा जी को अपने खुद के बच्चों की दूरी भुला देता था। इसमे दोष किसी का नही है। सभी परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हो जाती हैं कि किसी का कोई बस नही चलता है।                  
तभी रेलवे की घोषणा ने अनुभव को विचलित कर दिया। गाड़ी दो घंटे और लेट है। उफ ये रेलवे वाले कभी नही सुधरेगें। एक बार में क्यों नही बता देते कि गाड़ी कितनी देर से आएगी। सुबह से एक एक घंटे बाद और अधिक देरी से आने की घोषणा कर रहे है। सर्दियों में कोहरे के कारण गाड़ियां अक्सर देरी से चलती हैं। लेकिन अनुभव आज और अघिक इंतजार नही कर सकता था, लेकिन इस समय वह केवल झुंझला कर रेलवे प्लेटफार्म के एक छोर से दूसरे छोर के अनगिनत चक्कर लगा चुका था। तीन घंटे से अधिक उसे इंतजार करते हो गये। मालूम नहीं यह ट्रेन कब आएगी। वर्मा जी नर्सिगहोम में हैं। अकी भी स्कूल से आने वाली होगी। तभी मोबाइल की घंटी बजी। दूसरी तरफ वर्मा जी थे। मुबारक हो अनु बेटे। अकी का भाई आया है। स्नेह और छोटा काका एकदम ठीक हैं। तुम चिन्ता मत करो। मैं घर जा रहा हूं। अकी के स्कूल से वापिस आने का समय हो गया है। चिन्ता मत करना।
यह सुन कर अनुभव की जान में जान आई। अब तनाव से दूर शान्ती से बैंच पर बैठ गया। निश्चिन्त हो कर अब अनुभव ट्रेन का इंतजार करने लगा। गाड़ी पूरे छः घंटे देरी से आई। बच्चे की खुशखबरी सुन कर नानी की सफर की सारी थकान मिट गई।
अनु बेटे अब सीधा नर्सिगहोम ले चल। पहले छोटे काके को देख कर स्नेह से मिल लूं।
नर्सिगहोम में स्नेह के पास झूले में छोटा काका सो रहा था। नानी को देख कर वर्मा दंपति ने बधाई दी। नानी ने नर्स और आया को रूपये न्योछावर किये और छोटे काके को गोद में लिया। छोटे काके को गोद में लेता देख आकृति बोली। नानी मैंने आपसे पहले छोटे काका को देखा। नानी कितना गोरा है। देखो कितना सॉफ्ट है लेकिन एकदम गंजा है। सर पर एक भी बाल नही है। नानी ने लाड में कहा। बाल भी आ जाऐगें। अकी से भी ज्यादा। जब अकी तुम पैदा हुई थी, तुम्हारे भी सर में बाल नही थे, अब देखो, कितने लम्बे बाल हैं।
नानी मुझे दो ना छोटे काका को, मम्मी तो हाथ भी नही लगाने दे रही।
नानी ने प्यार से कहा। अभी बहुत छोटा है, मेरे पास बैठो, तुम्हारी गोदी में देती हूं। गोदी में पा कर आकृति उल्लास से भर गई। नानी देखो, अभी आंखो को खोला था, देखो कितना क्यूट तरीके से मुस्करा रहा है। ऐसे हंसते खेलते शाम हो गई। वर्मा आंटी ने घर जा कर रात के भोजन का प्रबंध किया। स्नेह ने नानी को घर जा कर आराम करने को कहा। आकृति का मन जाने को नही हो रहा था। नानी थोडा रूक के चलते हैं। अभी काका जाग रहा है। जब सो जाएगा, तब चलेगें।
अकी अब घर चलो, होमवर्क भी करना होगा और फिर तुम सुबह उठने में देर कर देती हो। अनुभव ने आकृति से कहा। लेकिन अकी का मन घर जाने को नही था। घर में होमवर्क करते समय उसका ध्यान छोटे काका में लगा हुआ था। जैसे तैसे होमवर्क पूरा किया। रात को एक बार फिर वह अनुभव के साथ नर्सिग होम गई और काफी देर तक छोटे काका को निखारती रही, पुचकारती रही। रात को घर आने में देरी हो गई। पूरे दिन की थकान के बाद स्नेह और छोटा काका को सही देख कर सम्पूर्ण निश्चिन्ता के साथ सोया तो सुबह उठने में देरी हो गई।  वर्मा आंटी ने जब कालबेल बजाई तब अनुभव की आंख खुली। बेटे क्या बात है, क्या अकी स्कूल नही जाएगी। मैनें उसका नाश्ता भी बना दिया है।
आंटी मालूम नही आज घड़ी का अलार्म कैसे नही सुनाई दिया। अभी अकी को उठाता हूं। स्कूल की तो अगले सप्ताह से छुट्टियां हैं।
कोई बात नही। बेटा। मैं तुम्हारी चाय और अकी का नाश्ता रसोई में रख देती हूं और हां स्नेह और नानी की चाय लेकर नर्सिगहोम जा रही हूं। तुम आराम से अकी को स्कूल के लिए तैयार करो। अनुभव नें अकी को उठने के लिए आवाज देनी शुरू की, लेकिन अकी रोज की तरह हूं हां कर के करवट बदल कर रजाई और अधिक कानों तक खींच कर सो जाती। बड़ी मुश्किल से अकी स्कूल जाने के लिए तैयार हुई, लेकिन स्कूल बस आज निकल गई। अनुभव को घर वापिस आ कर कार उठानी पड़ी। स्कूल घर से चैदह किलेमीटर दूर था। स्कूल के गेट पर प्रिसिंपल खड़ी थी और देरी से आने वाले सब बच्चों को घर वापिस भेज रही थी। अनुभव ने काफी मिन्नत की लेकिन प्रिसिंपल के ऊपर कोई असर नही पड़ा, उलटे वह अनुभव पर विफर पड़ी। आप अभिभावकों का कर्तव्य हैं कि बच्चों के नियमित समय पर स्कूल भेजे, उन को अनुशासित करे, लेकिन आप उनको शह देकर और अधिक बिगाड़ रहे है। मैं स्कूल का नियम किसी को नहीं तोड़ने दूंगी। आप अपने बच्चे को वापिस ले जाइये।
मैडम प्लीज आगे से देर नही होगी। आज अधिक सर्दी और धुन्ध के कारण देर हुई है। अनुभव ने विनती की।
अगर आप का घर दूर है तो आप घर के पास किसी स्कूल में बच्चे को दाखिल करवाइए। मुझे अपने स्कूल का अनुशासन नही तोड़ना। प्रिसींपल नें कड़क स्वर में कहा। इसके आगे अनुभव कुछ नही कह सका और चुपचाप अकी के साथ कार स्टार्ट कर घर के लिए रवाना हो गया। अनुभव का मूड खराब हो गया, कि कितने कठोर, निष्ठुर है स्कूल वाले, बच्चो के साथ उनके अभिभावकों के साथ भी कितने गलत तरीके से पेश आते हैं। इतनी ठंड में छोटे बच्चों को सुबह उठाना, तैयार करना कितना मुश्किल होता है। कभी कभी तो बड़े भी इतनी अधिक ठंड़ में घबरा जाते है। आफिस पहुंचने में देर हो जाती है। ठंड़ की परेशानी को समझना चाहिए। स्कूल के समय को बदलना चाहिए। यदि एक घंटा देरी से सर्दियों में स्कूल लगाया जाए तो सब समस्याऔ से छुटकारा मिल सकता है। स्कूल में मोटी मोटी मैडमों का दिमाग भी लगता है, मोटा होता है। छोटे बच्चों की भावनाऔ को कोई नही समझनें की कोशिश करता है। मुझे इस बारे में स्नेह से बात करनी पड़ेगी। चाहे कुछ हो जाए, इस साल अकी का स्कूल बदलवा दूंगा। घर के पास जिस भी स्कूल में दाखिला मिलेगा, उसी में करवा दूंगा। आखिर हम भी घर के पास सरकारी स्कूल में पड़े थे। क्या जिन्दगी की दोड़ में पिछड़ गए है। सब स्कूल के बड़े नाम में क्या रखा है। सिविल परीक्षाऔं में छोटे शहरों, कसबों के छात्र मेरिट लिस्ट में आते है। जो जलीकटी स्कूल में सुनी है उसके बाद अब इस स्कूल में अकी को पढा़ने का कोई औचित्य नही बचता। अनुभव यह सोचता हुआ धीरे धीरे कार चला रहा था। अकी समझ गई कि पापा प्रिसिंपल की बात से उदास और नाराज हो गए है। तभी कार में सीडी प्लेयर भी नही ऑन किया। अकी ने सीडी प्लेयर ऑन कर पापा की मन पसंद सीडी लगा दी। शोख नजर की बिजलियां दिल पर तू गिराए जा अपना मन पसंद गीत सुन कर अनुभव का चित कुछ शांत हुआ। मुस्करा कर उसने अकी को देखा और कार की रफ्तार तेज की। आखिर बच्चे भी सब समझते है। हमें कुछ कहते नही, शायद डरते है, क्योंकि हम डांट मार कर उन्हे चुप करा देते है। अकी छोटा काका को देखना पसंद करेगी, जब स्कूल की छुट्टी हो गई है तब कुछ समय नानी, स्नेह और छोटा काका के संग गुजारा जाए, इसीलिए अनुभव ने कार सीधे नर्सिगहोम की तरफ ले ली। अकी बहुत खुश हुई कि छोटा काका के साथ उसे सारा दिन मिलेगा। स्कूल बैग के साथ अकी को देख कर स्नेह कुछ नाराज हुई, “आपने अकी की छुट्टी क्यों करवाई अनुभव ने कहा कि इस विषय में घर चल कर बात करेगें। शाम को स्नेह को नर्सिगहोम से छुट्टी मिल गई। अनुभव ने अकी से कहा कि आज स्कूल की छुट्टी हो गई तो वह अपनी फ्ररेंड से होमवर्क पूछ के कर ले। अकी का ध्यान छोटा काका में लगा हुआ था, जैसे तैसे होमवर्क किया और फिर नानी के पास सट के बैठ गई कि किस बहाने छोटा काका के पास वह रहे। रात काफी हो गई थी, खुशी में बातों बातों में आंखों से नींद गायब थी, घड़ी देख कर स्नेह ने अकी को सोने को कहा, कि कल सुबह भी आज वाली बात कहीं न हो जाए। अकी का दिल सोने को नही हो रहा था, लेकिन बिस्तर में दुबकना पड़ा। रजाई से मुंह निकाल कर पूछती रहती, नानी छोटा काका क्या सो गया या जाग रहा है।
अभी अकी को एक सप्ताह स्कूल और जाना था, ठंड इस साल कुछ अधिक थी। रोज सुबह जबरदस्त कोहरा होने लगा। रोज सुबह अकी को इतने जल्दी स्कूल के लिए तैयार होते देख कर नानी ने स्नेह को कहा, कि किसी पास के स्कूल में अकी को दाखिल करवा दे। इतना अधिक परिश्रम छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए घातक है।
मां मैं स्कूल चेंज नही करवाउगी। बहुत नामी और बढिया स्कूल है।
इसका जवाब अनुभव ने दिया, “स्नेह नानी ठीक कह रही हैं। मैंनें सोच लिया है, कि इस साल रिजल्ट निकलने पर अकी का स्कूल पास के स्कूल में करवा दूंगा। और फिर उसने पूरी बात स्नेह को विस्तार पूर्वक बताई कि कैसे फटकार लगा कर अपमानित किया। बारबार अनुरोध करने पर भी प्रिंसीपल नें निर्दयता के साथ किसी दूसरे स्कूल में दाखिले की सलाह दी थी। ऐसी बात सुन कर स्नेह उदास हो गई कि उसका अरमान अकी को एक नामी स्कूल में पढानें का साकार नही हो पाएगा। लेकिन अनुभव के दृढ़ निश्चय और नानी के सहयोग के आगे स्नेह को झुकना पड़ा। आकृति सुन सुन कर बहुत खुश हुई कि अब उसे नये सत्र में पास के स्कूल में जाना होगा। इतनी जल्दी भी नही उठना पडेगा। स्कूल बस में वह बहुत अधिक परेशान होती थी। बड़े बच्चे बस सीट में छोटे बच्चों को बैठने नही देते थे। सीट पर बैठे बच्चों को उठा देते थे। स्कूल टीचर भी उन्हे कुछ नही कहती थी। उलटे सबसे आगे की सीटों पर बैठ जाती थी। कितनी ज्यादा भीड़ हो जाती थी। गर्मियों में तो इतने ज्यादा पसीने आते थे और बहुत ज्यादा घबराहट होती थी, इसी से तो तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन पापा मम्मी तो इस बारे में सोचते ही नही। सर्दियों में कितनी ज्यादा ठंड होती है। स्कर्ट पहन कर जाना पड़ता है। ऊपर से कोट पहना देते है, लेकिन स्कर्ट पहनने से टांगों में बहुत ज्यादा ठंड लगती है। छोटे बच्चों की परेशानी कोई नही समझता। लेकिन आकृति की परेशानी को नानी ने समझा। रोज सुबह आकृति का बेमन स्कूल जाना अच्छा नही लगता था। ठंड बढती जा रही थी। तापमान ने तेजी से गिरावट दर्ज की। प्रशासन ने सरकारी स्कूलों की छुट्टी समय से पहले घोषित कर दी। अभिभावकों के दबाव में आ कर निजी स्कूलों में भी निर्धारित समय से पहले सर्दियों की छुट्टियां घोषित कर दी। जिस दिन छुट्टियों की घोषणा की, आकृति बहुत अधिक खुशी के साथ झूमती हुई, नाचती हुई स्कूल से वापिस आई। जैसे नानी ने फ्लेट का दरवाजा खोला, आकृति नानी से लिपट गई।
नानी, मेरी प्यारी लवली नानी, आज मैं आजाद पंछी हूं।
क्या बात है, गुडिया रानी बहुत खुश है।
नानी हमारी कल से पूरे बीस दिन की छुट्टी। अब मैं रोज छोटा काका के संग खेलूंगी। और अपना स्कूल बैग एक तरफ पटक दिया और आइने के सामने कमर मटकाते हुए गीत गाने लगी, मितवा।
तभी स्नेह ने आवाज लगाई, “अकी काका सो रहा है, शोर मत मचाऔ।
गाना भी नही गाने देते और कह कर अकी बाथरूम में मुंह धोने के लिए चली गई। अकी बाथरूम में वाशबेसन के आगे आइनें में अपने को देख कर फिर गीत गाने लगी। मैंनें जिसे अभी देखा है, कौन है वो अन्जानी वो है कोई कली या कोई किरण या है कोई कहानी, उसे जितना देखूं उतना सोचूं क्या मैं उसे कह दूं, प्रीटी वूमन, देखो देखो न प्रीटी वूमन, तुम भी कहो न प्रीटी वूमन। अकी वाशबेसन के नल पर बड़े आराम से हाथों पर साबुन लगाए जा रही है और मजे में प्रीटी वूमन गीत गाती जा रही थी। अकी का गाना सुन कर स्नेह ने नानी को कहा। मम्मी जा कर अकी को बाथरूम से निकालो, वरना वह दो घंटे से पहले बाहर नही आएगी। नानी ने अकी को बाथरूम में जा कर कहा, “प्रीटी वूमन बहुत बन संवर लिए। अब बाहर आ जाइए। छोटा काका आपको बुला रहा है।
सच्चीकह कर अकी ने फर्राटे की दोड़ लगाई। यह क्या नानी, छोटा काका तो सो रहा है, आप भी मेरा मजाक उडा़ती हैं।
गाना तो बहुत अच्छा गा रही थी। आवाज बहुत सुरीली है। फिर से सुनाऔ अकी।
मैं नही सुनाती नानी। आपने मेरा मूड खराब कर दिया। अकी ने मुंह बनाते हुए कहा।
मूड कैसे आएगा, मेरी लाडो का। नानी ने अकी को अपनी गोद में बिठाते हुए पूछा।
जब पापा गाना गाएगें तब मैं पापा के साथ मिल कर गाऊंगी।
वो क्यो?”
क्योंकि नानी आपको नही पता, कि पापा को यह गाना बहुत अच्छा लगता है। मम्मी को देख कर गाते है। अकी ने बड़े भोलेपन से कहा तो नानी को हंसी आ गई। वाकई मासूम और भोले बच्चों को कई बार मालूम नही होता कि कहां क्या बात करनी है।
अच्छा अकी, पापा का गाना तो बता दिया, मम्मी कौन सा गाना गाती है, पापा को देख कर। इस से पहले अकी कुछ कहती, स्नेह तुनक कर बोली, “मां तुम ये क्या बाते ले कर बैठ गई। बच्चों को बिगाडनें का काम कर रही हो। बेकार की बातों को ले कर बैठ गई हो।
यह सुनते ही अकी नानी के कान में धीरे से बोली। नानी मम्मी को थोड़ा समझाऔ। हमेशा डांटते रहती है। नानी हंसने लगी। डांट में भी प्यार होता है। अकी को चूमते हुए नानी ने लाड से कहा।
छुट्टियों में अकी को बेफ्रिक देख कर नानी ने स्नेह से कहा, कि बच्चों के कुदरती विकास के लिए जरूरी है कि उन्हे पूरा समय मिले कि पढने के साथ खेलने का मौका मिले। क्या तू भूल गई, किस तरह बचपन में तू पडोस की लडकियों के साथ खेलती थी और पूरा मुहल्ला शोर से सर पर उठाती थी। हम अपना बचपन भूल जाते है कि हमने भी शैतानिया की थी। बच्चों पर आदर्श थोपते है, जो एक दम अनुचित है।
मां तुम तो भाषण पर आ गई हो। स्नेह ने तुनक कर कहा।
तुम खुद देखो कि अकी आजकल कितनी खुश है, जितने दिन स्कूल गई, एकदम थकी सी रहती थी, अब एकदम चुस्त रहती है। इसलिए कहती हूं कि अनुभव की बात मान ले।
मम्मी तुम और अनु एक जैसे हो, एक दूसरे की हां में हां मिलाते रहते हो। हमेशा अपनी मनमानी करते हो, मेरी भावनाऔ की तरफ सोचते भी नही हो। आखिर आपने मुझे इतना क्यों पढ़ाया। एमबीए के बाद शादी कर दी। मेरा कैरियर भी नही बनने दिया। मुश्किल से एक साल भी नौकरी नही की, शादी हो गई। शादी के बाद शहर बदल गया, फिर अकी के जन्म के कारण नौकरी नही की। अकी स्कूल जाने लगी, तब बडी़ मुश्किल से अनु को राजी किया। तीन चार साल ही नौकरी की, अब फिर छोटा काका के जन्म पर नौकरी छोड़नी पर रही है।
स्नेह एक बात तुम समझ लो, परिवार के लालन पालन और बच्चों में अच्छी आदतो की नींव डालने के लिए मां बाप को अपनी कई इच्छायों को मारना पड़ता है। परिवार को सही तरीके से पालना नौकरी करने से अधिक कठिन हैं। जोगी बनना असान है, लेकिन गृहस्थ बनना बहुत मुश्किल है। गृहस्थी की कठिन राह से परेशान लोग सन्यास लेते है, लेकिन दर दर भटकने पर भी ना तो शान्ति मिलती है और ना ही सुख। कठिन गृहस्थी में ही सच्चा सुख है।
स्नेह मां के आगे निरूतर हो गई और आकृति को घर के पास स्कूल में दाखिले को राजी हो गई।  
सर्दियों की छुट्टियों में वर्मा जी की लड़की भी अपने परिवार के साथ रहने आ गई। वर्मा जी की नाती वृन्दा आकृति की हम उम्र थी। दोनों सारा दिन एक साथ धमा चैकड़ी करती रहती और नानी स्नेह छोटा काका और वर्मा परिवार के साथ सोसाइटी के लॉन में धूप सेंकते। एक दिन धूप सेंकते वर्मा जी ने अपनी लड़की को सलाह दी कि वह भी वृन्दा को पास के स्कूल में दाखिल करवा दे। वों नानी के गुण गाने लगे कि उन्होने स्नेह को राजी कर लिया है आकृति के स्कूल बदलने के लिए।
स्नेह मुंह बना कर बोली, “क्या अंकल आप भी स्कूल पुराण की कथा लेकर बैठ गए। बड़ी मुश्किल से तो नानी की कथा बंद की है।
बेटे इस का जिक्र बहुत जरूरी है। देखो जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब गर्मियों और सर्दियों में स्कूल का अलग समय होता था। गर्मी में सुबह सात बजे और सर्दियों में दस बजे स्कूल लगता था। गर्मी में बारह बजे घर वापिस आ जाते थे और सर्दी में धूप में बैठ कर पड़ते थे।
अच्छा, वृन्दा ने हैरान हो कर पूछा। आप कुर्सी मेज क्लास से रोज बाहर लाते थे और फिर अन्दर करते थे। अपने सर पर उठाते थे, क्या नाना जी।
नहीं बेटे, हमारे समय तो मेज कुर्सी नही होते थे। जमीन पर दरी बिछा कर बैठते थे। धूप निकलते ही मास्टर जी हुक्म देते थे और सारे बच्चे फटाफट दरियां उठा कर क्लास रूम के बाहर धूप में बैठ जाते थे। पंखे भी नही होते थे, जब गर्मी लगती थी, तब भी बाहर बैठ जाते थे। मजे की बात तो बरसातों में होती थी। स्कूल की छत टपकती थी। जिस दिन बारिश होती थी, उस दिन छुट्टी हो जाती थी। मास्टर जी कहते थे, रेनी डे, होलीडे। बच्चों आज की छुट्टी।
यह सुन कर वृन्दा और आकृति जोर जोर से हंसने लगी, रेनी डे, होलीडे, कहते कहते और हंसते हंसते दोनों लोटपोट हो गई। दोनों के पेट में बल पड गये।
अच्छा और सुनो, जब सुबह बारिश होती थी, तब हम खुद ही स्कूल नही जाते थे।वर्मा अंकल की बातों पर अब बच्चों के साथ सभी हंसने लगे। अब अनुभव कहने लगा, “वर्मा अंकल के बाद मेरी भी सुनो, मेरा स्कूल तो दो शिफ्टों में लगता था। छटी क्लास तक दूसरी शिफ्ट में स्कूल लगता था। खाना खा कर एक बजे स्कूल जाते थे, छः बजे वापिस आते थे, मजे में सुबह सात आठ बजे उठते थे, सुबह स्कूल जाने की कोई जल्दी नही होती थी। आकृति और वृन्दा को स्कूल की बातों में बहुत अधिक रस आ रहा था और हंसते हंसते लोटपोट होती जा रही थी।
अकी के छुट्टियों में इतना अधिक खुश देख कर स्नेह ने पास के स्कूल का महत्व समझा और फाइनल परीक्षा के बाद नये सत्र में घर के पास स्कूल में दाखिला अकी का करा दिया। घर से स्कूल का पैदल रास्ता सिर्फ पांच मिन्ट का था। दो दिनों में अकी इतनी अधिक खुश हुई और स्नेह से कहा, “मम्मी यह स्कूल बहुत अच्छा है, मेरी दो दोस्त साथ वाली सोसाइटी में रहती है, मम्मी आपको मालूम है, वो साइकिल पर स्कूल आती हैं, मुझे भी साइकिल ले दो, दो मिन्टों में स्कूल पहुंच जाउगीं। अनुभव नें आकृति को साइकिल ले दी। अब अकी को कोई टेंशन थी, ना तो सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाने की और ना आने जानें की, ना ही स्कूल बस मिस हो जाने की। सारा दिन वह खुश रहती थी। होमवर्क करने के बाद काफी समय छोटा काका के साथ खेलती और बेफिक्र चहकती रहती। छः महीनों मे एकदम लम्बा कद पा गई आकृति को देख कर स्नेह खुशी से फूली नहीं समाती थी, जो अकी कल तक सारा दिन थकी थकी रहती थी, आज वह कहने लगी, मम्मी मुझे चाय बनाना सिखाऔ, मैं आपको सुबह बैड टी पिलाया करूंगी। सुन कर स्नेह को नानी की बातें बारबार याद आती, बच्चों के बहुमुंखी विकास के लिए उनका बेफिक्र होना बहुत जरूरी है, उन पर उनकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए। बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी होती है। 

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...