Sunday, March 02, 2014

रिटायरमेंट


चैक पर हस्ताक्षर करने के बाद हंसराज ने चीफ इंजीनियर शिवनारायण को कहा इसे फौरन नई मशीनों के आर्डर के साथ तुम खुद सप्लायर के पास जाऔ। यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि जितनी जल्दी हो सके, नई मशीनें फैक्टरी में लग जानी चाहिए और उस समय तक पुरानी मशीनों को रिपेयर करके काम किजिए। इस बात का ख्याल रहे कि प्रोडक्शन और क्वालिटी पर कोई आंच नही आनी चाहिए। अभी मैं जा रहा हूं लेकिन यह मत समझना कि मैं रिटायर हो गया हूं। कल सुबह से मैं रोज फैक्टरी आ रहा हूं और उसी पुराने तरीके  से काम होगा। कुछ दिनों के लिए मैंने आराम क्या कर लिया, तुमने तो मुझे रिटायर कर दिया। एक जोर से डांट लगा कर हंसराज कार में बैठ गए। इंजीनियर महोदय केवल जी जी कर के रह गये। कार में बैठ कर हंसराज केवल हल्के से मुस्करा कर अपने आप से वार्तालाप करने लगे हांलाकि इसमे इंजीनियर का कोई दोष नही है, लेकिन यही दुनिया का दस्तूर है, करे कोई और भरे कोई। किसी को तो बली का बकरा बनना पढ़ता है, अपने दो बेटों को कुछ नही कह सके, लेकिन इंजीनियर शिवनारायण पर बुरी तरह बरस पढ़े। हंसराज ने अपना चश्मा आंखो से उतार कर कोट की जेब में रख लिया और आंखे मूंद कर अतीत में खो गए।

बीस साल पहले की बातें चलचित्र की तरह एक के बाद एक करके स्पष्ट होती चली गई। पत्नी और दो छोटे छोटे बेटों के साथ नवयुग सिटी में रोजगार की तलाश में चंद पैसो लेकिन मजबूत ईरादो के साथ आए थे, एक छोटे से कारखाने मे केवल एक छोटी सी मशीन के साथ काम शुरू किया। मेहनत के बलबूते आज चार कारखानों के मालिक बन चुके थे। इस तरह हंसराज मलिक ने मलिक इंडस्ट्रीज की शुरूआत की। मलिक इंडस्ट्रीज ने अपनी गुणवक्ता के कारण बाजार में लगभग एकाधिकार कर लिया था। बाजार में सामान का रेट और मानक हंसराज मलिक ही करते थे। बाकी सब केवल अनुयायी बन कर रह गये थे। एक तरह से पूरे बाजार में मलिक इंडस्ट्रीज का एकाधिकार था। इतना सब होते हुए भी हंसराज मलिक घमंड से कोसो दूर थे। बेहद नम्र स्वाभाव के, एक साधारण वयक्तित्व, शख्शियत मधय्म कद काठी के जो सबकी सहायता के लिये हमेशा तत्पर रहते थे। अपने स्टाफ और कर्मचारियों की हमेशा जरुरत पर मदद के लिए तत्पर रहते थे, कभी एडवांस दे कर और कभी इनाम दे कर। कोई भी स्टाफ, कर्मचारी या डीलर कभी भी उनके ऑफिस में मिल सकता था।

हंसराज मलिक के बेटे पढलिख कर बढे हो गये और धीरे धीरे मलिक साहब नें व्यापार की बागडोर अपने बेटों को सौंप दी, और खुद सामाजिक कार्यो में समय बिताने लगे। महीने में एक दो बार ही ऑफिस में जाते थे। लेकिन कुदरत का नियम कुछ उलटा करने का होता है, उनके दो पुत्र सौरभ और वैभव का स्वाभाव अपने पिता से एकदम विपरीत। उग्र स्वाभाव और पैसे का घमंड। पिता सिर्फ बाहरवी पास बेहद नम्र लेकिन इंजीनियरिंग और मैनेंजमेंट की डिग्ररियों से लैस उग्र दोनो बेटे तू तडाक और गाली देकर स्टाफ और कर्मचारियों से बात करते थे। शायद मलिक साहब का बचपन गरीबी और अभाव में बीता, इसलिए अपने बच्चों को लाड प्यार से पाला और हर इच्छा पूरी की और यह प्यार बच्चों को उग्र बना गया। किसी के आगे झुकने में अपना अपमान समझते थे।     

मलिक साहब का एक उसूल था कि अपने कम्पनी के बने सामान की क्वालिटी दूसरी कम्पनियों से बेहतर रखनी है। लेकिन बच्चों ने क्वालिटी से समझोता करना शुरु किया। जब कम्पनी का प्रोडक्ट अपने नाम से बिक रहा है, तब क्वालिटी को उन्नीस करके प्रोडक्शन को बढाने में लग गये। धीरे धीरे कम्पनी की साख पर सवालिया निशान उठने लगे। डीलर खराब क्वालिटी के सामान का हर्जाना मांगने लगे, लेकिन बच्चों ने क्योंकि नीचे झुकना सीखा नही था, हर्जाना देने में अपनी तौहीन समझी और साफ मना कर दिया। रामदीन मलिक कम्पनी का सबसे प्रमुख डीलर था। जब वैभव और सौरभ से इस समस्या का कोई समाधान उसे नही मिला, तब एक दिन हंसराज मलिक से बात करने की सोची, क्योंकि रामदीन मलिक कम्पनी का पहला ग्राहक था और आज सबसे बडा डीलर। रामदीन और हंसराज एक दूसरे से बहुत बेतकल्लुख थे। हम उम्र और एक दूसरे के साथ काम करने के कारण काफी खुलकर दोनों की बातचीत हुआ करती थी।

सर्दियों के दिन थे। पूरा सप्ताह धूप नही निकली थी। ठंड कुछ ज्यादा ही थी। आज सूर्य देव कुछ प्रसन्न मूड में लग रहे थे, तभी रुक रुक कर निकलते और दर्शन देकर चले जाते। बीच बीच में आती धूप एक राहत दे रही थी और चमकदार धूप की आशा में हंसराज मलिक अपनी कोठी के लॉन में बैठे पकोडों के साथ चाय की चुस्कियां ले कर मौसम का भरपूर आनन्द उठा रहे थे। तभी नौकर कॉर्डलेस फोन के साथ आया।
साब जी, फोन है।
किसका है।
रामदीन साब का है।
हंसराज ने नौकर से फोन लिया। बोल राम के बच्चे, कैसा है तू, बडे दिन बाद तेरी आवाज सुन रहा हूं। कहां मर गया था। फटाफट  राइफल की गोलियों की तरह सवाल दाग दिये।
तेरी नगरी में शहीद हो गया हूं, मलिक, अफसोस मेरे जनाजे पर भी तू नहीं आया।
आ जा यहां पर, पकोडे़ खा कर शहीद होने में ज्यादा मजा है। हंसराज ने चुटकी ली।
रामदीन के स्वर में उदासी थी, “चल तेरी तमन्ना भी पूरी कर देता हूं। बोल कहां मिलेगा।
आ जा घर पर, एक साथ लंच करते हैं।

ठीक दोपहर के एक बजे रामदीन हंसराज मलिक की कोठी पहुंच गया। सूर्य देव अब प्रसन्न मूड में धूप बिखरा चुके थे और हंसराज खिली हुई धूप का भरपूर आनन्द लेते हुए अभी भी लॉन में बैठे थे।
तू मूर्ख ही रहेगा, अकेला भागता हुआ चला आया, भाभी को भी नहीं लाया।कहते हुए हंसराज ने फोन रामदीन को थमा दिया, “तू फटाफट फोन कर, मैं ड्राइवर को भेजता हूं।
रामदीन ने कुर्सी खींचीं और बैठते हुए कहा, “रहने दे, आज अकेले में तेरे से बात करनी है, परिवार के साथ फुरसत में बैठ कर बतियाएगे।
मुझे तो फुरसत ही फुरसत ही है, अब तू भी रिटारमेंट ले, फिर दोनो यारों को फुरसत ही फुरसत।
हंस आज मैं मजाक के मूड में नही हूं, तेरे से एक सीरियस बात करनी है।
तेरे लिये जान भी हाजिर है, बोलो मेरी सरकार।
मजाक बंद कर और मेरी बात ध्यान से सुन।
रामदीन की बात सुन कर हंसराज गंभीर हो गया। तुझे यह बात पहले करनी चाहिए थी। यह नौबत ही नही आती। उसने फौरन वैभव को फोन किया।
बेटे रात को इस विषय में बात करेगें, लेकिन अभी तुरन्त रामदीन अंकल को खराब माल का हर्जाना दो। इसके बाद चीफ अकांउनटेंट वर्मा को फोन पर कहा कि आधे घंटे में रामदीन का पूरा हिसाब किताब लेकर कोठी चले आऔ। तीसरा फोन चीफ इंजीनियर शिवनारायण को लगाया और डाटते हुए कहा, शिव सामान की क्वालिटी खराब किस से पूछ कर की और क्वालिटी कंट्रोल पर ध्यान क्यों नही द रहे हो। इतनी बडी बात हो गई और तुमने मुझे बताना भी ठीक नही समझा। फौरन क्वालिटी सुपर वाइजर चंदरपाल के साथ कोठी पर आऔ।

हंसराज मलिक के फोनों से पूरी मलिक कम्पनी में भूचाल आ गया। सभी एक घंटे के अंदर मलिक साहब के आगे उपस्थित हो गये। वैभव और सौरभ भी बात की गंभीरता को भांप कर घर आ गये। हंसराज शिवनारायण और चंदरपाल पर बरस पड़े। इतने पुराने आदमी हो, खराब क्वालिटी के सामान बनाने से पहले मुझे बताने की कोई आवश्कता भी नही समझी। मेरे बनाए हुए नियमों को तुमने कैसे तोड़ा। वैभव और सौरभ को सामने देख कर उन दोनों की कुछ कहने की हिम्मत नही हो रही थी, कि कैसे बताए कि उन दोनों के कहने पर ही अधिक प्रोडक्शन के लिए ही क्वालिटी को हल्का किया था। हंसराज के तीव्र और उग्र तेवर देख कर वैभव ने कहा।
पापा आप तो छोटी सी बात का बतंगर बना रहो हो। सब की पेशी खामख्वाह कर दी।
देखो यह एक छोटी बात नही है, हमारी कम्पनी की साख का प्रश्न है। जो एक दम गलत है। प्रोडक्शन अधिक करने के लिए हमें सोचना पड़ेगा। लेकिन रामदीन को पूरा हर्जाना दे दो। हंसराज ने वर्मा को हिदायत दी और शिवनारायण और चंदरपाल को क्वालिटी बेहतर करने के आदेश दे कर रवाना किया।
अच्छा हंस अब मैं भी चलता हूं।रामदीन ने हंसराज को गंभीर देख कर जाने की इजाजत ली।
ठीक है राम, इस इतवार को एक साथ लंच पक्का। भाभी के साथ आना।
मंजूर मेरे आका। रामदीन ने गंभीर वातावरण को समाप्त करने के लिए फुलझड़ी छोड़ी।
दोनो मित्रों की तरह गले मिल कर जुदा हुए।

रामदीन के जाने के पश्चात वैभव हंसराज पर बिगड़ पड़ा। पापा आपने पूरे स्टाफ के आगे हमारी एक बात नहीं सुनी। क्या जरुरत थी रामदीन को हर्जाना देने की। वो सारी मार्किट में बताता फिरेगा कि हमारा माल खराब था। कम से कम हमारे से पूछ लिया होता।
जैसा तुम समझते हो, रामदीन वैसा नही है। हम दोनों ने एक साथ काम शुरू किया था। मार्किट में किसी को भनक भी नही होगी कि वो हमारे से खराब माल का हर्जाना ले गया है। लेकिन मुझे यह बताऔ कि क्या खराब माल सिर्फ रामदीन को बेचा था, या किसी और को भी बेचा है। हंसराज ने बच्चो से पूछा।
आप को रामदीन ने भड़का दिया है। माल में कोई खराबी नही है। अगले दो साल के लिए ऑर्डर बुक है, हमें अपना प्रोडक्शन बडाना है।
यह अच्छी खुशखबरी है कि दो साल के ऑर्डर बुक है, यही मौका है, हमें और मशीनें लगानी चाहिए। सोमवार को मैनेजर मीटिंग रखो, उस में सबके साथ विचार विमर्श करना है।
पापा इस बात के लिए मीटिंग की क्या जरूरत है। हमनें आपस में जो निर्णय लेना है, सरकुलर भेज कर सबको बता देगें, आपने स्टाफ को सर पर चढा रखा है। अभी और मशीनों मे निवेश की कोई जरूरत नही है। बेकार में रकम फसानें की अभी कोई जरूरत नही। समय आने पर इस विषय में बात करेगें। अभी क्लब भी जाना है। कह कर हंसराज के दोनों बेटे वैभव और सौरभ गाड़ी में बैठ कर क्लब के लिए रवाना हो गए।
क्लब जरूर जाऔ लेकिन मेरी एक बात समझ लो कि किसी भी हालात में क्वालिटी में समझोता या कम्प्रोमाइज नही करना है। हंसराज ने बेटो को हिदायत दी। बेटों के क्लब जाने के बाद हंसराज पूरे हालात का अवलोकन करने लगा कि बेटे उसकी बात नही मान रहे है और जो रामदीन ने बताया, वह गंभीर मसला है, आखिर कम्पनी में क्या चल रहा है, उसे खुद ही पता करना पड़ेगा। अगले दिन सुबह नाश्ता करने के फौरन बाद हंसराज ने ड्राईवर को फैक्टरी नम्बर 1 चलने को कहा। मर्सिडीज, होन्डा, टोएटा कारों के काफिले से अलग बीस साल पुरानी मारुती 800 निकलवाई। यह पहली कार हंसराज की चहेती थी, जो बडी हिफाजत से संभाल के रखी हुई थी, इसके बाद कई कारें खरीदी और बेची गई, लेकिन यह कार रोज धुलकर सज संवर के तैयार होती है, स्टार्ट करके हर रोज कार की खैरियत देखी जाती है और फिर खूबसूरत से तिरपाल से ढकी जाती है। कार को रामप्यारी की पदवी भी मिल गई थी। जिस ईमानदारी से मलिक इंडस्ट्रीज को पाला पोसा, उसी ईमानदारी से रामप्यारी को रखा हुआ है। जैसे रामप्यारी फैक्टरी के गेट पर पहुंची, आराम से बैठे सिक्युरिटी गार्ड हरकत में आ गए, क्योंकि वैभव और सौरभ ने अपना ऑफिस फैक्टरी नम्बर 4 में बना रखा था, यहां कम ही आते थे, जहां मालिक कम आते है, वर्कर बेखौफ रहते हैं। गार्ड आराम से बैठे बीड़ी के कश लगाते हुए गप्पें ठोंक रहे थे। गार्ड ने मुश्तैदी से फौजी स्यलूट लगाया। फैक्टरी गेट खुलते ही रामप्यारी हंसराज के पुराने ऑफिस के आगे रूकी। हंसराज कार से उतर कर अपने ऑफिस जाने के बजाए चीफ क्वालिटी कंट्रोलर चंदरपाल के केबिन की तरफ चल पड़े। चंदरपाल माल की क्वालिटी के बारे में बात करने चीफ इंजीनियर शिवनारायण के केबिन में था। हंसराज चंदरपाल को न पा कर शिवनारायण के केबिन की तरफ बड़े। केबिन के दरवाजे पर ठिठक गये क्योंकि दोनों क्वालिटी के बारे में बात कर रहे थे।
इस बार की क्वालिटी तो पहले से भी खराब है, क्वालिटी सुधारो शिव जी। मैं इस माल को कैसे पास कर सकता हूं। आपको मालूम है, कि उस दिन सेठजी कोठी पर इस बारे में कितने गरम थे।
चंदरपाल जी जैसे पहले पास करते थे, वैसे कर दो।
इस बार बिल्कुल नही करूंगा। सेठजी से बात करूंगा। उनके सिद्धातों को अब चकनाचूर नही होने दूंगा।
पहले छोटे सेठों से बात करलो।
क्या कर लेगें, ज्यादा से ज्यादा नौकरी से निकाल देगें। कोई चिन्ता नही।  तीन साल बाद रिटायर होना है, समझ लेगें उम्र बड़ गई। लेकिन आप डरपोक हो। किस बात की चिन्ता करते हो।
तुम्हारे जैसा निडर नही हूं, अभी बच्चे पालने है, तुमने तो लड़की की शादी कर दी, मैनें अभी करनी है।
आप पक्के बनिये हो, एक एक पैसा वसूलना जानते हो।
तभी हंसराज केबिन में दाखिल हुए। क्या बातें कर रहे हो। सेठजी को अचानक देखकर दोनो भोच्चके अपनी कुर्सियों से उठ खड़े हुए। कांपती सी आवाज में बोले, “गुड मॉर्निग सेठजी।
मॉर्निग तो गुड है, सर्दियों मे धूप निकल आए तो मॉर्निग तो क्या सारा दिन गुड ही रहता है। केबिन बहुत ढंडा है, बाहर धूप में बैठते हैं।
धूप में कुर्सियां लगाई गई।
अब बात में गर्मी आएगी।
शिव यह क्वालिटी का क्या चक्कर है। मेरे बनाए हुए क्वालिटी सिद्धातों को कैसे तोडा।
सेठजी हम तो छोटे सेठजी के आदेश का पालन कर रहे हैं। एक तो अधिक प्रोडक्शन के लिये क्वालिटी पर समझोता किया जा रहा है और ऊपर से इस साल वार्षिक रख रखाव को टाल दिया है, जिसके कारण क्वालिटी खराब हो रही है। कुछ मशीनों के पुरजे बदलने जरूरी हैं। मशीन नम्बर पांच और आठ बहुत खराब हालत में हैं, उनकी जगह हमें नई मशीनें खरीदनी चाहिए।
दूसरी फैक्टरियों में क्या हालात हैं। हंसराज ने बात को काटते हुए पूछा।
फैक्टरी नम्बर दो और तीन में भी कुछ कुछ ऐसा ही समझना चाहिए। सिर्फ फैक्टरी नम्बर चार सही चल रही हैं। शिव ने बताया।
अच्छा तुम मशीनों की रिपेयरिंग का कार्यक्रम बनायों। मैं खुद सब कुछ देखता हूं। अभी बाते चल ही रही थी, तभी बहुत जोर से आवाज आई और शिव मशीनों की तरफ भागा। जैसा उसे अंदेशा था, वही घट गया। मशीन नम्बर पांच का मुख्य पुर्जा टूट गया और एक एक करके सभी मशीनों को रोकना पड़ा। पूरा प्रोडक्शन रूक गया। शिवनारायण अपनी पूरी टाम के साथ बैठ कर मशीनों का अवलोकन करने लगा। कुछ देर बाद शिव ने आकर सूचना दी कि मशीन के पुर्जे बदलने पडेगें, लेकिन वो स्टाक में नही है। वार्षिक रख रखाव टालने के कारण उन पुर्जो को मंगाया ही नही था।
कितने दिनों में पुर्जे आएगें।
कम से कम दो महीने लग जाएगें।
क्या कहते हो, दो महीने। यानी के दो महीने फैक्टरी बंद। कम्पनी का पूरा नाम खराब करनें में कोई कसर नहीं छोडोगे। हंसराज अधिक क्रोधित हो गए। मैं ऐसा नही होने दूंगा। शिव तुम अभी नये पुर्जो का ऑर्डर दो। खराब पुर्जो को रिपेयर करवा के मशीनों को एक दो दिनों में चालू करो।
रिपेयर के बाद मशीन सिर्फ दो दिन चली। इस बार हंसराज ने शिव से पूछा, “तुम्हे मालूम है कि जब यह फैक्टरी लगी थी तब रामनरेश की कंसलटेंसी ली थी, आजकल वह कहां है, काफी वर्षो से उससे मुलाकात नही हुई। वह जरूर इस समस्या का हल निकालेगा।
शिव ने डायरी निकाली, “सेठजी फोन नम्बर तो पुराने है, लेकिन कृष्णा नगर में मकान है, सुना है, कि आजकल उतराखंड में नई फैक्टरियां लग रही है, वहीं कंसलटेंसी कर रहे है।
कोई बात नही, किसी को उसके घर भेजो। उसका टेलीफोन नम्बर तो जरूर मिलेगा। मोबाइल नम्बर जरूर होगा। चंदरपाल, सुनो तुम जाऔ, क्योकि तुम उसको जानते हो।
हां सेठजी, उसका मकान मैंने देखा हुआ है। कह कर चंदरपाल जल्दी से निकल पडा। रामनरेश घर पर लंच के लिए आया हुआ था। चंदरपाल को उसने पहचान लिया। क्या हाल है, चंदरपाल, आजकल कहां हो।
बस आप का आर्शीवाद है, सब खैरियत है, वहीं मलिक इंड्रस्टीज में टाइमपास कर रहे हैं। आपसे थोड़ा सा काम है, सेठजी बात करना चाहते है, फोन मिला देता हूं।
हां भई बहुत साल हो गये हैं तुम्हारे सेठ से बात किए हुए। चंदरपाल ने मोबाइल से फोन लगाया और रामनरेश को थमा दिया। भई हंस किस गुफा में छुपा रहता है, पुराने दोस्तों को भूल गया लगता है। हुक्म करो मेरे आका।
सुना है, बडा आदमी बन गया है, उतराखंड में बडी बडी फैक्टरियां लगवा दी, अब हम जैसे छोटे दोस्तो को भूल गया है।हंसराज ने मजाक किया। अच्छा एक बात जिसके लिए चंदरपाल को भेजा है, कुछ मशीनें चेक करवानी है, आजा अभी, शाम का नास्ता एक साथ।
कल सुबह आता हूं, अभी जरा दांतो के डाक्टर के पास जाना है, कल रात से दांत दुख रहे है, पूरी रात सो नही सका। तडप तडप के रात काटी है। यार यह दांत दर्द साले किसी दुश्मन को भी न दे। फिर्क मत कर, यार का हुक्म सर आंखो पे, सुबह ठीक नौ बजे फैक्टरी पहुंच जाऊगां।
अगले दिन वायदे के मुताबिक रामनरेश ने फैक्टरी में मशीनों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के पश्चात रामनरेश ने हंसराज से कहा, “यार तेरी फैक्टरी में मशीनों की यह दुर्गति मैं सोच भी नही सकता, तुम एैसे तो कभी नही थे, अपनी जान से अधिक प्यारी होती थी तुम्हे मशीनें।
रामनरेश की बाते सुन कर हंसराज पानी पानी हो गया, कि किस मुंह से बताये कि उसके अपने बेटे ही उसके सिद्धांतों की धजियां उडा रहे है।  “खैर इन बातो को छोड, अब क्या करना है, यह बता।
हंस एक तो कुछ मशीनों को रिटायर करके नई मशीनों का आर्डर कर, लेकिन छः आठ महीने लग जाएगे, मशीनो को आने में, तब तक पुर्जो को बदलना पड़ेगा, लेकिन पुर्जो का आर्डर कालीचरण वर्कशाप को देना। सस्ते भी मिल जाएगे, लेकिन उनका भरोसा नही। क्वालिटी केवल कालीचरण ही दे सकता है। मैं कल उतराखंड जा रहा हूं, दो महीनों के लिए, लेकिन कोई बात है, तब मेरे मोबाइल पर कानटेक्ट करना।

हंसराज ने शिवनारायण के साथ वैभव और सौरभ को खास हिदायत दी कि रामनरेश के बताए उपायो पर अमल करे, लेकिन पर्चेस डिपार्टमेंट का हैड तिलकराज बेहद चापलूस और रिश्वतखोर था, जहां से उसे अधिक कमीशन मिलती, वहीं से सामान खरीदा जाता। छोटे सेठों को उसने अपनी मुठ्ठी में कर रखा था। इस बार उसने वैभव और सौरभ के कान भर दिये कि कालीचरण से रामनरेश की सेटिंग है, रामनरेश को कालीचरण कमीशन देता है। वहां से पुर्जे बनवाने की कोई जरूरत नही है, दूसरी बहुत सारी वर्कशाप है, जहां से सस्ता और टिकाउ सामान मिल सकता है। अकसर यह देखा गया है कि मालिक हर जगह अपने चमचे छोड़ देता है, ताकि खुफिया जानकारी मिल सके और किसी वर्कर के खिलाफ वक्त पर इस्तेमाल की जा सके। दोनों वैभव और सौरभ को तिलकराज पर भरोसा था। उन दोनों ने रामनरेश की सलाह अनसुनी करके तिलकराज का रास्ता चुना, लेकिन पुर्जे दो चार दिन में खराब हो जाते। ऐसे करते हुए दो महीने बीत गए, मशीनें और खराब हो गई। एक दिन एक मशीन में बहुत जोर से धमाका हुआ और दो वर्करों को चोट लग गई। घायल कर्मचारियों को अस्पताल दाखिल कराया गया। दो दिनों के अन्तराल में तीन मशीनों में खराब पुर्जों के कारण धमाके हुए और कई कर्मचारी घायल हो गए। शिवनारायण काफी परेशान हो गये कि अब तो हंसराज को पूरी बात बतानी पड़ेगी, तभी तिलकराज ने वैभव और सौरभ को कहना शुरू कर दिया कि फैक्टरी में कुछ अनिष्ट हो रहा है, उसके पीछे किसी बुरी आत्मा का हाथ है और शुद्धी के लिये पूजा हवन इत्यादि की बहुत अधिक आवश्कता है। वैभव और सौरभ दोनों ने विमर्श किया कि पूजा करवानी चाहिए। आजकल हर जगह बिना पूजा के कुछ कार्य आरम्भ ही नही होता और हर व्यक्ति बिना भविष्य फल पढे घर से बाहर भी नही निकलता है। हर जगह वास्तुशात्र की धूम है। मशीनों की वास्तु के मुताबिक सेटिंग करानी पड़ेगी।

अब तो तिलकराज का हौसला बढ गया। सर जी, आपने डिम्पल कम्पनी का नाम तो सुना होगा। फैक्टरी बंद होने की नौबत आ गई थी, तब एक पहुंचे हुए वास्तुशात्री से सलाह लेकर पूरी फैक्टरी को नये सिरे से बनवाया, अब तो उनके पौ बारह हैं।तिलकराज ने आग में घी डाल दिया।
“”तिलक बिल्कुल ठीक कह रहा है, मैंने भी कई ऑफिस देखे है, जो एकदम नये सिरे से वास्तु के हिसाब से बने है। वैभव ने सौरभ से कहा।
हां ठीक बात है, पापा ने कभी इस बारे में नहीं सोचा। आज तो जमाना सिर्फ वास्तु का है। हमें शीघ्र ही एक अच्छे वास्तुशात्री से मिल कर उपाय कर लेना चाहिए। सौरभ ने हां मे हां मिलाई।
सर जी अगर इसमें टू इन वन हो जाए तब किसी बात की शंका शेष नही रहेगी, यदि एक ही व्यक्ति वास्तु और ज्योत्ष की महारत रखता हो। तिलक ने कहा।
क्या तुम ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हो। सौरभ ने पूछा।
सर जी बहुत विद्वान है, शास्त्री नगर के मंदिर में प्रमुख पंडित है। पंडित क्या सचमुच शास्त्री हैं। बस एक बार आप मिलेगें तो किसी दूसरे के बारे में सब भूल जाऐगें। कहें तो आपकी फोन पर बात करवां दूं। तिलक ने चमचागिरी को तेज करते हुए कहा।
हां, समय हैं तो बात करवाऔ। सौरभ की यह बात सुनते ही तिलक ने झट से शास्त्री जी का मोबाइल लगाया। शास्त्री जी, मैं तिलक।
हां वत्स इस समय कैसे कष्ट उठाया।दूसरी तरफ से शास्त्री जी बोले।
हमारे सेठ जी आप से मिलना चाहते हैं, बहुत जरूरी है, क्या आज समय आप निकाल सकेगें।
कुछ क्षण बाद शास्त्री जी बोले, “ठीक है वत्स कल ग्यारह बजे का समय उचित रहेगा।
ठीक है, शास्त्री जी मैं खुद आपको लेने आ जाऊंगा। फोन करने के बाद तिलक ने कहा, “यह काम अति शीघ्र हो जाए तो ठीक रहेगा। तिलक खुद शास्त्री नगर में रहता था, और शास्त्री जी उसके मोहल्ले के मंदिर में पुजारी थे। तिलक पूजा पाठ में बहुत अधिक विश्वास रखता था, उसकी पत्नी लगभग पूरा दिन ही मंदिर में रहती थी। शास्त्री जी की प्रसिद्धी फैलाने में तिलक का काफी हाथ था, जहां भी मौका मिलता, शास्त्री जी के गीत गाता थकता नही था। शास्त्री जी को मशहूरी और काम मिलता रहा। शास्त्री जी भी तिलक का पूरा ध्यान रखते थे। चंदे, चढावे और दान दक्षिणा का एक हिस्सा वे तिलक को देते। इस प्रकार तिलक और शास्त्री जी एक दूसरे के पूरक थे। अगले दिन ठीक ग्यारह बजे शास्त्री जी अपनी होन्डा सिटी कार में फैक्टरी पहुंचे। पूरी फैक्टरी का निरीक्षण करने के बाद वैभव और सौरभ के केबिन में अपना लैपटाप निकाला और कुछ गरणा के पश्चात बोले, “वत्स पूरी फैक्टरी बिना सोचे वात्सु के सिद्धांतो के विपरीत बनाई गई है, इसी कारण फैक्टरी में मशीनों का कष्ट रहेगा।
कुछ उपाय बताईए।वैभव नें हाथ जोड कर कहा।
वत्स हमारे शास्त्रो में हर संकट का निवारण है, यदि आप तैयार है, तब समाधान बताता हूं।
शास्त्री जी शुभ कार्य में देर नही होनी चाहिए।सौरभ ने कहा।
वत्स आप को अति शीघ्र यज्ञ करवाना होगा और वास्तु के हिसाब से मशीनों की दिशा बदलनी पड़ेगी। 

वैभव और सौरभ के राजी होने पर शास्त्री जी ने शुक्रवार के ग्यारह बजे मर्हुत निकाला। वत्स यज्ञ की सफलता के लिए जरूरी है, कि कार्य में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए, जब तक यज्ञ होगा, फैक्टरी के दरवाजे बंद रहने चाहिए, जो जहां होगा, वहीं रहेगा, कोई भी अंदर बाहर नही आएगा या जाएगा। यज्ञ का सारा सामान हम लाएगें ताकि उसमें किसी का अशुध हाथ न लग सके। इस महान यज्ञ की लागत और दक्षिणा दो लाख इक्कीस हजार होगी, जो आप को एडवांस में देनी होगी। यज्ञ सपन्न होने के बाद वास्तु शास्त्र के हिसाब से फैक्टरी में परिवर्तन के सुझाव दिए जाऐगें। आपको कुछ नही करना होगा। सब हम संभाल लेंगे। यज्ञ की रकम लेकर शास्त्री जी तो चले गए। तिलक की खुशी की कोई सीमा नही थी, क्योकि शास्त्री जी से बीस प्रतिशत कमीशन पहले ही तय हो चुकी थी। एक झेपी सी हंसी के साथ अपनी खुशी दबाते हुए तिलक ने पूछा,  “सर जी शास्त्री जी के बारे में क्या विचार हैं? खुद ही उत्तर देते हुए बोला। आप को अब कोई चिन्ता करने की जरूरत है। शास्त्री जी सब संभाल लेंगे।
लगता तो ऐसे ही है, शास्त्री जी बड़े हाईटेक है। लैपटाप लेकर काम करते हैं। वैभव ने सौरभ को इशारा किया।
यार हमारा लैपटाप तो पुराना हो गया है, शास्त्री जी का लैपटाप एक दम स्लिम नया लेटेस्ट माडल है। सौरभ बोला, “नया लैपटाप लेने के बाद तिलक मैं अपना पुराना लैपटाप तुम्हे दे दूंगा। तुम्हारे पास लैपटाप जरूर होना चाहिए, आजकल जमाना लैपटाप का है, हाईप्रोफाइल होने के लिए एकदम आधुनिक मोबाइल और लैपटाप होना जरूरी है।
यज्ञ की खबर सुन कर हंसराज ने बच्चो को कहा, “पूजा से मुझे कोई ऐतराज नही लेकिन पहले नयी मशीनों का आर्डर दे दो।
पापा पहले पूजा हो जाए। बच्चों ने हंसराज को कहा।
आखिर पूजा का दिन शुक्रवार आ गया। शास्त्री जी के चेले ने एक घंटा पहले आ कर पूजा की तैयारियां सपन्न की। ठीक ग्यारह बजे फैक्टरी के दरवाजे बंद कर दिए और पूजा आरम्भ की। पूजा की विधी और करने के तरीकों से सब मंत्र मुग्ध हो गये, कि ऐसी विधी से पूजा अब तक सिर्फ टीवी सीरियलो में ही देखी थी। दो घंटो की पूजा ने सबके मोह लिया, तभी शास्त्री जी ने शंख बजाया। शंख की ऐसी आवाज केवल टीवी सीरियल महाभारत में ही सुनी थी। सभी मंत्र मुग्ध हो कर पूजा में तल्लीन थे, जैसे ही एक बार और शास्त्री जी ने शंख बजाया, तभी एक मशीन के पुर्जे टूट गये। एक जोर से धमाका हुआ और तीव्र कम्पन और घरघराहट के साथ सारी मशीने रूक गई। हंसराज पूजा से उठे और आवाज दी शिव फटाफट देखो क्या हुआ।
एक मशीन टूट गई थी। शुक्र यह हुआ कि दो वर्करों को मामूली चोटें आई, जिन्हे प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल ले जाया गया। हंसराज शिवनारायण के साथ निरीक्षण करने लगे। शिव रामनरेश यदि शहर में है तो उसे फौरन बुलाऔ।
संजोग से रामनरेश शहर में थे जो कुछ समय बाद फैक्टरी में आ गए। मशीनों को बिगडते देख शास्त्री जी ने रूकना उचित नही समझा, कहीं बात उल्टी न गले पड़ जाए, इसलिए मौका पा कर वहां से खिसक लिए। क्योकि सभी मशीनों के निरीक्षण मे व्यस्त थे और शास्त्री जी को खिसकने का आराम से मौका मिल गया। क्योकि अब वास्तु की सलाह के लिए उचित समय नही था। रामनरेश ने आते ही शिकायत की हंस तू कंजूस कब से हो गया, मैनें तुझें ऐसा कभी नही देखा था।
क्या हुआ, नरेश, आज तो तेरे तेवर गरम है।
तुझे कहा था, कालीचरण वर्कशाप से पुर्जे बनवाना, लेकिन सस्ते के चक्कर में एक तो चार बार पुर्जे बनवाए, जिसका परिणाम अब तू देख रहा है साथ में पूरे बाजार में मुझे बदनाम कर दिया कि मैं कालीचरण से कमीशन लेता हूं। आखिर किस जन्म का बदला मुझसे ले रहा है।
रामनरेश की बात सुन कर हंसराज भौच्चका रह गया, लेकिन तुरन्त समझ गया कि यह करतूत तिलक की होगी। मौके की नजाकत समझते हुए उसने बात पलट कर रामनरेश से माफी मांगी और पूछा कि अब क्या करना चाहिए।
हंस जो बात मैंने पहले कही थी, वही दोहरा रहा हूं, नई मशीनों के लिए तुरन्त ऑर्डर दे दो। मशीनों को कम से कम आने में छः महीने लग जाएगे, तब तक कालीचरण से पुरजे बनवा लो। एक बात मैं तुम्हारे लाडलो से कहना चाहता हूं कि एक तो बिना किसी सबूत के किसी पर लांक्षण नही लगाने चाहिए। भगवान की कृपा से बाजार मे काफी गुडविल है, आज तक ईमानदारी और लगन से काम किया है तभी आज बासठ साल की उम्र में लोग मेरे पीछे घूमते है, कभी किसी के आगे काम का लिए चापलूसी नही की। और तुम मुझे बदनाम करके क्या हासिल कर लोगे। क्या तुम्हारी मशीनें ठीक हो गई। अच्छी क्वालिटी के पुर्जे लगाने के बदले पूजा और वास्तु के चक्कर में पड़ गए। मैं भी धार्मिक हूं, घर में एक छोटा सा मंदिर बना रखा है, सुबह ध्यान में बैठ कर पूजा भी करता हूं, लेकिन मैं सबसे पहले कर्म मे विश्वास रखता हूं। धर्म मे हर व्यक्ति की आस्था होती है, हर किसी में विश्वास करना चाहिए, लेकिन अंधविश्वास नही करना चाहिए। हम कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया उपदेश भूल जाते है, जिसमें सिर्फ कर्म करने को कहा है। कर्म करने से हम सब कतराते है। हमें शार्टकट के जरिए सफलता चाहिए, जिसका फायदा पूजा पाठ वास्तु वाले उठाते है। मैं सिर्फ एक बात तुमसे पूछना चाहता हूं, कि आज से बीस साल पहले हंसराज ने यह फैक्टरी लगाई थी। मैं उस समय भी सलाहकार था, हमने फैक्टरी एक्ट के नियमानुसार निर्माण किया और इसी फैक्टरी से लाभ कमा कर तीन और फैक्ट्ररियां लगाई। अगर हमने वास्तु के हिसाब से फैक्टरी का निर्माण नही किया तो बीस साल तक लगातार मुनाफा क्यों आया? एक बात मेरी सुनो कि लाभ और हानी, सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू है, जो बारी बारी से हमारी जिन्दगी में आते है। दुनिया का कोई भी आदमी इस से बच नही सकता। इतिहास गवाह है किसी भी अमीर या मशहूर आदमी की जिन्दगी देख लो, उतार चढाव, सुख और दुःख से कोई नही बच सकता है। जैसे साइकल का पहिया घूमता है, आदमी की जिन्दगी में सुख और दुःख घूमते है। अगर आपकी कार खराब हो जाए, तब आप उसको ठीक करवाएगें या उसको बेच कर नई कार खरीदेगें, क्या आपने कभी कार ठीक करवानें के लिए कोई पूजा की है। तब इन मशीनों की पूजा क्यो। मेरी मंशा कोई भाषण देने की नही है लेकिन तिलक के झूठे प्रचार से मुझे ठेस लगी, शायद इसी कारण कुछ अधिक बोल गया। कहते कहते रामनरेश की आंखे भर गई और अपना ब्रीफकेस उठा कर अपनी कार में बैठ कर रवाना हो गए।
वैभव और सौरभ पर क्या असर हुआ, यह तो पता नही, लेकिन हंसराज ने शिवनारायण को बुला कर कहा कि नई मशीनों के ऑर्डर फौरन तैयार करो। ऑर्डर तैयार होते खुद हंसराज ने ऑर्डर और अग्रिम राशी के चेक पर साइन किए और अपनी रामप्यारी में बैठ कर घर के लिए रवाना हुए।

साब जी घर आ गया है।ड्राईवर की आवाज सुनकर हंसराज अतीत से वर्तमान में आ गए और धीरे धीरे चलते हुए कोठी के लॉन में कुर्सी खींच कर बैठ कर ड्राईवर से कहा, “अंदर बीबी जी को कहना, चाय के साथ यहीं लान में आ जाए।      
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