Saturday, March 22, 2014

रोड सेंस और मोबाइल बाबा


चला जाता हूं किसी की धुन में गीत को गाते हुए राजेश खन्ना ओपन कार में पहाडी रास्तों में अपनी प्रेमिका तनूजा के हसीन सपने देखते हुए कार को चला रहे है। फिल्मी कलाकार तो कुछ भी कर सकते हैं। हम आम आदमी यानी के मैंगो मैन उनकी हरकतों को कापी करते है। पूरा हक बनता है अपने चहेते कलाकारों का अनुसरण करना। अजय देवगन, सलमान खान बाईक चलाते समय स्टंट कर सकते है। इन को छोडो, चुम्बन स्वामी इरमान हाशमी तो मल्लिका शेराहवत को साथ चिपकते हुए रोमान्स भी कर सकते है। हम उनकी नकल करें तो दुर्घटना तो स्वाभाविक है। फिल्मों में तो सडकों का खाली करवा लिया जाता है, परन्तु हमें तो भीड वाली सडकों पर बहुत ही ध्यान के साथ बाईक, कार चलानी पडती है। जरा सी चूक हुई तो ऐक्सीडेंट यानी के दुर्घटना, अर्थात जान पर भी बन सकती है।

भारत सरकार ने वाहन चलाने के नियम बना रखे है। नियमों के पालन न करने पर जुर्माना, चालान हो सकता है। आप को जेल हो सकती है, वाहन को जब्त किया जा सकता है। नियमों का पालन होता है। अब उनकी बात करते है, जिनके लिए कोई नियम कानून नही है।

सडके सिर्फ वाहनों के लिए ही नही, बल्कि पैदल चलने वालों की भी होती है। घर से बाहर आप हम निकलते है। चलना तो सडक पर ही है। वैसे तो पहले सरकार ने पटरियां बनाई, कि उन पर पैदल चला जाए। परन्तु दिल्ली शहर में पटरियों की हाल मालूम नही हैं, तो हम बता देते है। मार्किटों में पटरियां तो दुकानदारों के कब्जे में हैं। पूरा हक है उनका दुकान का सारा सामान पटरी पर डिसप्ले करने का। सरकारी तंत्र, पुलिस, मुनिसिपल तो रिश्वत लेकर आंखे मूंद लेते है। सरकार तो उनको पेंशन देती है, सैलरी तो दुकनदारों से लेते है, तो मना क्यों? फिर पटरी वाले भी तो दुकानदार होते है, उनसे भी सैलरी ले लो। उनका सामान सडक पर डिसप्ले होगा। अब तो सब की बल्ले बल्ले। नही नही सब की नही, पैदल कहां जाए?

अब एक नजर रिहाइशी कॉलोनियों की, बढती कारों की जनसंख्या ने पटरियां या तो तोड दी गई हैं, या फिर कारों ने उन पर स्थाई कब्जा कर लिया है।

अब आप बताए, पैदल कहां जाएं?   

एक प्रश्न है, सरकार आदमियों की जनसंख्या की बात करती है, छोटा परिवार होना चाहिए। परन्तु वाहनों की जनसंख्या पर कोई कुछ नही करता है। हर आदमी की पीछे कितने बाहन? चलो छोडो वाहन की जनसंख्या पर बात करनी, क्योंकि उसको सरकार नियंत्रित करने लगी तो वाहन उद्योग की सेहत बिगड जाएगी। बेरोजगारी जैसी समस्या हो सकती है। आखिर ऑटो इंडस्ट्री की सेहत का जो ख्याल रखना है। फिर पैदल कहं जाए। दिल्ली और दूसरे महानगरों में तो भगवान भरोसे चलते हैं।

नही हम पैदल दो भरोसों पर चलते है, पहले का तो जिक्र हो गया, भगवान जी का, दूसरा है मोबाइल जी। ठीक कहा और सही पढा आपने, मोबाइल जी। अब आप कहेगें कि रोड सेंस और मोबाइल बाबा का क्या क्नेंशन है? बिल्कुल है फुल फुल क्नेंशन है।

मोबाइल फोनों ने एक नई क्रांती को जन्म दिया है। वैसे तो बडे कमाल की चीज है, मोबाइल, एक छोटे से यन्त्र ने पूरी दुनिया को आपकी मुठ्ठी में सिमटा दिया है। कही भी बात कर लो। इंटरनेंट से स्मार्टफोन में कोई भी जानकारी प्राप्त कर लो। चीज तो अति उत्तम है। इस में कोई शक नही है। मुझे खुद भी बहुत पसंद है। चुटकी बजाते अपने ब्लाग में अपलोड कर लो। परन्तु आज के युवा को एक बीमारी है, वह बुरी लत है, चौबीसों घंटे मोबाइल बाबा के दरबार में हाजिरी देना। एक सैकन्ड के लिए भी दरबार नही छोडना चाहते। सुनने में तो यह भी तेजी से आ रहा है, कि फेसबुक, वहॉस्टएप और न जाने कौन कौन से मोबाइल बाबा के खास बन्दे हैं, जिनको आज का युवा छोडना ही नही चाहता और शादीके बाद भी उन्ही में रमा रहता है। नतीजा तलाक। यह भी ठीक है, या तो जीवन साथी चुन लो, या फिर मोबिइल बाबा का दरबार। तलाक को तो छोडो, दूसरा जीवन साथी मिल जाएगा, परन्तु यदि जीवन ही नही रहा तो क्या?

जी हां, बिल्कुल सही, मोबाइल ने जीवन को ही खतरे में डाल दिया है। रोड सेंस ही समाप्त हो गई है। घर से निकलते तो है, कही जाने के लिए, लेकिन मोबाइल से चिपके रहते हैं। सडक पर चल रहे हैं, या तो मोबाइल कान से ऐसे अटका होता है, जैसे कान में दर्द हो रहा हो, या फिर ईयर फोन कानों में अटका है, बाते हो रही हैं। नहीं हो रही तो, गीत संगीत का आनन्द उठाया जा रहा है। नही तो फोन में इंटरनेंट चालू है। ऊंगलियां मोबिइल में थिरक रही हैं। कोई होश नही, सडक पर चले जा रहे है, बेसुध, पीछे से कार का हॉर्न बज रहा है। सुनाई नही दे रहा है। कार वाला दुखी है, कि क्या करे। हॉर्न बजाने पर भी मटकते हुए चला जा रहा है। खैर कार से उतर कर मोतरमा से विनती की, कि थोडी साइड दे दे, तो कार चला लूं। मोतरमा ने ऐसा मुंह बनाया जैसे मैनें कोई अपराध कर लिया, उसको रास्ता देने की थोडी सी विनती करके। उसका अहसान हुआ, थोडा सा रास्ता दिया, तो कार को आगे बढाया। चलने की तो छोडो। सडक पार करते हुए भी मोबाइल बाबा के दरबार में मत्था जरूर टेकना है। मोबाइल से बाते हो रही है या फिर इंटरनेंट के लिए ऊंगलियां थिरकती रहती है। लाल से हरी बत्ती हो जाती है। कार के हॉर्न बजते रहते है, लेकिन जरा से टस से मस नही होते है। होले होले चलो मोरे साजना गीत की तर्ज पर होले होले ही चलना है। होले होले चलना तो अच्छी आदत है, लेकिन मोबाइल में मस्त हुए बिना। इंटरनेंट में कई वीडियो है, जहां मोबाइल के साथ मस्त सडक पार करते हुए भगवान ने ही तेजी से गुजरते वाहनों से बचाया। वैसे तो यह समस्या पूरे ब्रह्मांड में बुरी तरह से फैली है, परन्तु मैं अपने देश वासियों से तनिक अनुरोध करना चाहता हूं, कि समस्या से बचे। मोबाइल का इस्तेमाल अवश्य करें, क्योंकि इंटरनेट के जरिये हम अपनों से जुडे रहते है और देश विदेश की पूरी खबरे, जानकारी तुरन्त प्राप्त होती हैं। आप सडक पर चलते समय यदि मोबाइल बाबा के दर्शन करना चाहते है, तो एक साईड खडे हो कर मुराद पा सकते है, परन्तु चलते चलते मत कीजिए। बाबा दूसरे लोक का टिकट कटवा सकते है। बाबा का महिमा बहुत अपरमपार है।

वैसे क्या ख्याल है? वाहन चलाते समय मोबाइल बाबा के दरबार मथ्था टेकना दंडनीय अपराध है, पैदल चलने वालों के लिए भी कर दिया जाए तब.....?  जय मोबाइल बाबा की।


अत: समस्त बाबा भक्तों से बाबा के दरबार से ही अपील आई है। दुकानदार अपना सामान दुकान के अंदर रखे। पटरीवाले थोडी पटरी पैदल चलने के लिए सुरक्षित रखे। वाहन मालिक वाहनों को पटरी पर पार्क न करे और अंत में  पैदल चलते समय, सडक पार करते समय मोबाइल बाबा के दरबार में प्रवेश वर्जित है।
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नाराजगी

हवाई अड्डे पर समय से बहुत पहले पहुंच गया। जहाज के उड़ने में समय था। दुकानों में रखे सामान देखने लगा। चाहिए तो कुछ ...