Sunday, March 23, 2014

बच्चों की भावना


अकी, बेटा अकी, उठो, सुबह हो गई, स्कूल जाना है। उठो प्यारी अकी। अनुभव ने अपनी लाडली लडकी आकृति को सुबह सुबह जगाने के लिए आवाज लगानी शुरू की। हूं कह कर अकी ने करवट बदली और रजाई को कानों तक खींच लिया। अकी यह क्या, रजाई में अब और ज्यादा दुबक गई हो, उठो, स्कूल को देर हो जाएगी।
अच्छा पापा।कह कर अकी और अधिक रजाई में छुप गई।
यह क्या तुम अभी भी नही उठी, लगता है, रजाई को हटाना पडेगा।
अभी उठती हूं।
नही अकी, अब फटाफट रजाई से बाहर आ।कह कर अनुभव नें अकी की रजाई को हलके हलके धीरे से हटाना शुरू किया।
नही पापा, अभी उठती हूं। बंद आंखों में ही अकी ने कहा।
नही अकी अब देरी अच्छी नही, साढे पांच बज गये हैं, तुम्हे टायलेट में भी अच्छा टाइम लग जाता है।
यह सुन कर अकी ने धीरे से आंखें खोली, “अभी तो पापा रात है, अभी उठती हूं। अब अनुभव ने कुछ नही सुना और अकी को उठाया और टुथब्रश हाथ में देकर टायलेट में वाशबेसन के आगे खड़ा कर दिया। पापा ऊ हूं कह कर बेमन दांतो को ब्रश करने लगी। आंखों में उसके अभी भी नींद थी। सर्दियों में रातें लम्बी होने के कारण सुबह सात बजे के बाद ही उजाला होना शुरू होता है और ऊपर से घने कोहरे के कारण लगता ही नही कि सुबह हो गई। बस घड़ी देख कर दिनचर्या आरम्भ कर दो। आकृति की स्कूल बस साढे छः बजे आ जाती है। वैसे तो स्कूल आठ बजे लगता है, लेकिन घर से स्कूल की दूरी चौदह किलोमीटर तय करने में पूरा सवा घंटा बस लेती है। रास्ते में हर चार कदम पर बस स्टाप और बच्चों को लेते हुए सवा घंटा बच्चों को तोड़ देता है। एक तो सुबह सुबह आकृति की नींद नही खुलती और सवा घंटे की बस यात्रा स्कूल पहुंचने से पहले ही आकृति को थका देती थी। जैसे तैसे अकी स्कूल के लिए तैयार हुई। फ्लैट से बाहर निकलते आकृति ने पापा से कहा, “अभी तो रात है, दिन भी नही निकला। मैं आज स्कूल जल्दी क्यों जा रही हूं।
आज कोहरा बहुत अधिक है, इसलिए उजाला नही हुआ, एैसा लग रहा है, कि अभी रात है, लेकिन अकी, घड़ी देखो, पूरे साढे छः बज गये है। बस आती ही होगी।
कोहरा बहुत घना था। सात आठ फीट से आगे कुछ नजर नही आ रहा था। सड़क एक दम सुनसान थी, इक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे। सोसाइटी के गेट पर स्कूल बस आती थी। आज आकृती के अलावा और कोई बच्चा नही था। बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। उनकी एक सोच होती है। अपनी सोच और समझ के मुताबिक वे सोचते विचारते है, जिस को हम बड़े नही समझते है या समझने की कोशिश ही नही करते है। मस्तिष्क हम बडो़ में होता है तो वैसा मस्तिष्क बच्चों में भी होता है। हम बच्चों के मस्तिष्क को समझने की कोशिश नही करते है। यह जरूर है कि उनकी एक छोटी दुनिया होती है, जिसमें वे अपना ताना बाना बुनते है। उनकी बातों को बचपना कह कर टाल जाते है, लेकिन हमें उनकी बातों को ध्यान से समझना चाहिए। उन की भावनाऔ की कद्र करनी चाहिए।
घने कोहरे के बीच सर्द हवा के झोकों से आकृती के शरीर में झुरझिरी सी होती और इसी झुरझराहट ने उसकी नींद खोल दी। अपने बदन को ब्रेक डांस जैसे हिलाते डुलाते वह बोली पापा लगता है, आज बस नही आएगी।
आपको कैसे मालूम अकी।
देखो पापा, आज स्टाप पर कोई बच्चा नही आया है, आप स्कूल फोन करके मालूम करो, कहीं आज स्कूल में छुट्टी न हो?”
आज छुट्टी किस बात की होगी?”
ठंड की वजह से आज छुट्टी होगी। इसलिए आज कोई बच्चा नहीं आया। देखो पापा इसलिए अभी तक बस भी नही आई है।
बस कोहरे की वजह से लेट हो गई होगी।
पापा कल मोटी मैडम शकुन्तला राधा मैडम से बात कर रही थी कि ठंड और कोहरे के कारण सर्दियों की छुट्टियां जल्दी हो जाएगी।
जब स्कूल की छुट्टी होगी तो सब को मालूम हो जाएगा।
आप ने टीवी में न्यूज सुनी, शायद आज से छुट्टियां कर दी हैं।
नही, बेटे, अभी ऐसी कोई न्यूज नही है।
आकृति ही क्या सारे बच्चे ठंड में यही चाहते है, कि स्कूल बंद रहे, लेकिन स्कूल वाले इस बारे में कुछ सोचते है। चाहे ठंड पहले पड़े या बाद में, छुट्टियों की तारीखें पहले से तय कर लेते है। ठंड और कोहरे के कारण न तो छुट्टियां करते है ना स्कूल का टाइम बदलते है। सुबह के बजाए दोपहर का समय कर दें, लेकिन हम बच्चों की कोई नहीं सुनता है। सुबह सुबह इतनी ठंड में बच्चे कैसे उठे। आकृती मन मन में बडबड़ा रही थी।
अकी क्या सोच रही हो।
कुछ नही, पापा।
तभी दो तीन बच्चे स्टाप पर आ गये। सभी ठंड में कांप रहे थे, बच्चे आपस में बतियाने लगे कि मजा आ जाएगा, बस न आए। तभी एक बच्चे की मां ने अनुभव को सम्बोधित करते हुए कहा, “भाभी जी के क्या हाल है? अब तो डिलीवरी की तारीख नजदीक है। आप अकेले कैसे मैनेंज कर पाएगे। अकी की दादी या नानी को बुलवा लीजिए। वैसे कोई काम हो तो जरूर बताइए।
अकी की नानी आज दोपहर की ट्रेन से आ रही है। अनुभव ने उत्तर दिया।
पापा क्या नानी आ रही है? आपने मुझे क्यों नही बताया। अकी नाराज हो कर बोली।
तभी स्कूल बस ने हॉर्न बजाया, कोहरे के कारण रेंगती रफ्तार से बस चल रही थी। किसी को पता ही नही चला कि बस आ गई। बच्चे बस में बैठ गये, सभी पैरेन्ट ने बस ड्राइवर को बस धीरे चलाने की सलाह दी। बस ड्राइवर ने पलट के जवाब दिया कि यह भी कोई कहने की बात है। बच्चों की सुरक्षा सबसे पहले, इस कारण रेंगती रफ्तार से बस चला रहा हूं।
अनुभव बस के रवाना होने के बाद जल्दी से घर आया। स्नेह को लेबर पेन शुरू हो गई थी, “अनु डाक्टर को फोन करो। अब रहा नही जा रहा है। स्नेह के कहते ही अनुभव नें डाक्टर से बात की। डाक्टर ने फौरन अस्पताल आने की सलाह दी। फौरन फ्लेट को ताला लगा कर अनुभव कार में स्नेह को नर्सिग होम ले गया। डाक्टर ने चेकअप के बाद कहा। मिस्टर अनुभव आज ही आपको खुशखबरी मिल जाएगी। अनुभव ने अपने बॉस को फोन करके स्थिती से अवगत कराया और ऑफिस से छुट्टियां ले ली। अनुभव की चिन्ता अब रेलवे स्टेशन से आकृती की नानी को घर लाने की थी, कि नर्सिग होम में किसको स्नेह के पास छोड़े। आज के समय एकल परिवार में ऐसे मौके पर यह एक गंभीर परेशानी करती है कि अकेले कब क्या क्या और कहां क्या करे। सुबह आकृती को तैयार करके स्कूल भेजा और फिर स्नेह के साथ नर्सिग होम। स्नेह को अकेला छोड़ नही सकता, मालूम नही कब क्या जरूरत पड़ जाए। नानी अकेले स्टेशन से कैसे घर आएगी। घर में ताला लगा है। सुबह पड़ोसी वर्मा जी के घर कालबेल बजाई लेकिन सब व्यस्त, घर का दरवाजा खोलने में देरी कर दी और अनुभव इन्तजार नही कर सका। नर्सिग होम के वेटिंगरूम में बैठ कर अनुभव का मस्तिष्क तेजी से चल रहा था, कि कैसे सब कुछ मैनेंज किया जाए। वर्मा जी को फोन लगाया और स्थिती से अवगत कराया। नर्सिग होम घर के नजदीक था, आधे घंटे में मिसेज वर्मा थर्मस में चाय, नाश्ता लेकर उपस्थित हो गई। बेटा पहले तो आप चाय और नाश्ता लीजिए, मैं यहां स्नेह के पास बैठती हूं। आप आकृती की नानी जी को रेलवे स्टेशन से लाईए। अनुभव ने बिस्कुट के साथ चाय पी और रेलवे स्टेशन रवाना हुआ। स्टेशन पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि गाड़ी दो घंटे लेट है। रेलवे प्लेटफार्म के बैंच पर बैठा अनुभव सोचने लगा कि एकल परिवार के जहां एक तरफ अपने सुख हैं तो दूसरी और दुःख भी। आज जब प्रसव के समय किसी अपने की जरूरत है, तो अकेले सभी कार्य खुद को करने पड़ रहे है। लेकिन यह उसकी मजबूरी है। नौकरी जहां मिलेगी, वही रहना पड़ेगा। अपने घर के पास नौकरी न मिले तब कोई कुछ नही कर सकता है। घर से दूर रहना पड़ता है। कोई सगा तो पास नही होता। ऐसे समय पड़ोस ही सगा होता है। पता नही डाक्टर भी डिलीवरी की गलत तारीख क्यों बताते है, तारीख के हिसाब से नानी को दस दिन पहले बुलाया है, लेकिन यह बातें सोचने का समय तो नही है, फिर भी इन्तजार में समय व्यतीत करते हुए मस्तिष्क में पता नहीं, कहां से क्या क्या विचार आ जाते हैं।

पडोसी वर्मा जी की भी कुछ ऐसी स्थिती है। दोनों बुजर्ग दंपति रिटायरमैंट के बाद अकेले रह रहे है। एक पुत्र विदेश में नौकरी कर रहा है, दो तीन साल बाद दो महीनों के लिए मिलने आता है और दूसरा पुत्र बंगलूरू में आईटी कम्पनी में नौकरी करता है। साल में दस एक दिनों के लिए मिलना होता है। दो पुत्रियां हैं, एक अहमदाबाद में रहती है, लेकिन दूसरी पुत्री नोएड़ा में रहती है, जो हर रविवार को सपरिवार मिलने आती है। बाकी सप्ताह वर्मा दंपति अकेले। इसी कारण एक दूसरे की पूर्ती के लिए अनुभव और वर्मा जी के बीच काफी नजदीकियां हो गई थी। अनुभव और स्नेह दोनो नौकरी करते थे। आकृति की वजह से वर्मा दंपति की नजदीकियां बड़ी। दोपहर को आकृति स्कूल से वापिस आती तो अधिक समय उसका वर्मा जी के घर बीतता। घर के कार्य के लिए अनुभव ने दिन की नौकरानी रखी हुई थी, लेकिन नौकरानियां आकृति का कम और अपना ध्यान अधिक रखती थी। एक छोटे से बच्चे ने क्या खाना पीना था, उससे कई गुणा अधिक नौकरानियां हजम कर जाती थी, इस कारण कई नौकरानियां आई और चली गई। लेकिन वर्मा परिवार से संबंध बढ़ता ही गया। अकेलेपन को दूर करने के लिए एक छोटे बच्चे का सहारा वर्मा जी को अपने खुद के बच्चों की दूरी भुला देता था। इसमे दोष किसी का नही है। सभी परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हो जाती हैं कि किसी का कोई बस नही चलता है।                  
तभी रेलवे की घोषणा ने अनुभव को विचलित कर दिया। गाड़ी दो घंटे और लेट है। उफ ये रेलवे वाले कभी नही सुधरेगें। एक बार में क्यों नही बता देते कि गाड़ी कितनी देर से आएगी। सुबह से एक एक घंटे बाद और अधिक देरी से आने की घोषणा कर रहे है। सर्दियों में कोहरे के कारण गाड़ियां अक्सर देरी से चलती हैं। लेकिन अनुभव आज और अघिक इंतजार नही कर सकता था, लेकिन इस समय वह केवल झुंझला कर रेलवे प्लेटफार्म के एक छोर से दूसरे छोर के अनगिनत चक्कर लगा चुका था। तीन घंटे से अधिक उसे इंतजार करते हो गये। मालूम नहीं यह ट्रेन कब आएगी। वर्मा जी नर्सिगहोम में हैं। अकी भी स्कूल से आने वाली होगी। तभी मोबाइल की घंटी बजी। दूसरी तरफ वर्मा जी थे। मुबारक हो अनु बेटे। अकी का भाई आया है। स्नेह और छोटा काका एकदम ठीक हैं। तुम चिन्ता मत करो। मैं घर जा रहा हूं। अकी के स्कूल से वापिस आने का समय हो गया है। चिन्ता मत करना।
यह सुन कर अनुभव की जान में जान आई। अब तनाव से दूर शान्ती से बैंच पर बैठ गया। निश्चिन्त हो कर अब अनुभव ट्रेन का इंतजार करने लगा। गाड़ी पूरे छः घंटे देरी से आई। बच्चे की खुशखबरी सुन कर नानी की सफर की सारी थकान मिट गई।
अनु बेटे अब सीधा नर्सिगहोम ले चल। पहले छोटे काके को देख कर स्नेह से मिल लूं।
नर्सिगहोम में स्नेह के पास झूले में छोटा काका सो रहा था। नानी को देख कर वर्मा दंपति ने बधाई दी। नानी ने नर्स और आया को रूपये न्योछावर किये और छोटे काके को गोद में लिया। छोटे काके को गोद में लेता देख आकृति बोली। नानी मैंने आपसे पहले छोटे काका को देखा। नानी कितना गोरा है। देखो कितना सॉफ्ट है लेकिन एकदम गंजा है। सर पर एक भी बाल नही है। नानी ने लाड में कहा। बाल भी आ जाऐगें। अकी से भी ज्यादा। जब अकी तुम पैदा हुई थी, तुम्हारे भी सर में बाल नही थे, अब देखो, कितने लम्बे बाल हैं।
नानी मुझे दो ना छोटे काका को, मम्मी तो हाथ भी नही लगाने दे रही।
नानी ने प्यार से कहा। अभी बहुत छोटा है, मेरे पास बैठो, तुम्हारी गोदी में देती हूं। गोदी में पा कर आकृति उल्लास से भर गई। नानी देखो, अभी आंखो को खोला था, देखो कितना क्यूट तरीके से मुस्करा रहा है। ऐसे हंसते खेलते शाम हो गई। वर्मा आंटी ने घर जा कर रात के भोजन का प्रबंध किया। स्नेह ने नानी को घर जा कर आराम करने को कहा। आकृति का मन जाने को नही हो रहा था। नानी थोडा रूक के चलते हैं। अभी काका जाग रहा है। जब सो जाएगा, तब चलेगें।
अकी अब घर चलो, होमवर्क भी करना होगा और फिर तुम सुबह उठने में देर कर देती हो। अनुभव ने आकृति से कहा। लेकिन अकी का मन घर जाने को नही था। घर में होमवर्क करते समय उसका ध्यान छोटे काका में लगा हुआ था। जैसे तैसे होमवर्क पूरा किया। रात को एक बार फिर वह अनुभव के साथ नर्सिग होम गई और काफी देर तक छोटे काका को निखारती रही, पुचकारती रही। रात को घर आने में देरी हो गई। पूरे दिन की थकान के बाद स्नेह और छोटा काका को सही देख कर सम्पूर्ण निश्चिन्ता के साथ सोया तो सुबह उठने में देरी हो गई।  वर्मा आंटी ने जब कालबेल बजाई तब अनुभव की आंख खुली। बेटे क्या बात है, क्या अकी स्कूल नही जाएगी। मैनें उसका नाश्ता भी बना दिया है।
आंटी मालूम नही आज घड़ी का अलार्म कैसे नही सुनाई दिया। अभी अकी को उठाता हूं। स्कूल की तो अगले सप्ताह से छुट्टियां हैं।
कोई बात नही। बेटा। मैं तुम्हारी चाय और अकी का नाश्ता रसोई में रख देती हूं और हां स्नेह और नानी की चाय लेकर नर्सिगहोम जा रही हूं। तुम आराम से अकी को स्कूल के लिए तैयार करो। अनुभव नें अकी को उठने के लिए आवाज देनी शुरू की, लेकिन अकी रोज की तरह हूं हां कर के करवट बदल कर रजाई और अधिक कानों तक खींच कर सो जाती। बड़ी मुश्किल से अकी स्कूल जाने के लिए तैयार हुई, लेकिन स्कूल बस आज निकल गई। अनुभव को घर वापिस आ कर कार उठानी पड़ी। स्कूल घर से चैदह किलेमीटर दूर था। स्कूल के गेट पर प्रिसिंपल खड़ी थी और देरी से आने वाले सब बच्चों को घर वापिस भेज रही थी। अनुभव ने काफी मिन्नत की लेकिन प्रिसिंपल के ऊपर कोई असर नही पड़ा, उलटे वह अनुभव पर विफर पड़ी। आप अभिभावकों का कर्तव्य हैं कि बच्चों के नियमित समय पर स्कूल भेजे, उन को अनुशासित करे, लेकिन आप उनको शह देकर और अधिक बिगाड़ रहे है। मैं स्कूल का नियम किसी को नहीं तोड़ने दूंगी। आप अपने बच्चे को वापिस ले जाइये।
मैडम प्लीज आगे से देर नही होगी। आज अधिक सर्दी और धुन्ध के कारण देर हुई है। अनुभव ने विनती की।
अगर आप का घर दूर है तो आप घर के पास किसी स्कूल में बच्चे को दाखिल करवाइए। मुझे अपने स्कूल का अनुशासन नही तोड़ना। प्रिसींपल नें कड़क स्वर में कहा। इसके आगे अनुभव कुछ नही कह सका और चुपचाप अकी के साथ कार स्टार्ट कर घर के लिए रवाना हो गया। अनुभव का मूड खराब हो गया, कि कितने कठोर, निष्ठुर है स्कूल वाले, बच्चो के साथ उनके अभिभावकों के साथ भी कितने गलत तरीके से पेश आते हैं। इतनी ठंड में छोटे बच्चों को सुबह उठाना, तैयार करना कितना मुश्किल होता है। कभी कभी तो बड़े भी इतनी अधिक ठंड़ में घबरा जाते है। आफिस पहुंचने में देर हो जाती है। ठंड़ की परेशानी को समझना चाहिए। स्कूल के समय को बदलना चाहिए। यदि एक घंटा देरी से सर्दियों में स्कूल लगाया जाए तो सब समस्याऔ से छुटकारा मिल सकता है। स्कूल में मोटी मोटी मैडमों का दिमाग भी लगता है, मोटा होता है। छोटे बच्चों की भावनाऔ को कोई नही समझनें की कोशिश करता है। मुझे इस बारे में स्नेह से बात करनी पड़ेगी। चाहे कुछ हो जाए, इस साल अकी का स्कूल बदलवा दूंगा। घर के पास जिस भी स्कूल में दाखिला मिलेगा, उसी में करवा दूंगा। आखिर हम भी घर के पास सरकारी स्कूल में पड़े थे। क्या जिन्दगी की दोड़ में पिछड़ गए है। सब स्कूल के बड़े नाम में क्या रखा है। सिविल परीक्षाऔं में छोटे शहरों, कसबों के छात्र मेरिट लिस्ट में आते है। जो जलीकटी स्कूल में सुनी है उसके बाद अब इस स्कूल में अकी को पढा़ने का कोई औचित्य नही बचता। अनुभव यह सोचता हुआ धीरे धीरे कार चला रहा था। अकी समझ गई कि पापा प्रिसिंपल की बात से उदास और नाराज हो गए है। तभी कार में सीडी प्लेयर भी नही ऑन किया। अकी ने सीडी प्लेयर ऑन कर पापा की मन पसंद सीडी लगा दी। शोख नजर की बिजलियां दिल पर तू गिराए जा अपना मन पसंद गीत सुन कर अनुभव का चित कुछ शांत हुआ। मुस्करा कर उसने अकी को देखा और कार की रफ्तार तेज की। आखिर बच्चे भी सब समझते है। हमें कुछ कहते नही, शायद डरते है, क्योंकि हम डांट मार कर उन्हे चुप करा देते है। अकी छोटा काका को देखना पसंद करेगी, जब स्कूल की छुट्टी हो गई है तब कुछ समय नानी, स्नेह और छोटा काका के संग गुजारा जाए, इसीलिए अनुभव ने कार सीधे नर्सिगहोम की तरफ ले ली। अकी बहुत खुश हुई कि छोटा काका के साथ उसे सारा दिन मिलेगा। स्कूल बैग के साथ अकी को देख कर स्नेह कुछ नाराज हुई, “आपने अकी की छुट्टी क्यों करवाई अनुभव ने कहा कि इस विषय में घर चल कर बात करेगें। शाम को स्नेह को नर्सिगहोम से छुट्टी मिल गई। अनुभव ने अकी से कहा कि आज स्कूल की छुट्टी हो गई तो वह अपनी फ्ररेंड से होमवर्क पूछ के कर ले। अकी का ध्यान छोटा काका में लगा हुआ था, जैसे तैसे होमवर्क किया और फिर नानी के पास सट के बैठ गई कि किस बहाने छोटा काका के पास वह रहे। रात काफी हो गई थी, खुशी में बातों बातों में आंखों से नींद गायब थी, घड़ी देख कर स्नेह ने अकी को सोने को कहा, कि कल सुबह भी आज वाली बात कहीं न हो जाए। अकी का दिल सोने को नही हो रहा था, लेकिन बिस्तर में दुबकना पड़ा। रजाई से मुंह निकाल कर पूछती रहती, नानी छोटा काका क्या सो गया या जाग रहा है।
अभी अकी को एक सप्ताह स्कूल और जाना था, ठंड इस साल कुछ अधिक थी। रोज सुबह जबरदस्त कोहरा होने लगा। रोज सुबह अकी को इतने जल्दी स्कूल के लिए तैयार होते देख कर नानी ने स्नेह को कहा, कि किसी पास के स्कूल में अकी को दाखिल करवा दे। इतना अधिक परिश्रम छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए घातक है।
मां मैं स्कूल चेंज नही करवाउगी। बहुत नामी और बढिया स्कूल है।
इसका जवाब अनुभव ने दिया, “स्नेह नानी ठीक कह रही हैं। मैंनें सोच लिया है, कि इस साल रिजल्ट निकलने पर अकी का स्कूल पास के स्कूल में करवा दूंगा। और फिर उसने पूरी बात स्नेह को विस्तार पूर्वक बताई कि कैसे फटकार लगा कर अपमानित किया। बारबार अनुरोध करने पर भी प्रिंसीपल नें निर्दयता के साथ किसी दूसरे स्कूल में दाखिले की सलाह दी थी। ऐसी बात सुन कर स्नेह उदास हो गई कि उसका अरमान अकी को एक नामी स्कूल में पढानें का साकार नही हो पाएगा। लेकिन अनुभव के दृढ़ निश्चय और नानी के सहयोग के आगे स्नेह को झुकना पड़ा। आकृति सुन सुन कर बहुत खुश हुई कि अब उसे नये सत्र में पास के स्कूल में जाना होगा। इतनी जल्दी भी नही उठना पडेगा। स्कूल बस में वह बहुत अधिक परेशान होती थी। बड़े बच्चे बस सीट में छोटे बच्चों को बैठने नही देते थे। सीट पर बैठे बच्चों को उठा देते थे। स्कूल टीचर भी उन्हे कुछ नही कहती थी। उलटे सबसे आगे की सीटों पर बैठ जाती थी। कितनी ज्यादा भीड़ हो जाती थी। गर्मियों में तो इतने ज्यादा पसीने आते थे और बहुत ज्यादा घबराहट होती थी, इसी से तो तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन पापा मम्मी तो इस बारे में सोचते ही नही। सर्दियों में कितनी ज्यादा ठंड होती है। स्कर्ट पहन कर जाना पड़ता है। ऊपर से कोट पहना देते है, लेकिन स्कर्ट पहनने से टांगों में बहुत ज्यादा ठंड लगती है। छोटे बच्चों की परेशानी कोई नही समझता। लेकिन आकृति की परेशानी को नानी ने समझा। रोज सुबह आकृति का बेमन स्कूल जाना अच्छा नही लगता था। ठंड बढती जा रही थी। तापमान ने तेजी से गिरावट दर्ज की। प्रशासन ने सरकारी स्कूलों की छुट्टी समय से पहले घोषित कर दी। अभिभावकों के दबाव में आ कर निजी स्कूलों में भी निर्धारित समय से पहले सर्दियों की छुट्टियां घोषित कर दी। जिस दिन छुट्टियों की घोषणा की, आकृति बहुत अधिक खुशी के साथ झूमती हुई, नाचती हुई स्कूल से वापिस आई। जैसे नानी ने फ्लेट का दरवाजा खोला, आकृति नानी से लिपट गई।
नानी, मेरी प्यारी लवली नानी, आज मैं आजाद पंछी हूं।
क्या बात है, गुडिया रानी बहुत खुश है।
नानी हमारी कल से पूरे बीस दिन की छुट्टी। अब मैं रोज छोटा काका के संग खेलूंगी। और अपना स्कूल बैग एक तरफ पटक दिया और आइने के सामने कमर मटकाते हुए गीत गाने लगी, मितवा।
तभी स्नेह ने आवाज लगाई, “अकी काका सो रहा है, शोर मत मचाऔ।
गाना भी नही गाने देते और कह कर अकी बाथरूम में मुंह धोने के लिए चली गई। अकी बाथरूम में वाशबेसन के आगे आइनें में अपने को देख कर फिर गीत गाने लगी। मैंनें जिसे अभी देखा है, कौन है वो अन्जानी वो है कोई कली या कोई किरण या है कोई कहानी, उसे जितना देखूं उतना सोचूं क्या मैं उसे कह दूं, प्रीटी वूमन, देखो देखो न प्रीटी वूमन, तुम भी कहो न प्रीटी वूमन। अकी वाशबेसन के नल पर बड़े आराम से हाथों पर साबुन लगाए जा रही है और मजे में प्रीटी वूमन गीत गाती जा रही थी। अकी का गाना सुन कर स्नेह ने नानी को कहा। मम्मी जा कर अकी को बाथरूम से निकालो, वरना वह दो घंटे से पहले बाहर नही आएगी। नानी ने अकी को बाथरूम में जा कर कहा, “प्रीटी वूमन बहुत बन संवर लिए। अब बाहर आ जाइए। छोटा काका आपको बुला रहा है।
सच्चीकह कर अकी ने फर्राटे की दोड़ लगाई। यह क्या नानी, छोटा काका तो सो रहा है, आप भी मेरा मजाक उडा़ती हैं।
गाना तो बहुत अच्छा गा रही थी। आवाज बहुत सुरीली है। फिर से सुनाऔ अकी।
मैं नही सुनाती नानी। आपने मेरा मूड खराब कर दिया। अकी ने मुंह बनाते हुए कहा।
मूड कैसे आएगा, मेरी लाडो का। नानी ने अकी को अपनी गोद में बिठाते हुए पूछा।
जब पापा गाना गाएगें तब मैं पापा के साथ मिल कर गाऊंगी।
वो क्यो?”
क्योंकि नानी आपको नही पता, कि पापा को यह गाना बहुत अच्छा लगता है। मम्मी को देख कर गाते है। अकी ने बड़े भोलेपन से कहा तो नानी को हंसी आ गई। वाकई मासूम और भोले बच्चों को कई बार मालूम नही होता कि कहां क्या बात करनी है।
अच्छा अकी, पापा का गाना तो बता दिया, मम्मी कौन सा गाना गाती है, पापा को देख कर। इस से पहले अकी कुछ कहती, स्नेह तुनक कर बोली, “मां तुम ये क्या बाते ले कर बैठ गई। बच्चों को बिगाडनें का काम कर रही हो। बेकार की बातों को ले कर बैठ गई हो।
यह सुनते ही अकी नानी के कान में धीरे से बोली। नानी मम्मी को थोड़ा समझाऔ। हमेशा डांटते रहती है। नानी हंसने लगी। डांट में भी प्यार होता है। अकी को चूमते हुए नानी ने लाड से कहा।
छुट्टियों में अकी को बेफ्रिक देख कर नानी ने स्नेह से कहा, कि बच्चों के कुदरती विकास के लिए जरूरी है कि उन्हे पूरा समय मिले कि पढने के साथ खेलने का मौका मिले। क्या तू भूल गई, किस तरह बचपन में तू पडोस की लडकियों के साथ खेलती थी और पूरा मुहल्ला शोर से सर पर उठाती थी। हम अपना बचपन भूल जाते है कि हमने भी शैतानिया की थी। बच्चों पर आदर्श थोपते है, जो एक दम अनुचित है।
मां तुम तो भाषण पर आ गई हो। स्नेह ने तुनक कर कहा।
तुम खुद देखो कि अकी आजकल कितनी खुश है, जितने दिन स्कूल गई, एकदम थकी सी रहती थी, अब एकदम चुस्त रहती है। इसलिए कहती हूं कि अनुभव की बात मान ले।
मम्मी तुम और अनु एक जैसे हो, एक दूसरे की हां में हां मिलाते रहते हो। हमेशा अपनी मनमानी करते हो, मेरी भावनाऔ की तरफ सोचते भी नही हो। आखिर आपने मुझे इतना क्यों पढ़ाया। एमबीए के बाद शादी कर दी। मेरा कैरियर भी नही बनने दिया। मुश्किल से एक साल भी नौकरी नही की, शादी हो गई। शादी के बाद शहर बदल गया, फिर अकी के जन्म के कारण नौकरी नही की। अकी स्कूल जाने लगी, तब बडी़ मुश्किल से अनु को राजी किया। तीन चार साल ही नौकरी की, अब फिर छोटा काका के जन्म पर नौकरी छोड़नी पर रही है।
स्नेह एक बात तुम समझ लो, परिवार के लालन पालन और बच्चों में अच्छी आदतो की नींव डालने के लिए मां बाप को अपनी कई इच्छायों को मारना पड़ता है। परिवार को सही तरीके से पालना नौकरी करने से अधिक कठिन हैं। जोगी बनना असान है, लेकिन गृहस्थ बनना बहुत मुश्किल है। गृहस्थी की कठिन राह से परेशान लोग सन्यास लेते है, लेकिन दर दर भटकने पर भी ना तो शान्ति मिलती है और ना ही सुख। कठिन गृहस्थी में ही सच्चा सुख है।
स्नेह मां के आगे निरूतर हो गई और आकृति को घर के पास स्कूल में दाखिले को राजी हो गई।  
सर्दियों की छुट्टियों में वर्मा जी की लड़की भी अपने परिवार के साथ रहने आ गई। वर्मा जी की नाती वृन्दा आकृति की हम उम्र थी। दोनों सारा दिन एक साथ धमा चैकड़ी करती रहती और नानी स्नेह छोटा काका और वर्मा परिवार के साथ सोसाइटी के लॉन में धूप सेंकते। एक दिन धूप सेंकते वर्मा जी ने अपनी लड़की को सलाह दी कि वह भी वृन्दा को पास के स्कूल में दाखिल करवा दे। वों नानी के गुण गाने लगे कि उन्होने स्नेह को राजी कर लिया है आकृति के स्कूल बदलने के लिए।
स्नेह मुंह बना कर बोली, “क्या अंकल आप भी स्कूल पुराण की कथा लेकर बैठ गए। बड़ी मुश्किल से तो नानी की कथा बंद की है।
बेटे इस का जिक्र बहुत जरूरी है। देखो जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब गर्मियों और सर्दियों में स्कूल का अलग समय होता था। गर्मी में सुबह सात बजे और सर्दियों में दस बजे स्कूल लगता था। गर्मी में बारह बजे घर वापिस आ जाते थे और सर्दी में धूप में बैठ कर पड़ते थे।
अच्छा, वृन्दा ने हैरान हो कर पूछा। आप कुर्सी मेज क्लास से रोज बाहर लाते थे और फिर अन्दर करते थे। अपने सर पर उठाते थे, क्या नाना जी।
नहीं बेटे, हमारे समय तो मेज कुर्सी नही होते थे। जमीन पर दरी बिछा कर बैठते थे। धूप निकलते ही मास्टर जी हुक्म देते थे और सारे बच्चे फटाफट दरियां उठा कर क्लास रूम के बाहर धूप में बैठ जाते थे। पंखे भी नही होते थे, जब गर्मी लगती थी, तब भी बाहर बैठ जाते थे। मजे की बात तो बरसातों में होती थी। स्कूल की छत टपकती थी। जिस दिन बारिश होती थी, उस दिन छुट्टी हो जाती थी। मास्टर जी कहते थे, रेनी डे, होलीडे। बच्चों आज की छुट्टी।
यह सुन कर वृन्दा और आकृति जोर जोर से हंसने लगी, रेनी डे, होलीडे, कहते कहते और हंसते हंसते दोनों लोटपोट हो गई। दोनों के पेट में बल पड गये।
अच्छा और सुनो, जब सुबह बारिश होती थी, तब हम खुद ही स्कूल नही जाते थे।वर्मा अंकल की बातों पर अब बच्चों के साथ सभी हंसने लगे। अब अनुभव कहने लगा, “वर्मा अंकल के बाद मेरी भी सुनो, मेरा स्कूल तो दो शिफ्टों में लगता था। छटी क्लास तक दूसरी शिफ्ट में स्कूल लगता था। खाना खा कर एक बजे स्कूल जाते थे, छः बजे वापिस आते थे, मजे में सुबह सात आठ बजे उठते थे, सुबह स्कूल जाने की कोई जल्दी नही होती थी। आकृति और वृन्दा को स्कूल की बातों में बहुत अधिक रस आ रहा था और हंसते हंसते लोटपोट होती जा रही थी।
अकी के छुट्टियों में इतना अधिक खुश देख कर स्नेह ने पास के स्कूल का महत्व समझा और फाइनल परीक्षा के बाद नये सत्र में घर के पास स्कूल में दाखिला अकी का करा दिया। घर से स्कूल का पैदल रास्ता सिर्फ पांच मिन्ट का था। दो दिनों में अकी इतनी अधिक खुश हुई और स्नेह से कहा, “मम्मी यह स्कूल बहुत अच्छा है, मेरी दो दोस्त साथ वाली सोसाइटी में रहती है, मम्मी आपको मालूम है, वो साइकिल पर स्कूल आती हैं, मुझे भी साइकिल ले दो, दो मिन्टों में स्कूल पहुंच जाउगीं। अनुभव नें आकृति को साइकिल ले दी। अब अकी को कोई टेंशन थी, ना तो सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाने की और ना आने जानें की, ना ही स्कूल बस मिस हो जाने की। सारा दिन वह खुश रहती थी। होमवर्क करने के बाद काफी समय छोटा काका के साथ खेलती और बेफिक्र चहकती रहती। छः महीनों मे एकदम लम्बा कद पा गई आकृति को देख कर स्नेह खुशी से फूली नहीं समाती थी, जो अकी कल तक सारा दिन थकी थकी रहती थी, आज वह कहने लगी, मम्मी मुझे चाय बनाना सिखाऔ, मैं आपको सुबह बैड टी पिलाया करूंगी। सुन कर स्नेह को नानी की बातें बारबार याद आती, बच्चों के बहुमुंखी विकास के लिए उनका बेफिक्र होना बहुत जरूरी है, उन पर उनकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए। बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी होती है। 
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