Sunday, April 06, 2014

आठ फेरे


प्रतिष्ठा क्या है, मान सम्मान क्या है, दिल को बहलाने के मात्र खिलौने के अतिरिक्त कुछ नही हैं। खुद को ऊंचा और दूसरों को नीचा समझना भी एक छलावा ही तो है। आज हमारे पास धन दौलत है तो ये सब खिलौने अपने आप ही आ जाते हैं। गलतियां, एैब सब छुप जाते हैं। धन दौलत का घमंङ एक नशा है, जिसमें आदमी जब तक तैरता है, दूसरे तारीफ करते हैं, हौसला अफजाई करते हैं, और जब वही तैराक डूबता है, तब वही प्रशंसक मुंह पर थूकने से भी नहीं कतराते हैं। कुछ इसी हालात में आज चंदरभान हैं। कार में पूरे रास्ते यही सोचते और अवलोकन करते रहे, कि क्या सोचा था और क्या हो गया, गलती किसकी थी और कहां हुई। किसी भी नतीजे पर नहीं आ सके और घर आ गया। दादा जी घर आ गया है, आईए, कार से उतरिए।कह कर चंदरभान के प्रौत्र रितेश ने कार का दरवाजा खोला।
एक हलकी सी हूं कह कर चंदरभान कार से उतरे, दरवाजे पर पुराना वफादार नौकर कालूराम खडा था। उसे देख कर बहुत ही धीरे स्वर में कहा, “सब रौशनी, लाईटस को बंद कर दो। अब इनकी कोई जरूरत नहीं है। कह कर आंखें छलक गई। धीरे धीरे चलते हुए अपने कमरे में जा कर बिस्तर में धम से लेट गए। घर के बाकी सदस्य भी चुपचाप अपने कमरों में कैद हो गए। मेहमान आपस में खुसर फुसर में लगे हुए थे। जो घर कुछ घंटों पहले खुशियों और रौनक का प्रतीक था, अब एक मरघट सा लग रहा था।
चंदरभान की आंखों में नींद नही थी। लोग जो सिर झुका कर बात करते थे, अब आंखें घूर कर नाना तरह की बातें करेगें। लोगों की, जमाने की बातों, ताने को झेलना होगा, आज बुढापे में यह दिन भी देखना पढेगा, कभी सोचा नही था, अब तो समय बीत गया है, बात सुलट सकती थी, लेकिन पैसों का गुरूर, घमंड, सबको नीचा दिखाने की प्रवृति बात को कभी कितना बिगाड सकती है, इसका अवलोकन बाद में करते हुए चंदरभान किसी नतीजे पर नही पहुंच पा रहे थे। अभी चंद घंटों पहले घर का हर एक कोना रौशनी की जगमगाहट से महक रहा था, चंदरभान की खुशी की कोई सीमा नजर आ नहीं आ रही थी। अथाह खुशी चंदरभान की हर बात में झलक रही थी, आखिर आज पच्चीस वर्ष बाद चंदरभान के घर खुशी का पर्व था। आज उनके पौत्र रितेश का विवाह जो है। चंदरभान के दो पुत्र, बडा महेन्द्र जिसकी पुराने शहर के चौक पर किराने की बड़ी मशहूर दुकान है। आज मॉल के बडे़ बड़े शोरूमों के जमाने में भी उसकी दुकान पर सुबह से शाम तक भीड़ रहती थी, कहें कि कान खुजाने की फुरसत नही मिलती, तो कोई अतिशियोक्ती नही होगी। छोटा पुत्र सुरेन्द्र कस्टम विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर। पैसे और रुतबे के कारण चंदरभान अपने को सबसे अलग और इक्कीस मानते थे। घंमड़ और अहंकार कूट कूट कर चंदरभान के पूरे परिवार में था। रितेश महेन्द्र का बड़ा लड़का है। रितेश को पढ़ाई में विशेष रूचि थी, एमबीए करने के बाद जब रितेश ने एक बड़ी कंपनी में नौकरी करनी चाही तो चंदरभान के गुस्से का पारा सातवें आसमान को भी पार कर गया, कि उनका पौत्र इतने जमे जमाए व्यापार को लात मार कर नौकरी करेगा। चाचा सुरेन्द्र की नौकरी का उद्हारण भी काम नही आया, कि उस समय वे इतने समृद्ध नही थे, इस कारण सुरेन्द्र को नौकरी करनी पड़ी, लेकिन आज बात एकदम अलग है, इस कारण रितेश को पिता की चली चलाई पुशतैनी दुकान पर बैठना पड़ा। अनाज मंडी के बादशाह प्रेमशंकर की बेटी रूचिका के साथ रितेश के विवाह पक्का होने पर चंदरभान की छाती और अधिक चौड़ी हो गई। गर्व से फूले नही समा रहे थे चंदरभान।
आज शुभ विवाह की परमबेला का समय आ गया। पिछले दो दिनों से घर में हर तरफ हलचल ही हलचल थी। मेहमानों का तांता लगा हुआ था। सभी रिश्तेदार मामा, फूफा, मौसा सभी विवाह में शामिल होने पहुंच चुके थे। पूरा घर बिजली की रौशनी से जगमगा रहा था। विवाह की रस्में बड़े शानोशौकत से भव्य स्तर पर निभाई जा रही थी। चारो तरफ हलचल थी। चंदरभान बन ठन कर रौबीली आवाज में नौकरों को काम के लिए हुक्म दे रहे थे। घर के सभी सदस्यों और मेहमानों को समय पर तैयार होने की बार बार हिदायत देते जा रहे थे, ताकि बारात में देर न हो और सभी शुभ कार्य समयानुसार होते रहे। शाम को घुडचडी तय समय हो गई। एक जोरदार आतिशबाजी के साथ बारात ने वधु के घर की ओर कूच किया। बारात जैसे चली, सुरेन्द्र ने रितेश और अपने मित्रों और ऑफिस के सहयोगियों के साथ शराब का कार्य आरम्भ किया। बारात चली जा रही है सुरेन्द्र की पार्टी का जश्न ही खत्म नही हो रहा था। चंदरभान इस बात पर परेशान था कि बारात में नाच गाना ही नही हो रहा है। बैंड वाले फिल्मी गीत बजा रहे हैं, ठोल वाले ठोल बजा रहे हैं, लेकिन घर की औरतों को छोड कर किसी आदमी को नही नाचता देख चंदरभान का गुस्सा खोलने लगा। कडक कर आवाज दी
सुरेन्द्र यह क्या मजाक बना रखा हैं, तुम्हारी शराब का दौर खत्म नही हो रहा है, बरात की रौनक कौन लगायेगा, तुम्हारा बाप, बिना नाच के रौनक ही नहीं हैं। सूनी बारात लग रह है।
पापा आप चलो, बस अभी कुछ मिन्टों में नाच शुरू करते हैं, तब तक बड़े भैया और भाभी के आप नाचना शुरू किजिए।
अबे इस बुड्ढे को नाच शोभा नही देता, रौनक जवानों से लगती है। चंदरभान नें कडक आवाज में कहा।
अब सुरेन्द्र ने रितेश के दोस्तो से कहा, “बुड्ढा गरम है, तुम नाचना शुरू करो, हम लोग सब अभी आते हैं। बाकी का कोटा आगे के लिए सुरक्षित रखते है। अब रितेश के दोस्तों ने नाचना शुरू किया। कोई नागिन डांस कर रहा था, कोई डिस्को और कोई ट्विस्ट, जिसे नाचना नही आता था, वह आड़ा तिरछा हो कर हाथ पैर हिलाने लगा। युवको का उत्साह बडानें के लिए झमाझम आतिशबाजी होने लगी। बैंड और ठोल वालो का उत्साह चार गुना हो गया। सुरेन्द्र और उसकी मित्र मंडली का नाच चालू होते ही चंदरभान अपनी मूंछो को ताव देनें लगे। नाच और आतिशबाजी के कारण बारात के चलने की गति धीमे हो गई, बारात चलती कम और रूकती अधिक थी। बीच बीच में नाचनें वाले ईधंन के लिए रूकते तो बारात कुछ आगे बढ़ती। ईधंन के कारण नाचने वालों को कुछ फर्क पडता, लेकिन बाराती थकने लगे और एक एक करके बारात से अलग हो कर वधु पक्ष के वहां पहुचने लगे। अब बारात में सिर्फ घर के सदस्यों के साथ सिर्फ नचइये ही रह गये। बारातियों के आगमन के साथ प्रेमशंकर ने खाने शुरू करने को कहा। बाराती खाना खा कर शगुन पकडा कर रुक्सत होने लगे, लेकिन बारात वधु पक्ष के पंडाल के द्वार पर अटक गई। चंदरभान अपनी शानशौकत दिखाने के लिए आतिशबाजी के आयोजन में मस्त थे और सुरेन्द्र अपनी मंडली के साथ नाचने में मस्त।
प्रेमशंकर का उठना बैठना मंत्रियों में था। दो मंत्री भी विवाह में सम्मिलित थे, बारात का द्वार में अटक जाने पर एक मंत्री ने प्रेशंकर से कहा, “अब दूलहे को अंदर लाईये और रस्में पूरी किजिए। नाच गाना एक तरफ होता रहेगा। मुझे देर हो रही है, सुबह की फ्लाइट से दौरे पर जाना है, मैं अधिक नही रूक सकूंगा।
मंत्री जी की बात सुन कर प्रेमशंकर ने चंदरभान से विनती की कि अब बिना किसी विलम्ब के मिलनी की रस्म की जाए और जयमाला भी हो जाए, जो नाचना चाहता है, पूरी रात बाकी है, मंत्री जी को जल्दी जाना है।
हां हां जरूर जरूर, अरे सुरेन्द्र, जरा देर के लिए नाचना बंद करके विवाह की रस्में पूरी कर लें, फिर बाद में नाचते रहना।
लेकिन जब जरूरत से ज्यादा ईंधन लिया गया हो, तब नाचने की गाड़ी ईंधन समाप्त होने पर ही रूकती है। सुरेन्द्र ने कहा, “अभी दूल्हा अंदर नही जाएगा, अभी थोड़ा रूको। हो जाऔ शुरू। यह सुनते ही नच्चइए अधिक जोश से नाचने लगे। मंत्री जी ने प्रेमशंकर से आग्रह किया, कि वे इजाजत दे, पिछले रास्ते से विदा हो जाते है, यहां रंग मे भंग नही डालना चाहता।
जैसी आपकी इच्छा।कह कर प्रेमशंकर मंत्री जी को विदा करने पिछले रास्ते की ओर चल दिये। मंत्री जी के साथ प्रेमशंकर को जाता देख सुरेन्द्र लपक कर उनके आगे खड़ा हो गया। यह क्या समधी जी, बारात दरवाजे पर खड़ी है और आप स्वागत करने की बजाय मंत्री जी को खुश करने मे लगे हैं। यह हमारा घोर अपमान है। रूको मंत्री जी आपको स्पेशल डांस दिखाते है।कह कर सुरेन्द्र ने मंत्री जी का हाथ पकड़ लिया और नागिन डांस करने लगा। मंत्री जी बौखला गये, “यह क्या फूहड़पन है।कह कर मंत्री जी ने हलका सा धक्का दिया, जिस कारण सुरेन्द्र गिर गया। आप अपने समधियों को समभालिए, मैं चला।कह कर मंत्री जी लम्बे लम्बे डग भरते हुए चले गये। नशे के कारण सुरेन्द्र उठ नही सका, उसे खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन बेकार, वह फिर लड़खडाता गिर पड़ा। चंदरभान गुस्से से आगबबूला हो गये। चीख कर बोले, “यह किस पाजी की हिमाकत है कि मेरे बेटे को धक्का दे, मैं उसकी हड्डी पसली एक कर दूंगा। झगड़े को शांत करने के लिए प्रेमशंकर का छोटा भाई  दुर्गाशंकर ने मध्यस्थता की, “भाई साहब आप कुछ न बोलिए, झगड़ा बढ़ सकता है, आप मंडप में जा कर जयमाला की तैयारियां किजिए, रूचिका बेटी को जल्दी लाईए। प्रेमशंकर जलता भुनता बड़बड़ता हुआ लम्बे डग भरते हुए मंडप में चले गये। चंदरभान बहुत अधिक गुस्से में थे, दुर्गाशंकर ने रितेश के पिता महेन्द्र के आगे हाथ जोड कर माफी मांगी। महेन्द्र ने मौके की नजाकत देखते हुए अपने पिता चंदरभान को खींच कर एक कोने में ले गया, “पिता जी यह समय झगड़े का नही है, आप आगे चल कर विवाह की रस्में पूरी करवाईए। झगड़ा बढ़ाने से कोई शान नही बढेगी, उलटे थू थू होगी कि शुभ विवाह के मौके पर झगड़ा हो रहा है।
तेरे भाई को धक्का दिया है, देख कैसे औंधा पड़ा है। चंदरभान ने महेन्द्र को गुस्से से कहा।
छोडो पिता जी, जरूरत से अधिक पी रखी है, होश नही उसे, उलटी कर दी है उसने, उसको घर वापिस भेज दो, नही तो एक कोने में सुला दो, जब तक नशा उतरेगा नही, कोई न कोई हंगामा करता रहेगा। कह कर चंदरभान को मिलनी के लिए तैयार किया, उधर दुर्गाशंकर ने प्रेमशंकर का गुस्सा शांत करवाया। सुरेन्द्र को एक कोने में रजाई देकर सुला दिया।
मिलनी और जयमाला के बाद विवाह की बाकी रस्में होने लगी, मंडप में वेदी सजा दी गई थी। पंडित जी पवित्र फेरों की तैयारी में जुट गये। सब लोग आपस में हंसी मजाक कर रहे थे, दो घंटे पहले हुए झगड़े का कोई नामोनिशान नहीं था। चंदरभान और प्रेमशंकर एक दूसरे के हाथ पकड़ कर बतिया रहे थे। रितेश और रूचिका अग्नि की पवित्र साक्षी में विवाह के पवित्र बंधन में बंधने के लिए सात फेरो के लिए उठे, अभी पहला फेरा ही समाप्त हुआ था, कि सुरेन्द्र की नींद खुल गई। उसका नशा अभी भी नही उतरा था। झूमता मस्त हाथी की चाल में बढता हुआ जेब से अपनी सर्विस रिवोल्वर से फायर किया, “कहां है साला मंत्री, उसने मुझको धक्का दिया, उसका मैं खून पी जाऊंगा। महेन्द्र ने सुरेन्द्र को पकड़ा, लेकिन सुरेन्द्र ने महेन्द्र का हाथ झटक कर प्रेमशंकर को पकड़ लिया। बता कहां छुपा रखा है, बाहर निकाल कमीने को। कह कर सुरेन्द्र लडखड़ा कर प्रेमशंकर के उपर गिर गया। गिरते समय प्रेमशंकर का सिर खंभ्बे से टकरा गया। प्रेमशंकर को चक्कर सा आ गया और धम्म से सिर पकड़ कर बैठ गये। सभी प्रेमशंकर के इर्द गिर्द इक्कठे हो गये। अरे डाक्टर को बुलाऔ। भाई साहब बेहोश हो गये है। सुरेन्द्र उठा और प्रेमशंकर को देख कर बोला साला नाटक करता है, अरे तेरा मंत्री कहां है। तभी प्रेमशंकर के चक्कर खत्म हुए और चीख कर बोला चंदरभान अपने लड़के को यहां से दफा कर नही तो बहुत बुरा होगा।
चंदरभान प्रेमशंकर की तीखी तेज आवाज बरदाश्त नही कर सका और पलट कर बोला प्रेमशंकर आवाज नीची, मैं बहरा नही हूं। मैं यह बेइज्जती नही सह सकता। तुम्हे माफी मांगनी होगी।
मांफी मांगे मेरी जूती। एक तो तेरे लौंडे ने शराब पी कर आतंक मचा रखा है पहले मंत्री जी की बेइज्जती की और अब मेरी इज्जत का फलूदा बनाने में कोई कसर नही छोडी। सिर फूटते बचा है वरना इसने कोई कसर नही छोडी है।
तमीज से बात कर प्रेमशंकर, तेरा समधी हूं, यह लौड़ा क्या लगा रखा है।
एक तो मरते बचा हूं और ऊपर से तमीज सिखा रहा है, एैसे शराबियों के घर में अपनी लड़की का हाथ नही देना। यह शादी नही होगी। प्रेमशंकर गरज कर बोला।
अरे तेरे घर का पानी भी नही पीना है, शादी तो दूर की बात है, चावल चोर कहीं का। चंदरभान ने पलट के कहा।
क्या कहा चावल चोर, तेरे बाप के चावल कब चुराए हैं। साला बात करता है, वो दिन भूल गया, जब स्कूल के आग खोंमचा लगा कर पतीले में छोले बेचा करता था, आज अपने को करोड़पति कहता है।
अपने अतीत की धज्जियां उड़ते देख चंदरभान बौखला गया, “अरे खोंमचा लगाना इज्जत का काम है, तू तो चोर था। अनाज मंडी में बोरियों मे से चावल चुराता था, चोरी के चावल बेच कर आज धन्ना सेठ बना हुआ है। लानत है।
जो कुछ ही पल में समधी बनने वाले थे, अब एक दूसरे की अतीत और वर्तमान की धज्जियां उड़ाने मे व्यस्त हो गये। तूतू मैं मैं अधिक होने लगी, तो महेन्द्र ने चंदरभान को और दुर्गाशंकर ने प्रेमशंकर को खींच कर दूर ले जा कर शांत करने की कोशिश की, कि झगडा न हो और विवाह संपन्न हो, लेकिन सब व्यर्थ। नाक और मूंछ के आगे किसी की कुछ न चली और शादी रूक गई। बारात एक फेरे के बाद बिना दुल्हन के वापिस लोट गई।

प्रेमशंकर ने रूचिका को वेदी से घसीटा और घर ले गये। वह कुछ नही बोल पायी। सिर्फ पापा कह कर चुप हो गई। कमरे मे आ कर दरवाजे की कुंडी लगा कर कटे वृक्ष की तरह धम्म से बिस्तर पर गिर गई। रितेश ने चंदरभान को कहने की कोशिश की कि आप क्यों कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ रहे हैं। चंदरभान ने एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। शर्म नही आती बाप दादा से जुबान लड़ाते हुए। शादी करने के लिए घर की इज्जत से खेलेगा। छोटा सा मुंह लेकर रितेश बिना रुचिका के वापिस आ गया और अपने को कमरे के अंदर बंद कर लिया। दोनों परिवारों में खुशी के बजाय मातम छा गया।
चंदरभान का अवलोकन नौकर कालूराम की आवाज के साथ खत्म हुआ। साबजी दोपहर हो गई है, कुछ तो खा लीजिए। परिवार का हर सदस्य शांत था, बैरंग शादी की वापिसी के बाद मेहमानों ने विदा लेनी खुरू कर दी। अडोस पडोस में लोग नमक मिर्च लगा कर तरह तरह की बातें करने लगे। जितनी इज्जत खुद उन्होनें उछाली थी उस से अधिक लोग उछालने लगे। आखिर लोगों का काम बातें करना ही है। उनकी सहानुभूति किसी परिवार से न थी। यह एक कुदरत का नियम है, कि आदमी हर विपदा के बाद खुद ही संभल जाता है। आखिर चार पांच दिनों के बाद खुद को सामान्य करके चंदरभान और प्रेमशंकर ने अपनी दुकान और ऑफिस जाना शुरू किया। मार्किट के लोगों ने जख्मो में नमक छिडकना शुरू किया। उनकी हां मे हां मिलाने लगे और दूसरे पक्ष को गालियां देने लगे।
प्रेमशंकर के ऑफिस में मजमा लग गया। एक के बाद एक ने कहना शुरू किया, “सेठ जी आप ने बिल्कुल सही किया। एैसे नीच और औछे घर में आप की गुण की खान एक दम प्योर सोने सी खरी पुत्री जाए, भगवान ने सही समय पर आप को सदबुद्धी दे दी वरना उस परिवार में जा कर रूचिका बेटी का जीवन नर्क हो जाता। किस बात की कमी है उसमें आप के हुक्म की देरी है, सेठ जी, कहो तो यहां लड़को की लाइन लगा दूं। इतना सुन कर प्रेमशंकर गर्व से फूल गए। आग में घी एक बुड्ठे ने डाल दिया, “सेठ जी मैं ते पहले दिन से इस रिश्ते से खुश नही था कि आप सा सेठ एक खोंमचे वाले के घर अपनी बेटी का विवाह करे। आप को शोभा नही देता था। अरे जब मैं स्कूल में पड़ता था तो मैंने खुद रिसर्स में छोले खाए हुए हैं। चव्वनी के छोले बेचता था। आज अपने को करोड़पति समझता है। थूकता हूं उस पर। जितनी बुराई कर सकते थे, करते चले गए, लेकिन ऑफिस से बाहर आकर सभी कहने लगे। आ गई अकल ठिकाने पर। अपने को तीसमारखां समझता था। अनाज मंडी में बोरियों में सुआ मार कर चावल चुराता था, आज चोरी का माल बेच कर अपने को धन्ना सेठ समझता है। अब देखते है, कौन करता है, इसकी लौडिया से शादी।
यही हाल चंदरभान की दुकान पर था। उसके दुकान में मजमा लग गया। एक के बाद एक ने कहना शुरू किया, सेठ जी आप ने बिल्कुल सही किया। एैसे नीच और औछे घर में आप के हीरे जैसे सुपुत्र की शादी हो, अपमान की बात है, भगवान ने सही समय पर आप को सदबुद्धी दे दी वरना उस परिवार में रिश्ता जोड़ कर आपकी सारी इज्जत डूब जाती, कलंक का टीका माथे पर लग जाता। किस बात की कमी है रितेश में आप के हुक्म की देरी है, सेठ जी, कहो तो यहां लड़कियों की लाइन लगा दूं। इतना सुन कर चंदरभान की छाती गर्व से फूल गई। आग में घी एक बुड्ठे ने और डाल दिया, “सेठ जी मैं ते पहले दिन से इस रिश्ते से खुश नही था कि आप सा सेठ एक चावल चोर के घर रिश्ता करे। आप को शोभा नही देता था। अरे आज चावलों का बड़ा व्यपारी बना फिरता है, पहले तो नजर बचा कर ट्रकों में से बोरियां गायब करता था अरे थूको उस पर। जितनी बुराई कर सकते थे, करते चले गए, लेकिन दुकान से बाहर आकर सभी कहने लगे। आ गई अकल ठिकाने पर। अपने को तीसमारखां समझता था। स्कूल के आगे खोंमचा लगा कर छोले बेचता था, आज अपने को करोडपति समझता है। अब देखते है, कौन करता है, इसके लौडे से शादी।
दोनों परिवारों के बडे तो अपनी झूठी शान पर इतरा रहे थे, लेकिन किसी ने रितेश और रूचिका के बारे में नही सोचा। रूचिका ने अपने कमरे से बाहर निकलना ही छोड़ दिया। बिना नहाये, संवरे तीन चार दिन निकल जाते थे, जो लड़की अपना सारा दिन बनने संवरने में व्यतीत करती थी, उसने आइना ही देखना छोड़ दिया। बड़ी मुश्किल से सूखी रोटी के दो निवाले गटकती थी। सबसे बात करना छोड़ दिया था। मां प्रेमवती आखिर अपना सब्र खो बैठी। रात को खाने के समय डायनिंग टेबल पर प्रेमवती ने प्रेमशंकर से कहा, “सुनो आप खुद तो बेफ्रिक हो कर खाना खा रहे हो, बेटी के बारे में भी क्या कुछ सोचा है। कुछ भी नही खाती। सूख कर कांटा हो गई है। उस दिन के बाद अपने कमरे से बाहर नही निकली।
तो क्या करूं। उस खोंमचे वाले के सामने सिर झुकाऊ। प्रेमशंकर ने नाराजगी से कहा।
एैसे नाजुक मौकों पर विनम्रता से बात करते है, आपने तो झगड़ा कर के बारात वापिस लौटा दी।
कहना क्या चाहती हो, सारा कसूर मेरा है, उस शराबी को देखा था, मंत्री जी के सामने मेरी बेइज्जती कर दी।
हमने उसका क्या करना है, रितेश तो हीरा है, एक भी एैब नही है। शादी से पहले रुचिका कितनी खुश होती थी उससे मिल कर। हर रोज घंटो फोन पर हंस हंस कर बाते करती थी। कितना प्यार करती है वो रितेश से। सारे सपने टूट गए है। मुझे तो उसको देख कर कुछ होता है। हर समय बुरे ख्याल मन में आते है, कि कुछ कर न बैठे।कह कर प्रेमवती फूट फूट कर रोने लगी।
खाने की थाली को पटक कर प्रेमशंकर ने गुस्से से कहा। कह दो अपनी लैला से, प्यार बाजी बंद करे। उसकी शादी उस घर में हरगिज नही होगी।
दुर्गाशंकर ने बीच में बात काटी। भाईसाहब भाभी ठीक कर रह हैं। हम कोई अमेरिका में नही रहते है, कि शादी टूट गई तो दूसरी चुटकी बजाते हो जाएगी। हम भारत में रहते है, यहां शादी टूटना सही नही माना जाता है। आप ठंडे दिमाग से सोचिए।
दुर्गा तेरी मति मारी गई है, तुम भाभी देवर ने मेरा जीना हराम कर दिया है। जो मैंने कह दिया, वह पत्थर की लकीर है, तुम दोनो सुन लो।
उस तरफ रितेश का हाल भी कुछ एैसा था। घर से बाहर ही नही निकलता था। चंदरभान ने डांट लगाई, “कब तक मजनू बन कर घर बैठा रहेगा। काम धंधा भी करेगा या नही। इश्क का भूत उतार सर से। उससे शादी का सपना छोड़ दे मन से।

महेन्द्र ने चंदरभान को समझाने की कोशिश की, “पिता जी ठंडा हो कर बात कीजिए, कितनी बदनामी हो रही है। मुंह पर तो सब मीठे बनते है, लेकिन पीठ पीछे सब गालियां दे रहे है। एैसी झूठी शान का क्या फायदा। लेकिन सब तर्क बेकार। चंदरभान और प्रेमशंकर अपनी झूठी शान पर अडिग रहे।
इस बात को एक महीना बीत गया। रितेश ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया, लेकिन उसका मन काम में नही लगता था। उठते बैठते सोते जागते रूचिका ही मस्तिष्क में छाई रहती थी। एक दोपहर लंच के बाद बिजली की रफ्तार से एक विचार आया कि रुचिका से बात की जाए, यदि उसकी हालत भी मेरे जैसी है तो दुनिया की एैसी तैसी। मोबाइल फोन काफी देर तक हाथ में लेकर भी साहस नही कर पाया। अगर वो बात न करे। काफी सोचने के बाद उसने सोचा कि एसएमएस करता हूं। अगर जवाब आया तो बात करूंगा। एक छोटा सा संदेश भेजा। तुमसे मिलना चाहता हूं।
उदास रुचिका बड़े दिनों के बाद आज आइने के सामने बैठी उलझे बालों को संवार रही थी, तभी उसके मोबाइल पर एसएमएस टोन बजी। मोबाइल कंपनी वाले प्रोमोशनल एसएमएस भेजते रहते है। उलटे उलटे मैसजो ने परेशान कर दिया है। उसने कोई ध्यान नही दिया। रात को बिस्तर में लेटे लेटे मोबाइल उठा लिया। आंखों से नीद गायब थी। मोबाइल के इनबाक्स से मैसेज एक एक करके डिलीट करते करते रितेश के मैसेज पर रुचिका की आंखें गढ़ गई। तुमसे मिलना चाहता हूं। उसे यकीन नही हुआ। कहीं वह सपना तो नही देख रही है। अपनी आंखों को मला, होठों को दांतो से काटा। यह सपना नही, हकीकत में रितेश का मैसेज था। हां लगता है, वो मुझे नही भूला है। मुझे उतना ही प्यार करता है, जैसे विवाह की घटना से पहले। थोड़ी देर तक सोचती रही, जब उसने मैसेज भेजा है तो जवाब देना चाहिए। आखिर रितेश क्या सोचता है, वह जानने के लिए उत्सुक थी। जवाबी मैसेज दिया कब।
उधर रितेश ने जवाब के लिए मोबाइल को एक पल के लिए भी नही छोड़ा। जवाब मिलते ही खुशियों से रितेश उछल पड़ा। फौरन संदेश भेजा। दिल तो अभी मिलने को कर रहा है, लेकिन कल दोपहर में।
रुचिका जवाब पाते ही खुशी में बिस्तर से लुढक गई। सारी रात दोनो एसएमएस ही करते रहे। पिछले एक महीने की जुदाई जो सदियों के समान लग रही थी, एक अंधेरी रात जो खत्म होने का नाम नही ले रही थी, सर्द रातों के बाद निकली सुनहरी धूप का बेसबरी से दोनों को इन्तजार था। दोपहर को रितेश ऑफिस से निकला और रुचिका ब्यूटी पार्लर के बहाने घर से निकली। दोनो कॉफी हाउस में मिले, जहां शादी से पहले मिला करते थे। एक कोने की टेबुल में कॉफी के कप के साथ दोनो एक दूसरे को निराहते रहे। न कुछ बोले और न कॉफी पी। हॉट कॉफी कोल्ड कॉफी बन गई। एक दूसरे की आंखों में झाकते न जाने किस दुनिया में खो गए। रितेश सोच रहा था कि रुचिका कुछ बोले और रूचिका रितेश की पहल का इन्तजार कर रही थी। पिछली रात सारी संदेशों के आदान प्रदान में निकल गई थी लेकिन आमने सामने मुंह पर ताले लग गए।
रूचिका अपने हाथों की अंगुलियों से अंगूठी निकाल कर दुबारा पहनती धीरे से बोली, ‘इसको पहचानते हो।


तभी तो यहां बुलाआ है।रितेश ने रूचिका के दोनों हाथों को पकड़ते हुए कहा। भला कोई अपनी वैड़िग रिंग भूल सकता है। यह सगाई पर मैनें तुम्हे पहनाई थी और तुम्हारी पहनाई अंगूठी यह देखो। रितेश ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।
इतने दिन क्या मेरी याद नही आई?”
सारा दिन तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता था, तभी कल एसएमएस किया था।
पहले क्यों नही किया?”
डरता था, माहौल ही कुछ एैसा था, पता नही तुम क्या सोचो। घर में सब तुम्हे भूलने को कहते थे, लेकिन भूल नही पाया। अब तुमसे एक वादा चाहता हूं कि मेरा साथ नहीं छोड़ोगी चाहे घर वालों से बगावत करनी पड़े।
क्या तुम विद्रोह कर सकते हो?”
बिल्कुल कर सकता हूं। अगर तुम साथ दो तो अभी इसी समय भाग चलते है। तैयार हो?”
मुझे नहीं मालूम, अभी यहां से चलते है, काफी देर हो गई है। दुबारा मंगाई हॉट काफी भी कोल्ड कॉफी में परिवर्तित हो चुकी थी। दोनों ने बिल चुका कर थोड़ी देर मॉल में समय व्यतीत किया।
अब बहुत देर हो गई है। ब्यूटी पार्लर के बहाने तुमसे मिलने आई हूं, अब मुझे वहां छोड़ दो।
रूचिका को ब्यूटी पार्लर छोड़ने के बाद रितेश ऑफिस आ गया। आज एक महीने के बाद रितेश का चेहरा दमक रहा था। महेन्द्र ने रितेश का खिला चेहरा देख कर चंदरभान से कहा, “आज रितेश बहुत खुश है। एक महीनें बाद आज रितेश नार्मल लग रहा है।
बेटे मैनें पहले तुझे कहा था, इश्क का भूत महीने दो में उतर जाएगा। देखना उससे अच्छे परिवार में रिश्ता करते हैं।
रितेश ने सुना और मन ही मन में हंस दिया। आखिर ये बुढ्डे कभी नही सुधरेगें।
उधर रुचिका जब घर फिल्मी गीत गुनगुनाते पहुंची तब प्रेमवती दंग रह गई। उसने एक लम्बी चैन की सांस ली, शुक्र है कि बेटी के अधरों पर मुस्कान आई। रात को डाईनिंग टेबल पर प्रेमशंकर से कहा आज रूचिका बहुत खुश है और वह ब्यूटी पार्लर भी गई, बिल्कुल पहले जैसी बेटी लग रही है।
अपनी छाती फुला कर प्रेमशंकर ने गर्व से कहा मैं पहले ही जानता था, आज के समय लैला मजनू का खेल ज्यादा दिन तक नहीं चलता है। एक महीनें में ही उतर गया आखिर। अब उसका रिश्ता एैसे घर में करूंगा कि दुनिया देखती रह जाएगी।

लेकिन चंदरभान और प्रेमशंकर दोनों को मालूम नही था, कि इश्क का भूत और अधिक चिपक गया है रितेश और रूचिका को, जो इस जन्म में तो उतरता नजर नही आता है। रितेश से मिलने के लिए घर से कैसे निकले। कमरा बंद कर दोनों घंटो फोन पर बातें करते रहते। घर वाले बेफ्रिक हो कर आगे रिश्ते की बातें करनें लगे, लेकिन अपनें ऊंचे परिवार और मान मर्यादा का घंमड जल्दी ही टूटता नजर आने लगा। वे जहां भी रिश्ते की बात करते उचित उत्तर नही मिलता। तिलमिला कर रह जाते। एक दो ने साफ इन्कार कर दिया कि अधूरी शादी के बाद वे रिश्ता नही बनाना चाहते है।
आखिर रितेश ने सुझाव दिया कि रूचिका कंमप्यूटर कोर्स करने के बहाने घर से रितेश को मिलने निकले। यह योजना काम कर गई। कोर्स की फीस के लिए रुचिका ने पचास हजार रूपये झटक लिए। रुचिका ने फोन किया, “रितेश गुड न्यूज, तुम्हारा दिमाख तो यार वाकई कमाल है, मिशन कमप्लीट।
फिर तो बिना नागा रोज मिल सकते है।
लेकिन एक गडबड हो गई, कोर्स का टाइम गलती से सुबह दस से एक का बता दिया।
कोई बात नही, यह समय सबसे ज्यादा अच्छा है, मिलने के बाद आराम से ऑफिस जा सकता हूं। लेकिन संडे को कैसे मिलेगें।
संडे की तो छुट्टी रखनी पडेगी।रुचिका ने हंसते हुए कहा।
अगले दिन ही दोनों ने मॉर्निग शो में फिल्म देखी, उसके अगले दिन शापिंग मॉल में घूमते हुए रूचिका एक जूलरी शॉप के आगे रूक गई। विंडो शॉपिंग करते करते रितेश से कहा, “जरा अंदर चलो।
खर्चा करवाने का इरादा है क्या?”
बिल्कुल उलटा करने का इरादा है। एक हीरे की अंगूठी रितेश के लिए पसंद कर के बोली, “कैसी है, पहन कर दिखाऔ। रितेश की अंगुली में डाल कर हंसती हुई बोली, “फनटास्टिक, अब यह अंगूठी हाथ से कभी नहीं उतरेगी। दुकानदार से कहा बस बिल बना दो। पूरे पचास हजार रूपये जो रुचिका ने कोर्स के नाम से लिए थे, रितेश की अंगूठी खरीदने में खर्च कर दिए।
“:अब कंमप्यूटर कोर्स का क्या होगा? सारी फीस तो अंगूठी में खर्च कर दी।
मेरा कंमप्यूटर कोर्स सिर्फ तुम हो। तुम मुझे वापिस मिल गए, इससे ज्यादा कुछ नही मांगती।
जूलरी शॉप से निकल कर रूचिका स्टेशनरी शॉप पर रूक गई।
यहां क्या करना है?” रितेश ने हैरानी से पूछा।

मिस्टर ऐबसेन्ट मांइड, मुझे रजिस्टर और कंमप्यूटर की किताबें ले दो, वरना घर पर पिटाई का पूरा इन्तजाम करवा रहे हो। क्या जवाब दूंगी, घर जा कर?”
इस तरह घर से बेखबर दोनों रोज मिलते रहे। उधर चंदरभान और प्रेमशंकर की परेशानियां बढती जा रही थी। रस्सी तो जल गई थी लेकिन बल नही निकल रहा था, जहां भी रिश्ते की बात करते, नही सुनने को मिलता।
एक दिन अपनी दिनचर्या के मुताबिक रुचिका दोपहर के एक बजे रितेश के साथ कार में वापिस आ रही थी। कार ट्रैफिक सिग्नल पर रूकी। दोनो अपनी बातों में मस्त थे। रुचिका के चाचा दुर्गाशंकर की कार एकदम साथ रुकी, लेकिन दोनों को पता नही चला। अचानक से दुर्गाशंकर की नजर रूचिका पर पडी तो वह अवाक रह गया, लेकिन तुरन्त संभल कर मुंह दूसरी तरफ कर लिया। रात को डाइनिंग टेबल पर दुर्गाशंकर ने बात छेडी। भाईसाहब, आप बेकार में रूचिका के रिश्ते के लिए दर दर भटक रहे है और जगह जगह अपमानित भी होना पड़ रहा है। आप रितेश के बारे में क्यों नही दुबारा सोचते?”
रितेश का नाम सुन कर रूचिका के हाथ से चम्मच छूट गया।
दुर्गा कहीं तुम नशा कर के तो नही बोल रहे हो। तुम्हे मालूम है, कि क्या बोल रहे हो?” रितेश का नाम सुन कर रुचिका भी घबरा गई।
भाईसाहब मैं बिल्कुल होश में हूं और चाहता हूं कि आप भी होश में आ जाए तो अच्छा है। हमें अपने परिवार के झूठे मान सम्मान को भूल जाना चाहिए। हर रोज जहां रिश्ते की बात करते है, कितनी तकलीफ देह बातों को सुनना पडता है। लोग ने तो यहां तक कह दिया है कि आधी शादी को पूरा कर दो, उनको झूठन नही चाहिए।
दुर्गा।।।प्रेमशंकर क्रोध में आग बबूला हो कर थाली को पटक कर बोले।
बेटे तुम अपने कमरे में जाऔ।दुर्गाशंकर ने रुचिका से कहा।
घबरा कर रुचिका कमरे में खडी हो कर अपने चाचा की बातों को सुनने लगी। उसका दिल जोर से घडकने लगा। कहीं कुछ अनर्थ न हो जाए।
भाई साहब गुस्से को शांत कर के बात सुनेगों तभी हमारे परिवार का हित होगा। मिथ्या के पीछे कब तक भागेंगें। आप शांति से मेरी बात पर विचार कीजिए। रुचिका पूरी तरह रितेश के प्यार में गिरफ्त है। प्यार का भूत कभी नही उतरेगा।दुर्गाशंकर ने जो दोपहर को देखा, विस्तार से बताया।
बात सुन कर प्रेमशंकर एकदम सन रह गया, कुछ नही कह सका। प्रेमवती ने भी देवर दुर्गाशंकर का समर्थन किया, कि जहां बेटी की खुशी, वहां हमारी खुशी। आप चंदरभान जी से बात कीजिए।
यह मुझसे नही होगा।
भाईसाहब आप मत जाईए, मैं बात शुरू करता हूं।
यह नही हो सकता।कह कर प्रेमशंकर कमरे में चले गए। पूरी रात प्रेमवती प्रेमशंकर को मनाती रही, आखिर टूटा अहंकार झुक गया कि दुर्गाशंकर किसी तरह फिर विवाह की बात शुरू करे।
दुर्गाशंकर ने रूचिका को संतावना दी कि वह घबराए नही, अगर तुम और रितेश अडिग रहो तो वह पूरी कोशिश करके विवाह को संपन्न करवाएगा। बाकी बचे छः फेरे पूरे होंगे।
रूचिका ने रितेश को पूरी बात बताई। रितेश ने कहा, “अब हमारे विवाह को कोई नही रोक सकता, बस अब समय है हमारे धैर्य का।
अगले दिन दुर्गाशंकर ने महेन्द्र से मुलाकात के लिए फोन किया। नमस्कार महेन्द्र भाई जी। आपसे मिलने का समय चाहता हूं।
नमस्कार दुर्गा भाई, कोई खास बात है।
मिलने पर ही बताउगां। अति शीघ्र मिलना चाहता हूं। लेकिन कहीं बाहर मिलना चाहता हूं।
ठीक है, दोपहर में मिल सकते हैं।
मैं आपका इन्तजार रैस्टोरेंट में करता हूं।
दोपहर दो बजे महेन्द्र और दुर्गाशंकर रैस्टोरेंट में मिले, दुर्गाशंकर ने बात शुरू की, “भाईसाहब जो शादी के समय हुआ, उसको भूल जाइए और आगे जिन्दगी शुरू करते हैं। मैं फिर से विवाह का प्रस्ताव लेकर आया हूं।
कुछ देर की चुप्पी के बाद महेन्द्र ने जवाब दिया। मैं इस विषय में आपको संतोषजनक जवाब नही दे सकता हूं, क्योंकि आप जानते हैं कि मेरे पिता और आपके भाई रूकावट डाल सकते है। उनकी सहमति आवश्यक है।
आप हमारी तरफ से निश्चिन्त रहिए, क्योंकि मैंनें प्रेमशंकर से बात कर ली है, हांलाकि वह कुछ ना नकुर कर रहे है, लेकिन मन ही मन इस विषय में उनकी रजामंदी समझिए। अब आप अपने पिता जी को रजामंद किजिए। एक बात जो आप भी शायद नही जानते होंगे कि रितेश और रूचिका पिछले एक महीने से हर रोज मिलते हैं, मुझे कल ही इस बात का पता चला जब मैंनें उन दोनों को एक साथ कार में देखा। हम दोनों परिवार आपस में बैर निकालनें में जुटे हैं और वे दोनों साथ जीने मरने की कसमें खा रहे है। जब मियां बीबी राजी तो क्या करे काजी। हमें अपने मिथ्या अहंकार को छोड़ कर बच्चों के हित में सोचना चाहिए।
तभी रितेश का व्यवहार इतना अचानक से कैसे बदल गया, मैं खुद नही जान सका। महेन्द्र ने आश्चर्य से कहा।
यही बात हम भी नही पहचान सके। कंमप्यूटर कोर्स की फीस के बहाने रूचिका ने हमारे से पचास हजार रूपये लिए और आप सपने में भी नही सोच सकते कि उसने उन रूपयों का क्या किया?” दुर्गाशंकर ने कहा।
आप सस्पेंस मत रखिए, साफ साफ बताइए। महेन्द्र ने आश्चर्य से पूछा।
उन रूपयों से रूचिका ने रितेश के लिए हीरे की अंगूठी खरीदी।
विवाह के समय भी मैंनें और आपने काफी कोशिश की थी कि विवाह संपन्न हो जाए लेकिन मेरे पिता और आपके भाई को मूंछ की पड़ी थी, लेकिन अब आप निश्चिन्त रहिए, जब आपने पहल की है तो मेरा फर्ज है कि बच्चों की खुशी के लिए पिता जी की मूंछ नीचे करनी पडेगी।
घर वापिस आ कर जब महेन्द्र ने चंदरभान से विवाह की बात की तो एक बार चंदरभान गुस्से से लाल पीला हो गया लेकिन दो चार दिन बाद आखिर झुकना पड़ा। कब तक झूठी शान के चक्कर में रहते। जहां भी विवाह की बात की, मुंह की खानी पड़ी। कमबख्त मजनू ने नाक कटवा दी। चंदरभान ने कहा तो महेन्द्र के साथ सुरेन्द्र ने भी कहा कि झूठी शान छोडिए, बच्चे लैला मजनू नही बनेगें तो क्या हम बुढ्डे लैला मजनू बनेगें।
चंदरभान और प्रेमशंकर दोनों झूठे अहंकार से टूट चुके थे, विवाह को सादगी से परिवार के सदस्यों के साथ करने का निश्चय किया। पहले तमाशा देख चुके हर पल को सावधानी से व्यतीत करना चाहते थे, कि फिर से कोई अनहोनी न हो जाए। सुरेन्द्र तू शादी में नही जाएगा, फिर कोई बखेड़ा न हो जाए। चंदरभान ने हिदायत दी।
पिता जी पहले मेरे कारण विवाह में विघ्न हुआ, उसको दूर करना मेरा फर्ज है। बाकी बचे फेरे मैं पूरे करवाउगां। मुझे आपका आर्शीवाद और बच्चों का स्नेह चाहिए।सुरेन्द्र ने विनती की।
दादा जी इस बार कुछ नही होगा। रितेश ने कहा।
मजनू की छटी औलाद, तू चुप रह। चंदरभान ने हंस कर ठहाका लगा कर कहा।
इस बार विवाह समारोह सीधा वेदी से फैरों के लिए शुरू हुआ। पंडित जी ने सात फेरे पूरे करवाए। सुरेन्द्र ने चुटकी ली। पंडित जी आपको गिनती नही आती, कौन से स्कूल से पढे हुए हो, आपने एक फेरा पहले करवाया और अब सात, टोटल आठ फेरे हो गए, पंडित जी।
इस बार पूरा पक्का काम करवाया है मैंने, एक दम मजबूत काम हुआ है। एक फेरा अतिरिक्त माने कि मजबूत गठबंधन। सारी जिन्दगी नही टूटेगा। डबल फीस लूंगा। गारन्टी के फेरे हैं आठ फेरे। पंडित जी के कहते ही सभी ठहाके लगा कर हंसने लगे। आठ फेरे। मजबूत गठबंधन। आठ फेरे। मजबूत गठबंधन। हा हा हा। ठहाको की गूंज के बीच रितेश और रूचिका आंखों ही आंखों में एक दूसरे को देख कर मुसकराते हुए सोच रहे थे, कि कहां गया बुढडो का अंहकार, मान मर्यादा, प्रतिष्ठा, सम्मान। ये तो झूठे हैं, झूठो का क्या?
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