Sunday, May 11, 2014

तीसरी


हांफते हुए जयप्रकाश ने देवराज के घर की घंटी बजाई। सुबह छ: सवा छ: बजे का समय हो रहा है। आंखे मलते हुए देवराज ने दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही झट से जयप्रकाश बदहवासी सी हालात में घर के अंदर छुपने की जगह ढूंढने लगा।
देवराज – क्या हुआ।
जयप्रकाश – बचा ले मुझे, देव। आज तू ही मेरा सहारा है।
देवराज – बता तो सही, हुआ क्या? तेरी बात समझ में नही आ रही है।
जयप्रकाश – दोनों मेरे पीछे लगी हुई हैं। कभी भी यहां पहुंच सकती हैं। आज तो मेरी शामत है।
देवराज – कौन दोनों?
जयप्रकाश – और कौन? दुर्गा और काली।
देवराज समझ गया कि जयप्रकाश अपनी दो पत्नियों की बात कर रहा है। एक को दुर्गा और दूसरी को काली कह रहा है। देवराज पुरानी कारे खरीदने, बेचने का कार्य करता है और जयप्रकाश परिवहन विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत है। कारों की खरीद फरोख्त के सिलसिले में नाम ट्रांस्फर, फिटनेस, लाईसेंस हेतु परिवहन विभाग में काम पडता है। कागजों पर जयप्रकाश ने साईन करने होते है या उसके किसी साथी ने। परिवहन विभाग में हर काम के लिए रकम खर्च करनी पडती है। हररोज काम हो, तो दोस्ती हो जाती है। हमउम्र देवराज और जयप्रकाश की दोस्ती पक्की हो गई। देवराज फोन कर देता, जयप्रकाश देवराज के घर से कागज ले जाता और अगले दिन सुबह काम करके कागज दे जाता। कांम फटाफट हो जाता। इसलिए दूसरे कार डीलर भी देवराज की मार्फत काम करवाते। दोनों में अच्छा तालमेल, दोस्ती हो गई। एक दूसरे के घर आना जाना, सुख, दुख बाटना कई वर्षो से पक्की दोस्ती हो गई थी। क्योंकि परिवहन विभाग में कोई भी कार्य बिना रिश्वत के होता नही है, जयप्रकाश ने मोटी रकम जमा कर ली थी। दो मकान, कारें, बैंक बैलेंन्स, सोना, चांदी, सभी कुछ अनगिनत। जयप्रकाश ने दो विवाह किये। पहली पत्नी का नाम दुर्गा और दूसरी का नाम कमला, जिसे वह काली कहता है, थोडा रंग काला है। पूरी तरह काली तो नही थी, सांवली थी, लेकिन वह काली ही कहता था। देवराज हैरान है, कि जयप्रकाश इतना घबराया हुआ क्यों है? वह समझने में असमर्थ, परन्तु कोशिश करता है।
देवराज – यार, सवेरे सवेरे क्या हो गया, तबीयत तो ठीक है न?
जयप्रकाश – अभी तो तबीयत ठीक है, परन्तु जल्द ही बहुत खराब होने वाली है। तू मुझे कहीं छुपा ले।
देवराज – आराम कर, चल अंदर बैठते है।
देवराज ने पत्नी सुनीता को आवाज दी – नीते, जय आया है, जरा ठंडा पानी दे और चाय का पानी रख।
सुबह के समय सुनीता ने अभी स्नान नही किया है, वह नाईटी पहने कमरे में आती है और ठंडा पानी जय को देती है।
सुनीता – भाई साहब आप की तबीयत ठीक नही लग रही है। पसीने से तरबतर हो। फिर पति देवराज से कहती है – सुनो, भाई साब को बिस्तर पर लिटाऔ। चेहरा पीला फक हो रक्खा है। डाक्टर को बुलाऔ।
देवराज जयप्रकाश को अंदर कमरे में ले जाता है। सुनीता चाय के साथ बिस्कुट लेकर आती है।
जयप्रकाश – भाभी जी, कुछ भी खाने, पीने का दिल नही है। एक घूंट भी नही निगल सकूंगा।
सुनीता – भाई साब, कुछ तो कहो, दिल पर बोझ मत रखो, हम तो आपके अपने हैं।
जयप्रकाश रोने लगा। आंखों से आंसू टपकने लगे।
देवराज – यार तू दफ्तर नही जा रहा क्या? भसीन कह रहा था, उसे जरूरी काम था। दो दिनों से तेरे को ढूंढ रहा है।
जयप्रकाश – मैं तीन दिनों से दफ्तर नही जा रहा हूं।
देवराज – पर क्यों? तबीयत ठीक नही, तो डाक्टर से सलाह ले, अस्पताल चले।
जयप्रकाश – दोनों ने दफ्तर में डेरा डाल रखा है।
देवराज – दोनों कौन?
जयप्रकाश – वोही, दुर्गा और काली। दोनों तीन दिनों से दफ्तर के अंदर सारा दिन बैठी रहती हैं। मैं तो बाहर से वापिस चला जाता हूं।
देवराज – किस के घर जाता है, दुर्गा के या काली के?
जयप्रकाश – किसी के भी नही।
देवराज – क्या? किसी के घर नही जाता है, ऑफिस भी नही जा रहा है, कहां रहता है?
कुछ देर की चुप्पी के बाद जयप्रकाश बोला – तीसरी के घर।
सुनीता जो जयप्रकाश की दयनीय हालात पर तरस खा रही थी, चुप न रह सकी। हक्की बक्की ताकती बोली – भाई साहब, क्या अनर्थ किया। तीसरी शादी कर ली।
हकलाते हुए जयप्रकाश ने तीसरी शादी कबूल की। यह सुनते ही सुनीता चिल्ला कर बोली – अक्ल मारी गई थी या किसी पागल कुत्ते ने काटा, जो दो के होते तीसरी शादी की। सोचा नही, कि सबकी जिन्दगी बर्बाद हो जाएगी।
देवराज अब तक जयप्रकाश की तबीयत की खैर खबर ले रहा था, तीसरी शादी की बात सुन कर आगबबूला हो गया – सूअर, खोते, क्या सोच कर तीसरी शादी की, दो ने तो तेरा घर स्वर्ग बना रखा था, अब खुद सबकी जिन्दगी नर्क कर दी। तूने मुझे भी नही बताया। क्या कर दिया?
सुनीता – खडे क्या सोच रहे हो, मिलाऔ फोन दुर्गा और काली को। बता दो हरामी यहां है।
जयप्रकाश – भाभी जी नही, उन्हे नही बताऔ।
सुनीता – पर क्यों? शादी करने से पहले क्या हमसे सलाह ली थी। तेरी बारात में नाचे थे क्या?
देवराज – छोड नीते, इसकी हालात ठीक नही है। ब्लडप्रेशर भी ज्यादा लग रहा है। इसको आराम करने दे। कुछ सोचते हैं। अच्छा जय, हम दूसरे कमरे में जा रहे है। तू आराम से सो जा। फिक्र न कर, जब तक तू यहां है, दुर्गा, काली को फोन नही करेगें।
जयप्रकाश ने तीन दिनों से आराम नही किया था, वह थोडी देर में सो जाता है।
दूसरे कमरे में देवराज और सुनीता जयप्रकाश के बारे में बात कर रहे है और एक निर्णय करते हैं, कि जब तक जयप्रकाश की तबीयत ठीक नही होती, वे दुर्गा और काली से कोई बात नही करेगें।

बात लगभग दस वर्ष पहले की है। लम्बा, गोरा, चिट्टा जवान गबरू जयप्रकाश, जिसको देख कर कोई भी लडकी गश खा जाए। ग्रेजुएशन के फौरन बाद सरकारी नौकरी लग गई। परिवहन विभाग में, जहां रिश्वत के बिना कोई काम होता ही नही। दो साल में ही मोटी रकम जमा कर ली। एक तो गबरू जवान ऊपर से मोटी रिश्वत वाली पक्की नौकरी, शादी के लिए खूबसूरत लडकियों के घरवाले आगे पीछे घूमने लगे। विवाह खूबसूरत दुर्गा के साथ संपन्न हुआ। खूबसूरत जोडे को देख कर हर कोई गश खाता था। शायद दुनिया की नजर लगी, दोनों के संतान नही हुई। बडे से बडा कोई भी डाक्टर नही छोडा। सारे इलाज करवाए, पर संतान का सुख नही पा सके। सात वर्ष बीत गए। दुर्गा ने खुद जयप्रकाश को दूसरी शादी की अनुमति दी। गरीब परिवार की कमला से विवाह हो गया। रंग काला होने के कारण जयप्रकाश कमला को काली कहता था। दुर्गा पुराने मकान में रहती थी। काली दूसरे मकान मे। जयप्रकाश एक दिन दुर्गा के पास रहता, सुबह का नाश्ता दुर्गा के साथ। दुर्गा टिफिन ऑफिस के लिए देती, शाम को जयप्रकाश काली के पास रहता, सुबह का नाश्ता काली के साथ, काली टिफिन ऑफिस के लिए देती। शाम को जयप्रकाश दुर्गा के पास जाता। यह सिलसिला तीन साल तक चलता रहा। कुदरत का करिश्मा देखिए, जयप्रकाश को दो संतानों का सुख मिला। काली से पहली संतान और ठीक एक साल बाद दुर्गा से दूसरी संतान। जहां सात वर्षो तक दुर्गा संतान को तरसती रही, काली के मां बनते ही दुर्गा भी मां बन गई। सभी खुश थे। किसी को कोई किसी से शिकायत नही थी। देवराज जयप्रकाश का घनिष्ठ मित्र था, हंसी ठठ्ठा चलता रहता था। देवराज मजाक करता, कि क्या किस्मत पाई है, लोगों से एक बीवी संभाली नही जाती, तूने दो दो के साथ गृहस्थी रमा रखी है। किस्मत कहें, कुदरत, यह तो शायद जयप्रकाश के हाथों की लकीरे थी। जो आपके मन को भाए। यह भी हाथों की लकीरों में लिखा था कि एक दिन यह भी आएगा, कि वह उन दो बीवीयों से भागता फिरेगा, जो उसको पूजती हैं। आखिर काम भी तो उसने गलत किया है। उसकी मति मारी गई थी। कहावत है, गीदड की मौत आती है, तब वह शहर की ओर दौड लगाता है। जयप्रकाश ने तीसरी शादी कर ली, वो भी गुपचुप, किसी को कोई खबर नही। एक नर्स के साथ तीसरा विवाह। उस नर्स को भी नही पता चला, कि जयप्रकाश को दो पत्नियां पहले से है। रुपये की कोई कमी नही, एक फ्लैट और ले लिया तीसरी पत्नी के लिए। जयप्रकाश अभी भी गबरू जवान, कोई उसको देख कर कह ही नही सकता था, कि वह दो पत्नियों वाला, दो बच्चों का पिता है। नर्स उसके रूपयों की चमक में खो गई। दो पत्नियों के साथ गजब का रूटीन था। एक दिन एक के साथ, दूसरे दिन दूसरी के साथ, वो भी दोनों की रजामंदी के साथ। दोनो पत्नियों को मालूम होता था, कि उनका पति कहां है। जब तीसरी शादी कर ली और अधिक समय तीसरी के साथ बीतने लगा, तो रूटीन बिगड गया। दोनों पत्नियों का माथा ठनका। आपस में बातचीत की, कुछ नही पता चला, कि मामला क्या है। तब दोनों ऑफिस में गई, तो जयप्रकाश गायब। ऑफिस वालों को भी नही पता, कि भाई साहब कहां हैं। आखिर कब तक ऑफिस नही जाएगा। सरकारी नौकरी है, बिना बताए कब तक छुट्टी पर रहेगा।     

दोपहर के दो बजे जयप्रकाश की नींद खुली। सुनीता ने खाना खिलाया।
सुनीता – भाई साब, आपने यह क्या किया। बहुत गलत किया। तीसरी शादी क्या सोच कर की, दो काफी नही थी क्या। यहां लोग एक को संभाल नही सकते, आप की दो के साथ परफेक्ट सेटिंग थी। तीसरी के साथ तो भगवान भी नही बचा सकता।
सुनीता के कटी जली सुन कर जयप्रकाश फिर से डिप्रेशन में चला गया। खाने का निवाला निगल नही सका। बदन पसीने से नहा गया। देवराज ने उसे कार में बिठाया और नजदीक के नर्सिंग होम ले गया। डाक्टरों ने इलाज शूरू किया। टेस्ट किए गए। दवाइयों के असर से नींद आ गई।
सुनीता – सुनों अब आप दुर्गा, काली को फोन कर दो। कब तक छुपा कर बात रखी जा सकती है। जो करेगा, वही भरेगा।
देवराज – ठीक कहती है तू नीते। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। आज तीसरी की है, क्या मालूम, कल को चौथी कर ले। ठरक की कोई सीमा नही होती।
कुछ देर बाद दुर्गा, काली नर्सिंग होम आती हैं। सभी विषय की गंभीरता पर चर्चा कर रहे है। दुर्गा, काली का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उग्र रूप में आज तो भैरव का संहार शर्तिया होगा। देवराज और सुनीता को इस की भनक लग चुकी थी। वो तो सिर्फ मूक दर्शक बन कर मैच देख सकते है।
रात के आठ बजे नर्सिंग होम में डाक्टरो, नर्सों की ड्यूटी बदली। नाईट शिफ्ट की नर्स ने कमरे में प्रवेश किया। जयप्रकाश को देख कर सुबक सुबक कर रोने लगी।
नर्स – जय, यह क्या हो गया, तुमको? फिर कमरे में बैठे दुर्गा, काली, सुनीता और देवराज से पूछा – मैंने आप को पहचाना नही।
देवराज – क्या आप जयप्रकाश को जानती हो?
नर्स – जय मेरा पति है।
यह सुन कर दुर्गा, काली, सुनीता और देवराज एक साथ चिल्ला पडे – क्या, पति?
नर्स – चिल्ला क्यों रहे हो? देखते नही, मेरा पति बीमार है। लेकिन आप मेरे पति के कमरे में क्या कर रहे हो?
नर्स की बात सुन कर दुर्गा और काली ने उग्र रूप धारण कर लिया। दुर्गा ने नर्स का एक हाथ पकडा और दूसरा काली ने। दोनों हाथ मरोड दिए। दर्द से नर्स चिल्ला पडी। शोर सुन कर वार्ड बाय और जूनियर डाक्टर आ गए और नर्स को छुडवाया।
जूनियर डाक्टर – देखिए आप नर्स के साथ झगड क्यों रहे हो?
देवराज नाजुक मौके को संभालता है और डाक्टर को समझाता है, कि कोई अप्रिय बात नही होगी। कोई किसी के साथ मारपीट नही करेगा। देवराज की बात सुनकर जूनियर डाक्टर और वार्ड बाय चले जाते हैं। देवराज दुर्गा, काली और नर्स को शांत करता है। सुनीता सबको पानी देती है।
देवराज नर्स से – आपने जयप्रकाश से शादी कब की।
नर्स – आपसे मतलब।
देवराज – मतलब इसलिए क्योंकि आप इनसे मिलो। यह दुर्गा जयप्रकाश की पहली पत्नी। दस साल पहले शादी हुई। ये हैं काली, दूसरी पत्नी, शादी तीन साल पबले हुई।अब आप बताए, आप तीसरी पत्नी, शादी कब हुई।
यह सुन कर नर्स शान्त बैठी रही, कुछ नही बोली।
दुर्गा – कर्मजली, क्या सोच कर शादी की?
काली – मोटी आसामी को फांस लिया। क्या सोचा था, मोटी रकम ऐंठने के लिए शादी की।
सुनीता – आराम से बात करो। ऐसे किसी बात को सुलझा नही सकेंगे।
देवराज सबको शान्त करवाता है।
देवराज नर्स से – देखो, अब आप को मालूम हो गया है, कि जयप्रकाश शादीशुदा है, एक नही दो पत्नियों का पति है। आप बताऔ, कि आपने क्या सोच कर जयप्रकाश से शादी की।
नर्स – मुझे क्या पता था, कि जय पहले से शादीशुदा है। गबरू जवान, पच्चीस का जवान लगता है, शादी कर ली।
देवराज – आप जय से कब पहली बार मिली थी?
नर्स – तीन महीने पहले जय नर्सिंगहोम आया था, अपने दोस्त से मिलने। मुलाकात हुई, मुझे जय से मिलना अच्छा लगा। फिर मिलते रहे और पिछले महीने शादी की।
देवराज – शादी की, मगर उसके घरवालों से मिली क्या? कुछ जानने की कोशिश की क्या?
नर्स – जय का घर जालंधर में है। उसने बताया, कि प्रेम विवाह के खिलाफ है उसका परिवार, इसलिए हमने कोर्ट मैरिज की।
सुनीता – क्या, कोर्ट मैरिज। बेडा गर्ग, सत्यानाश।
कोर्ट मैरिज की बात सुन कर सब भौचच्के रह गए।
देवराज सिर पकड कर बैठ गया, कि जयप्रकाश ने क्या किया, किसी को नही बताया और चुपचाप कोर्ट मैरिज कर ली। दुर्गा, काली रोने लगी। सुनीता संतावना दे रही थी। नर्स ठगी गई। कुछ देर बाद जयप्रकाश की नींद खुली। तीनों को एक साथ देखकर सकपका गया। क्या कर सकता है कोई जब औखली में सिर दे दिया तो मूसल से क्या डरना। जो घबराहट सुबह थी, गायब हुई, समय का मुकाबला करने के लिए भगवान ने ताकत दी।
जयप्रकाश – मुझे माफ कर दो।
पक्की अमृतसरनी दुर्गा ने जयप्रकाश के हाथों को पकड कर पूरा शरीर को झंझौर दिया – कंजरा, तूने क्या किया। मजबूरी में तुझे दूसरी शादी की इजाजत दी थी, अब हवस इतनी बढ गई, कि बतना भी जरूरी नही समझा, तीसरी भी कर ली।
जयप्रकास – अब इजाजत दे दे।
देवराज समझ चुका था, कि भैरव का काल नजदीक है। काली ने जयप्रकाश के बाल नोंचे।
काली – मजाक समझ रखा है, कुत्ते। कितनी शादियां करेगा।
जयप्रकाश चुप रहा।
काली और दुर्गा अपने उग्र रूप में जयप्रकाश को पीटने लगी। जयप्रकाश चिल्लाने लगा। शोर सुन कर नर्सिंगहोम के सभी डाक्टर, नर्से, वार्डबाय इक्कठे हो गये। अब नर्स भी दुर्गा, काली के साथ जयप्रकाश को पीटने लगी। देवराज और सुनीता चुपचाप तमाशा देखते रहे। डाक्टर, वार्डबाय और नर्सो के पास भी कोई इलाज नही था। डाक्टरों ने नर्सिंगहोम के मालिक मेंहन्दीरता को बुलाया।
मेंहन्दीरता – आप इसको घर ले जाऔ। हम यहां कोई अशान्ति नही चाहते।
दुर्गा और काली एक साथ – किसके घर जाएगा।
जयप्रकाश ने टुकर टुकर तीनों को बारी बारी से देखा।
नर्स – कोई चौथी पकड ले। खबरदार जो मेरी तरफ देखा। तलाक के कागज भिजवा दूंगी। चुपचाप साईन कर दिऔ।
नर्स की बात सुन कर दुर्गा और काली एक साथ बोली – हमारे तलाक के कागज भी साईन कर देना। कंजर कही का। जहां जाना हो, जा, हमारे घर मत आना।
देवराज – दोस्त, साथ यहीं तक था। अब तो दोस्ती समाप्त। चलता हूं, बाकी जो ठीक समझे, कर लेना। मेरे से कोई मदद की उम्मीद रखना। चल नीते, हरामी से यह उम्मीद नही थी।
जयप्रकाश कमरे में अकेला रह जाता है। देवराज, सुनीता के साथ दुर्गा और काली भी प्रस्थान करती है। नर्स गुस्से में पानी जयप्रकाश के मुंह पर फैंक कर पैर पटकती चली जाती है।
मेंहन्दीरता – अब जनाब क्या करूं आपका। नर्सिंगहोम का बिल कौन भरेगा?
जयप्रकाश – आपको बिल की पडी है, यहां लाईफ बर्बाद हो गई।
मेंहन्दीरता – की किसने, खुद तुमने। जो किया, अब भुगतो। इससे पहले बाकी मरीज भाग जाए, बिल भर के दफा हो जाऔ।
जयप्रकाश – कहां जाऊं?

मेंहन्दीरता – चौथी तलाशो और अपना चौथा करवाऔ।   
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