Saturday, May 24, 2014

आम

अमरूद नही हूं मैं,
जो  पेट ठीक करूं।
पपीता नही हूं मैं,
जो हाजमा ठीक करूं।
चीकू नही हूं मैं,
जो बीमार को ठीक करूं।
मौसमी नहीं हूं मैं,
जो तबीयत ठीक करूं।
तरबूज नही हूं मैं,
जो गर्मियों में तरावट करूं।
खरबूजा नही हूं मैं,
जो मुंह को मीठा करूं।
फालसा नही हूं मैं,
जो शरबत बन ठंडक करूं।
जी मैं तो आम हूं,
मीठा मीठा, पेड का पका हुआ,
अमृत बन जाऊं।
जी मैं तो आम हूं,
खट्टा खट्टा, मसाले वाला,
जो अच्छे अच्छे को बीमार कर दूं।
कुदरत मुझे पेड पर पकाती है,
नेता स्वार्थ का मसाला लगाते है।
जी मैं तो मैंगो मैंन हूं,
मीठा मीठा, खट्टा खट्टा। 
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