Sunday, December 21, 2014

नंबर


इंदौर के छप्पन में रात के समय विवेक परिवार के साथ वयंजनो का लुत्फ़ उठा रहे थे। काफी शोर गुल के बीच पिकनिक का सा मज़ा विवेक पत्नी वीना, पुत्र. पुत्रवधु और पौत्र के साथ ले रहे थे। मोबाइल फोन जेब में पड़ा था। दो चार बार बजा पर हल्ले गुल्ले शोर गुल में फ़ोन का पता ही नहीं चला कि कब कितनी बार फोन महाराज ने दस्तक दी फिर नाराज़ हो कर चुप चाप लंबी चुप्पी कर कोप भवन में चले गए कि फिर बजने की जुर्रत नहीं की।

पंद्रह दिन की छुटी लेकर विवेक अपने पुत्र के पास मिलने आया। पांच दिन कैसे बीत गए। विवेक को पता ही नहीं चला। छटे दिन सुबह नींद खुली। फ़ोन देखा रात को बॉस की पांच मिस्ड कॉल्स। ये बॉस को क्या हो गया जो रात में पांच कॉल्स कर दी। सब कुछ खैरियत हो, यही सोच कर विवेक ने बॉस को फोन किया। जिस बात का डर था वही हुआ। ऑफिस में ज़रूरी काम के चलते विवेक को वापिस आना होगा।

"सर टिकट नहीं मिलेगी। सर कुछ तो सोचिये।"
"मैं कुछ सोचने लायक रहा ही नहीं। फ्लाइट की टिकट ईमेल कर कर रहा हूं। इमरजेंसी है तभी छुटटी कैंसल कर रहा हूं।"

बॉस ने आर्डर सुना दिया और विवेक कर भी क्या सकता था। प्राइवेट नौकरी है, सब करना पड़ता है। एक सरकारी नौकर होते है। कोई कुछ नहीं कर सकता। घर बैठ कर अपना काम करते है और हज़ारी दफ्तर में लगती है। पूरी सैलरी और रिटायरमेंट के बाद पेंशन। मोती दान करके पैदा होते हैं सरकारी कर्मचारी और प्राइवेट नौकर लगता है कि पिछले जनम में भिखारी के कटोरे से पैसे उठाये होंगे तभी प्राइवेट नौकर बने। संधिविछेद करो नौकर यानी नौ कर। उनमे से एक है चौबीस घंटे की हज़ारी। चलो वापिस दिल्ली चलते हैं। चलो बुलावा आया है बॉस ने बुलाया है। कर देने का समय है। ठीक है।

विवेक के वापिस जाने के फैसले पर वीना उदास हो गई।
"मैं भी साथ चलती हूं।"
"तुम बच्चों के साथ रहो। मैं अपनी वापिसी की टिकट कैंसिल करवाता हूं, तुम तय तिथि पर आना।"
"आपको खाने की दिक्कत होगी। आप खुद खाना बनाते नहीं।"
"आता हो तो बनाऊ।" हंसते हुए विवेक ने कहा। "दिन में ऑफिस कैंटीन में और रात का बाजार में। वीना तुम चिन्ता मत करो। टूर पर जाता रहता हूं, तब भी बाजार का ही खाना पड़ता है।"
"टूर की बात अलग होती है पर अपने घर रहते हुए बाजार का खाना, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।"
"कोई बात नहीं, मज़बूरी है।"

थोड़ी देर में ईमेल से वापिस फ्लाइट की टिकट आ गई और दोपहर की फ्लाइट से विवेक दिल्ली आ गया और सीधा ऑफिस पहुंच कर बॉस से मुलाकात की। इमरजेंसी में एक ज़रूरी टेंडर बना कर भरना था।

"विवेक ये जो सोशल साइट्स हैं कभी कभी मुसीबत में डाल देती हैं। तुम इंदौर गए और फेसबुक में इंदौर अपडेट किया और हर रोज़ वहां के फ़ोटो डाले। तुम तो हमारे टेंडर एक्सपर्ट हो। सिंपल कंपनी नाम की सिंपल है पर काम की शातिर। हाईवे का टेंडर शार्ट नोटिस पर निकलवा लिया। हमारे पास समय नहीं है। दो दिन में टेंडर जमा करना है। दो दिन इमरजेंसी समझो।"
विवेक मौके की नज़ाकत समझ गया। उसी समय टेंडर बनाने में जुट गया। बॉस भी उसके साथ लग गए। कंपनी ने यह ज़ाहिर किया कि विवेक छुट्टी पर है। समीप होटल में कमरा लिया और विवेक का ऑफिस होटल के कमरे में शिफ्ट हो गया। रात दिन काम में जुट कर दो दिन में टेंडर तैयार हो गया और सिंपल कंपनी से पहले टेंडर जमा करा दिया। सिंपल कंपनी भौचक्की रह गई।

"विवेक तुमने कंपनी की जान बचाई है। तुमने देखा कैसे सिंपल कंपनी के मैनेजिंग डारेक्टर के चेहरे की हवाईयां उडी हुई थी। अब तुम फैमिली को ज्वाइन कर सकते हो। कल फ्लाइट की टिकट बुक करवा लो।"

"काफी थक गया हूं। कल आराम करता हूं। परसों सुबह की फ्लाइट की टिकट करवा लीजिये। अब घर जा कर आराम करता हूं।"

विवेक ने पूरा दिन घर आराम किया। रात को लगभग साढ़े आठ बजे थे और विवेक खाना खाने घर के पास मार्किट में ढाबे तक गया। ढाबे में दो परिवार खाना खा रहे थे। कोई कुर्सी खाली नहीं थी। एक टेबल थी, ढाबे वाले ने एक कुर्सी का इंतज़ाम किया। ढाबे वाला खाना अच्छा बनाता था, इसीलिए ढाबा अच्छा खासा चलता है और परिवार समेत वहीँ खाना खाने लोग आते हैं। विवेक ने दाल रोटी का आर्डर देकर कुर्सी पर इंतज़ार करने लगा। ढाबे की खासियत यही होती है कि खाना फटाफट मिल जाता है। दो मिनट में विवेक का आर्डर सर्व हो गया। विवेक खाना खाने लगा। तभी एक औरत ढाबे पर आई। खाने का आर्डर दिया। खाना लेकर देखा कि कोई कुर्सी खाली नहीं है। विवेक जिस टेबल पर बैठ खाना खा रहा था, वहां टेबल पर जगह थी पर कुर्सी नहीं। खाने की प्लेट लिए वह महिला विबेक के पास आ कर बोली "यहां प्लेट रख लूं।"

"आप बैठ कर खाना खाएं। कुर्सी नहीं तो मूड़ा ले लीजिये।" विवेक ने खाना खाते हुए कहा।
"कोई बात नहीं, मैं खड़े खड़े खा लूंगी। आप अकेले खाना खा रहे हैं।"

यह सुन कर विवेक चौंका और पहली बार उस महिला को ध्यान से देखा। कोई चालीस के आस पास की उम्र होगी। सलवार सूट पहन रखा था। कद पांच फुट पांच इंच, न मोटी न पतली, रंग सांवला।

"अकेले खाना खा रहे हो, कोई साथ नहीं।" उसने फिर पूछा।

उसके दो बार पूछने पर विवेक ने उत्तर दिया "हां अकेला ही खा रहा हूं।"
"क्या बात हो गई कि अकेले ही खा रहे हो?"

विवेक चौंक गया एक अजनबी महिला उससे ऐसे बात कर रही है जैसे पुरानी पहचान हो। महिला खड़े खड़े खाना खाते खाते विवेक से बातों में मशगूल हो गई।

"पत्नी बच्चों के पास गई है। अकेला घर क्या पैक करवा के ले जाता. इसीलिए ढाबे पर ही खा रहा हूं।"
"कहां रहते हो।"
"पास में ब्लू सोसाइटी में।"
"मैं येलो सोसाइटी में रहती हूं।"
"येलो तो मार्किट के ठीक सामने है।"
"सही पहचाना। गुप्ता जी को जानते हो।"
"नही मैं नहीं जानता। येलो सोसाइटी में मेरा कोई जानकार नहीं रहता।"
"उनकी पिछले महीने डेथ हुई है।"
"मैं नहीं जानता।"
"वोह भी मेरे पास आते थे। खाने की कोई चिंता नहीं। अकेले थे।"
"मैं अकेला नहीं मेरा परिवार है।"
"फिर भी मेरा नम्बर ले लो। काम आएगा।"
"फ़ोन नम्बर।"
"हां फ़ोन नम्बर ले लो।"
"क्या करूंगा?"
"काम आएगा। जब अकेले रहतो हो, मिलने आ जाना। इसलिए मैंने शादी नहीं की।"

यह सुन कर विवेक का माथा ठनका। क्या मतलब है इस औरत का। कहीं देह व्यापार....? सोच कर विवेक का बदन हिल गया। तब तक विवेक का खाना समाप्त हो गया। उसने ढाबे वाले को भुगतान किया और घर की ओर चलने लगा।

"नम्बर लेना है?" वह महिला फिर बोली।

"नहीं" और विवेक चला गया।
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