Sunday, December 28, 2014

परिवर्तन


ट्रैफिक सिग्नल पर कार रुकी, कार में बैठे दीनानाथ की नज़र बाई तरफ दीवार पर पड़ी। दो तीन पैम्फलेट चिपके हुए थे। पढ़ कर दीनानाथ मुस्कुरा दिए। लिखा था, पत्नियों के सताए लिखे मिले नहीं। दीनानाथ सोचने लगे कि संस्था बना ली परन्तु हिम्मत नहीं हो रही कि खुल कर सामने आ कर पत्नी सताये मर्दों की संस्था बना कर काम करे। खुल कर बात भी नहीं कर सकते। लानत है ऐसे पोस्टर लगाने वालों पर। हरी बत्ती हो गयी और कार आगे बढ़ गयी। दीनानाथ अपनी दुकान पहुंच कर काम में व्यस्त हो गए।

दीनानाथ की दुकान शहर की अनाज मंडी में है। दीनानाथ मंडी के चोटी के शीर्ष दुकानदारों में गिनती होती है। नीचे दुकान और दुकान के ऊपर दो कमरे जहां दूर के व्यापारी आ कर रुकते हैं।

दोपहर के समय खाना कर दीनानाथ ऊपर बने कमरे में विश्राम करने चले गए। बड़े लड़के के विवाह की भगा दौड़ी में दीनानाथ एकदम से थक चुके थे। दीनानाथ का तन और मन दोनों थकान से चूर थे। दीनानाथ को नींद आ गयी। जब दीनानाथ नींद में थे, उनकी पत्नी दुर्गादेवी का फ़ोन आया, परन्तु दीनानाथ नींद में होने के कारण फोन की घंटी सुन नहीं सके। जब नींद खुली, फ़ोन में पत्नी की मिस कॉल देखी तो फ़ोन मिलाया। दूसरी तरफ पत्नी नाम के अनुरूप चंडी रूप धारण किया हुआ था।

"कहां थे, फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे थे। मर खप तो नहीं गए।" दुर्गादेवी क्रोधित स्वर में बोली।
पत्नी के जले कटे बोल सुन दीनानाथ का चेहरा मुरझा गया "भाग्यवान थकान के कारण थोड़ी नींद आ गयी थी। इतनी सी बात पर नाराज़ क्यों हो रही हो।"
"तो क्या करू। दुकान कौन चलेगा। नौकरों के भरोसे बर्तन बिक जायेंगें। खुद तो घोड़े बेच कर सो रहे हो, मुझे कह रहे हो कि नाराज़ न हो। तीन दिन बाद दुकान गए हो, मुझे पूरा हिसाब चाहिये। रात को बिना हिसाब के घर में मत घुसना।" कह कर चंडी के रूप में दुर्गादेवी ने फोन पटक दिया।

दीनानाथ पत्नी दुर्गादेवी की मुट्ठी में है। विवाह को तीस वर्ष हो गए। बिना आज्ञा दीनानाथ एक घूंठ पानी तक नहीं पी सकते। पूरे पत्नी भक्त या उसके ग़ुलाम। सभी रिश्तेदार और मंडी के हर आदमी को मालूम है कि दीनानाथ बिलकुल दया के पात्र हैं। व्यापार तो दीनानाथ बखूभी से करते हैं। मंडी में धाक भी है और डंके की चोट पर सौदा करते हैं। लेनदेन भी बखूबी से करते हैं, परन्तु एक कमजोरी विवाह के पहले दिन से आज तक, पत्नी के आगे बोलती बंद हो जाती है। वो कहे तो दिन, कहे तो रात। दुकान में राजा, लेकिन घर में भीगी बिल्ली। जब ऊपर बैठे ईश्वर ने हाथ की लकीरे ही ऐसी बना दी, तब बेचारे दीनानाथ की क्या मजाल कि ईश्वर के रचे रास्ते पर कोई प्रश्न उससे करे।

बड़े पुत्र विशाल का विवाह कल ही सम्पन हुआ। शगुन परसो हुआ, कल रात शादी हुई और आज सुबह डोली घर आई है। दो दिन पुत्र के विवाह के कारण दीनानाथ दुकान नहीं गए। डोली घर में आते ही दुर्गादेवी ने पति को कहा "आज क्या करना है?"
दीनानाथ ने डरते डरते धीमी आवाज़ में कहा "भाग्यवान अभी तो डोली घर आई है। बहू को घर के अंदर तो आने दो। आराम से बात करते हैं।"
"इसमें आराम से बात क्या करनी है। मुझे बताओ कि दुकान कितने बजे जाना है।"
"थोडा आराम कर लूं, दो दिन से नींद नहीं मिली, फिर दुकान जाता हूं।"
"मुझे दस बजे के बाद घर में नज़र आये तो खैर नहीं। समझ गए न।" इतना कह कर गुस्से के तेवर में बेटे विशाल को कहा। "तू भी कान खोल कर सुन ले। शादी हो गयी, इसका यह मतलब नहीं कि बीवी के पेटीकोट में घुसा रहेगा। कल से तूने भी दुकान जाना है। और हां महारानी विशाखा आज का दिन दे रही हूं कल से रसोई में घुसना है।"

पुत्र विशाल स्तब्ध रह गया। बड़ी मुश्किल से धीरे स्वर से बोला "मां कल तो हनीमून के लिए जाना है।"
"हनीमून क्या होता है?" दुर्गादेवी ने क्रुद्ध हो कर कहा तो फिर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि दुर्गादेवी से जबानी जंग लड़े।
दीनानाथ फौरन बाथरूम में घुस गए और नहा कर बिना नाश्ता किये दुकान की ओर रुक्सत हुए। इसी कारण पत्नी के सताए पोस्टर को देख मुस्कुरा दिए थे। दुकान पर ही नाश्ता बाजार से मंगवा कर किया। अब फिर फ़ोन पर झिड़की ने दीनानाथ को पस्त कर दिया। दुकान बंद करके रात को घर वापिस नहीं गए और ऊपर बने कमरे में सोने चले गए। दुकान के कर्मचारी और मंडी का हर व्यापारी जानता है कि दीनानाथ पत्नी के डर के कारण घर नहीं जाते और दुकान पर ही सोते है।

उधर विशाल की स्थिति दयनीय हो गयी। मां के हुकम के खिलाफ जा नहीं सकता। नवविवाहित दुल्हन को कैसे मनाये। विशाखा को यह तो पता था कि उसकी सास सख्त है, पर इतनी जालिम होगी उसको इल्म आज हुआ। ससुराल में पहला दिन था, विशाखा चुपचाप घर का वातावरण देखती रही। रात को डाइनिंग टेबल पर ससुर जी को नदारत देख अचम्भा हुआ।
"मुंह फाड़ कर क्या देख रही हो, खाना खाओ। कोई मुंह में डालने नहीं आएगा।" दुर्गादेवी ने विशाखा को कड़क आवाज़ में कहा तो एक बार वह हिल गयी पर हिम्मत कर पूछ ही लिया "पापा" वह बस इतना ही कह सकी। जवाब सुन कर वह दंग रह गयी।
"पड़ा होगा दुकान पर। निखट्टू कहीं का। मैं न हूं तो कोई दुकान पर जाये ही नहीं। घर के सारे मर्द लुगाइयों के पेटीकोट में घुसे रहें। सुन रहा है तू। तेरे से कह रही हूं विशाल, खबरदार जो लुगाई के पेटीकोट में घुसा। कल से दुकान जाना है। हनीमून मनाने के लिए पूरी रात होती है। दुकान की किसी को फ़िक्र नहीं, हनीमून मनाना है। कमाई की कोई सोचता नहीं। हनीमून में रकम उड़ाई जाएगी।" दुर्गादेवी के हुकम के आगे विशाल बेबस था। वह क्या, उसके बाप की हिम्मत नहीं कि दुर्गादेवी की बात टाल दे। दुर्गादेवी के सुविचार सुन डाइनिंग टेबल पर विशाखा खाना बेमन निगल ही पाई।

रात अपने कमरे में विशाल और विशाखा दोनों परेशान सोच रहे थे। विशाल सोच रहा था कि जालिम मां के तुग़लकी फरमान ने हनीमून कैंसिल कर दिया। सुहागरात है पर दोनों चुप है। दिमाग गरम हो गए। विशाखा ने कितने सपने देखे थे। सब अरमान मिट्टी में मिलते नज़र आ रहे थे। हिम्मत जुटा कर विशाल विशाखा के पास आया और विशाखा के होठों पर अपने होंठ रख दिए। विशाखा बिस्तर पर लेटी हुई थी। विशाल के होंठों का स्पर्श पा कर उसने विशाल को दूर किया।

"मां की बात भूल गए। लुगाई के पेटीकोट में नहीं घुसना है। चिपकने से पहले मां से इज़ाज़त तो ले लो।" कह कर विशाखा ने विशाल को दूर धकेला। विशाल सोचने लगा कि सुहागरात को पत्नी ने झटक दिया। कितना बदनसीब है कि एक मां सुहागरात में रोड़ा बन गयी। उसको उम्मीद नहीं थी कि मां दो चार दिन भी नहीं रुकी, पहले दिन ही हिटलर और तुगलक बन गयी। अपने बच्चे का नहीं सोचा। पापा को जब हर रोज़ डांट डप्पत करती थी तब विशाल ने कभी सोचा नहीं। आज जब उसकी नवविवाहिता पत्नी विशाखा ने उसका हाथ झटक दिया और सुहागरात में दोनों पति पत्नी अलग अलग सोच में उलझे हुए थे। पूरी रात उलझन में बीत गयी। दोनों एक दूसरे को देखते रहे, पर ना कुछ कहा ना कुछ किया। आंखों से नींद उडी हुई थी। इस उधेड़ बुन में रात बीत गयी।

सुबह हो गयी। सुबह साढे छ बजे ही दुर्गादेवी ने विशाल और विशाखा को आवाज़ लगाई "बहुत हो गयी सुहागरात, आधे घंटे में बाहर आओ और काम पर लग जाओ।"

बहुत हो गयी सुहागरात शब्द सुन कर विशाखा के तन बदन में आग लग गयी। सोचने लगी कि आखिर किस मिट्टी की बनी है यह औरत। सासु मां के प्रति कोई आदर भाव नहीं रहा। एक ही रात में विशाखा का मन खट्टा हो गया। किससे कैसे निभानी है, बाद में सोचेगी पहले नहा कर रसोई में काम शुरू किया जाये।

सुबह के नाश्ते के साथ डाइनिंग टेबल पर पति विशाल और दुर्गादेवी को पाया पर उसके ससुर दीनानाथ नज़र नहीं आये।
"पापा नाश्ता कमरे में करेंगे?"
"कमरे में, लाला घर में नहीं है। विशाल जल्दी तैयार हो जा। दुकान जाना है। लाला से हिसाब भी लेना है।" कह कर दुर्गादेवी अपने कमरे में चली गयी।
दुर्गादेवी पति दीनानाथ को लाला पुकारती है। ठीक दस बजे दुर्गा देवी विशाल के साथ दुकान ग़ई तब पीछे विशाखा अपने कमरे में जा कर दरवाज़े की कुण्डी बंद कर कमरे में कैद कर लिया और आईने के सामने बैठ कर अपने को निहारने लगी। मन ही मन सोच रही है कि कहीं उसमे कोई कमी है, जो विशाल को एक दिन भी बांध न सकी। हर कोण से खुद को निहारा और होंठो पर हलकी सी मुस्कान आई। नहीं नहीं कहीं से कोई कमी नहीं है। एक औरत की सभी खूबियां उसमे है। बस नहीं है तो वह है सास जैसी कर्कश और रौबीली। पूरे दिन दुर्गादेवी दुकान पर पति दीनानाथ पर रौब डालती रही। शाम दुकान से चलते समय पति को घर चलने को भी नहीं कहा। विशाल के साथ कार में घर वापिस आ गई। बेचारा दुखियारा दीनानाथ दुकान पर ही सो गया। कम से कम रात तो आराम से कटेगी। विशाखा पूरे दिन की उधेड़बुन के बात इस निर्णय पर पहुंची कि लोहा ही लोहा को काटता है।

शाम को विशाखा ने घर में सास और पति के साथ सामान्य व्यवहार किया। रात कमरे में विशाल उसके समीप आया तब फिर विशाल का हाथ झटक दिया और साफ़ मना कर दिया कि नज़दीकियां बढ़ाने का कोई मन नहीं है।
"पर क्यों?"
"इस घर में वातावरण क्या है, कुछ समझ नहीं आ रहा है। दो चार दिन घर के माहौल में ढलने दो, फिर नज़दीकियां भी हो जायेंगी। अभी चुपचाप सोने दो।"
"अभी हमारी शादी हुई है। कल भी, आज भी मैं पास आता हूं तुम दूर जाती हो। हनीमून नहीं सुहागरात नहीं। तुम्हारी कोई इच्छा नहीं हो रही?"
"हर लड़की की तरह मेरे भी अरमान थे कि हनीमून जायेंगे और एक दूसरे में खो जायेंगे। दो जिस्म एक जान की उड़ान भरी थी पर अफ़सोस हनीमून की तुम्हे परवाह ही नहीं. कब चलना है।"
"मां से पूछना होगा।" विशाल ने गला साफ़ करते धीरे से कहा।
"शादी से पहले मां से इजाज़त ली थी।"
"ताने दे कर क्यों बात कर रही हो?"
"सच्चाई बोलने को ताने कह रहे हो?"
"बड़ों से पूछने में कोई आपत्ति नहीं।"
"ज़रूर, आपत्ति कोई नहीं है। बड़ों की इज़्ज़त करनी चाहिये, आदर सम्मान करना चाहिए और इजाज़त भी लेनी चाहिए, पर क्या बड़ों का कोई हक़ नहीं बनता कि वे अपने अनुभवों का इस्तेमाल करके बिगड़ी बात को बनाना चाहिए ना कि अपने अहंकार के आगे किसी को कुछ नहीं समझती सासू मां। शादी में हर कोई थक जाता है पर मां ने पापा को सुबह दस बजे दुकान भेज दिया। आज दो दिनों से वे दुकान पर ही सो रहे है। छी कोई पत्नी रात को चैन से सो सकती है क्या? पति दुकान पर सोता है और अपने लड़के की ज़िन्दगी तबाह करने पर तुली है। अगर तुम्हे मैं दुकान पर सोने को कहूं तो कैसा लगेगा।" कह कर विशाखा चुप हो गई और विशाल निरुत्तर हो गया।

एक सप्ताह बीत गया। दीनानाथ दुकान पर ही सोते रहे। विशाखा हैरान और परेशान थी की सासू मां किस मिट्टी की बनी है कि एक शहर में रहते दोनों अलग रह रहे है वो भी अलग मकान में नहीं बल्कि दुकान पर। भला दुकान पर कोई कैसे सो सकता है। नवविवाहिता कैसे किससे और क्या पूछे कि ससुर जी दुकान पर क्यों सोते है। विशाल समेत सारे बच्चे मां के बंधुआ गुलाम बने हुए थे। उनका कोई अपना अस्तित्व ही नहीं है। दुर्गादेवी रात कहे तो सारे बच्चे रात कहते है और दिन कहे तो दिन। विशाखा ने एक बात पल्लू से बांध ली कि जब तक ससुर जी घर नहीं आते वह विशाल को अपने पास नहीं आने देगी।

विशाल की हालत भी ख़राब थी कि पत्नी बात ढंग से नहीं कर रही और सुहागरात और हनीमून दोनों लुप्त हो गए। वह मां दुर्गादेवी के आगे बेबस है। वह क्या उसके पिताजी की भी हिम्मत नहीं, दुर्गादेवी से प्रश्न पूछने की।

इस बार दीनानाथ ने भी ठान लिया कि अब तो लड़के की शादी भी हो गई, अब कब तक दुर्गादेवी की मर्ज़ी के आगे घुटने टेकता रहेगा। अब तो समय आ गया कि घर पर उसका भी हक़ है। घर की मालकिन दुर्गादेवी है तो मालिक तो वो भी है। घर दोनों की सहमति से चलना चाहिए पर हुआ कुछ और। ऐसा कभी चाहा नहीं पर परिवार की खातिर उसका त्याग कोई नहीं देखता, सिर्फ हंसी का पात्र बन कर रह गया।

रात के आठ बजे दुकान बंद करने के पश्चात ऊपर कमरे में आराम करने दीनानाथ चले गए। अक्सर व्यापारी रुकते हैं तो दीनानाथ ने एक महाराज रखा हुआ है। महाराज ने खाना बना दिया और दीनानाथ खाना खाने के बाद आराम करने लगे। एफएम रेडियो पर गाने सुन रहे थे। मनपसंद गीत आया। मन रे तू काहे न धीर धरे वो निर्मोही जिनका तू मोह करे। गीत सुनते सुनते होंठो पर हलकी सी मुस्कान आ गई। बिस्तर पर लेटे लेटे दीनानाथ के मस्तिक्षक में पुरानी बाते चलचित्र की तरह उभरने लगी।

अतीत सामने आ गया। दीनानाथ संयुक्त परिवार में रहते थे। व्यापार भी सांझा था। पिता, ताऊ और चाचा सभी एक बड़े से मकान में रहते थे और व्यापार भी एक साथ करते थे। उस ज़माने में हनीमून का कोई रिवाज़ होता नही था। दुर्गादेवी पढ़ी लिखी थी और उसका परिवार आज़ाद और आधुनिक तौर तरिके का था। दुर्गादेवी का उस ज़माने में भी बाकी लड़कियों से ज्यादा खर्च ज्यादा होता था। दुर्गादेवी के पिता जानते थे कि उनकी बेटी का खर्च अधिक है उन्होंने दीनानाथ की शराफत, खानदानी परिवार के शरीफ लड़के को देख कर विवाह सम्पन किया। दीनानाथ के परिवार में नियम था कि कुंवारे बच्चों को जेबखर्च नहीं मिलता था। शादी के बाद उनका जेबखर्च बांधा जाता था। दुर्गादेवी अधिक धन की मांग करती जो दीनानाथ पूरी नहीं कर पाते। दुर्गादेवी रूठ कर मायके चली जाया करती थी। दुर्गा देवी के मायके जाने पर घर में दीनानाथ उपहास का पात्र बनते। घर वालों के तानों से बचने के लिए दीनानाथ ने दुकान पर सोना शुरू कर दिया। एक तरफ पत्नी का रूठना और घर वालों की हंसी दीनानाथ को हताश कर देती पर न तो दुर्गादेवी उसकी सुनती और घर वाले ने जोरू का गुलाम कहना शुरू कर दिया तब दीनानाथ ने सोचा की परिवार से दूर रह कर कुछ अलग काम धंधा करे तब सब ठीक हो सकता है। परन्तु आदमी जो सोचता है वह होता नहीं है। वक़्त बीतता गया। संयुक्त परिवार टूट गया। सब एकल हो गए। दीनानाथ शुरू में व्यापार ठीक तरह से चला नहीं सके। मुनाफा कम होने के कारण घर खर्च कम देते। दुर्गादेवी को कम में गुजारा करने की आदत नहीं थी। वह झुंझला कर बच्चों को पीटती और मायके चली जाती। दीनानाथ हाथ मलते रह जाते। समय ने करवट ली और दीनानाथ मार्किट के बेताज बादशाह बन गए। दुर्गादेवी के पिता गुजर गए, दुर्गादेवी का मायके जाना बंद हो गया परन्तु दुर्गादेवी का अहंकार बढता गया। कहना ना मानने पर बच्चों की पिटाई होती और रूठ कर कोपभवन में चली जाती। दीनानाथ बच्चों और परिवार की खातिर चुप रह जाते। यह सिलसिला आज तक चल रहा है। सोचते सोचते दीनानाथ की आंख लग आई और नींद के बंधन में बंध गए।

सुबह नींद खुली, रविवार का दिन था। एक सप्ताह बीत गया, घर नहीं गया। आईने में शक्ल देखी, दाढ़ी बढ़ी है। चेहरा मजनू सा लग रहा है। दीनानाथ सोच विचार उधेड़बुन में कि आज क्या करे। पहले तो आदमी बना जाए। नाई के पास जाकर दाढ़ी बनवाई। शीशे में खुद को देख कर मुस्काया कि शकल तो निकली। वापिस दुकान आ कर नहाया और महाराज को हिदायत दी कि वह नाश्ता बाज़ार में करेंगे और हो सकता है कि दो चार दिन दुकान न आएं। घर जा रहे हैं अब आराम करेंगे। कोई ज़रूरी बात हो तो फ़ोन कर लेना। दुकान विशाल आएगा। दीनानाथ की बात सुन कर महाराज अचम्भे में आ गया कि क्या बात है जो सेठजी चहक रहे हैं। बिल्ली शेर की आवाज़ में बोल रही है। हम तो नौकर ठहरे, सेठानी के आगे बोलें तो जाने कि बिल्ली में बहादुरी आ गई है।

सेठ दीनानाथ मंद मंद मुस्कुराते हुए दुकान से निकले और सीधे बिल्लू दी हट्टी पहुंचे। बिल्लू दी हट्टी मशहूर हलवाई की दुकान बाजार के ठीक बीच में पूरे दिन ग्राहकों से ठसाठस भरी रहती है। सुबह पूरी छोले लाइन लगा कर बिकते है और मिठाई पूरे दिन। पुराने ज़माने की दुकान, जिसकी दो दीवारों के साथ पत्थर की परमानेंट पत्तल रखने के लिए टेबल और आगे वोही पुराने बेंच। दीनानाथ का नंबर दस मिनट के बाद आया। दीनानाथ ने एक प्लेट पूरी छोले और एक प्लेट कचोड़ी खाई और घर के लिए भी कुछ प्लेट पूरी छोले और कचोड़ी पैक करवाई और ऑटो पकड़ कर घर पहुंचे।
घर पहुंच कर देखा बच्चे अपने अपने कमरों में थे। विशाखा रसोई में नज़र आई।
"बेटे नाश्ते की तैयारी हो रही हो?"
"जी पापा" कह कर उसने दीनानाथ के चरण स्पर्श किये।
"युग युग जियो।" आशीर्वाद दे कर दीनानाथ ने विशाखा को पूरी छोले और कचोडी के पैकेट दे कर कहा "बिल्लू दी हट्टी का नाश्ता है। जवाब नहीं इसकी पूरी कचोड़ी का। लाजवाब होती है। नाश्ते की टेबल पर इनको भी रखना। घर में सबको पसंद है। उंगलियां चाट कर बिल्लू दी हट्टी का नाश्ता करते हैं। विशाल को बहुत पसंद हैं कचोड़ी। उसको बता देना।" कह कर दीनानाथ बैठक में सोफे पर धम हो गए। टीवी चालू किया। म्यूजिक चैनल में पुराने गाने देखने लगे।

दीनानाथ टीवी देखने में मस्त थे, तभी दुर्गादेवी नहा कर आई और दीनानाथ को देख कर पूछा "कब आये।"
"बस अभी कोई दस मिनट हुए होंगे।"
"दुकान के टाइम घर आ गए। दुकान पर कौन है?" दुर्गादेवी की आवाज़ में आक्रोश था पर उतने ही शांत स्वर में उत्तर दिया "आज रविवार दुकान बंद रहती है। हफ्ते में एक छुटटी सरकार ने तय कर रखी है।"
"छुटटी है तो आराम से नहीं कह सकते। चिल्लाने की क्या ज़रुरत है।" तेज स्वर में पति को डांट कर बहू विशाखा की खबर लेने रसोई चली गई।
पत्नी के जाने के बाद दीनानाथ मन मन बोले "खुद चिल्लाती है, कर्कश बोलती है मुझ पर चिल्ला रही थी और इलज़ाम मुझ पर।"
रसोई में मुआइना किया। विशाखा नाश्ते की तैयारी में जुटी थी। वहां से बैठक में आई और पति के सामने बैठ कर पूछने लगी।
"दुकान का हिसाब दिखाओ।"
"हिसाब देखना है तो दुकान चलना पड़ेगा।"
"दिमाग ठिकाने तो है, मुझ से जबान लड़ा रहे हो।"
"आज ठीक कह रहा हूं। दुकान सही सलामत है। विशाल की शादी हो गई है। उसको अपने पल्लू से बाहर निकलने दो, तभी दुनियादारी समझेगा।"
"तुम्हारे साथ क्या सीखेगा। सबसे दबते रहे। अपने बाप से, भाइयों से।"
"सिर्फ तुम्हारे और अपने परिवार की खातिर। तुम बच्चों को पिटती थी। मायके चली जाती थी। इस कारण चुप रहता। व्यापार में किसी से नहीं दबा। नंबर एक पर मेरा नाम है पूरी मंडी में। परिवार की खातिर तुम से दबा।" कह कर दीनानाथ चुप हो गए। आज के लिए इतना ही। धीरे धीरे ही उसको बदलना है और दुर्गादेवी को भी। बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है।

तभी सब डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। नाश्ते में बिल्लू दी हट्टी के पूरी छोले, कचोड़ी देख कर सब प्रसन्न हो गए।
"विशाल तुम शादी के बाद हनीमून के लिए कहीं नहीं गए। कहीं आस पास चले जाओ। दूर का कार्यक्रम बाद में बना लेना।"
पति के मुंह से यह सुन कर दुर्गादेवी भौचक्की रह गई। गुस्से में बोली "कोई ज़रुरत नहीं है। दुकान संभालो।"
"ऐसा करो चार पांच दिन के लिए नैनीताल ही घूम आओ। अपनी कार में ही चले जाओ।"
दुर्गादेवी ने विरोध किया परन्तु दीनानाथ में यह कह कर शान्त किया कि यह आजकल का दस्तूर है। शादी के बाद पति पत्नी एक दूसरे को समझे और जाने, इसीलिए हनीमून का रिवाज़ बना है।

विशाल पापा के निर्णय से खुश था। विशाखा भी खुश थी पर पहेली नहीं बूझ सकी कि ससुरजी कैसे सासू मां पर भारी पड़े। अगले दिन सुबह विशाल और विशाखा कार से नैनीताल के लिए रवाना हो गए।

बच्चों के जाने के बाद दुर्गादेवी दीनानाथ पर बिगड़ गई। दीनानाथ ने शान्त स्वर में पत्नी दुर्गादेवी को समझाया कि बच्चे की शादी के बाद अपने को बदलना चाहिए। अपने को अब बुजुर्गो की श्रेणी में रखना चाहिए और बड़े बन कर बच्चों को बागडोर दे देनी चाहिए। उनका मार्ग दर्शन करना चाहिए। पैनी नज़र रखनी चाहिए कि वे गलत रास्ते पर न जाए। वे भटकें नहीं बस यही देखना चाहिये। विशाल की शादी हो गई और छोटा लड़का और लड़की कॉलेज में हैं, उनके दोस्त बन कर उनकी ज़िन्दगी को अच्छा बनायें। डांट डपट रोब को ख़त्म करो। हंस कर जियो और दूसरों को भी जीने दे। खैर एक दिन में तो दुर्गादेवी बदल नहीं सकती, यह दीनानाथ को मालूम था। दुर्गादेवी एक सप्ताह उदास रही। कोई बोलचाल नहीं। सोचती रहती कि क्या दीनानाथ सही कह रहे हैं। वह सारा दिन अवलोकन करती रहती। दीनानाथ सुबह दस बजे दुकान जाते और शाम छ बजे वापिस आते। उधर एक सप्ताह विशाल और विशाखा की भी नैनीताल की हसीन वादियों में दूरियां नज़दीकियों में बदल गई। मां दुर्गादेवी ने दूरियां पहले दिन बना दी थी और पापा दीनानाथ ने नज़दीकियां कर दी। कितना फर्क है दोनों के स्वाभाव में। क्या कोई इतना लंबा समय लगभग तीस साल दब कर बिता सकता है। यह तो सर्फ हमारे देश में संभव है। अपना दुःख भूल कर अपने बच्चों की खातिर पूरी ज़िन्दगी बिता देते हैं। कहीं पत्नी सहती है तो कहीं पति। मासूम बच्चों के लिए दीनानाथ पत्नी दुर्गादेवी की हर सही गलत बात मानते रहे जिसमे दुर्गादेवी अपनी जीत समझती। गृहस्थी हार जीत की नहीं, एक दूसरे के साथ जीने के लिए बनी है। एक दूसरे का मर्म समझ कर दूसरे के गम को ख़ुशी में बदलना ही सफल गृहस्थी की कुंजी है।

सप्ताह बाद विशाल और विशाखा हनीमून से वापिस आये। दोनों के चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी।

रविवार रात खाने के समय दीनानाथ ने विशाल से कहा "बेटे अब तुम दुकान की ज़िम्मेदारियां धीरे धीरे अपने कंधो पर लो। मैं तो हूं ही। हर कदम, मोड़ पर साथ रहूंगा।"
"हां बेटी विशाखा, तुम भी विशाल का साथ दो। एमबीए किया है। तुमने सारी ज़िन्दगी रसोई में नहीं बितानी। घर और दुकान दोनों संभालने हैं। दिन में घर देखो और शाम दो घंटे दुकान पर लगाओ। हमारी होलसेल की दुकान है। कुछ सोचो तुम दोनों मिल कर रिटेल मैं क्या कर सकते हो। तुम दोनों के जिम्मे सौपता हूं। आशा करता हूं कि तुम दोनों सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाओगे।"

बहू विशाखा ने ससुर दीनानाथ के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद मांगा। बहू विशाखा के सिर पर दो हाथों ने आशीर्वाद दिया। एक हाथ दीनानाथ का और दूसरा दुर्गादेवी का।

सोने के समय कमरे में दीनानाथ ने दुर्गादेवी को कहा। "तुमने आशीर्वाद दे कर अच्छा काम किया। जो हम चाहते हैं और हमे नहीं मिला। उसके लिए बच्चों के रास्ते नहीं आना चाहिए। जो हमे नहीं मिला, बच्चों को मिले तब हमारी ख़ुशी कई गुणा बढ़ जाती है। हमारे समय औरतों का नौकरी या दुकान चलाना अच्छा नहीं माना जाता था। जो तुम चाहती थी, वह उस समय नहीं पा सकीं। यदि बच्चे पा लें तो समझो कि तुम्हे मिल गई। आज बहू को बहू नहीं समझो। उस पर हुकुम नहीं चलाना। उससे दोस्ती करो। हम बच्चों पर जान छिड़केगें वो हम पर जान न्यौछावर करेंगे। प्रकृति का नियम ही यह है। प्यार दो, प्यार लो।" दीनानाथ अपनी धुन में कहते रहे। पत्नी की ओर देखा, दुर्गा देवी की आंखों मैं आंसू थे।
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