Sunday, January 25, 2015

वक्त

धडी की सुईयां चल रही हैं,
पर वक़्त थम सा रहा है।
कुछ ख़ुशी का पल आ गया है,
पर वक़्त फिर से थम सा रहा है।
कुछ गम का पल छा गया है,
पर वक़्त फिर से थम सा रहा है।
कुछ नाराज़ सी वो हो गई है,
पर वक़्त फिर से थम सा रहा है।
कुछ हंस कर नज़रें मिलने लगी हैं,

पर वक़्त फिर से थम सा रहा है।

Friday, January 23, 2015

दिल


इस दिल को संभाल कर रखिये
हर बात पर मचल जाता है।
नादान है यह दिल
हर बात पर रूठ जाता है।
बात ना मानो इस दिल की
जोर से धड़कने लग जाता है।
जब कहते है इसको नादान
भाग कर कोपभवन चला जाता है।
जब मानते हैं इसकी बात
खुश होकर हंसता जाता है।
जब मुस्कुरा कर मिलते हैं दो हसीन चेहरे

दिल दिल से मिल जाता है।

Saturday, January 17, 2015

एक सफर


सुबह के साढ़े आठ बज रहे है। योगेश मेट्रो स्टेशन पहुंचा। सीढ़ियां चढ़ रहा था, मेट्रो चली गई। कोई बात नहीं एक, दो मिनट में दूसरी आ जाएगी। सबसे बड़ा सुख मेट्रो का यह है कि कोई चिन्ता नहीं, जितनी छूट जाएं। दो दो मिनट में आती हैं। पहले बस का कितना चक्कर होता था कि निकल गई तो आफत आ जायेगी। दूसरी घंटे बाद आएगी। चार्टर्ड बस निकल गई तो कोई दूसरा चारा नहीं। एक एक दो दो लोग प्लेटफार्म पर आ रहे थे। पांच लड़के लड़कियों का ग्रुप आया और बातों में मगन था। मेट्रो प्लेटफार्म के नज़दीक आ रही थी तो एक लड़के ने एक लड़की को कहा "तुम दोनों तो लेडीज कोच में चढ़ जाओ।"
"न बाबा, बड़ा बोर डिब्बा है लेडीज कोच। बोरिंग लेडीज चढ़ती है उस डिब्बे में। एक साथ हैं, बातें करते एक साथ जायेंगें।"

मेट्रो आई और सभी यात्री चढ़ गये। संजोग से योगेश और वो कॉलेज के लड़कियों, लड़को का ग्रुप एक कोच में सवार हुए। लड़के, लड़कियां बातें कर रहे थे। योगेश सोचने लगा कि लड़कियां शायद ठीक कह रही होंगी कि लेडीज कोच बोरिंग होता होगा, क्योंकि इतनी आज़ादी से वहां बातचीत कहां हो सकती है। भई वह तो लेडीज कोच में सफ़र कर नहीं सकता। दंडनीय अपराध है इसीलिए। जोर जोर तेज अवाज़ में वे बात कर रहे थे। उस कोच में बाकी लोग भी सफ़र कर रहे थे। किसी ने आपत्ति नहीं की। मेट्रो की यह खासियत है कि लोग आपस में बातें करते हैं। फोन पर बातें करते है, कई तो व्यापार की भी बातें करते हैं। सब अपने गंतव्य पर उतर जाते हैं। योगेश के एक हाथ में टिफ़िन का बैग और दूसरा हाथ रेलिंग पर। पड़ोस में खड़े महाशय ने अपना बैग फर्श पर रख टांगों के बीच फंसा लिया। अखबार निकाला और पढ़ने लगे। सुबह जल्दी ऑफिस के लिए निकलना पड़ता है, पूरा अखबार पढा नहीं जाता। योगेश ने मुंह घुमाया और उसका अखबार पढ़ने लगा। एक खासियत है मेट्रो में कोई अखबार नहीं मांगता, लेकिन आप के साथ साथ दूसरे भी पढ़ लेते हैं। योगेश अखबार पढने लगा।

तभी एक सज्जन का फोन आया। योगेश को लगा कि वह व्यक्ति दूसरे को टाल रहा है पर दूसरा आदमी उससे अभी मिलने को कह रहा था। भाई साहब मैं गुडगाँव जा रहा हूँ। मेट्रो में हूं। गुडगाँव आने वाला है। तभी मेट्रो की सूचना "अगला स्टेशन इंदरलोक है।" दूसरा आदमी बोला अभी तो इंदरलोक ही है तू, झूठ न बोल। तीस हज़ारी उतर। वहीँ मिलता हूं। वे सज्जन खीज गए। अब तो जबरदस्ती उससे मिलने तीस हज़ारी उतरना होगा। वह तो खीज गया। योगेश मुस्कुरा दिया।

अखबार पढने वाले सज्जन अगले स्टेशन पर उतर गए। दो युवा योगेश के पास खड़े हो गए। दोनों ने मोबाइल पर से ध्यान नहीं हटाया। दोनों मोबाइल पर गेम खेल रहे थे। मोबाइल गेम खेलते हुए सफर का पता ही नहीं चलता। हर युवा लड़की और लड़के का मोबाइल चालू था। कोई गेम खेल रहा है, कोई सोशल साइट्स पर चैट कर रहा है। मेट्रो पर कोई खाली सफ़र नहीं करता। तभी एक युवती मेट्रो में चढ़ी। लेडीज सीट पर एक युवक बैठा था। उसे खाली करवा बैठ गई। अब योगेश को समझ आया कि अधिकतर युवतियां लेडीज कोच में क्यों नहीं चढ़ती। वहां तो किसी से सीट भी खाली नहीं करवा सकती। इसलिए रौब से जनरल कोच में चढ़ती है। बैठने को सीट मिल जाती है और अपनी ड्रेस और अदाए भी तो दिखलानी हैं। वह युवती सीट पर बैठते मोबाइल से उलझ गई। उसके साथ बैठा युवक भी मोबाइल से खेल रहा था। दोनों मोबाइल से उलझे हुए थे और चलती मेट्रो में हाथ से हाथ टकरा गया तो युवती तेज स्वर में बोली सीधे बैठे रहो। युवक बोला मेडम मैंने क्या किया है?
युवती बोली कि चुपचाप सीधे बैठे रहो।
मैं तो सीधा ही बैठा हूं। आपको आपत्ति किस बात से है।
तुम मुझे हाथ मत लगाओ।
मैंने कब लगाया।
बार बार हिल रहो हो।
मेट्रो हिल रही है। मैं तो सीधा बैठा हूं।
चुपचाप सीधे बैठो। हिलो मत।
इतना सुन कर युवक ने सीट छोड़ दी और खड़ा हो गया और युवती से बोला। अब आप दो सीटो पर बैठो।

आस पास बैठे और खड़े यात्री बस मुस्कुरा रहे थे। उस खाली सीट पर कोई और नहीं बैठा। कौन झांसी की रानी से उलझे। अगले स्टेशन पर एक मोटी महिला चढ़ी और उस युवती के पास खाली सीट पर बैठ गई। मोटी महिला ने उस युवती को पिचका दिया और चलती मेट्रो में हिल भी रही थी। उस महिला का हाथ बार बार उस युवती को लग रहा था। बेचारी युवती कैसे और किससे शिकायत करे। अब युवक और बाकी यात्री उस युवती को घूर रहे थे और मंद मंद मुस्कान के साथ उपहास कर रहे थे।

कुछ पढने वाले विद्यार्थी अपनी किताबों और नोट्स बुक में व्यत्स थे।

राजीव चौक एक ऐसा स्टेशन है, जहां सदा भीड़ रहती है धक्के के साथ भीड़ आपको मेट्रो के अंदर ले जाती है और धक्के के साथ मेट्रो से बाहर कर देती है। एक महिला धक्के के साथ अंदर आई। एक सज्जन कंधे पर बैग लटकाए खड़े थे। आदत से मजबूर, जबकि मेट्रो में लगातार घोषणा होती रहती है कि दूसरे यात्रियों की सुविधा के लिए कंधे और पीठ पर लैपटॉप बैग न टांगे, पर कुछ आदत से मजबूर कंधे और पीठ पर टांगे यात्रा करते है।

उस महिला को धक्का लगा और वह उस सज्जन से उलझ गई कि उसने धक्का क्यों दिया?
मैंने धक्का नहीं दिया। भीड़ है। मुझे भी भीड़ का धक्का लगा आपको भी लग गया होगा।
लग गया और धक्का देने में फर्क है।
मैंने कहा कि धक्का नहीं दिया। भीड़ में लग गया होगा। मुझे खुद लगा है।
मुझे धक्का आपने दिया है।
एक युवक ने उस महिला को सीट बैठने को दी। महिला बैठ गई लेकिन चुप नहीं हुई। आपने जान बूझ कर धक्का दिया है।
तभी भीड़ में से एक युवक ने कहा की मेडम जी अब तो चुप हो जाएं।
एक तो धक्का दो ऊपर से माफ़ी भी न मांगो फिर कहते हो चुप हो जाओ।
मैंने धक्का नहीं दिया तो किस बात की माफ़ी।
देखो चोरी और उस पर सीना जोरी। माफ़ी मांगते शर्म आती है।
मेडम जी माफ़ी मैं मांग लेता हूं अब तो चुप कर जाओ।
तुम्हारे कहने से चुप हो जाऊं। क्यों?
हे भगवान। धन्य है आपके पति जो आपके साथ रहते है।
वो तो ऊपर चले गए।
जल्दी ऊपर चले गए।
जब जिसका टाइम आता है उसको ऊपर जाना ही पड़ता है।
आप कब जाओगी।
जाएं मेरे दुश्मन। तुम चले जाओ।
मेरी तो शादी भी नहीं हुई है। ऊपर कैसे चला जाऊ।
तो में कैसे चली जाऊ। अभी तो लड़के की शादी करनी है।
बहू को भी ऐसे परेशान करोगी।
मैंने तो चुन कर बहू ली है। मेरी खूब पटती है।
बेचारा लड़का। उसका क्या होगा।
तुझे मेरे लड़के की पड़ी है। अपनी सोच।
वोही सोच रहा हूं, अगर आपके जैसी मिल गई तो क्या होगा?
सोच बेटा सोच। मेरा तो स्टेशन आ गया। कह कर महिला सीट से उठी।
योगेश मन मन मुस्कुरा रहा था कि आज तो टाइम अच्छा पास हो गया।

शाम को घर वापिस के लिए मेट्रो स्टेशन पर आया। मेट्रो के आखिरी डिब्बे में भीड़ थोड़ी कम होती है। इसलिए योगेश प्लेटफार्म के अंत तक गया। प्लेटफार्म का अंतिम छोर एकान्त होता है। कुछ युवा लड़के लड़की आपस में बातें कर रहे थे। योगेश समझ गया कि प्रेमी युगल जोड़ो को इससे एकान्त जगह कहीं और नहीं मिल सकती। लव इन मेट्रो आजकल आम बात है। एक साथ आना और एक साथ आना। बेंच पर एक तरफ युगल जोड़े और साथ किताबों में सर झुकाये पढने वाले विधार्थी अपनी अपनी धुन में दीन दुनिया से बेखबर। मेट्रो स्टेशन एक अच्छा स्थान है पढ्ने के लिए।


रात के आठ बजे योगेश वापिस घर जा रहे हैं। एक लड़की का फोन बजा। घर वाले पूछ रहे थे कि कहां हो, कब तक घर आओगी। पापा मैं मेट्रो में हूं। आधे घंटे में पहुंच जाउंगी। घर वालों की चिंता ज़ाहिर है क्यों कि आये दिन वारदाते होती रहती हैं। कभी टैक्सी में, कभी ऑटो में तो कभी प्राइवेट बस में। मेट्रो में भीड़ जरूर होती है, पर पूरी तरह सुरक्षित। दिल्ली वालों की दिल की धड़कन, जीवन रेखा बन गई मेट्रो। योगेश का स्टेशन साढे आठ बजे आया और योगेश पैदल घर की ओर चल पढ़ा। हर रोज़ का सुहाना सफ़र।

Saturday, January 10, 2015

तेरिया तूं जाण

मैं सोच सोच कर हारां, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, तेरियां तूं जाण मालिका,
मैं सोच सोच कर हारां।

किस धातु से पवन बनी है, किस धातु से पानी,
कैसे रची तेज की रचना, भेद किसे न जाणी,
कैसे रच दिया सूरज तारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

कैसे रची भूमि की रचना, कैसे शिखर बनाये,
कैसे नदी सरोवर रच कर, जल की धारा बहाये,
कैसे रच दिया सागर खारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

कैसे रची बीज की रचना, कैसे वृक्ष बनाये,
कैसे फूल पत्ती बना कर, नाना भांती सुहाए,
कैसे फल विच रस तूने डाला, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

नाना भांति जगत प्रांणी, नाना शक्ल बनाये,
मानव दानव देव दनुज, नर नारी कोई कहाए,
कोई बन गया सुत्त कोई नारी, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

कैसे बादल बने आकाश में, करें गर्जना भारी,
कभी न टपके बूंद जमीं पर, कभी भर दे नदियां सारी,
कैसे बिजली का है चमकारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

बगुला हंस बनाये उज्जवल, कागा कोयल काली,
लाल चोंच दी सुऐ को, पंखों में हरियाली,
कैसे मोर को तूने संवारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

गन्ना मीठा, मिर्च तीखी, खारा नमक बनाया,
मिट्टी पानी एक सभी का, भेद किसे न पाया,
कोई मीठा, कोई तीखा खारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।
ज्ञानी ध्यानी धनी कोई, सेवक स्वामी बनाये,
भिक्षु, पीर फकीर किसी को शहनशाह बनाऐ,
तेरी मर्जी का यह नजारा, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, मैं सोच सोच कर हारां।

मैं सोच सोच कर हारां, तेरियां तूं जाण मालिका,
तेरियां तूं जाण मालिका, तेरियां तूं जाण मालिका,

मैं सोच सोच कर हारां।

Saturday, January 03, 2015

भाग गया


हरिद्वार से दिल्ली वापिस आते हुए त्रिलोक रूड़की से आगे हाईवे के किनारे बने ढाबे पर खाना खाने के लिए रुके। दोपहर का समय हो रहा है। ढाबे पर तीन चार करें खड़ी है। उनको देख त्रिलोक ने भी कार उसी ढाबे पर कार रोक ली। ढाबे के एक ओर ट्यूबवेल चल रहा था। पानी अंदर खेतों में जा रहा था। ट्यूबवेल और ढाबे के बीच खेत का रास्ता था। मोटे पानी की धार नीचे हौद पर गिर कर बनी नाली के सहारे खेत में जा रही थी। त्रिलोक उस दृश्य को देख रहा था।

"बाबू क्या लोगे।" ढाबे वाले की आवाज़ सुन कर त्रिलोक कुर्सी पर बैठ गया और बात करने लगा। "यह खेत आपका है।"
"हां बाबू, खेत अपना है। पीछे आम के बाग़ है। लंगड़ा आम लगा है। आदमी तोड़ने गए हैं। थोड़ी देर रुको तो बढ़िया लंगड़ा भी लेकर जाना। आप क्या खाओगे।"
"क्या मिलेगा?"
"अंदर खेत में से ताज़ी गोभी और मूली तोड़ी है, गोभी की सब्ज़ी और मूली का परांठा अगर पसंद हो तो वो खा कर देखिये। अभी बनवाता हूं। हमारा रसोइया एक दम बढ़िया खाना बनाता हैं। बड़े बड़े होटलों का खाना भूल जाओगे। पानी ट्यूबवेल का पी कर देखो। बोतल का पानी भूल जाओगे। ठन्डे पानी से मुंह धो कर तरो ताज़ा हो जाइए। तब तक खाना बनाता है।"

ट्यूबवेल का ठंडा पानी पी कर त्रिलोक का चित प्रसन्न हो गया। मुंह धो कर तरो ताज़ा हो कर सफ़र की थकान मिट गई। खाना खा कर त्रिलोक जाने लगा, तो ढाबे वाले ने रोक लिया।

"दस पंद्रह मिनट रुक सकते हो तो आम भी देख लीजिये।"
आम और वो भी लंगड़ा, त्रिलोक की कमजोरी है। त्रिलोक आम की खतिर रुक गया। दस मिनट के बाद आम की टोकरियां आने लगी।
"छोटे साइज़ के नहीं, बड़े साइज़ का बताओ। ऐसे तो दिल्ली में खूब मिलते हैं। जब आपके बाग़ में रुके हैं तो लजीज आम दीजिये।"
"आप अपनी पसंद के चुनिए। टोकरी खुद बनाइए और हमें याद रखें। बस यही आपकी दुआ चाहिए।"

त्रिलोक बड़े साइज़ के लंगड़ा आम छांटने लगा और दो टोकरियां बनवाई। त्रिलोक आम की पेमेंट करके टोकरियों को कार की डिक्की में रखवा रहा था तभी एक आदमी आम की टोकरियों लेकर आया और ढाबे वाले से बोला कि आज के सारे आम आ गए। कहो तो मंडी के लिए आम की पेटियां बना लें।
उस आदमी की आवाज़ सुन कर त्रिलोक ठिठिक गया कि कुछ सुनी जानी पहचानी सी लग रही है। त्रिलोक ने पीछे मुड कर देखा। उस आदमी की दाढ़ी बढ़ी हुई थी। कपडे मैले पुराने। वह आदमी आम की पेटियां बनाने लगा। दो मिनट देखने के बाद त्रिलोक ने आवाज़ दी "टीटू"

टीटू नाम सुन कर उस आदमी ने त्रिलोक को पहचान लिया। त्रिलोक को वहां देख टीटू तेजी से सड़क की ओर भागा। त्रिलोक ने टीटू को भागता देख उसका पीछा करने लगा। पकड़ो पकड़ो की आवाज़ सुन कुछ लोग और भी भागे और टीटू को पकड़ लिया। पकड़ कर ढाबे में ले आये।
"टीटू तू यहां क्या कर रहा है? पूरा घर परेशान है। चल घर चल। मेरे पास कार है। बैठ कार में, घर चलते हैं।"
"मैं घर नहीं जाना।"
"क्यों नहीं जाना?"
"बस कह दिया नहीं जाना।"
"घर में सब तेरी राह देख रहे हैं। कोई कुछ नहीं कहेगा। मेरे साथ चल।"
पर टीटू घर जाने को तैयार नहीं हुआ। मौका देख फिर टीटू भागने में सफल हो गया। सड़क पार कर दूसरे खेत में कहां गायब हो गया और त्रिलोक के हाथों से निकल गया। टीटू को ढूंढने की कोशिश में सफलता नहीं मिली। थक कर त्रिलोक चारपाई पर बैठ गया।

"टीटू नाम से उसको बुला रहे थे। हमें उसने अपना नाम इंदरजीत बताया हुआ था। हम सब उसको जीत कहते हैं। कौन है वह? आप जानते हैं क्या उसे?" ढाबे के मालिक ने त्रिलोक से पूछा।
"कब से यहां था?"
"करीब एक साल से।"
"टीटू लगभग ढाई साल से घर से भागा हुआ है, आपके पास एक साल से है, तो उससे पहले डेढ़ साल कहां होगा।"
"आप कैसे जानते हो जीत को?"
"टीटू मेरा रिस्तेदार है। देखो किस्मत के खेल, जिसके खुद के यहां नौकर हैं, वो दूसरे के यहां मजदूरी कर रहा है। अच्छा खासा परिवार है। दुकान है। रुपये पैसे की कोई कमी नहीं। घर से भाग गया और दर दर ठोकरें खा रहा है। कुदरत का करिश्मा ही है। जो हाथों की लकीरों में लिखा है, वो हो कर रहता है।"

"वो घर से भागा क्यों?"
"बुरी संगत में पड़ गया और नशा करने लगा था। कॉलेज में बिगड़ गया। पढ़ भी नहीं सका। दुकान पर बैठा दिया पर गल्ले से पैसे निकाल कर नशे का सामान खरीदता। नशे में दुकान पर बैठा रहता, दुकान का कोई अता पता नहीं होता। बाप ने पैसे देने बंद कर दिए और दुकान पर जाना बंद करवा दिया। नशे क़ी लत के लिए पैसे चाहिए। एक दिन तिजोरी से रकम साफ़ कर घर से भाग गया। लगता है पैसे ख़त्म हो गए होंगे तभी मज़दूरी कर रहा है। एक बात बताओ यहां नशा करता था।"
"मजदूर तो नशा करते हैं। काम पूरा करता था। कोई शिकायत नहीं थी। रात को पुड़िया खा कर सोता था। इस पर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं हुआ।"

त्रिलोक ने टीटू के घर फोन लगाया और पूरी बात बताई। टीटू के पिता ने इतना कहा कि अपनी औलाद है। वापिस आता तो गले लगाता। नहीं आ रहा तो क्या कर सकता हूं। जहां रहे, सुखी रहे। क्या उसकी नशे की लत छूटी।

त्रिलोक के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ढाबे के मालिक को अपना फ़ोन नंबर दिया कि अगर टीटू आये तो खबर करना।
त्रिलोक कार में बैठ कर चला गया।

मेरी सोच, समझ और अनुभव कहता है कि जीत (टीटू) दुबारा यहां नहीं आएगा। चिड़िया नए पेड़ पर बैठेगी। ढाबे का मालिक मन मन में खुद को कह रहा था।

मतभेद

पांच वर्षीय अचिंत घर के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते - खेलते दो बच्चे अचिंत की मां के पास शिकायत ...