Saturday, January 03, 2015

भाग गया


हरिद्वार से दिल्ली वापिस आते हुए त्रिलोक रूड़की से आगे हाईवे के किनारे बने ढाबे पर खाना खाने के लिए रुके। दोपहर का समय हो रहा है। ढाबे पर तीन चार करें खड़ी है। उनको देख त्रिलोक ने भी कार उसी ढाबे पर कार रोक ली। ढाबे के एक ओर ट्यूबवेल चल रहा था। पानी अंदर खेतों में जा रहा था। ट्यूबवेल और ढाबे के बीच खेत का रास्ता था। मोटे पानी की धार नीचे हौद पर गिर कर बनी नाली के सहारे खेत में जा रही थी। त्रिलोक उस दृश्य को देख रहा था।

"बाबू क्या लोगे।" ढाबे वाले की आवाज़ सुन कर त्रिलोक कुर्सी पर बैठ गया और बात करने लगा। "यह खेत आपका है।"
"हां बाबू, खेत अपना है। पीछे आम के बाग़ है। लंगड़ा आम लगा है। आदमी तोड़ने गए हैं। थोड़ी देर रुको तो बढ़िया लंगड़ा भी लेकर जाना। आप क्या खाओगे।"
"क्या मिलेगा?"
"अंदर खेत में से ताज़ी गोभी और मूली तोड़ी है, गोभी की सब्ज़ी और मूली का परांठा अगर पसंद हो तो वो खा कर देखिये। अभी बनवाता हूं। हमारा रसोइया एक दम बढ़िया खाना बनाता हैं। बड़े बड़े होटलों का खाना भूल जाओगे। पानी ट्यूबवेल का पी कर देखो। बोतल का पानी भूल जाओगे। ठन्डे पानी से मुंह धो कर तरो ताज़ा हो जाइए। तब तक खाना बनाता है।"

ट्यूबवेल का ठंडा पानी पी कर त्रिलोक का चित प्रसन्न हो गया। मुंह धो कर तरो ताज़ा हो कर सफ़र की थकान मिट गई। खाना खा कर त्रिलोक जाने लगा, तो ढाबे वाले ने रोक लिया।

"दस पंद्रह मिनट रुक सकते हो तो आम भी देख लीजिये।"
आम और वो भी लंगड़ा, त्रिलोक की कमजोरी है। त्रिलोक आम की खतिर रुक गया। दस मिनट के बाद आम की टोकरियां आने लगी।
"छोटे साइज़ के नहीं, बड़े साइज़ का बताओ। ऐसे तो दिल्ली में खूब मिलते हैं। जब आपके बाग़ में रुके हैं तो लजीज आम दीजिये।"
"आप अपनी पसंद के चुनिए। टोकरी खुद बनाइए और हमें याद रखें। बस यही आपकी दुआ चाहिए।"

त्रिलोक बड़े साइज़ के लंगड़ा आम छांटने लगा और दो टोकरियां बनवाई। त्रिलोक आम की पेमेंट करके टोकरियों को कार की डिक्की में रखवा रहा था तभी एक आदमी आम की टोकरियों लेकर आया और ढाबे वाले से बोला कि आज के सारे आम आ गए। कहो तो मंडी के लिए आम की पेटियां बना लें।
उस आदमी की आवाज़ सुन कर त्रिलोक ठिठिक गया कि कुछ सुनी जानी पहचानी सी लग रही है। त्रिलोक ने पीछे मुड कर देखा। उस आदमी की दाढ़ी बढ़ी हुई थी। कपडे मैले पुराने। वह आदमी आम की पेटियां बनाने लगा। दो मिनट देखने के बाद त्रिलोक ने आवाज़ दी "टीटू"

टीटू नाम सुन कर उस आदमी ने त्रिलोक को पहचान लिया। त्रिलोक को वहां देख टीटू तेजी से सड़क की ओर भागा। त्रिलोक ने टीटू को भागता देख उसका पीछा करने लगा। पकड़ो पकड़ो की आवाज़ सुन कुछ लोग और भी भागे और टीटू को पकड़ लिया। पकड़ कर ढाबे में ले आये।
"टीटू तू यहां क्या कर रहा है? पूरा घर परेशान है। चल घर चल। मेरे पास कार है। बैठ कार में, घर चलते हैं।"
"मैं घर नहीं जाना।"
"क्यों नहीं जाना?"
"बस कह दिया नहीं जाना।"
"घर में सब तेरी राह देख रहे हैं। कोई कुछ नहीं कहेगा। मेरे साथ चल।"
पर टीटू घर जाने को तैयार नहीं हुआ। मौका देख फिर टीटू भागने में सफल हो गया। सड़क पार कर दूसरे खेत में कहां गायब हो गया और त्रिलोक के हाथों से निकल गया। टीटू को ढूंढने की कोशिश में सफलता नहीं मिली। थक कर त्रिलोक चारपाई पर बैठ गया।

"टीटू नाम से उसको बुला रहे थे। हमें उसने अपना नाम इंदरजीत बताया हुआ था। हम सब उसको जीत कहते हैं। कौन है वह? आप जानते हैं क्या उसे?" ढाबे के मालिक ने त्रिलोक से पूछा।
"कब से यहां था?"
"करीब एक साल से।"
"टीटू लगभग ढाई साल से घर से भागा हुआ है, आपके पास एक साल से है, तो उससे पहले डेढ़ साल कहां होगा।"
"आप कैसे जानते हो जीत को?"
"टीटू मेरा रिस्तेदार है। देखो किस्मत के खेल, जिसके खुद के यहां नौकर हैं, वो दूसरे के यहां मजदूरी कर रहा है। अच्छा खासा परिवार है। दुकान है। रुपये पैसे की कोई कमी नहीं। घर से भाग गया और दर दर ठोकरें खा रहा है। कुदरत का करिश्मा ही है। जो हाथों की लकीरों में लिखा है, वो हो कर रहता है।"

"वो घर से भागा क्यों?"
"बुरी संगत में पड़ गया और नशा करने लगा था। कॉलेज में बिगड़ गया। पढ़ भी नहीं सका। दुकान पर बैठा दिया पर गल्ले से पैसे निकाल कर नशे का सामान खरीदता। नशे में दुकान पर बैठा रहता, दुकान का कोई अता पता नहीं होता। बाप ने पैसे देने बंद कर दिए और दुकान पर जाना बंद करवा दिया। नशे क़ी लत के लिए पैसे चाहिए। एक दिन तिजोरी से रकम साफ़ कर घर से भाग गया। लगता है पैसे ख़त्म हो गए होंगे तभी मज़दूरी कर रहा है। एक बात बताओ यहां नशा करता था।"
"मजदूर तो नशा करते हैं। काम पूरा करता था। कोई शिकायत नहीं थी। रात को पुड़िया खा कर सोता था। इस पर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं हुआ।"

त्रिलोक ने टीटू के घर फोन लगाया और पूरी बात बताई। टीटू के पिता ने इतना कहा कि अपनी औलाद है। वापिस आता तो गले लगाता। नहीं आ रहा तो क्या कर सकता हूं। जहां रहे, सुखी रहे। क्या उसकी नशे की लत छूटी।

त्रिलोक के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ढाबे के मालिक को अपना फ़ोन नंबर दिया कि अगर टीटू आये तो खबर करना।
त्रिलोक कार में बैठ कर चला गया।

मेरी सोच, समझ और अनुभव कहता है कि जीत (टीटू) दुबारा यहां नहीं आएगा। चिड़िया नए पेड़ पर बैठेगी। ढाबे का मालिक मन मन में खुद को कह रहा था।
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