Sunday, February 22, 2015

बस एक बार

बस एक बार मुड़ कर देखें
वो बचपन के अल्हड दिन
बस एक बार मुड़ कर देखें
वो बचपन की किलकारी हंसी
बस एक बार मुड़ कर देखें
वो बचपन में आसमान छूते छोटे छोटे हाथ
बस एक बार मुड़ कर देखें
वो बचपन की मस्तियां नादानियां
बस एक बार मुड़ कर देखें
वो छोटे हाथों का कबूतर बिल्लियों के पीछे भागना
बस एक बार फिर मुड़े
वो गीले शिकवे छोड़ दें
बस एक बार फिर मुड़े
वो भेद भाव छोड़ दें
बस एक बार फिर मुड़े
वो अशांति छोड़ दें
बस एक बार फिर मुड़े
वो हिंसा छोड़ दें
बस एक बार फिर मुड़े
वो तनाव ज़िन्दगी में छोड़ दें
बस एक बार फिर मुड़े
वो करें इस्त्री जीवन की सलवटों पर
बस एक बार फिर मुड़े
वो क्या तेरा क्या मेरा
बस एक बार फिर मुड़े
वो बस सब कुछ एक दूजे पर अर्पित
बस एक बार फिर मुड़े

वो ज़िन्दगी जियें वोही ज़िन्दगी

Monday, February 16, 2015

रौशन


करें दिल हम रौशन
भुला दें हम दिलों के अंतर
गिले शिकवों में क्या रखा है
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
समझे किसी को छोटा बड़ा
सब हैं प्यार के काबिल
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
क्या कोई गरीब अमीर
दिल है सबका एक सा
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
एक सा सबका धड़कता है दिल
करें बेदाग़ हम दिल
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
प्यार के लिए बना है यह दिल
छोड़ दें नफरत हम
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
क्या तेरा क्या मेरा
हंसते हंसते बिताएं ज़िन्दगी
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
गम का क्या है
आदत है उसकी आने जाने की
करें दिल हम रौशन

करें दिल हम रौशन
खुशियां बांटे जग में
हंसना सिखाएं हम सबको
करें दिल हम रौशन


Sunday, February 08, 2015

यूंही

बस यूंही गुज़र रहा है दिन
सोचते सोचते
बस यूंही गुज़र रही है ज़िन्दगी
सोचते सोचते
बस एक ठंडी हवा का मस्त झोंका आया
सोचते सोचते
बस एक गरम हवा बदन पस्त कर गई
सोचते सोचते
बस रिश्ते बनते टूटते रहे
सोचते सोचते
बस कुछ हंसी के लम्हे आ गए
सोचते सोचते
बस कुछ गम से समय बीत गया
सोचते सोचते
बस कुछ उदासी सी छाने लगी है
सोचते सोचते
बस कुछ समय बीत रहा है
सोचते सोचते
बस यूंही गुज़र रहा है दिन
सोचते सोचते
बस यूंही गुज़र रही है ज़िन्दगी

सोचते सोचते

Monday, February 02, 2015

छापा



चियर्स के साथ तीन गिलास टकराये। सुकुमार प्राधिकरण के चेयरमैन शहर के जाने माने बिल्डर्स शर्मा और वर्मा के साथ डिंपल फाइव स्टार्स होटल के बार में बैठे व्हिस्की पी रहे थे। दो पैग पीने के बाद सुकुमार सरूर में आ गए।
"और शर्मा कैसे चल रहा है बिज़नस।"
"बस आपकी कृपा बनी रहे। बिज़नस अपने आप चलता रहेगा।"
"शर्मा बस यही तेरी अदा मार डालती है।"
"सर आपका गिलास खाली अच्छा नहीं लगता।" वर्मा ने व्हिस्की सुकुमार के गिलास में डालते हुए कहा।
"यार वर्मा तुम तो कुछ बोल नहीं रहे। बस पैग बना रहे हो।"
"ज़रा सरूर आ जाये तो बात करने का मज़ा आएगा।"
"वर्मा तू बड़ा शैतान है। बोल बात कर। सरूर आ रहा है। व्हिस्की में दम है।"
"सर जी, कोई खरा सौदा बताओ तो मज़ा आ जाये। कोई दूसरा उसमे हाथ न डाल सके। यह मकान, दुकाने तो आजकल हर दूसरा नाथूखैरा बना रहा है।"
"कान पास लाओ, दीवारों के आजकल कान बड़े तेज हैं।"
वर्मा और शर्मा दोनों सुकुमार के पास दाएं और बाएं आ कर बैठ जाते है।
"सुनो, क्या करोगे तुम, यह बताओ पहले?" सुकुमार ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा।
"यह भी कोई क्या पूछने की बात है। आप हुकुम करते जाएं, हम करते जायेंगे। बस सौदा खरा होना चाहिए।" वर्मा और शर्मा सुकुमार के कान में फुसफुसाते हैं।
"तुम हॉस्पिटल, स्कूल, स्टेडियम बनाने के लिए आवेदन करो। सस्ते में मिलेगी। आस पास की ज़मीन रिहाइश, होटल और कमर्शियल के लिए। मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग के एक तरफ शर्मा और दूसरी तरफ वर्मा। कैसी लगी।"
"आपके मुंह में घी शक्कर। बस हुकुम कीजिये।"
"इतनी जल्दी क्या है। धीरे धीरे पते खुलेंगे।"
सुकुमार की बातों से दोनों वर्मा और शर्मा निश्चिन्त हो गए। महफ़िल रात के दो बजे तक चलती रही। सुकुमार पूरा पियक्कड़ है। सुकुमार की बातों के बाद दोनों ने एक तरह से सुकुमार को व्हिस्की से नहला दिया।

अगले ही दिन दोनों वर्मा और शर्मा ने सुकुमार के कहने पर हॉस्पिटल, स्कूल, कॉलेज, स्टेडियम के साथ नयी टाउनशिप के लिए आवेदन दे दिया। एक महीने में दोनों वर्मा और शर्मा के आवेदन मंज़ूर हो गए। वर्मा को मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग के दाहिने ओर 500 एकड़ जमींन मिल गयी और बाई ओर की 500 एकड़ जमींन मिल गयी शर्मा को। सुकुमार ने मुंह मांगी कीमत वसूल की। कैश रिश्वत की मोटी रकम के साथ बड़े लड़के को विदेश में सेटल करवा दिया। पत्नी को वर्मा की एक कंपनी में डायरेक्टरशिप और मोटी तनख्वा, प्रॉफिट में हिस्सा और छोटे भाई को शर्मा की कंपनी में डायरेक्टरशिप के साथ मोटी तनख्वा के साथ प्रॉफिट में हिस्सा। छोटे लड़के और लड़की के नाम ब्रोकर कंपनी। जो भी बिकेगा, वह ब्रोकर कंपनी की मार्फ़त, यानी हर बिक्री पर एक तय निश्चित कमिशन। यानी चित भी सुकुमार की और पट भी सुकुमार की। पांचों उंगलियां घी में।

सुकुमार प्राधिकरण में एक जूनियर इंजीनियर भर्ती हुए थे। देखते देखते चेयरमैन बन गए। सब जानते हैं कि सुकुमार एक चलता चालू पुर्जा है। नेताओं से बना कर रखता है और उनके सानिध्य में चेयरमैन बन गए। सबको मालूम है कि रिश्वत का मोटा हिस्सा मंत्रियों और मुख्यमंत्री को जाता है। मुख्यमंत्री से तो घर वाले रिश्ते हो गए। सभी उलटे सीधे काम सुकुमार की मार्फ़त ही होते हैं। कई सीनियर ऑफिसर्स को लांघ कर चेयरमैन बने तो ईर्षा के कारण सुकुमार के कई शत्रु भी हो गए, पर कोई कुछ नहीं कर सकता था। दस साल से मुख्यमंत्री और मंत्री कई भ्रष्ट कामों में लिप्त थे। कई सकैम हुए। जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा था पर सरकार की ताकत के आगे जनता बेबस रही।

वर्मा और शर्मा को ज़मीन मिल गई। दोनों ने कई स्कीम निकाली और जनता ने बुकिंग करानी शुरू कर दी। वर्मा और शर्मा के साथ सुकुमार के पौ बारह होने लगे। हर बुकिंग पर कमीशन। बात होती है तो धुंआ निकलने लगता है। बातें बाजार में कई तरह से उठ रही थी। सुकुमार के जूनियर सुखीजा और मखीजा, वैसे तो सुकुमार से सीनियर थे परन्तु मुख्यमंत्री की कृपा से सुखीजा और मखीजा समेत कई सीनियर अधिकारियों को नज़रअंदाज़ करके सुकुमार को चेयरमैन बना दिया था। दोनों सुखीजा और मखीजा ने सुकुमार के विरुद्ध सबूत एकत्रित करना शुरू कर दिए। उन दोनों को उम्मीद थी कि कभी न कभी पाप का घड़ा भरेगा और सुकुमार की चढ़ती पतंग कटेगी। तब कटी पतंग को कोई नहीं लूटेगा। पैरों तले रौंदी जायेगी कटी पतंग।

चुनाव का समय आया और जनता ने दस सालों से टिके मुख्यमंत्री और उनके दल को नकार दिया। बुरी तरह से चुनाव हार गए। सकैम ही सकैम चारों तरफ व्यापक थे। भ्रष्ट सरकार हार गई। मुख्यमंत्री की जमानत भी जब्त हो गई। नई सरकार ने पुरानी सरकार की गड़बड़ी, सकैम और अनिमिताओं की जांच आरम्भ की। सुखीजा और मखीजा तो इंतज़ार में बैठे थे। मौका मिलते उन्होंने मीडिया में सुकुमार की कालगुजारिओं के चिट्ठे खोल दिए। मीडिया को तो मसाला चाहिए, जो सुखीजा और मखीजा के पास बेशुमार था। शर्मा और वर्मा की हर बिक्री में सुकुमार की लड़की की कमीशन। जिस रेट पर शर्मा और वर्मा को ज़मीन दी, वह गलत थी। कम रेट पर कॉलेज, हॉस्पिटल और स्टेडियम के लिए दी, जो सिर्फ सरकारी संस्थानों को ही मिल सकती थी। किसी निजी कंपनी में सिर्फ गरीबों के लिए बनाये जाने हेतु की कम कीमत पर दी जा सकती थी। शर्मा और वर्मा तो शुद्ध लाभ कमा रहे थे। सरकार ने जांच बिठा दी। सुकुमार लंबी छुटी पर चले गए। सुखीजा को सुकुमार के स्थान पर कार्यवाहक चेयरमैन बना दिया।

सरकारी जांच एक तरफ चल रही थी तो मीडिया दूसरी तरफ अपनी जांच में जुटा हुआ था। हर रोज़ गरमा गरम चटपटी मसालेदार ख़बरें आ रही थी। सुकुमार पचीस कंपनियों के मालिक। रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज से कंपनियों का पूरा ब्यौरा निकाल कर रख दिया कि सुकुमार खुद, उनका परिवार, भाई, बहनो के ज़रिये इन पचीस कंपनियों के मालिक हैं। मीडिया रिपोर्ट को देखते हुए आयकर विभाग ने छापा मारा। छापे के दौरान सुकुमार के कई बैंक लाकर खोले गए। बैंक लाकर में चमकते हुए नोटों की गड्डियां निकली। आयकर विभाग को कैश गिनने वाली मशीन मंगवानी पड़ी। साढे पांच करोड़ नकदी बैंक लाकर से प्राप्त हुई। कई प्रॉपर्टीज के कागज़ मिले। मीडिया में सुकुमार ही सुकुमार छाहे रहे। सुकुमार सोच रहे थे की कैसे इस जाल से निकला जाए। रिश्वत की पेशकश की पर जहां सरकार ही पीछे पड़ जाए तब हाथ मला ही जा सकता है और कुछ नहीं। कोई रास्ता नहीं बचा। लाकर में रखे कैश भी हाथ से चला गया। मीडिया वाले उसके पुश्तैनी गांव भी गए। उसके गांव में आलीशान मकान के चित्र मीडिया में छाहे रहे। दो तीन शहरों में बने बंगले सभी की जुबान पर छाहे रहे। कैसे निकले जाल से, कोई रास्ता न मिलने पर उसने पत्नी सोनाली से बात की।

"सोनाली अब हमें यह देश छोड़ना पड़ेगा।"
"हमारा सब कुछ यहीं है। बिज़नस, प्रॉपर्टीज इनका क्या होगा?"
"बाद में देख लेंगे। अभी तो बचा नहीं सकते। शिकंजा चारों तरफ से जबरदस्त है। दो चार साल में सब ठंडा पड़ जायेगा, तब देखेंगे। कौन नहीं बिकता। आज नहीं तो कल सब ठीक हो जायेगा। कल पुराना मुख्यमंत्री बिकता था, कल नया बिकेगा।"
"लेकिन अब क्या करें?"
"एक काम करो तुम और बच्चे मेरठ निकल जाओ। वहां हरलाल जापानी मिलेगा। यह दस रुपये का नोट उसे देना वो तुम्हे एक करोड़ देगा। मैं तुम्हे कुछ दिन बाद मिलूंगा। वो तुम्हे भूटान भिजवा देगा। तुम वहीँ रहना। एक छोटा सा आशियाना है भूटान में।"
"भूटान के बारे में कभी नहीं बताया?"
"कुछ बातों को कहा नहीं जाता। मौका मिलने पर खुलासा करते हैं। अब समय आ गया है। तुम भूटान चली जाओ।" कह कर सुकुमार ने एक फट हुआ दस रूपए का नोट सोनाली को दिया।
नोट देख कर "यह फटा हुआ है।"
"तभी दिया है। इसका एक सिरा तुम्हे दिया है, दूसरा हरलाल जापानी के पास है। वह नोट को मैच कर रकम एक दो दिन में दे देगा। फिर ट्रेन से जलपाईगुड़ी और वहां से सड़क के रास्ते भूटान।"

रात के अंधेरे में सोनाली और बच्चे मेरठ चले गए। मेरठ में हरलाल जापानी ने अगले दिन रकम दी और तय कार्यक्रम अनुसार भूटान के सुरक्षित स्थान पहुंच गए। बीवी बच्चों के सुरक्षित पहुंचने पर सुकुमार निश्चिन्त हो गया। अगला एक सप्ताह बड़ा तूफानी रहा। सुकुमार की परेशानियां बढती गई। आयकर के साथ सीबीआई की भी जांच शुरू हो गई। सुकुमार को चक्रव्यूह में फंसा लिया। अपने दोस्त, जिन पर सुकुमार को भरोसा था, वो भी मैदान छोड़ गए। इससे पहले की सुकुमार को गिरफ्तार किया जाये, जिसकी सुकुमार को आकांशा थी, वह चुपचाप रात के डेढ़ बजे घर से निकला।

सुकुमार पैदल चल रहा था। उस समय एक डैम सन्नाटा था। कहीं कहीं से कुत्तों के भोंकने की आवाज़े आ रही थी, जो एक दम माहौल को रहस्मयी और डरावना बना देती। सुकुमार के हाथ में एक अटैची, जिस में उसके कपडे और रकम थी। लगभग दस मिनट पैदल चलने के बाद चौराहे पर दो ऑटो खड़े थे। रोडवेज की नाईट सर्विस वाली बसें वहां रूकती है। सवारियां उतरती है। इसलिए ऑटो रात को मिल जाते हैं। सुकुमार उस स्थान पर रुक कर सोचने लगा। एक ऑटो वाले ने पूछा "बाबू कहां जाओगे।"
"मुझे बस पकड़नी है। सुबह घर पहुंचना जरूरी है।"

कुछ देर में ऋषिकेश की बस आई। सुकुमार ने बस पकड़ी। बस का ऋषिकेश पहुंचने का समय सुबह छ बजे था। सुकुमार ने सोचा कि ऋषिकेश के किसी आश्रम में कुछ दिन रुक कर सोचा जाए की अब क्या करना है। सोचते हुए सुकुमार को नींद आ गई। लगभग तीन बजे का समय था। सड़क सुनसान, मुजफ्फरनगर से पहले सड़क पर बैरियर लगा कर बस रोक ली। पुलिस की वरदी में डाकू थे। सभी बस में चढे। एक आदमी ने सबको बिस्कुट खाने को दिए। बिस्कुट में नशे की दवा मिली थी। जिसने खाने में आनाकानी की, उसे जबरदस्ती खिलाये गए। डाकुओं ने सभी मुसाफिरों को लूट लिया। सुकुमार और दो और यात्रियों को बंधक बना अपने साथ जीप में बिठा कर ले गए। तीनों बंधकों को गांव के खेत में बने कमरे में कैद कर लिया।

सुबह होते ही डाकुओं ने भूरे चीनी को फ़ोन किया। "मालिक तीन तगड़े भैंसे है। दूध, मलाई, घी आपका, हमें तो चरणामृत चाहिए।"
"भैंसे कहां हैं?"
"खेत में।"
"ठीक है, मैं आता हूं।"

भूरे चीनी मुज़फ्फरनगर में रहता है। नाम तो कुछ और है पर गोरा रंग होने के कारण नाम भूरे पड़ गया। कद छोटा, चीनी लोगों जैसी छोटी छोटी आंखें, तो नाम चीनी भी जुड़ गया।

एक घंटे के अंदर भूरे चीनी अपने एक साथी के साथ खेत पर बने कमरे में पहुंच गया।

"सर जी, पहले को देखो दिल्ली का सॉलिड माल है। घर से दूर हरिद्वार में रखैल से मिलने बस पर जा रहा था। कारों की लाइन है, पर चोरी छिपे बस में जा रहा था।"
"पांच करोड़ मांग लो।"
"सर जी, दूसरे को देखो। हरिद्वार का पांडा है। मोटी रकम वसूल कर जा रहा था। ब्याज पर रकम दिल्ली के सेठों को देता है।"
"तीन मांग लो।"
"सर जी, यह तीसरा सबका बाप लगता है। छोटे सी अटैची मैं ही पांच लाख ले कर चल रहा था।"

भूरे चीनी ने सुकुमार को देख कर डाकुओं को लताड़ा और भद्दी मां, बहन की गलियां देते हुए बोला। "सालों, जानते हो, किस को पकड़ लाए।"
"सर जी, बताओ तो सही, क्या गलती हो गई। कौन है यह।"
"अरे यह हम सबका बाप है। सुकुमार नाम है। मतलब माई बाप। प्राधिकरण के चेयरमैन, जिन पर जांच चल रही है। मैं तो इनका अहसानमंद हूं। दुनिया की नज़र में खलनायक बने हुए हैं आजकल। हमारे तो हमेशा इष्ठदेव रहेंगे। मुज़फ्फरनगर की तीन ज़मीने औने पौने दामों पर दिलवा दी थी। रिश्वत ज़रूर ली थी पर यारों का यार है। मेरे पास इसके दस करोड़ पड़े हैं। मैं फिरौती की बात सोच भी नहीं सकता। अरे इसे होश में लाओ। नशे की दवा जयादा मिला दी होगी तुमने। ट्यूबवैल में नहला दो। होश में आये तो ज़रा शराफत से पेश आना। खाना एकदम बढ़िया खिलाओ। फिर मुझे बुलाना।" कह कर भूरे चीनी जाने वाला था, पर रुक कर बोला। "सुनो, इसको मेरे घर ले कर आना।"

डाकू सुकुमार को ट्यूबवैल ले गए। मोटी पानी की धार के नीचे सुकुमार को होश आया। अनजान स्थान पर अनजान लोगों के बीच सुकुमार घबरा गया। खेतों के बीच ट्यूबवैल और कमरा, सुकुमार को कुछ याद नहीं आ रहा था कि वो इस स्थान पर कैसे आया।
"सर जी, आप को भूख लगी होगी। आप कपडे बदल लीजिये। नाश्ता बिरजू अभी लाता होगा।"
तभी बिरजू शहर से पूरी छोले और कचोड़ी का नाश्ता ले आया। सुकुमार कपडे बदलने कमरे में गया, वहां दो आदमी बेहोश थे। सुकुमार घबरा गया।
"सर जी, डरने की कोई बात नहीं है। नशे में हैं, थोड़ी देर में उठेंगे। आप कपडे बदल कर नाश्ता कीजिये।"
सुकुमार ने कपडे बदले और नाश्ता किया। नाश्ता करने के बाद सुकुमार को अब एक कार में भूरे चीनी के फार्महाउस ले गए। भूरे चीनी को देख कर सुकुमार के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आ गए।
भूरे चीनी ने आगे बड़ कर सुकुमार का स्वागत किया। भूरे चीनी ने सुकुमार को सर कह कर पुकारा, फिर सुकुमार का हालचाल पूछा।
"समाचार पत्र में आपके बारे में ख़बरें छप रही हैं। मैं कुछ मदद कर सकू तो मेरा सौभाग्य होगा।"
"मैं रात बस में बैठा था। आप लोगों के बीच कैसे पहुंचा, कुछ याद नहीं आ रहा है।"
भूरे चीनी ने सुकुमार को पूरी बात बताई कि रात में बस को लूट कर तुम्हे और दो को फ़िरौती के लिए अगवा कर किया।
"अच्छा तो वो दोनों अगवा किये हुए थे। मैं तो इनका साथी समझ रहा था।"
"अब आप चिंता न करो। मेरे यहां आपका कोई बाल भी बांका कर सकता।"
"भूरे चीनी, तुम यह काम करते हो, मुझे आज पता चला।"
"छोड़ो सर जी, बस आप हुकुम कीजिये। आप के कई अहसान हैं मुझ पर। आज समय आ गया है, उन अहसानो के लिए आपकी सेवा के लिए यह नाचीज हाज़िर है।"
"कुछ रकम तुम्हारे पास है। जो कुछ लेकर चला था, लूट लिया। ठन ठन गोपाल हूं। अभी एक करोड़ दे दो। भूटान जा रहा हूं, बाकी वहीँ पहुंचा देना। मामला ठंडा हो जाए तो फिर बाकी प्रॉपर्टीज भी कैश करनी है। तुम्हारी ज़रुरत पड़ेगी।"
"आप चिंता न करे। बस हुकुम करते रहिये। हम तो आपके ताबेदार हैं। आप भूटान कैसे जाओगे।"
"रेल से बदल बदल कर कलकता, फिर वहां से सिलिगुडी और सड़क से भूटान।"
"मेरी राय में आप अकेले मत जाइये। मेरा एक आदमी साथ रखिए। रास्ते ख़राब हैं। लूटपाट हो सकती है। सही एक बार पहुंच जाइये, फिर बाकी के काम यहां में कर दूंगा।"
"भूरे तुम ठीक कहते हो।"
भूरे चीनी मन मन में सोच रहा था। सुकुमार की अनेक प्रॉपर्टीज हैं। उन्हें निकालने में अपनी पौ बारह, चांदी काटने का समय आ गया है। सुकुमार सोच रहा था कि उसे सतर्क रहना है, अपना अड्डा किसी को नहीं बताना।
"भूरे, मैं अकेला ही जायूंगा। कोई खास खबर हो तो बताते रहना।"
"जैसी मालिक की इच्छा।" भूरे चीनी ने कहा। "आज के दिन यहीं रहो। मैं रकम का बंदोबस्त करता हूं।"
भूरे चीनी ने रात को रकम सुकुमार को दी। सुकुमार रात की ट्रेन से रवाना हो गया। अलग अलग जगह रहते हुए, कभी बस से तो कभी ट्रेन से, सुकुमार दस दिन बाद भूटान अपने परिवार से मिला। भूटान में सुकुमार ने अपनी दाढ़ी बढ़ा ली और हुलिया भी, ताकि कोई पहचान न सके।

धीरे धीरे समय बीतता गया। मीडिया की रूचि नए केसों में होने लगी और सुकुमार को मीडिया भूलती गई। सरकारी जांच की गति कछुहे की रफ़्तार से होती है। एक साल बाद सुकुमार को भगोड़ा घोषित कर दिया। कोई भी उसे ढूंढ सका, यहां तक पुलिस को भी कोई सुराग नहीं मिला कि सुकुमार कहां है। सरकार ने उसको ससपेंड कर दिया। जो सम्पति सुकुमार के नाम थी, उसे जब्त कर लिया। मीडिया में ख़बरें आनी बंद हो गई। इस एक साल में सुकुमार ने अपने बच्चों को विदेश सेटल करा दिया। खुद पत्नी सोनाली के साथ भूटान के एक दूर गांव में रहने लगा। सुकुमार की कई बेनामी प्रॉपर्टीज भी थी। सुकुमार उनको बेचना चाहता था। उसको मालूम था कि शातिर छट्टे खिलाडी हरलाल जापानी और भूरे चीनी ही कर सकते हैं, ताकि जिनके नाम प्रॉपर्टीज हैं, हथिया ना सकें। एक एक करके सुकुमार ने सारी बेनामी प्रॉपर्टीज को बेचा। हरलाल जापानी और भूरे चीनी ने खूब लाभ कमाया। सुकुमार को आधी रकम ही मिल सकी और बाकी आधी रकम हरलाल जापानी और भूरे चीनी ने रखी। सुकुमार जान कर भी अनजान बना रहा। चोरों के भी असूल होते हैं। उन दोनो ने किसी को नहीं बताया कि वे सुकुमार के लिए काम कर रहें हैं और सुकुमार कहां है। उनको अपना फायदा था। सुकुमार अपने रिश्तेदारों और जग से कट गया।


समय बीतता गया। इस घटना को आज दस साल हो गए। सुकुमार दूर गांव में चैन की बंसी बजा रहा है। बहुत सारी ज़मीन खरीद ली। बागवानी और फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट का मालिक बन गया। यहां किसी को पता नहीं कि सुकुमार कहां है। फ़ाइल दब गई। लोगों और मीडिया के मन पटल और स्मृति से मिट गया। सब का व्यापार पहले जैसा चलता रहा। सरकार नई योजनाओं में जुट गई। नए अफसर नई सरकार के मंत्रियों के साथ हाथ में हाथ मिला कर नए घोटाले में जुट गए। मीडिया को नया मसाला मिल गया। नए सुकुमार पैदा हो गए। सुकुमार दूर से सब कुछ देखता रहा और चुपचाप शान्त जीवन व्यतीत करता रहा।

अकेलापन

सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया। ...