Tuesday, March 10, 2015

कायाकल्प



मेज पर फाइलों का पुलिंदा पड़ा है, पर दिलीप को कोई जल्दी नहीं है कि फाइलों को निबटाया जाए। सरकारी विभाग, बिना दक्षिणा के फ़ाइल का पट नहीं खुलता। दिलीप का सिद्धान्त है कि मंदिर जाते है तो बिना प्रसाद, चढ़ावे के भगवान से भी विनती नहीं करते तो सरकारी कर्मचारी कौन भगवान से कम हैं। पूरे देश के जंवाई राजा हैं। घर में खाने को दाने न हों पर जंवाई की खातिर जरूर होती है, चाहे पड़ोसियों से उधार मांगना पड़े। एक बार सरकारी नौकरी लग जाये, सरकार की पेंशन लग जाती है। तनख्वाह तो पेंशन है, बाकी खर्चे के लिए दान दक्षिणा होती है। इसी सिद्धान्त पर दिलीप ने बीस वर्ष सरकारी नौकरी में निकाल दिए।

पत्नी दर्पण सुबह सुबह टिफिन तैयार कर देती है। हर सरकारी नौकर की पत्नी की ख्वाहिश रहती है कि उसके पति को सबसे अधिक दान दक्षिणा मिले। खैर जनाब, यह तो कुर्सी पर निर्भर रहता है, कि उसका महत्व कितना है, चढ़ावा तो कुर्सी कुर्सी पर निर्भर रहता है। जितनी ऊंची कुर्सी, उतनी अधिक दक्षिणा। दर्पण को दिलीप की तनख्वाह से कोई सरोकार नहीं। एक पैसा भी नहीं लेती है, हां दक्षिणा पर पूरा हक़ दर्पण का ही रहता है। उसका मानना है कि दफ्तर एक मंदिर है, वहां हर रोज़ जाना है। कोई छुट्टी नहीं करनी, पता नहीं, कुर्सी पर किसी और को विराजमान कर दिया तो न जाने क्या होगा।

दिलीप दफ्तर में सुबह से तीन कप चाय पी चुका है। ग्यारह बजे है, गपशप चल रही है। किसी ने कोई फ़ाइल नहीं खोली। धीरे धीरे लोगों का आना आरम्भ हुआ और फाइलों की पूछताछ हुई। सभी को पता कि कहां देने है, जिस सीट पर फ़ाइल है, बातचीत कर आगे बढ़ाने के किये दक्षिणा देते जाते है।
"दिलीप जी, नमस्कार कैसे है।" एक सज्जन ने दिलीप की सीट के आगे एक कुर्सी खींच कर बैठते हुए कहा।
"नमस्कार, दिखाई नहीं देते, आजकल।" उन सज्जन को देखते दिलीप के चेहरे पर मुस्कान छा गई।
मन ही मन उसने दिलीप को दो चार गलियां दी, कौन आना चाहता है, मिलने का मतलब है, माथा टेकना। परन्तु चेहरे के हावभाव से प्रकट नहीं होने दिया कि वह मन ही मन कोस रहा है "हमारी फ़ाइल जरा देख लीजिये।"
"अभी देख लेते है।" दिलीप ने फ़ाइल निकली और देखने के बाद दक्षिणा बताई "इस में तो तीस हज़ार लगेंगे।"
"पिछली बार तो बीस में काम किया था। वही विषय है।"
"नए साब है, कड़क एक दम। मानना मुश्किल है। आप तो पुराने ठहरे। उचित दक्षिणा में काम होगा।"
"ठीक है, कब तक हो जायेगा।" कोई और चारा न देखते हुए वो सज्जन बोले।
"कल इसी समय आ जाना। हमारे दरबार में देर नहीं होती।"

एक खूबी थी दिलीप में। दक्षिणा मिलते गोली की रफ़्तार से फ़ाइल निबट जाती थी। उस दिन दिलीप को दो लाख रुपये की दक्षिणा आई। ऐसे दिन तो कभी कभी आते है, कि छप्पन भोग लगे। शाम को दर्पण इतराती नहीं थक रही थी। डायमंड का नेकलेस की फरमाइश हो गई।

"दर्पण कीमत नहीं देखना। नेकलेस ऐसा होना चाहिए, कि सब देखते रह जाएं। तुम्हारी खूबसूरती को चार चांद जब तक न लगे, मुझे चैन नहीं आएगा।" कह कर दिलीप ने दर्पण के होंठों पर होंठ रख दिए और बांहों में कैद कर लिया।
बांहों में कैद दर्पण मचल गई। "आज कोई खास बात है क्या, जो इतना जवान बन रहे हो।"
"बच्चों को होस्टल में डाल रखा है, घर में एक मैं और एक तुम। मौसम भी कातिलाना है और तुम उस पर आग लगा रही हो।"
"ठिठोली कर रहे हो।"
"सच कह रहा हूं।"
फिर दो जिस्म एक जान हो गए।

दर्पण नाम के अनुरूप थी और नाम को सार्थक करती थी। विवाह के सोलह साल बाद भी दर्पण को देख कर हर कोई यही कहता था कि दर्पण अभी कॉलेज में पढ़ रही होगी। बच्चे होस्टल में रहते है, दर्पण उम्र के साथ साथ अधिक जवान हो गई थी। बेफिक्र घर का वातावरण, बच्चे होस्टल में। रुपये, पैसों की कोई कमी नहीं, हर ख्वाहिश पूरी हुई। हालांकि दिलीप कुछ उम्र से बड़े दिखने लगे थे, पर दर्पण उम्र से छोटी दिखती। गोरी, सुन्दर, थोडा ऊंचा कद, सुडोल बदन की स्वामिनी दर्पण।

हर इच्छा, ख्वाहिश पूरी हुई। दक्षिणा मांगने में दिलीप दक्ष था कि किस तरह अधिक से अधिक दक्षिणा झटकी जाये। हर सरकारी कर्मचारी की पत्नियों की तरह उसे भी दक्षिणा से अधिक लगाव था।
एक रात दर्पण के होंठों पर होठ रखते कहा "आज पच्चीस साल हो गए नौकरी करते हुए।"
"सिल्वर जुबली, क्या इरादा है। शादी की सिल्वर जुबली में तो पांच साल है।" दर्पण दिलीप से चिपक गई।
"कश्मीर चलते है। हसीन वादियों में कुछ प्यार का इज़हार किया जाए।"
"कभी विदेश नहीं गए, सिंगापुर ले चलो।"
"सरकारी नौकरी है, विदेश सैर सपाटे के लिए गए तो पीछे लग जायेगें। इंडिया में जहां कह, वहीँ चलते है।"
"फिर कश्मीर चलते हैं।"
कश्मीर की हसीन वादियों और मौसम ने दिलीप और दर्पण को रोमांटिक बना दिया। अधेड़ उम्र में भी दोनों युवा से भी अधिक युवा बने हुए थे। दर्पण का सौंदर्य कश्मीर की हसीन वादी और मौसम के साथ अधिक कामुक हो गया। पंद्रह दिन दोनों के जीवन में यादगारहसीन बन गया।

समय के पंख होते है, कब कहां के लिए उड़ जाये, सिर्फ समय ही जानता है। हसीन वादियों के बाद तपते रेगिस्तान में पंख ले गए दर्पण को। उसकी तबियत ठीक नहीं रहने लगी। कई डॉक्टरों को दिखाया। हाथ से बाहर तबीयत जाती रही। दर्पण के सौंदर्य पर किसी की बुरी नज़र लग गयी। एक दिन तपते रेगिस्तान की रेत पर पैर पड़े और जख्म हो गए। कैंसर का शब्द सुनते दर्पण सदमे में आ गई। दिलीप भी एक बुत बन गए। डॉक्टर ने जो कहा क्या वह सत्य है। कटु सत्य ही निकला। डॉक्टर ने कहा कि कई बार कैंसर बीमारी का पता शुरू में लग जाता है, कई बार बाद में। आपके केस में कैंसर का पता देर से लगा, लेकिन घबराने, परेशान होने की कोई बात नहीं है। इलाज़ है। एक साल तक इलाज़ चलता है। पहले ऑपरेशन, फिर कीमोथेरपी और बाद में रेडिएशन। कैंसर के इलाज़ के लिए रुपये, पैसों की चिंता नहीं थी। दक्षिणा खूब कमाई। दर्पण को अपने सौंदर्य की चिंता थी। एक ग्रहण लग गया। जिस सुंदरता पर इठलाती थी, अभिमान था, वह समाप्ति की ओर था। स्त्री के स्तन उसके सौंदर्य, जिस्म का अहम अंग हैं। उसी को काटना होगा। अधूरे जिस्म के साथ कैसे जिएगी। कई दिन कट गए। दर्पण ने इलाज़ से मना कर दिया कि वह मौत को गले लगा लेगी पर इलाज़ नहीं करवाएगी। डॉक्टर ने समझाया कि क्योंकि कैंसर की तीसरी स्टेज है, इसलिए एक स्तन को अलग करना पड़ेगा। यदि पहले चरण में पकड़ा जाता तो स्तन बच जाता, अब कोई चारा नहीं।

"ज़िन्दगी से मुंह मत मोड़, दर्पण। अभी तक खुद अपने लिए ज़िन्दगी को जिया है। अब औरों के लिए जीना है।"
"और कौन? दर्पण ने शून्य भाव से दिलीप को देखते हुए कहा।
"मेरे लिए, बच्चों के लिए।"
"आप और बच्चे तो अपने हैं। और कौन है।"
"तेरे बिना मैं क्या करूंगा। मेरा जीवन का कोई लक्ष्य नहीं रहेगा। बच्चे छोटे हैं। उनका सोचो। दर्पण तुमको जीना है मेरे लिए और बच्चों के लिए। मेरा मार्गदर्शन करना है। तुम्हारे बिना मैं भी नहीं जी सकता।"
"अपंग शरीर के साथ मैं कैसे जीवन बिताउंगी।"
"मैं हूं तुम्हारे साथ।"
"कहना आसान है पर जीना मुश्किल है।"
"जीवन में अब तक सुख देखे हैं। कुछ दुःख तो सहना पड़ेगा। जीवन में हर किसी को सुख और दुःख बराबर मिलता है। किसी को पहले सुख मिलता है फिर दुःख, किसी को पहले दुःख फिर सुख तो किसी को बराबर साथ साथ मिलता है। जीवन एक सिक्के जैसा है, जिसके एक तरफ सुख और दूसरी तरफ दुःख होता है।" दिलीप के आंखों में आंसू आ गए।
"तुम तो दार्शनिक बन गए हो।" दर्पण ने नाखून कुरेदते हुए कहा।
"पिछले एक महीने से जब से तुम्हारी बीमारी का पता चला है, या तो तुम्हारे साथ तुमको ऑपरेशन के लिए बात करने और राज़ी करने में व्यतीत होता है या फिर धार्मिक पुस्तके पढ़ने में। गीता पढ़ कर आत्म चिंतन कर रहा हूं कि कर्म करने हैं। फल भगवान पर छोड़ दें तो जीवन का उद्धार है। ऑपरेशन करवाना हमारा कर्म है। उसका फल अच्छा मिलेगा। तुम स्वस्थ हो जाओगी। हमें आज का सोचना है, भविष्य परम परमात्मा के लिए है। जो होगा अच्छे के लिए ही होगा।"

दिलीप की सलाह पर दर्पण ने ऑपरेशन के लिए हामी दे दी। ऑपरेशन के लिए दर्पण को हॉस्पिटल में दाखिल करवाया। बेड पर लेटे हुए दर्पण कमरे की छत पर टिकटिकी लगा कर दिलीप को बोली "सुनो, कल सुबह ऑपरेशन है। मेरा दिल डूबा जा रहा है। यह एक बड़ा ऑपरेशन है। पता नहीं मैं बचूं या नहीं।"
दिलीप कुर्सी से उठ कर दर्पण के सिरहाने बैठ कर एक हाथ दर्पण के हाथ पर रखता है और दूसरा हाथ दर्पण के माथे पर। "दिल बड़ा रख, दर्पण। सब ठीक होगा। डॉक्टर ने कहा है कि ऑपरेशन के बाद सिर्फ एक दिन हॉस्पिटल में रखना है फिर सीधे घर। इस तरह के ऑपरेशन में कोई खतरा होता। बस घर पर आराम करना है।"
"मुझे तसल्ली दे रहे हो।" कह कर दर्पण की आंखों में आंसू आ गए और गालों पर छलक पड़े।
दिलीप ने दर्पण के आंसू पोछे और दर्पण के हाथ पर चुंबन ले दर्पण को सांत्वना दी। अचानक दिलीप की नज़र दर्पण के हाथों पर पड़ी। दर्पण के हाथों की लकीरें का कोई पता नहीं। अज़ीब सा हाथ था। उसने दूसरा हाथ देखा। दोनों हाथों की लकीरों ने नया रूप ले लिया था। पूरे हाथ में चोकडी सी कटी फटी लाइनें थी। हर मानव के हाथों में उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को बताती लकीरे होती है। पर आज वो लकीरे नहीं थी। सिर्फ  कटी हुई लकीरों की चोकड़ी से पूरा हाथ भरा हुआ था। दिलीप को हस्त रेखा शास्त्र का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वह सोचने लगा कि दर्पण का हाथ क्या कह रहा है। इन चोकड़ी वाली लकीरों का क्या रहस्य है? क्या बताना चाहती हैं? उसे सावित्री की बात याद आ गई। सावित्री दिलीप के ऑफिस में कंप्यूटर ऑपरेटर थी। उसका छोटा भाई आर्मी में था। नॉर्थईस्ट में एक मुठभेड़ में वह बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था। इलाज़ के लिए उसे दिल्ली लाया गया। आर्मी हॉस्पिटल में उसका इलाज़ चल रहा था। सावित्री को हस्त रेखा शास्त्र में रूचि थी और थोडा बहुत ज्ञान भी था। उसके भाई के हाथ की लकीरे भी ऐसी हो गई थी, जैसी आज दर्पण की हैं। जब कोई जीवन और मौत के बीच झूल रहा होता है, तब उसका हाथ ऐसा हो जाता है। हाथ की लकीरें सब कुछ बताती हैं। सावित्री के कहे ये शब्द उसे याद आ गए। क्या सचमुच दर्पण जीवन और मौत के बीच दो राहे पर है। हां, दर्पण को ज्ञान हो गया है। डॉक्टर तो तसल्ली देते हैं। किसी अनजान दर से भयभीत दिलीप अपने भय को छुपा कर दर्पण को तसल्ली देता रहा। दर्पण की आंखे नम थी। कुछ देर बाद दर्पण को नींद आ गई पर दिलीप की आंखों से नींद उड़ चुकी थी। दर्पण को सोता देख दिलीप ने बत्ती बुझा थी। पूरी रात दर्पण के सफल ऑपरेशन की विनती और प्रार्थना करता रहा।

अगली सुबह पांच बजे दर्पण ने बिस्तर छोड़ा। स्नान किया और प्रार्थना की। वैसे दर्पण पूजा, पाठ कभी कभी करती थी, पर जब से बीमारी ज्ञात हुई, हर रोज़ पूजा, प्रार्थना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया। दिलीप भी प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना समाप्त होने के पश्चात दर्पण ने होले से कहा।
"सुनो, एक बात मानोगे।"
"कहो दर्पण।"
"अभी कुछ देर बाद मेरा ऑपरेशन है। कुछ भी हो, अभी प्रण लो, कि अभी से रिश्वत नहीं लोगे। हम तनख्वाह में गुजारा कर लेंगे। रूखी रोटी सही, प्रभु भक्ति में जीवन व्यतीत करेंगे। शायद हमारा लालच अधिक धन अर्जित करने का, अधिक दक्षिणा लेने का फल ही है जो मुझे भुगतना पड रहा है। स्वर्ग, नरक किसने देखे हैं। सब हम अपने जीवन में इसी धरती पर देखते है। सुख को स्वर्ग और दुःख को नरक समझे।" कह कर दर्पण रोने लगी।

दिलीप ने दर्पण के आंसू पोंछे और सांत्वना दी, कि ऑपरेशन से पहले मन को दुखी न करे। वह प्रण लेता है कि आज से वह रिश्वत नहीं लेगा। सिर्फ काम करेगा। अपनी पूरी निष्ठां से बिना भेदभाव के हर फ़ाइल को उसकी योग्यता के आधार पर देखेगा।

दर्पण का ऑपरेशन सफल रहा। दो दिन बाद दर्पण हॉस्पिटल से घर आ गई। दिलीप ने दर्पण का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा "दर्पण, जो वादा किया है तुमसे, वही होगा। जब मैं ऑफिस जाऊंगा, तब हर काम बिना रिश्वत के करूंगा।" दिलीप ने दर्पण का हाथ देखा। अब चोकड़ी वाली कटफत कुछ कम हो गई थी।
"एक काम और कर दो। बच्चों को अपने पास बुला लो। अब होस्टल में मत रखो उनको।"
"ठीक है, इस साल होस्टल में रहने दो। अगले सत्र में यहीं स्कूल में दाखिला दिला देंगे।"
"अब आप छुट्टी करके घर मत बैठो। कल से ऑफिस जाना शुरू कीजिये। डॉक्टर ने कहा कि मैं सब काम कर सकती हूं।"
"डॉक्टर ने यह भी कहा है, कि थकना नहीं है और भार भी नहीं उठाना है।"
"थोडा थोडा काम करूंगी। थकान महसूस होगी तो आराम कर लूंगी। भारी चीज़ कोई उठानी नहीं है। घर में नौकर है। वह करेगा। वैसे हम दो जान घर में हैं, काम है भी कितना। आप ऑफिस जाइए।"

दिलीप ने एक सप्ताह बाद ऑफिस जाना शुरू कर दिया। दिलीप एक नए अवतार में अपनी कुर्सी पर बैठे। हर फ़ाइल को ध्यान से देखते और अपनी टिप्पणी लिखते। ऊपर अफसर भी गौर से देखते कि दिलीप को क्या हो गया है। फ़ाइल पर टिप्पणी के बाद त्रुटि सुधार के बाद ही आगे की कार्यवाही हो सकती थी। दिलीप ने स्तिथि स्पस्ट कर दी, कि हर जान, मानव को अपने पुण्य, पाप का लेखा जोखा इसी ज़िन्दगी में मिलता है। आप सब जानते है कि मेरे से अधिक भ्रष्ट इस ऑफिस में कोई दूसरा नहीं है। दक्षिणा अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझता था। मैं क्या सभी समझते हैं। पत्नी की बीमारी में खुद अपने आप ज्ञान हुआ कि बहुत हो गया। शायद दक्षिणा का असर था कि पत्नी कैंसर जैसे रोग का शिकार हुई। भगवान का शुक्र है, कि ऑपरेशन सफल रहा। मैंने और पत्नी ने शपथ ली है कि रिश्वत नहीं लूंगा। आप लीजिये पर मुझे मत कहिये। अब अपना मन शांत, स्वच्छ रखना चाहता हूं। इस जीवन में स्वर्ग और नरक देख लिए। मर कर किसने देखे। सब कुछ इसी जीवन में है।

अब दिलीप सुबह साढ़े नौ बजे ऑफिस पहुंच जाते और बिना समय बर्बाद किये काम में जुट जाते। कोई चाय, गपशप पार्टी नहीं, काम ही पूजा है दिलीप के जीवन का लक्ष्य। शाम ठीक छः बजे दफ्तर छोड़ देते। उनके बैग में गीता रहती, फुरसत के पलों में गीता पढ़ते। घर में दर्पण रसोई बनाती और छोटे कार्य करती। बडे काम नौकर करता। फुरसत के पल वह प्रभु की आराधना में व्यतीत करती।

एक दिन दिलीप ऑफिस में फ़ाइल निबटा रहा था। एक पुराने परिचित दिलीप के सामने कुर्सी पर बैठ गए, जिन्होंने दिलीप को कई बार दक्षिणा दी थी। उनकी फ़ाइल पर दिलीप ने टिप्पणी कर कुछ और कागज़ मांगे, जो वो प्रस्तुत नहीं कर सकते थे और मुंह मांगी दक्षिणा देने को तैयार थे।
"सर जी, हमारी फ़ाइल क्यों अटका रखी है। जल्दी फाइनल करो। इस बार बहुत समय ले रहे हो।"
"फ़ाइल पूरी कर दो, मुझे कोई दिक्कत नहीं है।"
"सर जी, आप तो जानते ही है, पहले भी इन्ही कागजों के आधार पर आप काम कर देते थे। अब भी फटाफट कर दीजिये। दक्षिणा तो पूरी मिलेगी। आप तो सब जानते है।"
"पहले की बात कुछ और थी, मैं दक्षिणा लेता था, अब नहीं।"
"मैं कुछ समझा नहीं।"
"यही कि मैंने रिश्वत लेनी छोड़ दी है। अब काम सिर्फ योग्यता के आधार पर ही होगा।"
"सर जी, हमारा क्या होगा?"
"लालच बुरी बला है। मैंने यह लत छोड़ दी है। आप भी ईमानदारी से काम कीजिये और दक्षिणा देकर हमें बेईमान मत बनाइए।"
"सर जी मछली पानी में ही तैरती है। अभी तक की रीत को टूटने न दीजिये।"
"तोड़ नहीं रहा, अपनी राह बदली है। नया रास्ता है। मुझे आनन्द आ रहा है। आप भी चल कर देखिये। किसी का डर नहीं रहेगा। चैन की बंसी बजाइये। उलटे काम बंद कीजिये, न टैक्स वालों के छापे की चिन्ता, न कोई परेशानी।"
"सर जी, उस रास्ते पर नुकीले पत्थर हैं। चला नहीं जाता। दक्षिणा से सभी चाहत संपन्न होती है। आसान ज़िन्दगी जीने में आनन्द है।" कह कर एक लाख रुपये दिलीप की मेज पर रख दिए।
दिलीप ने वो रुपये उन सज्जन के हाथों पर रख कर कहा। "आप गलत मकान का दरवाज़ा खटखटा रहे हो, जहां कोई रहता नहीं।" और दिलीप ने फ़ाइल बंद कर दी।
उस व्यक्ति ने काफी मिन्नतें की परन्तु दिलीप जिस ईमानदारी के रास्ते चल रहा था वहां से वापिस मुड़ना असंभव और नामुमकिन था। उस व्यक्ति ने ऑफिस में दूसरों से बातचीत की, पर कोई बात नहीं बनी। दिलीप बदल चुका था। उसने सोचा कि घर पर बात की जाए और दिलीप की पत्नी को दक्षिणा दी जाए। पहले भी कई बार वह दर्पण को दक्षिणा दे चुका था। वह व्यक्ति तुरन्त दिलीप के घर पहुंचा। दर्पण उसको पहचानती थी। उसके लिए चाय बनाई। चाय पीते पीते एक लाख रुपये की गड्डी दर्पण को देनी चाही। मुस्कुरा कर दर्पण ने रुपये लेने से इनकार कर दिया।
"भाई साहब आपने बहुत बार सेवा की है। अब ईश्वर की आराधना कीजिये। हम बदल चुके है, कुछ आप बदलिये।"
थक हार कर वह व्यक्ति चला गया। शाम को दिलीप घर वापिस आया तब उसे और दर्पण को आत्मसंतुष्टि थी कि वे अपने प्रण पर अडिग रहे और सभी प्रलोभनों से बचे।

एक महीने बाद दर्पण की किमोथैरेपी शुरू हुई। हर इक्कीस दिन बाद छः किमोथैरेपी। दर्द से गुज़रता हुआ समय। सिर के बाल झड़ गए। मजबूत इरादों के साथ सिर पर चुन्नी बांधे घर के काम भी करती रही और किमोथैरेपी के दर्द दायक दौर से गुज़र गई। दर्पण का बदन ढल गया लेकिन खूबसूरती अभी भी कायम थी।
स्कूल का नया सत्र आरंभ हो गया। बच्चे भी होस्टल से घर वापिस आ गए। किमोथैरेपी के बाद रेडिएशन का सत्र शुरू हुआ। पच्चीस दिन रेडिएशन के। उस हिस्से को जला दिया। ढीले ढाले वस्त्रों, सिर पर चुन्नी, हाथ में गीता, दर्पण एक सन्यासी लगने लगी थी। एक वर्ष के कठिन दौर के बाद कैंसर का इलाज़ समाप्त हुआ और दर्पण वापिस अपनी गृहस्थी में लौटी।

दर्पण के सिर पर बालों ने फिर उगना शुरू किया। कुछ समय में बॉय कट बाल हो गए। दिलीप ने दर्पण का हाथ देखा। अब कोई कटी हुई चोकड़ी वाली लकीरें नहीं थी। सामान्य हाथ हो गया और लकीरें भी पहले वाली अवस्था में हो गई।
"दर्पण एक बात मेरी मानो, बॉय कट बाल बहुत अच्छे लग रहे है तुम्हारे चेहरे पर। इनको लंबे मत होने देना।"
"ठिठोली कर रहे हो।" हंसते हुए दर्पण ने दिलीप की बात मान ली।
समय बीतता गया। कल के भ्रस्ट दिलीप की गिनती अब सबसे ईमानदार में होने लगी। सब दिलीप की मिसाल देकर कहते कि काश सब दिलीप की तरह सुधर जाएं। रिटायरमेंट के बाद भी दो दो साल की एक्सटेंशन चार बार दिलीप को मिली।
"यह तुम्हारे प्रण और ईमानदारी का फल है" दर्पण ने मुस्कुराते हुए कहा।


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हुए हैं जब से शरण तुम्हारी , खुशी की घड़ियां मना रहे हैं करें बयां क्या सिफ़त तुम्हारी , जबां में ताले पड़े हैं। सु...