Friday, March 20, 2015

ईमानदार



नाम छेत्रपाल उम्र बारह साल, सातवीं में पढ़ता है। उसके दो छोटे भाई बहन भी उसके साथ स्कूल जाते हैं। एक गरीब परिवार में उसके पिता मोची हैं। एक ऑफिस की बिल्डिंग के बाहर पेड़ के नीचे अपनी दुकान लगाते हैं। मां घरों में साफ़ सफाई का काम करती है। बस गुजरा हो जाता है। घर के पास नगर निगम के स्कूल में बच्चे पढ़ रहे हैं। मां बाप को कोई मतलब नहीं, कि उनके बच्चे स्कूल में क्या पढ़ते है, कौन सी कक्षा में पढ़ते है। पढाई का खर्च सरकारी स्कूल में है नहीं। फीस कोई नहीं। यूनिफार्म, किताबें सरकार की तरफ से और स्कूल में भोजन, खाना भी। बस यही सोच है छेत्रपाल के माता पिता की। बच्चों को स्कूल में खाना मिलता है, यही एक कारण है, बच्चों को स्कूल भेजने का। बच्चे स्कूल चले गए और मां बाप अपने काम धंधे पर। सरकार की नीति है कि आठवीं कक्षा तक किसी बच्चे को फेल नही किया जायेगा। हर साल बच्चे पढे या ना पढे, पास हो कर अगली क्लास में चढ़ जाते हैं। जब तक स्कूल वाले बच्चों को स्कूल से नहीं निकालते, बच्चे पढ़ते जाते हैं।

सरस्वती किस पर मेहरबान हो जाए, किसी को नहीं पता। शिक्षा का अधिकार सिर्फ अमीरों को नहीं है। गरीब भी पढ़ सकते हैं। कभी तो खूब पढ़ते हैं। यहां तक कि आई.ए.एस भी बनते हैं। यहां भी सरस्वती ने छप्पड़ फाड़ा और छेत्रपाल का हाथ पकड़ लिया। कक्षा सात का रिजल्ट आया और सरस्वती की कृपा से छेत्रपाल पूरे कक्षा सात में प्रथम रहा। प्रिंसिपल ने सबके सामने शाबाशी दी और छात्रवृति प्रदान की। नकद पैसे पा कर मां बाप गदगद हो गए। गर्व से सीना चौडा कर सबको बताते फिरे कि उनका पुत्र प्रथम आया है। छेत्रपाल पढ़ता रहा और हर साल प्रथम आता रहा। माता पिता पढ़ते पुत्र पर गर्व करते रहे और अपने काम में नहीं लगाया। पढाई का कोई खर्च नहीं था। ट्यूशन ले नहीं सकता था, क्योंकि घर की आर्थिक  स्तिथी इस लायक नहीं थी कि ट्यूशन फीस भर सके। छात्रवृति मिलती रही और खुद अपने बलबूते पर छेत्रपाल पढ़ता रहा। वैसे तो सरकारी स्कूल में अध्यापकों और प्रिंसिपल को कोई फ़र्क़ पड़ता कि बच्चे पास हों या फेल। परन्तु जब सरस्वती की विशेष कृपा हुई तो अध्यापकों ने छेत्रपाल की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। छेत्रपाल की प्रतिभा देख कर उनको विश्वास हो गया कि छेत्रपाल बारहवी की बोर्ड परीक्षा में मेरिट लिस्ट में नाम ला सकता है, इससे उनका और स्कूल का नाम रौशन हो जायेगा। छेत्रपाल की पढ़ाई में लगन, उसकी मेहनत और अध्यापकों के सहयोग की रंगत सफल हो गई। बारहवीं की बोर्ड परीक्षा छेत्रपाल ने 95 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। माता पिता का सीना चौड़ा हुआ और स्कूल का नाम रौशन हो गया। समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर छेत्रपाल का फ़ोटो उसकी जीवनी के साथ छपी।

छेत्रपाल माता पिता की सीमाएं पहचानता था, इसलिए बोर्ड की परीक्षा के बाद पिता के साथ बैठने लगा। पिता से काम सीखने लगा। पिता का हाथ बटाना उसे अच्छा लगने लगा और आगे उच्च शिक्षा का सपना प्रभु इच्छा के हवाले कर दिया। बोर्ड नतीजे के बाद छपे समाचारपत्र को छेत्रपाल के पिता ने ऑफिस की बिल्डिंग की दीवार पर चिपका दिया, जहां  वे अपनी दुकान लगाते थे।

एक मोची पिता और घरों में काम करने वाली बाई माता का होनहार बालक। अभावों के बीच बेहद गरीब बालक ने सब का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। क्या कोई इसकी मदद को आगे आएगा? छेत्रपाल आगे पढ़ना चाहता था, पर उसके माता पिता उच्च शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ थे। समाचारपत्र में छपे लेख को पढ़ कर बिल्डिंग में एक ऑफिस के मालिक रंगराजन ने अपनी कार बिल्डिंग के पास उस स्थान पर रोकी जहां मोची अपनी दुकान लगाता था और उनके पुत्र छेत्रपाल सहायता कर रहा था। रंगराजन बिल्डिंग की दीवार पर चिपके समाचारपत्र को पढने लगे।

"यह तुम्हारा पुत्र है।"
"जी, आपके सामने है।" मोची ने छेत्रपाल की तरफ ईशारा किया। छेत्रपाल बूट पोलिश के ब्रश और पोलिश की डिब्बियां सजा रहा था।
"इतने अच्छे नंबरों से बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। होनहार हो। पिता का हाथ बढ़ाना चाहते हो या कुछ आगे भी पढ़ना चाहोगे।"
"जी, पढ़ना चाहता हूं परन्तु पिताजी की आर्थिक स्थिति के कारण हाथ बहुत तंग है, कि उच्च शिक्षा का खर्च कैसे उठा सकेंगे।" छेत्रपाल ने शरमाते हुए सिर नीचे रखे हुए कहा।
रंगराजन ने मोची से पूछा "तुम क्या सोचते हो, तुम्हारे पुत्र को आगे पढ़ना चाहिए। तुम क्या चाहते हो?"
"मेरे चाहने से क्या होगा। आगे पढ़ाई का खर्चा कहां से और कैसे पूरा करूंगा।" मोची की आंखों से कहते कहते आंसू छलक गए।

रंगराजन उन दोनों की मन की स्थिति समझ गया, कि पैसों की तंगी से उच्च शिक्षा शायद सपना न रह जाए। रंगराजन ने छेत्रपाल को कहा यदि वह आगे पढ़ने का इच्छुक है तो वह उसकी मदद करेगा। आगे की बात ऑफिस में बैठ कर करते हैं। छेत्रपाल मोची पिता के साथ रंगराजन के ऑफिस गए। मोची और छेत्रपाल पहली बार किसी शानदार ऑफिस बिल्डिंग के अंदर गए। बिल्डिंग की दीवार के साथ सट कर मोची पिछले कई वर्षों से अपना काम कर रहा था।

लिफ्ट से दोनों रंगराजन के साथ ग्यारहवीं मंज़िल पर बने ऑफिस में पहुंचे। पूरी मंज़िल पर रंगराजन का ऑफिस था। एक ओर छोटे छोटे केबिन बने हुए थे, जहां बड़े मैनेजर बैठते है। बाहर बड़े हॉल में स्टाफ कंप्यूटरों पर काम कर रहा था। अंत में एक बहुत बड़े केबिन के बाहर नेमप्लेट लगी थी "रंगराजन, चेयरमैन"। तीनों अंदर केबिन के गए। एक बहुत बड़ी टेबल। रंगराजन अपनी कुर्सी पर बैठ गए। टेबल के दूसरी तरफ छ कुर्सियां थी। रंगराजन ने दोनों को कुर्सी पर बैठने को कहा। केबिन के एक तरफ कांच लगा हुआ था जिससे बाहर सड़क और सड़क के पार का पूरा दृश्य साफ नज़र आता था। एक दीवार पर बहुत बड़ा टीवी लगा हुआ था। रंगराजन ने रिमोट से टीवी ऑन किया और एक बिज़नस चैनेल लगाया। दो मिनट टीवी शो देखने के बाद इण्टरकॉम से तीन कप चाय और बिस्कुट लाने के लिए कहा अपने सेकेट्री से। पांच मिनट के बाद ऑफिस बॉय एक ट्रे में चाय और बिस्कुट लाया और सबके सामने चाय का कप रखा और बिस्कुट की प्लेट। छेत्रपाल रंगराजन का केबिन देख रहा था। एक तरफ अलमारी में बहुत सारी ट्राफी सजी हुई रखी थी।

रंगराजन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा "चाय लो, शर्माओ नहीं। बिस्कुट भी लो।" चाय पीते हुए रंगराजन ने छेत्रपाल को कहा कि यदि वह अपनी लगन, जोश और हुनर के साथ आगे पढ़ना चाहता है तो पूरा ख़र्च रंगराजन देगा और उसके बाद इस ऑफिस में काम करना चाहो तो नौकरी भी। क्या सोच रहे हो?

"मैं आगे पढ़ना चाहता हूं।" छेत्रपाल ने कहा।
"किस विषय में पढ़ाई करना चाहते हो?"
"जी, कंप्यूटर साइंस में पढ़ना चाहता हूं। प्रोग्रामर बनना चाहता हूं। आप कुछ गाइड कीजिये।"
"जिस क्षेत्र में तुम्हारी रूचि है। वही पढ़ो। किस कॉलेज में पढ़ना चाहोगे।"
"कॉलेज नंबर वन है, पर हमारे घर से बहुत दूर है। आने जाने में समय लगेगा और मेट्रो का किराया।"
"तुम चिंता मत करो, कॉलेज फीस के साथ मेट्रो किराया और जेब खर्च भी। तुम अपना ध्यान सिर्फ पढ़ाई में दो। गीता का ज्ञान हमें यही बताता है की हमें सिर्फ कर्म करना है। फल कर्मानुसार प्रभु हमें देता है। तुम एडमिशन लो। एडमिशन के बाद हर महीने तुम मेरे पास बिना किसी झिझक के पहली तारीख को अपना महीना लेने आओगे। मैं अकाउंटेंट को बोल देता हूं, वो हर महीने की पहली तारीख में तुम्हे तुम्हारा महीना दे देगा। अगर कोई तकलीफ हो या कोई भी काम हो। बिना झिझक मेरे पास मिलने आ सकते हो।"

रंगराजन ने छेत्रपाल की पढ़ाई और जेब खर्च का इंतज़ाम कर दिया। छेत्रपाल ने एडमिशन ले कर उच्च शिक्षा का सपना साकार करने में जुट गया। फीस और जेब खर्च रंगराजन के ऑफिस से नियमत मिल रहा था। रंगराजन अपने काम में व्यस्त रहते थे। कभी कभी अकाउंटेंट से छेत्रपाल के विषय में जानकारी लेते रहते थे।

एक वर्ष बीत गया। रंगराजन एकाउंट्स की रिपोर्ट्स देख रहे थे। देखते देखते कुछ याद आया और अकाउंटेंट से छेत्रपाल के विषय में पूछा।

"छेत्रपाल को हर महीने पैसे दे रहे हो न, जैसे मैंने कहा था।"
"जी सर, लेकिन पिछले चार महीने से वो पैसे लेने नहीं आया।"
रंगराजन हैरान हो गया कि चार महीने से छेत्रपाल पैसे लेने नहीं आया। कुछ सोचने के बाद अकाउंटेंट से कहा कि छेत्रपाल के पिता मोची का काम करते हैं बिल्डिंग की दीवार के साथ। उसको सन्देश दो कि छेत्रपाल मेरे से मिले। सन्देश मिलते ही अगले दिन शाम के समय छेत्रपाल रंगराजन से मिलने आया। शाम के छ बज रहे थे। रंगराजन काम में व्यस्त थे। छेत्रपाल को इंतज़ार करने को कहा। एक घंटे बाद सात बजे रंगराजन ने छेत्रपाल को अपने केबिन में बुलवाया।

"गुड इवनिंग सर।" छेत्रपाल ने केबिन में प्रवेश करते हुए कहा।
रंगराजन छेत्रपाल के उससे न मिलने के कारण हैरान था और गुस्से में भी कि उसने छेत्रपाल के उच्च शिक्षा के सपने को साकार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन छेत्रपाल ने उससे मिलना उचित नहीं समझा। एहसान को ये छोटे लोग क्या समझे। किसी भी मदद के लायक नहीं हैं। कहीं पढाई छोड तो नही दी। लेकिन अपने गुस्से को काबू में रख कर रंगराजन ने छेत्रपाल को कुर्सी पर बैठने को कहा और ऑफिस बॉय को चाय, बिस्कुट लाने को कहा। पांच मिनट में चाय की चुस्कियों के बीच रंगराजन ने छेत्रपाल से पूछा।

"मुझसे मिलने भी नहीं आये और चार महीने से पैसे भी नहीं लिए। क्या कर रहे हो?"
सीधा साधे छेत्रपाल रंगराजन की बातों को नहीं समझ सका। सीधी सच्ची बात कहने लगा।

"सर जी, आप हर महीने मुझे जो पैसे देते थे, वे सारे खर्च नहीं होते थे। थोड़े थोड़े करके एक बड़ी रकम की बचत हो गई। इस लिए मैं ऑफिस पैसे लेने नहीं आया। दो महीने पहले प्रथम वर्ष की परीक्षा समाप्त हुई और समर ट्रेनिंग के लिए कॉलेज ने एक कंपनी में दो महीने के लिए भेजा। ट्रेनिंग के साथ मुझे काम करने का वेतन भी मिला। मेरी ट्रेनिंग कल ही समाप्त हुई। यह वेतन का चेक सबसे पहले आपके हाथ में रखना चाहता था।"  कह कर छेत्रपाल ने चेक रंगराजन की ओर बढ़ाया।

रंगराजन ने चेक देखा। मात्र दो हज़ार केवल। देख कर रंगराजन का सारा गुस्सा दूर हो गया। जो रंगराजन छेत्रपाल के बारे में बुरा सोच रहा था, अब उसकी ईमानदारी देख कर हैरान और आश्चर्यचकित हो गया। एक गरीब घर का ईमानदार, मेहनती छात्र ने उसके द्वारा दिए पैसों में से भी बचत की। यदि कोई और होता तो नियमित रूप से पैसे लेता रहता, परन्तु छेत्रपाल ने ईमानदारी से सिर्फ उतने पैसे लिए, जितने की उसको ज़रुरत थी। सीमित ज़रूरतें रखते हुए कम रकम में उसने गुज़ारा किया। रंगराजन ने चेक छेत्रपाल को देते हुए कहा।
"बेटे, यह तुम्हारी पहली कमाई है। इसको खर्च नहीं करना। बैंक में खाता खुलवा कर जमा कर दो। तुम्हारी फीस का जिम्मा मेरा है।"
"सर जी, अगले सप्ताह मेरा रिजल्ट है, सेकंड इयर की फीस में इस चेक की रकम इस्तेमाल करूंगा। थोड़ी बची रकम भी है, बाकी आपसे लेने अवश्य आऊंगा।"
"जैसा तुम उचित समझो।" रंगराजन ने छेत्रपाल की ईमानदारी को देखते हुए कहा।

एक सप्ताह बाद रिजल्ट आया। छेत्रपाल पूरी यूनिवर्सिटी में प्रथम रहा। मार्कशीट को देख कर रंगराजन की आंखों में आंसू आ गए। होनहार  छेत्रपाल  ने लगन, मेहनत और ईमानदारी से रंगराजन का दिल जीत लिया। मार्कशीट हाथों में लेकर रंगराजन ने छेत्रपाल को गले से लगाया।

"वेल डन, छेत्रपाल।" रंगराजन की आंखें गीली थी।
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