Thursday, March 26, 2015

बडे बोल



बचपन में कभी नाई की दुकान नहीं गए। उस समय नाई घर आते थे। शेव, कटिंग, जिसे हज़ामत कहते थे, सभी की घर पर होती थी। नाई को कहना होता था कि उस दिन आना, फिर घर में सभी की हज़ामत हो जाती थी। सयुंक्त परिवार में ताऊ, चाचा, पिता जी, सभी भाई और उनके बच्चे लाइन में एक के बाद एक सभी निबट जाते थे। दो तीन घंटे नाई के लगते थे। नाई सिर्फ बाल ही नहीं काटता है, वह हरफनमौला है। सभी विषयों पर बात करता है। राजनीति से लेकर व्यापार, सिनेमा और कुछ आप के घर की और कुछ दूसरों के घर की। घर घर जाकर पैनी नज़र से सिर्फ बाल ही नहीं काटे जाते, हर उस चीज़ पर नज़र होती, जहां आप सोच भी नहीं सकते। बच्चे जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते, नाई चाचा रिश्तों की झड़ी लगा देते। आधे रिश्ते तो नाई ही करवाते थे।

अब वो बात कहां। न सयुंक्त परिवार रहे, कि नाई घर घर जाकर हज़ामत बनायें। थक हार कर खुद की दुकान खोल ली, कि जिसने बनवानी हो, खुद चल कर उसके पास आये। दुकान पर रेडियो और टीवी भी रख लिया, जो कतार में है, रेडियो सुन ले, टीवी देख ले। हां समाचार पत्र नाई की दुकान का अहम हिस्सा है। तस्सली से पढ़िए। अब नाई की दुकान मत कहिये, जनाब, सैलून है। चाहे सैलून कहिये, पर काम वही पुराना, हज़ामत, बाल काटना, शेव बनाना और चम्पी इत्यादि। साथ साथ बातों का दौर चलता रहता है। किसी भी विषय पर बात कर लीजिये, पूरे हरफनमौला होते है ये नाई। अफ़सोस कि रिश्ते जोड़ने का काम बेचारे आजकल इंटरनेट साइट्स ने हतिया लिया है।

दुकान के बाहर बोर्ड लगा है 'टिप टॉप हेयर सैलून'। बोर्ड पर रणबीर कपूर और शाहरुख़ खान के फ़ोटो ऐसे लगे थे, जैसे सारे फ़िल्मी सितारे वहीँ बाल कटवाने आते हैं। दुकान में एयर कंडीशनर लगा हुआ है। सतबीर ने दरवाज़ा खोला और सैलून के अंदर गया। दो नाई काम पर लगे हुए थे। एक नाई किसी की शेव कर रहा था और दूसरा एक बच्चे के बाल काट रहा था। एक सज्जन कतार में इंतज़ार कर रहे थे। सतबीर खाली कुर्सी पर बैठ गया।

"कितना समय लगेगा।"
"बैठिये, बस पांच मिनट में आपका नंबर आ जायेगा।"

सतबीर ने वहां पड़े अखबार को उठाया और पढ़ने लगा। तभी पांच मिनट बाद, जैसा कि नाई ने कहा था, शेव बनवाने वाले सज्जन शेव करवा के चले गए और सतबीर कुर्सी पर बैठ कर बोला "बाल काटने है, फिर शेव और फेसिअल करते हो, क्या?"
"जी जनाब, यह सम्पूर्ण सैलून है। आप हुक्म कीजिये, ताबेदार तैयार है।"
"अगर काम में मज़ा नहीं आया, तो देख लो, पेमेंट नहीं दूंगा।" सतबीर ने रौब डालने के लिए कहा। वैसे भी सतबीर को ज्यादा बोलने और वो भी बात को बढ़ा चढ़ा कर बोलने की आदत थी। तिनके का पहाड़ बनाना उसके बांए हाथ का खेल था।
नाई ने मन ही मन सतबीर को दो चार मां बहन की भदी गलियां दी कि बड़ा आया पेमेंट न देने वाला। नाइयों से भी कोई बच कर निकला है पर चेहरे के हावभाव से प्रकट नहीं होने दिया "जनाब, जैसे आपकी इच्छा। पूरी तसल्ली के बाद पेमेंट करना वरना सब फ्री में।" कह कर नाई ने बाल काटने शुरू किये।
"क्या नाम है तुम्हारा।" सतबीर ने नाई से पूछा।
"शमशाद।" नाई ने कहा। वैसे मानना पड़ेगा कि नाई हरफनमौला होते है। बहुत सफाई से बाल भी काटते हैं और साथ साथ बातचीत भी होती रहती है।
"सर जी, आपका नाम।"
"सतबीर कहते हैं, जनाब को।"
"बड़ा धाकड़ नाम है आपका।"
"हम भी कोई ऐरे गैरे नहीं है। जैसा नाम वैसा काम। जो भी काम करते है, धाकड़ ही करते है।" सतबीर ने अकड़ कर कहा।
"सर जी, मैंने तो पहले ही भांप लिया था, जैसे आपने सैलून में एंट्री मारी, सर जी, एक दम धाकड़।" नाई शमशाद ने कानों को हाथ लगाते हुए कहा "सांई झूठ न बुलवाये।"
"सांई भक्त लगते हो।"
"सबका मालिक है सिर्फ एक और वो नाम है सांई बाबा।"
"फिर तो हम एक हुए। मैं तो सांई का पक्का भक्त हूं।" सतबीर ने नाई शमशाद से कहा।
"आपको पहले देखा नहीं, शायद पहली बार हमारे सैलून पर आए हैं।" शमशाद ने बाल काटते काटते बातों का सिलसिला शुरू किया।
"बिलकुल ठीक पहचाना। पहली बार इस सैलून में आया हूं। आने वालों पर पैनी नज़र रखते हो।" सतबीर ने कुछ व्यंगयात्मक अंदाज़ में कहा।
"सर जी, सभी ग्राहकों को हम व्यक्तिगत सेवा देते हैं। आप दिन, समय बताइये, आपके लिए उस समय कुर्सी का आरक्षण हो जायेगा। हम तो आपके समय पर आपके घर भी आ कर आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं। इसीलिए सबका ख्याल रखना पड़ता है।" शमशाद ने सतबीर के बालों की कट्टिंग समाप्त करते हुए कहा।
"बाल तो ठीक काटते हो। अब शेव कर दो।"
शमशाद ने शेव करनी शुरू की। "सर जी, रिहाइश कहां रखी हुई है।"
"न्यू मॉडल कॉलोनी।"
"वहां तो सर बड़े महंगे घर हैं।"
"मकान कह कर तौहीन न करो। कोठियां हैं वहां।"
"सर जी वह भी बड़ी बड़ी।"
"पांच सौ गज़ से कम कोई कोठी नहीं है वहां।" सतबीर ने रौब से कहा।
"बिलकुल सही फ़रमा रहे हो सर जी, बड़े आदमी ही वहां कोठियां खरीद सकते है। खास आदमियों की खास कॉलोनी बड़े प्यार से सरकार ने बनाई हैं। मज़ा आ जाता है वहां से गुज़र कर। हम तो कोठियां देख कर ही खुश हो जाते है, सर जी आपको तो वहां रह कर स्वर्ग का आनन्द आता होगा।"
"बिलकुल ठीक समझा। स्वर्ग है पूरा स्वर्ग।"
शमशाद ने कहा "सर जी, शेव भी हो गई। हेयर कलर और फेसिअल भी कर दूं।"
"हां भाई हां, फेसिअल तो करवाना है। चलो, अब तुम्हारी इच्छा हेयर कलर करने की है, तो कर दो।"
शमशाद ने फेसिअल और हेयर कलर भी कर किया।
"शमशाद, काम अच्छा करते हो, कितने पैसे हुए।"
"सर जी, सात सौ पचास।"
सतबीर ने एक हज़ार का नोट दिया तो शमशाद ने बाकी दो सौ पचास वापिस किये तो कालर ऊपर कर के सतबीर ने कहा "यह रख लो, इनाम है, जब काम अच्छा है तो इनाम बनता है। पूरा हक़ है इनाम का।" कह कर सतबीर सैलून से बाहर आ गया। इतना इनाम शमशाद को आज पहली बार मिला था। कई सालों से नाई का काम कर रहा था, आज पहली बार इतना बड़ा इनाम मिला। इनाम पा कर शमशाद फूला नहीं समाया जा रहा था। सैलून के दूसरे नाई भी सतबीर के बारे में बातें करने लगे, कि सतबीर ज़रूर धन्ना सेठ है।
बाहर सतबीर ने अपनी कार स्टार्ट की। सतबीर कोई धन्ना सेठ नहीं था। उसको एक बीमारी थी, वह बड़े बोल बोलने की। अधिक बढ़ा चढ़ा कर बात करने की आदत थी। अपने स्टेटस को बड़ा बताने में शान समझता था। सतबीर एक साधारण परिवार से था। गांव में ज़मीन बिकी। बिल्डर्स ने कॉलोनी काटने के लिए ज़मीन खरीदनी शुरू की, तो अच्छे दाम मिल गए, पर पूरी रकम सतबीर को नहीं मिली। दो भाई और पिता। चार हिस्से हो गए। ज़मीन बिकने से पहले सतबीर खेती में पिता और भाईओं का साथ बटाता था। अब ज़मीन बिकने के बाद सतबीर अपना हिस्सा लेकर शहर आ गया और प्रॉपटी डीलर का काम चालू किया। न्यू मॉडल कॉलोनी शहर की कीमती रिहाइश के रूप में विकसित हो रही थी। यहीं सतबीर ने एक कोठी की बरसाती में किराये पर रहना शुरू किया। रहता तो किराये पर था और वह भी कोठी की तीसरी मंज़िल पर बनी बरसाती पर, पर दिखावा ऐसा था, कि अपनी खुद की कोठी हो। जिससे मिलता, अपने अमीर होने की छाप छोड़ता। प्रॉपर्टी डीलर का काम कर रहा था सतबीर, काम के सिलसिले में किसी से भी मिलतापहले अपनी अमीरी के चर्चे करता। एक पॉश कॉलोनी का पता और ऊपर से ऑडी कार में घूमना। सतबीर को जब जमीन बिकने पर रकम का हिस्सा मिला तो एक अच्छी हालात में पुरानी ऑडी कार खरीदी और अमीर आदमियों की श्रेणी में शामिल करवा लिया।

बहुत जल्द सतबीर की अमीरी के चर्चे चारों तरफ उड़ने लगे। राई का पहाड़ सतबीर ने खुद बनाया था। पहाड़ का हिमालय पर्वत लोगों ने बना दिया।

सतबीर का एक लड़का सात साल का और एक लड़की पांच साल की, ये दो बच्चे थे। दोनों को सतबीर ने अच्छे मंहगे स्कूल में दाखिल करवाया। ज़मीन से मिली रकम से अमीरी के जलवे सतबीर दिखा रहा था। प्रॉपर्टी डीलर का काम भी चल निकला। हालांकि जितना सतबीर दिखावा करता था, उतना सतबीर के पास नहीं था। सतबीर की पत्नी सीमा भी बातें छोड़ने में सतबीर से दो कदम आगे चल रही थी। महिला मण्डली और आस पड़ोस और स्कूल में अमीरी की पतंग बहुत ऊपर चढ़ा दी थी।

एक प्रॉपर्टी के सौदे में सतबीर को बहुत फायदा हुआ। उस सौदे में दो और प्रॉपर्टी डीलर्स होड़ में थे पर सतबीर ने कांटे के मुकाबले में सौदा हथिया लिया। एक मोटी रकम के लाभ ने सतबीर के दिमाग को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। अमीरी के चर्चे और अधिक होने लगे।

संसार में पाये जाने वाले प्राणियों की भिन्न भिन्न जातियां, प्रजातियां होती हैं। ढूंढो एक, आपको अनेक मिल जाती हैं। हर जाती अच्छी लगती है। कुछ इंसान लक्ष्मी को छुपा कर रखते हैं। जितनी भी अधिक हो, किसी को भनक नहीं लगने देते, कि कितनी लक्ष्मी के स्वामी हैं। बहुत संभाल कर रखते हैं। भाई साब, एकदम ठीक करते हैं, चंचल स्वाभाव की लक्ष्मी कब दूसरे के घर चली जाए, पता ही नहीं चलता, इसलिए तिजोरी में मोटे मोटे ताले लगा कर रखे जाते हैं। बुढ़ापे के लिए और बच्चों, पोते, परपोतों के लिए, जितनी अधिक लक्ष्मी छोड़ जाएं, कम ही लगती है। खूब पूजा करते है। कुछ इंसान इसके विपरीत होते है, लक्ष्मी का दिखावा करते हैं। भाई चंचल स्वाभाव है लक्ष्मी का, खूब इस्तेमाल करो। कल की चिंता नहीं, किसने देखा है, कल। जियो आज और आज में। इससे पहले कि लक्ष्मी कहीं और रुक्सत हो, निचोड़ लो। अंत में एक और प्रजाती होती है, उसमें सतबीर जैसे प्राणी पाये जाते हैं। पल्ले हो या ना, दिखावा खूब करते हैं। बढ़ा चढ़ा कर लक्ष्मी का प्रदर्शन करते हैं। अपनी बातों, चमक धमक से दूसरों को प्रभावित कर देते है, कि खानदानी अमीर सिर्फ वोही हैं, और कोई उनका मुकाबला नहीं कर सकता। वैसे उनके अंदर दमखम नहीं होता, सिर्फ खोखलापन होता है। झूठी शान में जीना उनका मकसद होता है। क्यों जीते हैं झूठी शान में, क्या मिलता है झूठी शान में। किसी से नीचा दिखना नहीं चाहते। हर किसी से आगे दिखना चाहते हैं। उनके बदन में खुजली होती रहती है, वह खुजली मिटती है, अहंकार से, झूठी शान से।
सतबीर भी इसी खुजली का शिकार है। ये लोग अपने रिश्तेदारों से दूर रहते हैं, क्योंकि उनको इस प्रजाति की अंदर की जानकारियां होती है और अपनी झूठी शान की छाप नहीं छोड़ सकते हैं। सतबीर गांव से शहर रहने लग गया। कोई रिस्तेदार नहीं, जो कुछ कहेगा, दूसरा सच ही मानेगा। जब तक आप उनको झूठा साबित नहीं कर सकते, उनका हर कथन सत्य वचन। उनके वचनों को आप झूठा कह नहीं सकते और उस प्रजाति का हौंसला बढ़ जाता है और अधिक झूठ को सच में बदलने के लिए।

अब तो प्रॉपर्टी के सौदे में एक मुस्त रकम अच्छी खासी मिली। नाई शमशाद के सैलून में गुणगान कर रहा था, तभी एक सज्जन सैलून में आये और अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। समाचारपत्र पढ़ते हुए कान में सतबीर के वचन गूंज रहे थे। सतबीर जब सैलून से बाहर निकला तब वे सज्जन शमशाद की कुर्सी पर बैठ गया और बैठते ही शमशाद से पूछा। "इस चीज़ के बारे में विस्तार में बताओ।"
"सलाम साब, बड़े दिनों में दिखाई दिये।" शमशाद ने खुशामद करते हुए पूछा।
"मेरी मत पूछ, तुझे पता ही है, अपना तो आना जाना लगा रहता है। ससुराल जाओ तब बाहर की दुनिया से कट जाते हैं। इस चीज़ के बारे में बता।"
शमशाद ने विस्तार से सतबीर की खबर बताई।
"इस बार तो मोटा हाथ लगा है। कसम लंगोट वाले की, तभी कहूं, कि बाई हथेली क्यों खुजा रही है।"

इन सज्जन का नाम बंटू था। छटे बदमाशों में गिनती होती है। चोरी, डकैती और अपहरण के कई मामले दर्ज़ हैं, बंटू के नाम। बंटू के गुरु लंगोट पहनते थे, इसलिए बंटू का तकिया कलाम कसम लंगोट वाले की था। अपहरण के एक मामले में छूट कर दो दिन पहले ही ससुराल से घर की वापिसी हुई है और आते ही बाई हथेली खुजला गई। बिना सबूत के कोई केस नहीं बना। कौन बंटू के खिलाफ गवाही दे। जान अपनी, बीवी, बच्चों की सबको प्यारी होती है। धमकी मिलते ही सभी गवाह मुकर गए। साब जी बाइज़्ज़त घर आ गए।

"शमशाद सतबीर की पूरी गतिविधियों की खबर चाहिए। बाकी मैं देख लूंगा।"
"साब जी, काम तो कर दूंगा, परन्तु दीवारों के भी कान होते हैं। यहां नहीं, अड्डे पर बातें होंगी।" शमशाद ने बंटू के कान में फुसफुसाते हुए कहा।
"ठीक है, रात को आ जईओ।" कह कर बंटू चला गया।

शमशाद नाई के काम के साथ साथ बंटू का मुखबिर भी था। इलाके की सभी ख़बरें बंटू तक पहुंचता था। पहले भी नाई हर घर की खबर रखते थे, आज भी हर ग्राहक की, जो उनके सैलून में आते हैं। सतबीर की सच्चाई सिर्फ सतबीर ही जानता था। पल्ले दाने कम थे, पर ठाटबाट किसी रईस से कम नहीं। हर किसी पर अपनी बेहताशा दौलत की छाप छोड़ रखी थी। यही छाप शमशाद ने बढ़ा चढ़ा कर बंटू को बताई।

रात शमशाद बंटू के पुराने अड्डे उसके घर गया। बंटू के साथ उसकी मेहबूबा सलमा थी। बंटू बिस्तर पर अधलेटा था। सलमा उसके लिए शराब का पैग बना रही थी। समय लगभग साढ़े नौ का, तभी शमशाद वहां पहुंचा। दरवाजे पर डोरबेल बजाई।

सलमा से शराब का गिलास लेते हुए बंटू ने कहा "खोल दरवाजा, शमशाद होगा।"
"बहुत यकीन से कह रहे हो।"
"जो भी कहता हूं, करता हूं प्रिय यकीन के साथ, पूरे आत्मविश्वास के साथ।"
सलमा उठी और दरवाज़े के होल से पहले देखा, जब यकीन हो गया कि शमशाद ही है, तब दरवाज़ा खोला। शमशाद अंदर आया, सलमा को देख कर एक पल के लिए रुका, पर फिर बंटू के पास मूड़े पर बैठ गया।
"अमा यार, तुम तो तक़ल्लुफ़ कर रहे हो। कुर्सी पर आराम से बैठो फिर बात करते हैं।"
शमशाद कुर्सी पर बैठ गया।
"सलमा, लौंडे के लिए एक तगड़ा पैग बना। मैं साले की आदत जानता हूं। ऐसे खुलेगा नहीं।"
सलमा ने पैग बना कर शमशाद को दिया। शमशाद हुस्न की परी सलमा को देखता रह गया।
"आंखें फुड़वानी हैं। इतना घूर के न देख। गोटियां निकाल दूंगा।" बंटू ने शमशाद की कान मरोड़ते हुए कहा।
शमशाद शर्मा गया और खिसिया कर बोला "मेरी क्या मज़ाल की सलमा बहन को गलत निगाह से देखूं। बहुत दिनों बाद देखा, आज तो कयामत ढा रही हैं। बस कयामत देख रहा था।"
"अब पैग सलटा और मुद्दे पर आ जा, जिसके लिए बुलाया है।"
"वो सलमा जी।"
"अबे घबरा मत, सलमा और मेरे में कोई फ़र्क़ नहीं। इस किस्से में सलमा का अहम रोल है, उसके बच्चे उठाने है।"

शमशाद ने सतबीर के बारे में पूरी बात बताई। सतबीर की कोठी और बच्चों के बारे में, किस स्कूल में पढ़ते हैं। सतबीर की अमीरी के चर्चे कुछ बड़ा चढ़ा कर बताये। दुनिया का असूल है। दो से तीन के पास बात जाती है तो असल तो रहता नहीं, झूठ मिल जाता है। ऊपर से सतबीर ने खुद ही झूठ के पुलिंदे का जाल फैलाया हुआ था। सतबीर के बारे में बातें सुन कर बंटू ने शमशाद को कहा "सलमा को उसके बच्चों का स्कूल दिखा दे। घर बता दे। उसकी पत्नी की किटी पार्टी में सलमा खुद पहुंच जायेगी।"

"जो हुकुम सरकार, हम तो आपके ताबेदार हैं। मालिक जरा हाथ तंग है आजकल।" कह कर शमशाद ने सिर थोडा झुकाया।
"अबे सीधा कह, एडवांस चाहिए। हाथ तंग है, साला बात करता है।" फिर थोड़ी देर तक शमशाद की आंखों में आंखें डाल कर सलमा को आवाज़ दी। "जेब गरम कर इसकी, वर्ना नीयत बिगड़ जायेगी इसकी। दस हज़ार दे, बाकी परवाह न कर, मोटा निकालेंगे और मोटा दूंगा। चिंता न कर।"
दस हज़ार जेब में ठूंसते हुए हलकी मुस्कान के साथ शमशाद ने विदाई ली।

शमशाद के जाने के बाद बंटू ने सलमा को अपनी बांहों में भरते हुए कहा "प्रिय कल से अपनी ड्यूटी संभालो। यह काम जल्द से जल्द करना होगा। वकीलों ने जेब में छेक कर दिया है। कुछ सालों का प्रबन्ध सतबीर करेगा। लक्ष्मी चंचल हम जानी। उसके घर बदलने का समय आ गया है। तिजोरी नहीं बांध सकेगी लक्ष्मी को।" कह कर बंटू कुटिल मंद मंद मुस्कुराने लगा। सलमा और समीप हो गयी और बंटू की कुटिल मुस्कान में भागीदार।

अगले दिन से सलमा ने सतबीर की पत्नी सीमा से नज़दीकियां बढ़ानी शुरु की। सीमा सतबीर से दो कदम आगे ही रहती थी। अपनी बढ़ाई में उसने सतबीर को पीछे छोड़ दिया। सलमा सीमा और उसके दोनों बच्चों की गतिविधियों पर पूरी नज़र रखी हुई थी। कब क्या और कहां करते हैं सलमा ने पूरी पकड़ रख ली। सीमा के साथ दोनों बच्चों के साथ अच्छी घनिष्ठा कर ली। बंटू और शमशाद ने सतबीर पर नज़र रखी हुई थी।

एक महीने बाद दोपहर के समय स्कूल से वापिस आने का समय हो गया। सतबीर की कार में स्कूल से दोनों बच्चे बैठे। बंटू ने कार के दो टायर पंक्चर कर दिए। सतबीर का ड्राईवर परेशान हो गया। तभी प्लान के मुताबिक सलमा आई और ड्राईवर को कहा कि वह कार के टायर ठीक करवा ले। बच्चों को वह घर छोड़ देगी। सलमा आंटी को बच्चे और ड्राईवर को जानते थे। ड्राईवर कार टायर ठीक करवाने लगा। बच्चे सलमा के साथ कार में बैठ गए। बच्चे घर नहीं पहुंचे। ड्राईवर ने बताया कि बच्चे सलमा के साथ हैं। शाम तक सीमा ने ध्यान नहीं दिया और पार्टियों में व्यस्त रही। रात को भी बच्चे घर नहीं आये तो सलमा को फ़ोन मिलाया पर उसका फ़ोन बंद मिला। सलमा का पता सीमा की मित्र मण्डली में किसी को नहीं था। चारों तरफ हाथ पैर मारने के बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। सतबीर और सीमा के होश उड़ गए कि सलमा के साथ बच्चे कहां गए। बच्चे क्योंकि सलमा को जानते थे, वे भी बेफिक्र थे। प्लान के मुताबिक सलमा बच्चों को दूसरे शहर बंटू के ठिकाने पर ले गयी। बच्चों की पूरी तरह से आवभगत हो रही थी। तीन दिन तक कोई खबर नहीं, फिर चौथे दिन फिरोती का फ़ोन सतबीर को आया, पूरे पांच करोड़ रूपए।

पांच करोड़ की मांग सुनते ही सतबीर और सीमा के होश उड़ गए। दोनों सोच रहे थे कि क्या करे। उनको विश्वास नहीं हो रहा था कि सलमा अपहरण में शामिल है। पांच करोड़ की औकात ही नहीं थी। हिसाब लगाया तो एक करोड़ से अधिक जुटा नहीं सकते। पुलिस में खबर की तो पुलिस हरकत में आ गई। फ़ोन कॉल की लोकेशन को पता करने के लिए टेलीफोन कंपनी को कहा। उधर बंटू ने सात घाट का पानी पिया हुआ था। दो तीन अड्डे बदल लिए। बच्चे यह सोच कर खुश थे कि आंटी के साथ घूम रहे हैं।

बच्चों के अपहरण पर सतबीर आसमान से ज़मीन पर आ गया कि उसके पास कभी भी इतनी रकम नहीं रही। गांव की ज़मीन बिकने पर एक करोड़ उसके हिस्से आया, जिसमे से काफी रकम अपने खुद को अमीर दिखाने में खर्च हो गई थी। प्रॉपर्टी की दलाली में कुछ बनाया पर पांच करोड़ तो खुद को बेच कर भी नहीं जुटा सकता। शमशाद सतबीर पर पूरी नज़र रखे हुए था। पल पल की खबर बंटू को पहुंच जाती थी। बंटू ने सतबीर को धमकी दी कि पुलिस को बीच में डालने पर दोनों बच्चे खत्म कर दिए जाएंगे। पुलिस ने तब तक बंटू और सलमा को घेरना शुरू किया। बंटू बच्चों को मार कर फिरौती की रकम से हाथ नहीं धोना चाहता था। सतबीर की असलियत सब को मालूम हो गई। दोस्तों, परिवार जनों और आस पड़ोस में सबने सतबीर और सीमा को दोषी माना। खुद अपने बुने जाल में फंस गए। परिवार में उसके भाई, बहनो ने उसे सलाह दी कि पुलिस के चक्कर में न फंसे। कहीं बच्चों से हाथ न धोना पड़े। अगला फ़ोन आए तो अपनी माली हालात बता कर बच्चों को छुड़वा ले।

बदहवास हालात में सतबीर और सीमा को कुछ नहीं सूझ रहा था। शमशाद एक दिन सतबीर के घर हालात का मुआइन करने गया।
"साब जी, बहुत दिनों से आपको देखा नहीं। सोचा तबियत का हालचाल पूछता चलू।"
सतबीर दहाड़े मार कर रोने लगा। उसने सब कुछ शमशाद को बताया।
"जनाब, जान की सलामती चाहता हूं, कुछ कहूं।"
"डूबते को तो तिनके का सहारा भी होता है। कुछ तो सलाह दो। मुझे अपने दोनों बच्चे चाहिए। मेरी मदद करो, शमशाद।"
"मेरे सैलून पर बंटू आते है। अभी अभी ससुराल से बाहर आए हैं। कहो तो उनसे मिलवा दूं। बदमाशों को सब पता होता है। एक दूसरे के साथ मिलना जुलना, उठना बैठना, आप तो समझ सकते हैं।"
"कब मिलवा सकते हो।" सतबीर उतावला हो गया। उसकी खोपड़ी में तुरंत बात बैठ गई कि पुलिस कोई मदद न कर सकेगी। कोई छटा बदमाश शायद समाधान दे सके।
शमशाद ने सतबीर की मुलाकात बंटू से करवा दी। बंटू सतबीर की आर्थिक स्थिति भांप रहा था और सतबीर अनजान कि बंटू ने ही उसके बच्चों का अपहरण किया है।
"सतबीर भाई, ससुराल में से कई गैंग ये काम करते हैं। पुलिस वाले उनसे मिले हुए होते हैं। पुलिस से तो उम्मीद मत रखना। मैं पता लगता हूं कि कौन सा गिरोह इसके पीछे है। भाई साब, अपहरण एक गिरोह करता है और बेच दूसरे को देता है। कई बार तो तीन चार गिरोह शामिल होते हैं।"
"आपका ही सहारा है। मदद कीजिये।" रोते रोते सतबीर बंटू के पैरों से लिपट कर गिड़गिड़ाने लगा।
"मैं आपका दर्द समझता हूं। मैं अति शीघ्र मामले के तह तक पहुंचता हूं।" बंटू ने सतबीर के जख्मों पर मल्लम लगाई।
सतबीर ने एक करोड़ रुपये की अटैची बंटू के क़दमों में रख दी। बंटू ने अटैची पकड़ते हुए सतबीर को सांत्वना दी, कि वह हौसला रखे। बंटू ने दो दिन तक सतबीर को बातों में उलझाए रखा। बंटू ने सुनिश्चित कर लिया कि पुलिस से सतबीर दूर रहा। दो दिन बाद बंटू सतबीर से "मैंने सब मालूम कर लिया है, यह काम जिस गैंग ने किया है, बहुत जालिम है। यदि पुलिस के पास गए तब तो बच्चों को बचाना मुश्किल है। रकम भी वसूल लेंगें और बच्चे भी नहीं देंगे।"
"नहीं नहीं, हम पुलिस को कुछ नहीं कहेंगे। हमें हमारे बच्चे चाहियें।" सतबीर और सीमा दोनों बंटू के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगे।

पूरी तसल्ली करने के बाद बंटू शाम को दोनों बच्चों के साथ सतबीर के घर आया।

"भाई साब, दीवाली मनाइये, मिठाई खिलवाईए। आपके दोनों बच्चे आपके साथ।"
बच्चों को वापिस पाकर दोनों सतबीर और सीमा की आंखों में आंसू आ गए। अगले ही दिन सतबीर और सीमा अपने बच्चों के साथ वापिस गांव चले गए। दोनों को बड़बोलेपन का सबक मिल गया।

रात का समय था सलमा बंटू की बाहों में झूल रही थी, तभी डोरबेल बजी।
"आ गया, कबाब में हड्डी। शमशाद होगा। दरवाज़ा खोल।" दरवाज़ा खुलने पर शमशाद अंदर आया और सिर झुका कर कान खुजाते लगा लेकिन बोला कुछ नहीं।
"बोलियो कुछ मत, राई का पहाड़ बना कर मुझे बात बताई। मजा नहीं आया। पांच सोचे थे, मिला एक।"
"हुज़ूर मैं क्या कर सकता था, पठ्ठे ने खुद ही नकली हवा उड़ा रखी थी। हर कोई सच मानता था।"
"चल ज्यादा नहीं थोड़े में गुजारा कर। सलमा अलमारी से लिफाफा निकाल कर नज़राना भेंट कर। पूरे एक लाख हैं।"

"मालिक, हम तो आपके ताबेदार हैं। आगे भी मौका देते रहना।" कहते हुए शमशाद ने लिफाफा जेब में रखा और सीढ़ियां उतरने लगा।
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